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    अंतर्राष्ट्रीय कुद्स दिवस

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    पवित्र रमज़ान धीरे-धीरे अपने अंत की ओर बढ़ रहा है और इस्लामी जगत, पवित्र रमज़ान के अंतिम शुक्रवार को एकजुट होकर पुनः ज़ायोनी शासन की वर्चस्ववादी प्रवृत्ति का विरोध करने और उसके अस्तित्व को चुनौती देने के लिए तैयार हो रहा है।  पिछले कुछ दशकों के दौरान मध्यपूर्व और इस्लामी जगत को मूलभूत समस्याओं का सामना रहा है अर्थात मुसलमानों की पवित्रतम भूमियों में से एक बैतुल मुक़द्दस में विभिन्न राष्ट्रों के ज़ायोनियों का जमावड़ा और क्षेत्रीय देशों के संदर्भ में उनकी अतिग्रहणकारी और अतिक्रमणकारी कार्यवाहियां।  मध्यपूर्व संकट की महत्वपूर्ण एवं स्पष्टतम समस्या, फ़िलिस्तीन का विषय और फ़िलिस्तीनियों तथा उनके कुछ पड़ोसी देशों विशेषकर लेबनान के साथ इस अवैध अधिकृत ज़ायोनी शासन की युद्धोन्मादी नीतियां हैं।

    वर्ष १९४८ से, जब से ज़ायोनी शासन ने अपने अवैध अस्तित्व की घोषणा की है, फ़िलिस्तीनियों को ज़ायोनी शासन के निरंतर आक्रमणों का सामना रहा है।  इस दौरान लाखों फ़िलिस्तीनियों को अपनी मातृभूमि से पलायन करने पर विवश किया गया और हज़ारों की संख्या में फ़िलिस्तीनियों को ज़ायोनी शासन ने बंदी बनाया।  इसके अतिरिक्त इसी अवधि में बहुत बड़ी संख्या में फ़िलिस्तीनी शहीद हुए और हज़ारों की संख्या में घायल।  ज़ायोनी आरंभ से ही फ़िलिस्तीनियों की भूमियों का विनाश करने, वहां की एतिहासिक वास्तविकता को परिवर्तित करने और फ़िलिस्तीनियों की जनसंख्या के अनुपात में परिवर्तिन के लिए प्रयासरत रहे हैं।

    विश्व में फ़िलिस्तीन ही ऐसा भूभाग है जहां पर इस्राईल के माध्यम से मानवाधिकारों का हनन दशकों से जारी है।  फ़िलिस्तीनियों के विरुद्ध ज़ायोनियों के जघन्य अपराधों के बावजूद, मानवाधिकारों की सुरक्षा का ढिंढोरा पीटने वाले देशों की ओर से इस बारे में न केवल यह कि किसी प्रकार के विरोध का कोई स्वर सुनाई नहीं देता बल्कि इस शासन की अधिक से अधिक वित्तीय एवं सैनिक सहायता की जाती है।

    ज़ायोनी शासन के मुख्य समर्थक के रूप में अमरीकी सरकार ने इस्राईल की सहायता को अपने वार्षिक बजट में सर्वोपरि रखा है।  अमरीका की ओर से ज़ायोनी शासन की इस सहायता, से वे शस्त्र व उपकरण ख़रीदे जाते हैं जिनसे असहाय और अत्याचारग्रस्त फ़िलिस्तीनियों का जनसंहार किया जाता है।

    मध्यपूर्व में परमाणु शस्त्रों के एकमात्र स्वामी के रूप में ज़ायोनी शासन, इस क्षेत्र में अशांति का प्रमुख कारक है।  इस्राईल की गुप्तचर सेवा मोसाद, पिछले कई दशकों के दौरान अपनी गतिविधियों के अन्तर्गत क्षेत्रीय इस्लामी देशों में मतभेद फैलाने के ध्रुव में परिवर्तित हो चुकी है।

    फ़िलिस्तीन के पड़ोस में स्थित लेबनान को, अतिग्रहण से मुक्ति के पश्चात से निरंतर, इस्राईल के युद्धक विमानों के अतिक्रमणों और उनके द्वारा अपनी वायुसीमा के उल्लंघन का सामना है।  वे पश्चिमी देश जिन्हें मानवाधिकारों के समर्थन के अपने दावों के आधार पर लेबनान के विरुद्ध इस्राईल की इन कार्यवाहियों की निंदा करनी चाहिए थी, उन्होंने एसे कार्यों की निंदा के बजाए इस्लामी प्रतिरोध आन्दोलन हिज़बुल्लाह के नाम को ही, आतंकवादी गुटों की सूचि में डाल दिया जो वास्तव में ज़ायोनी शासन की अतिक्रमणकारी कार्यवाहियों का डटकर मुक़ाबला कर रहा है।

    दूसरी ओर सीरिया में बश्शार असद की वैध लोकतांत्रिक सरकार को, जो क्षेत्र में इस्राईल और अमरीका की अतिक्रमणकारी कार्यवाहियों के मुक़ाबले में सदैव अग्रणी रही है, दो वर्षों से अधिक समय से उन हिंसक प्रवृत्ति वाले आतंकवादियों की हिंसक कार्यवाहियों का सामना है जिन्हें पश्चिमी सरकारों का खुला समर्थन प्राप्त है।  लेबनान के हिज़बुल्लाह आन्दोलन और सीरिया की स्थिति भी उस ज़ायोनी शासन के माध्यम से फ़िलिस्तीन की पवित्र भूमि के अतिग्रहण जैसी है, जो पश्चिम के समर्थन से मध्यपूर्व में कैंसर के फ़ोड़े की भांति फैल चुका है और इसने क्षेत्र को शांति से वंचित कर दिया है।

    इन समस्याओं के अतिरिक्त क्षेत्र के अरब देशों की ओर से पश्चिम का अनुसरण एक ऐसा अन्य अत्याचार है जिसे विदित रूप से फ़िलिस्तीनियों के मित्र देशों के रूप में उन्हें सहन करना पड़ रहा है।  लंबे समय से पैट्रो डालरों की आय ने क्षेत्र के शासकों को एसी गहरी नींद सुला दिया है जिससे उनमे अब मित्र और शत्रु को पहचानने की क्षमता भी नहीं रही है।  इन शासकों ने जहां ज़ायोनी शासन को उसके हाल पर छोड़ रखा है जिसके कारण वह अन्तर्राष्ट्रीय मौन से लाभ उठाते हुए प्रतिदिन कोई न कोई अपराध करता रहता है किंतु यही शासक, सीरिया में असद की वैध सरकार को गिराने के लिए अपने भरसक प्रयास कर रहे हैं।  इन परिस्थतियों में क्षेत्र के मुसलमान राष्ट्र, फ़िलिस्तीन की अत्याचारग्रस्त जनता को उनके अधिकार दिलाने में अपनी सरकारों को पीछे छोड़ते हुए विश्व क़ुदस दिवस पर ज़ायोनी शासन और उसके पश्चिमी समर्थकों के विरुद्ध प्रदर्शन के लिए पूरी तरह से तैयार हैं।

    फ़िलिस्तीन के अतिग्रहण के पश्चात फ़िलिस्तीन की अत्याचारग्रस्त जनता को उसके अधिकार दिलाने के संदर्भ में इस्लामी गणतंत्र ईरान के संस्थापक स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ने पहली बार अगस्त १९७० में पवित्र रमज़ान के अन्तिम शुक्रवार को विश्व क़ुद्स दिवस घोषित किया था ताकि विश्व के मुसलमान, इस अवसर से लाभ उठाते हुए फ़िलिस्तीनियों को उनके वैध अधिकारों को दिलाने हेतु अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उनका समर्थन करें।  पिछले तीन दशकों के दौरान फ़िलिस्तीनियों के समर्थन में निकाली जाने वाली विश्वव्यापी रैलियां, प्रतिवर्ष पूर्व की तुलना में अधिक प्रभावशाली ढंग से निकाली जा रही हैं।  वर्ष १९७० में विश्व क़ुद्स दिवस की घोषणा करके स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ने फ़िलिस्तीन के विषय को इस्लामी जगत का ज्वलंत विषय बना दिया है।  स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ने विश्व क़ुद्स दिवस के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा था किः क़ुद्स दिवस, अन्तर्राष्ट्रीय दिवस है।  यह ऐसा दिन नहीं है जो केवल क़ुद्स से विशेष हो।  यह वर्चस्ववादियों से वंचितों के मुक़ाबले का दिन है।  यह उन राष्ट्रों के मुक़ाबले का दिन है जो अमरीकी तथा ग़ैर अमरीकी शक्तियों के वर्चस्व में थे।  यह एसा दिन है जिस दिन वंचितों को वर्चस्ववादियों के मुक़ाबले में संगठित होना चाहिए।  क़ुद्स दिवस वह दिन है जब वंचित राष्ट्रों का भविष्य स्पष्ट हो और वंचित राष्ट्र, वर्चस्ववादियों के मुक़ाबले में अपने अस्तित्व की घोषणा करें।  इस दिन हम सबको, क़ुद्स को स्वतंत्र कराने के लिए अपने भरपूर प्रयास करने चाहिए और साथ ही अपने लेबनानी भाइयों को भी ज़ायोनी दबाव से मुक्ति दिलानी चाहिए।  यह वह दिन है जिस दिन समस्त वंचितों को वर्चस्ववादियों के चुंगल से निकलवाया जाए।  यह वह दिन है जब समस्त इस्लामी राष्ट्रों को अपने अस्तित्व को प्रदर्शित करना चाहिए।