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    अक़्ल बड़ी या भैंस?

    अक़्ल बड़ी या भैंस?
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    प्राचीन काल में एक राजा के चार बेटे और एक बेटी थी। बेटों में से एक बड़ा दुबला पतला, नाटा और कुरूप था। पिता सदैव अपने अन्य तीन पुत्रों पर गर्व करता था किंतु उस नाटे एवं कुरूप बेटे से अधिक प्रेम नहीं करता था बल्कि इस प्रकार का पुत्र होने पर वह अपने को लज्जित महसूस करता था। एक दिन उस बेटे ने अपने पिता के भेदभावपूर्ण व्यवहार पर आपत्ति की और कहा कि पिता जी आपको यह बात जाननी चाहिए कि नाटा विद्वान, लम्बे मूर्ख से बेहतर होता है। ऐसा नहीं है कि जिसका क़द अधिक लम्बा हो उसका मूल्य व महत्व अधिक होता है। राजा यह बात सुनकर प्रसन्न हुआ और उसके बाद से उस बेटे को अपना पिता के निकट विशेष स्थान प्राप्त हो गया। सभी यह बात जान गए कि वह अत्यंत ज्ञानी, चतुर और बातों से मन मोह लेने वाला व्यक्ति है। इसी प्रकार कई वर्ष बीत गए और एक दिन पड़ोसी देश के सिपाहियों ने उनके देश पर आक्रमण कर दिया। युद्ध में राजा के तीनों हट्टे कट्टे और शक्तिशाली बेटों ने सैनिकों को आगे बढ़ाया और स्वयं उनके पीछे रहे किंतु नाटे बेटे ने अपने सैनिकों के साथ आगे बढ़ बढ़ कर आक्रमण किया और शत्रु के कई सैनिकों को मार गिराया। उसके दूसरे भाई भय के कारण एक किनारे ही खड़े होकर कांपते रहे। जब उन तीन भाइयों के सैनिकों ने अपने सेनापतियों को डरते और कांपते देखा तो वे भी भयभीत हो गए और युद्ध से भागने लगे। शत्रु की सेना बहुत अधिक थी और जब नाटे बेटे ने देखा कि वह अपनी छोटी सी सेना के साथ उसका मुक़ाबला नहीं कर पाएगा तो वह दौड़ता हुआ उनकी ओर आया और कहने लगा कि या तो शत्रु से लड़ो या फिर महिलाओं के वस्त्र पहन लो। उसकी बात का सिपाहियों पर इतना प्रभाव पड़ा कि वे लौट आए और युद्ध करने लगे। उन्होंने जब नाटे राजकुमार का साहस देखा तो उनमें भी साहस आ गया और उन्होंने भी एक दूसरे की सहायता से शत्रु पर बढ़ चढ़ कर आक्रमण करना आरंभ कर दिया और थोड़ी ही देर में उसे पराजित कर दिया। इस प्रकार युद्ध में उन्हें विजय और शत्रु को पराजय का सामना हुआ। नाटा राजकुमार अपने सिपाहियों के आगे आगे गर्व के साथ राजा के पास पहुंचा जबकि उसके अन्य भाई सिर झुकाए हुए हारे हुए लोगों की भांति अपने पिता के पास पहुंचे। राजा ने अपने नाटे बेटे को गले से लगाया, उसके माथे और आंखों को चूमा और उसके बाद उससे अधिक प्रेम करने लगा। इसके पश्चात उसने उसे अपना युवराज घोषित कर दिया। यह देख कर उसके भाइयों को उससे ईर्ष्या होने लगी। अब वे इस ताक में रहने लगे कि अवसर मिलते ही उसे मार्ग से हटा दें। एक दिन उन लोगों ने फ़ैसला किया कि अपने नाटे भाई के खाने में विष डाल कर उसकी हत्या कर दें। संयोग से जिस समय वे लोग खाने में ज़हर मिला रहे थे, उनकी बहन ने देख लिया किंतु उसने कुछ कहा नहीं। वह अपने उस भाई को अन्य भाइयों से अधिक चाहती थी अतः उसने इशारों ही इशारों में उसे अन्य भाइयों के षड्यंत्र से अवगत करा दिया। नाटे भाई ने अपने भाइयों के द्वारा भोजन को ग्रहण नहीं किया और इस प्रकार ईर्ष्यालु भाइयों के षड्यंत्र का भांडा फूट गया और वे अपने पिता की दृष्टि में अधिक अपमानित हो गए। नाटा भाई, अपनी बहन, पिता और अन्य अधिकारियों की दृष्टि में अधिक सम्मानीय हो गया। राजा ने अपने तीनों बेटों को दंडित किया और फिर उनमें से हर एक को किसी सुदूर नगर में भेज दिया ताकि वे अपने भाई से दूर रहें और उसे कोई क्षति न पहुंचा सकें। उसने इसी प्रकार उन्हें देश के किसी न किसी मामले का संचालन सौंपा ताकि वे उस क्षेत्र के शासक रहें और अपने भाई के विरुद्ध कोई कार्यवाही न करें।