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    अज़ान व इक़ामत:

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    सवाल 447: माहे रमज़ानुल मुबारक में हमारे गांव का मोअजि़्ज़़न हमेशा सुबह की अज़ान के वक़्त से कुछ मिनट पहले ही दे देता है ताकि लोग अज़ान के दर्मियान या इसके ख़त्म होने तक खाने पीने से फ़ारिग़ हों लें क्या ये अमल सही है?

    जवाब: अगर अज़ान देना लोगों को शक में न डाले और वो तुलू-ए-फ़ज्र (सुब्ह निकलने) के ऐलान के उन्वान से भी न हो तो इस में कोई हर्ज नहीं है।

    सवाल 448: कुछ लोग अम्र बिल मारूफ़ और नहीं अनिल मुनकर के फ़रीज़े को अंजाम देने के लिये मजमे में आम रास्तों में अज़ान देते हैं और ख़ुदा का शुक्र है कि इस इक़दाम से इलाक़े में खुल्लम खुल्ला फि़स्क़ व फ़साद रोकने में बड़ा असर हुआ है और आम लोग ख़ुसूसन जवान अव्वले वक़्त में नमाज़ पढ़ने लगे हैं? लेकिन एक साहब कहते हैं: ये अमल शरीअते इस्लामी में दाखिल नहीं है और बिदअत है हमें इस बात से शक पैदा हो गया है, आपकी राय क्या है?

    जवाब: रौज़ाना की वाजिब नमाज़ों के अव्वले औक़ात में अज़ान देना सुनने वालों की तरफ़ से इसे दौहराना और अज़ान देते वक़्त आवाज़ को बुलन्द करना उन मुस्तहब्बात में से है कि जिनकी शरिअत ने ताकीद की है और सड़कों के किरानों पर इजमाई सूरत में अज़ान देना अगर रास्ता रोकने और दूसरे की तकलीफ़ का सबब न बने तो इस में कोई हर्ज नहीं है।

    सवाल 449: चूंकि अज़ान देना इबादी, सियासी अमल है और इस में अज़ीम सवाब है लिहाज़ा कुछ मोमेनीन ने ये फ़ैसला किया है कि वे लाउड्स्पीकर के बग़ैर वाजिब नमाज़ के वक़्त ख़ुसूसन नमाज़े सुबह के लिये अपने अपने घरों की छत से अज़ान देंगे लेकिन सवाल ये है कि अगर इस अमल पर कुछ पड़ौसी ऐतराज़ करें तो इसका क्या हुक्म है?

    जवाब: आम तौर से छत पर अज़ान देने में कोई हर्ज नहीं है।

    सवाल 450: माहे रमज़ानुल मुबारक में मस्जिद के लाउडस्पीकर से सेहरी के मख़सूस प्रोग्राम नश्र करने का क्या हुक्म है? ताकि सब लोग सुन लें?

    जवाब: जहां पर अक्सर लोग रमजानुल मुबारक की रातों में तिलावते क़ुरआन मजीद दुआएं पढ़ने दीनी व मज़हबी प्रोग्रामों में शिरकत के लिये बेकार रहते हैं वहां उस में कोई हर्ज नहीं है लेकिन ये मस्जिद के पड़ौसियों की तकलीफ़ का सबब हो तो जाएज़ नहीं है।

    सवाल 451: क्या मस्जिद और दीगर मराकिज़ से लाउडस्पीकर के ज़रिये इतनी बुलन्द आवाज़ में जो कई किलो मीटर तक पहुंचे अज़ान सुबह से पहले कु़रआनी आयात और इसके बाद दुआओं का नश्र करना सही है? इस बात को मद्देनज़र रखते हुए के ये सिलसिला कभी कभार आधे घंटे से ज़्यादा देर तक जारी रहता है?

    जवाब: राइज तरीक़े के मुताबिक़ सुबह की नमाज़ का वक़्त दाख़िल हो जाने के ऐलान के लिये लाउडस्पीकर से अज़ान नश्र करने में कोई हर्ज नहीं है लेकिन लाउडस्पीकर के ज़रिये मस्जिद से आयाते कु़रआनी और दुआओं वग़ैरह का लगाना अगर पड़ौसियों के लिये तकलीफ़ का बाइस हो तो इसके लिये शरअन कोई जवाज़ नहीं है बल्कि इस में ऐतराज़ है।

    सवाल 452: क्या नमाज़ में मर्द के लिये औरत की अज़ान काफ़ी है?

    जवाब: मर्द के लिये औरत की अज़ान पर बाक़ी रहना इशकाल है।

    सवाल 453: वाजिब नमाज़ की अज़ान और इक़ामत में शहादते सालसा यानि सैय्यदुल औसिया (हज़रत अली अलै0) के अमीर व वली होने की गवाही देने के सिलसिले में आपकी राय क्या है?

    जवाब: शरई लिहाज़ से अज़ान और इक़ामत का जुज़ नहीं है लेकिन इसे मज़हबे शिया के अलामत के उन्वान से कहा जाये तो बहुत अच्छा है और ज़रूरी है के इस को कु़रबत के इरादे के साथ कहा जाये।

    सवाल 454: एक मुद्दत से कमर दर्द की तकलीफ़ में मुब्तला हूं और कुछ औक़ात (कभी-कभी) तो इतना ज़्यादा दर्द हो जाता है के खड़े होकर नमाज़ नहीं पढ़ सकता इस चीज़ के पेशे नज़र अगर अव्वले व़क़्त में पढ़ूं तो हतमन (ज़रूर) बैठकर पढ़ूंगा लेकिन अगर सब्र करूं तो हो सकता है आख़री वक़्त में खड़े होकर नमाज़ पढ़ सकूं, इस सूरतेहाल में मेरी ज़िम्मेदारी क्या है?

    जवाब: अगर आख़ीर वक़्त में खड़े होकर पढ़ सकते हो तो ऐहतियात ये है कि उस वक़्त सब्र कीजिये लेकिन अगर अव्वले वक़्त में किसी परेशानी की वजह से बैठकर नमाज़ पढ़ली और आख़ीर वक़्त तक वो परेशानी ख़त्म न हुई तो जो नमाज़ पढ़ी है वो सही और दोबारह पढ़ने की ज़रूरत नहीं है लेकिन अगर अव्वले वक़्त में खड़े होकर नमाज़ पढ़ने की ताक़त न थी और आपको यक़ीन था के आख़ीर वक़्त तक ये ताक़त बरक़रार रहेगी फि़र आख़ीर वक़्त से पहले वो परेशानी ज़ाइज हो जाये और खड़े होकर नमाज़ पढ़ना मुमकिन हो जाये तो दोबारा खड़े होकर नमाज़ पढ़ना वाजिब है।