islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. अबू बसीर का पड़ौसी 3

    अबू बसीर का पड़ौसी 3

    Rate this post

    पुस्तक का नामः पश्चाताप दया की आलंग्न

    लेखकः आयतुल्ला हुसैन अंसारियान

     

    इस के पूर्व के दो लेखो मे अबू बसीर और उनके पड़ौसी से समबंधित कुछ् बातो का वर्णन किया गया जिसके पहले लेख मे अबु बसीर अपने पड़ौसी से परेशान रहते है समझाने बुझाने पर भी वह कोई ध्यान नही देता बाद मे स्वयं अबू बसीर से कहता है कि इमाम सादिक से मेरे हालात बताना शायद वह ही मेरे लिए कुछ करे तथा दूसरे लेख मे इस बात का वर्णन हुआ जब अबु बसीर ने इमाम से मिलकर अपने पड़ौसी के सारे हालात इमाम को बताए तो जो संदेश इमाम ने अबु बसीर द्वारा उनके पड़ौसी को पहुचवाया और अबु बसीर ने अपनी ओर से उसमे इज़ाफ़ा किया जिसको सुनकर वह आश्चर्य चकित होकर प्रश्न करता है कि वासत्व ने क्या इमाम ने ऐसा कहा। इल लेख मे आगे के शेष हालात का अध्ययन करने को मिलेगा।

    उसने उत्तर दियाः यह मेरे लिए प्रयाप्त है, कुच्छ दिनो पश्चात मुझे संदेश भिजवाया कि मै तुम से मिलना चाहता हूँ, उसके घर जाकर मैने द्वार खटखटाया, उसके शरीर पर वस्त्र नही थे परन्तु द्वार के पीछे आकर खडे हो कर कहता है अबु बसीर मेरे पास जो कुच्छ भी था मैने सब उनके मालिको तक पहुंचा दिया है। अवैध समपत्ति से पवित्र हो गया हूँ तथा मैने अपने पापो से पश्चाताप कर ली है।

    मैने उसके लिए वस्त्रो का प्रतिबंध किया और कभी कभी उस से मिलने जाता रहता था, और यदि उसे कोई समस्या होती थी तो उसका भी समाधान करता था, एक दिन मुझे संदेश भिजवाया कि मै मरीज़ हो गया हूँ, मै उस से मिलने के लिए गया, कुच्छ दिनो बीमार रहा, एक दिन मरने से पहले कुच्छ मिनटो के लिए मूर्छित हो गया, जैसे ही होश आया मुसकराते हुए मुझ से कहता हैः हे अबु बसीर इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम ने अपने वचन को पूरा कर दिया, और यह कहकर उसने इस दुनिया से प्रलोक की ओर प्रस्थान किया।

    अबु बसीर कहते है किः मै उस वर्ष हज के लिए गया, हज के पश्चात रसूले इस्लाम की ज़ियारत (दर्शन) तथा इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम से मिलने मदीना गया, जब इमाम से मिला तो मेरा एक पैर कमरे मे और दूसरा कमरे के बाहर ही था इमाम अलैहिस्सलाम ने फ़रमायाः हे अबु बसीर हमने तुम्हारे पड़ौसी के बारे मे दिया हुआ वचन पूरा कर दिया है।[1]


    [1] कश्फ़ुल ग़ुम्मा, भाग 2, पेज 194; बिहारुल अनवार, भाग 47, पेज 145, अध्याय 5, हदीस 199

     

    erfan.ir/hindi/