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    अमर आंदोलन-११

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    आज दस मुहर्रम है।  न्याय और मानवता के सूखते चमन को हुसैन आज सवेरे से ही सींच रहे हैं।  सुबह की नमाज़ के समय से ही यज़ीदी सेना तीर बरसा रही थी।  हुसैन के कई साथी तो नमाज़ियों की सुरक्षा करते हुए ही शहीद हो चुके थे।  फिर पैग़म्बरे इस्लाम का चमन उजड़ने लगा।  हाशमी परिवार मृत्यु को गले लगाने लगा।  दिन चढ़ते-चढ़ते बच्चे और बड़े सभी मौत की गहरी नींद सो चुके थे।  हुसैन, अली असग़र की भेंट भी चढ़ा चुके थे।  अब बस महिलाएं थीं, कुछ बच्चे थे और एक बीमार सुपुत्र सैयदे सज्जाद जो ख़ैमे में रह गए थे।

    हुसैन अन्तिम विदा के लिए ख़ैमे में आए।  अपनी बहन ज़ैनब से वह वस्त्र लाने को कहे जो पैग़म्बरे इस्लाम की यादगार थे ताकि यज़ीदी सेना को बता सकें कि मैं ही तुम्हारे पैग़म्बर का वारिस हूं।  फिर सभी महिलाओं और बच्चों से विदा ली।  अपनी तीन-चार वर्षीय बेटी सकीना को बुलाया और कहा बेटी तुम्हें मेरी छाती से लगकर सोने की आदत है।  सकीना अब बाबा नहीं होंगे।  तुम मां के पास सोया करना।  सकीना बड़े ही आश्चर्य से पिता को देखती रही फिर कांपते स्वर में बोली कि बाबा आज सवेरे से जो जाता है वह लौटकर नहीं आता है।  क्या आप भी लौटकर नहीं आएंगे?  इसके बाद हुसैन अपने बीमार बेटे अली बिन हुसैन अर्थात सैयदे सज्जाद के ख़ैमे मे गए।  वे बुख़ार से बेहोश थे।  उनको फुफी ज़ैनब ने जगाया कि बेटा तुम्हारे बाबा अन्तिम विदा के लिए आए हैं।  सैयदे सज्जाद ने आंखें खोलीं तो घबराकर पूछा कि बाबा आप युद्ध करने क्यों जा रहे हैं?  चाचा अब्बास कहां हैं? अली अकबर कहां हैं? सारे हाशमी जवान कहां चले गए?  हुसैन ने अपने बेटे को छाती से लगा लिया और रोते हुए कहा कि सैयदे सज्जाद मेरे कपड़ों पर मेरे जवानों का ख़ून है और चेहरे पर नन्हें शिशू अली असग़र का।  अब पुरूषों में मेरे और तुम्हारे अतिरिक्त कोई अन्य जीवित नहीं है।

    हुसैन ने सैयदे सज्जाद से वसीयत की और सब को रोता छोड़ वे युद्धस्थल की ओर जाने लगे।  अभी वे घोड़े पर चढ़ना ही चाहते थे कि अपने जवानों की याद आ गई।  उनको याद करते हुए उन्होंने का कि हे मेरे जवानों, हुसैन को अकेला छोड़ दिया? तभी बहन ज़ैनब आगे बढ़ीं और बोलीं भैया, आपको सहारा देने के लिए बहन अभी ज़िंदा है।

    इमाम हुसैन जंग के मैदान में गए।  युद्ध आरंभ हुआ।  अली के लाल ने घायल हृदय और सूखे होठों के बावजूद एसा युद्ध किया कि यज़ीदी सेना भागने लगी।  यह स्थिति देखकर कायरों ने चारों ओर से एक साथ आक्रमण कर दिया।  तीरों की बौछार थी।  भाले थे तलवारें थीं।  यहां तक कि उनपर पत्थरों से भी आक्रमण हो रहा था।  हुसैन घोड़े से धरती पर आए।  तीरों से उनका शरीर छलनी था।  सीने पर भी इतने तीर थे कि झुक नहीं पा रहे थे।  उन्होंने ख़ून भरे हाथों से कर्बला की रेत एकत्रित की और ईश्वर के समक्ष माथा टेक दया।  उन्होंने कहा कि हे ईश्वर, अपनी राह पर मेरा यह तुच्छ बलिदान स्वीकार कर ले।  अभी हुसैन सजदे में ही थे कि दुष्ट शिम्र ने गर्दन के पीछे से छुरी चलाना आरंभ कर दी।  कहते हैं कि इस अन्याय पर करबला की धरती हिलने लगी।  उधर शत्रु बाजे बजा रहे थे।  ख़ुशिया मना रहे थे और साथ ही हुसैन के ख़ैमों को लूटने और जलाने की तैयारी की जा रही थी।

    हुसैन शहीद हो गए।  शत्रु यह समझकर संतुष्ट हो गया कि अब उसके अन्याय को रोकने वाला कोई नहीं है परन्तु वास्तविकता यह नहीं थी।  हुसैन बड़ा बंदोबस्त करके गए थे।  जब यज़ीदी सेना ने ख़ैमों में आग लगाना आरंभ की तो हुसैन की साहसी बहन ज़ैनब ने बच्चों और महिलाओं को एक के बाद एक दूसरे ख़ैमों में पहुचाना आरंभ कर दिया।  जब हुसैन के अन्तिम ख़ैमे में आग लगी तो ज़ैनब ने सबको बाहर निकाला और स्वयं आग की लपटों में घुसकर बीमार भतीजे को अपनी पीठ पर उठाकर बाहर लाईं।  पैग़म्बरे इस्लाम के महान घराने की महिलाओं के सिरों पर से चादरें छीन ली गईं।  बच्चों और महिलाओं को अत्याचार से बचाने के लिए ज़ैनब आगे आ जाती थीं।  यही कारण है कि जितने घाव उनकी पीठ पर लगे थे किसी अन्य के नहीं लगे थे।  इमाम हुसैन के बाद अब हज़रत ज़ैनब का संघर्ष आरंभ हुआ था।  उन्हें अब सैयदे सज्जा की सुरक्षा करनी थी।  महिलाओं और बच्चों को ढ़ारस बंधाना थी और इमाम हुसैन के संदेश को दुनिया तक पहुंचाना था।  फिर वह शाम आ गई जिसे शामे ग़रीबां कहते हैं।  ज़ैनब ने महिलाओं और बच्चों को एकत्रित किया।  रात का अंधेरा बढ़ रहा था।  जलते हुए ख़ैमों की आग भी बुझ रही थी।  भयभीत बच्चे अपनी माओं की गोदियों में मुंह छिपाए बेसुध पड़े थे जबकि ज़ैनब, अब्बास व अली अकबर की भांति उनका पहरा दे रही थीं। (http://hindi.irib.ir)