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    अमर आंदोलन-४

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    मुहर्रम के संबन्ध में प्रस्तुत किये गए अबतक के कार्यक्रमों से आपको इस बात का ज्ञान अवश्य हुआ होगा कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम आरंभ से ही जिस टकराव की तैयारी में लगे हुए थे वह किसी व्यक्तिगत हित की पूर्ति के लिए लिए नहीं था।  इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम, सत्ता को किसी एसे शासक के हाथ में नहीं देखना चाहते थे जो अन्यायी, अत्याचारी, भ्रष्टाचारी और क्रूर हो।  यज़ीद की सत्ता का विरोध वे इसलिए कर रहे थे क्योंकि उसे जनहित की कोई परवाह नहीं थी।  वह लोगों को अपना दास बनाकर रखना चाहता था और जनकोष को अपनी मीरास समझता था।  इस्लाम और उसके मानवता प्रेमी क़ानून उसकी राह की रुकावट थे इसलिए वह इस्लामी शिक्षाओं और नियमों को पैरों तले रौंद रहा था।  इमाम हुसैन से बैअत लेने अर्थात अपने आज्ञापालन का वचन लेने का उसका प्रयास भी इस्लामी रुकावटों को दूर करने के संदर्भ में ही था।  उधर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम पूरी स्थिति को अच्छी तरह से भांप चुके थे इसीलिए मानवता, धर्म और नैतिकता आदि समस्त सदगुणों को बचाने के लिए उन्होंने यज़ीद से टकराने की ठान ली थी।  आज मुहर्रम की तीसरी तारीख़ है।  कर्बला में पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वआलेही वसल्लम के नाती का आगमन हो चुका है।  मन की आखों से यदि सन ६१ हिजरी के तीसरे दिन के इतिहास को देखें तो सामने एक बहुत बड़ा मरुस्थल दिखाई पड़ता है जिसमें इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम, उनके भाइयों, बहनों, बेटों, संबन्धियों और मित्रों के ख़ैमे लगे हुए हैं।  छोटे-छोटे फूल जैसे बच्चे, इधर-उधर खेल रहे हैं।  गर्म हवाओं के बावजूद वे संतुष्ट भी हैं और प्रसन्न भी क्योंकि वे अपने बड़ों को शांत देख रहे हैं।  उन्हें पता भी नहीं है कि हुसैन की प्रिय बहन का मन कितना व्याकुल है।  जैसे-जैसे शत्रु की सेना की संख्या बढ़ रही है, अपने भाई की सुरक्षा की ओर से ज़ैनब की चिंता भी बढ़ती जा रही है।  यद्यपि अब्बास और अली अकबर जैसे शूरवीर करबला मे मौजूद हैं और दूसरे भी अपने आयु के अनुसार साहस में कम नहीं हैं, परन्तु सौ-डेढ़ सौ पुरुषों, महिलाओं और बच्चों का कारवां कहां और कम से कम तीस हज़ार व्यक्तियों की सेना कहां?

    जी हां।  आज ६१ हिजरी के मुहर्रम की तीसरी तारीख़ है।  इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम जो अपनी यात्रा के दौरान ही से अपने अनेक मित्रों को पत्र लिखते आए हैं, आज भी अपने निकट मित्रों को सत्य तथा न्याय की स्थापना पर आधारित इस्लामी सिद्धांतों की सुरक्षा के अपने उद्देश्य से अवगत करा रहे हैं।  अधिक ध्यान से देखें तो ज्ञात होता है कि हुसैन अपने बचपन के साथी हबीब इब्ने मज़ाहिर को पत्र लिख रहे हैं।  न जाने उन्होंने अपने काल में छाई हुई भ्रष्ट राजनीति, यज़ीद के अत्याचारों और समाज की अस्तव्यस्तता के बारे में कुछ लिखा या नहीं परन्तु यह बात स्पष्ट है कि उन्होंने हबीब इब्ने मज़ाहिर को यह अवश्य ही लिखा होगा कि यज़ीद उनके पवित्र अस्तित्व को मिटाने पर तुला हुआ है इसीलिए उसने बैअत अर्थात अपना समर्थन करने की अनहोनी शर्त सामने रख दी है।  अब मैं यज़ीद से टक्कर लेने जा रहा हूं कि मेरा ख़ून सत्य और असत्य के बीच एक एसी सीमा रेखा बना देगा जिसे न केवल यज़ीद बल्कि आने वाले कालों का कोई भी अत्याचारी मिटा नहीं सकेगा।  मेरी टक्कर अनोखी टक्कर होगी।  यदि चाहो तो असत्य के विरुद्ध मेरी इस लड़ाई में भाग लो।  मुझे तुम्हारी प्रतीक्षा है।

    हज़रत मुस्लिम की शहादत के बाद से कूफ़े की गलियों में सन्नाटा छाया रहता था।  इमाम हुसैन का पत्र बहुत ही कठिनाई से कूफ़ा पहुंचा।  सूर्य अस्त हो चुका था।  हबीब खाना खा रहे थे।  इसी बीच दास ने पत्र लाकर दिया।  हबीब ने पूछा कि किसका पत्र है?  दास ने उत्तर दिया कि कोई कर्बला से आया है।  हबीब ने पत्र खोला, पढ़ना आरंभ किया।  कुछ समय के लिए वे मूक से हो गए।  उनकी पत्नी निकट आई।  पति की हार्दिक व्याकुलता को भांप कर पूछा एसा क्या लिखा है इस पत्र में कि तुम इतने व्याकुल हो गए हो?  हबीब ने उत्तर दिया कि पैग़म्बरे इस्लाम के नाती इमाम हुसैन को यज़ीदी सेना ने कर्बला में घेर लिया है।  उन्होंने मुझे अपना साथ देने के लिए बुलाया है।  यह सुनते ही हबीब की पत्नी ने कहा है कि पैग़म्बरे इस्लाम का सपूत बुलाए और तुम सोच में पड़ जाओ।  यदि नहीं जाना चाहते तो यह मेरी ओढ़नी तुम ओढ़ो।  मैं स्वयं अपने इमाम की सहायता के लिए जाऊंगी।  हबीब शायद कूफ़े की परिस्थिति के बारे में विचार कर रहे थे।  वे सोच रहे थे कि कूफ़े से कैसे निकला जाए परन्तु पत्नी को कुछ क्षण की देर भी अच्छी न लगी।  इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के प्रति पत्नी की इस श्रद्धा को देखकर अत्याधिक संतोष प्राप्त हुआ।  इबीब घर से विदा हुए और रात्रि के अंधकार में सरकारी सिपाहियों से बचते हुए नगर के बाहर पहुंचे जहां उनका एक विश्वसनीय दास एक घोड़े के साथ उनकी प्रतीक्षा कर रहा था।  हबीब को पहुंचने में कुछ देर हुई थी अतः दास यह समझ रहा था कि उसका स्वामी अपनी जान बचा रहा है।  वह घोड़े को संबोधित करते हुए कह रहा था कि “हे पशु, तेरी ही भांति मैं भी तैयार हूं।  यदि मेरा स्वामी न आया तो मैं स्वयं हुसैन की सहायता के लिए जाऊंगा।  हबीब ने जब अपने दास के यह शब्द सुने तो वे रोने लगे।  उन्होंने स्वयं से कहा कि मेरे न्याय के प्रतीक हुसैन पर यह कैसा समय आ गया है कि मित्र ही नहीं बल्कि दास भी उसके लिए व्याकुल हैं।

    कर्बला का युद्ध भी बड़ा अनोखा युद्ध था।  एक ओर यज़ीदी सेना ने अत्याचार और अधर्म के किसी भी हथकंडे को हुसैन के विरुद्ध प्रयोग करने से हाथ पीछे नहीं खींचा था तो दूसरी ओर हुसैन अपने मानवाप्रेमी ईश्वरीय सिद्धांतों के किसी भी आयाम को संसार के सामने प्रस्तुत करने से नहीं चूके थे।  उनके नाना पैग़म्बरे इस्लाम और समस्त परिवार ने उच्च चरित्र तथा ईश्वरीय प्रेम को मनुष्य के बड़े एवं महान होने की कसौटी बताय था।  इसी आधार पर अफ़्रीकी देशों से आए हुए कितने ही दासों को पैग़म्बरे इस्लाम अत्यधिक महत्व देते थे।  इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की दृष्टि में भी मनुष्य के चरित्र का महत्व था, उसके रंगरूप, वंश या भाषा का नहीं।  इसीलिए इतिहास ने करबला में जहां एक ओर इबीब इब्ने मज़ाहिर और उन जैसे बड़ी आयु के अनेक लोगों को इमाम हुसैन पर अपना जीवन न्योछावर करते देखा वहीं अनेक दासों ने भी स्वेच्छा से हुसैन और उनके उद्देश्यों के लिए मृत्यु को हंसकर गले लगा लिया।  एसे ही एक ग़ुलाम जौन भी थे।  अपने स्वामी अबूज़र ग़फ़्फ़ारी के स्वर्गवास के पश्चात उनका समस्त जीवन इमाम हुसैन के पिता हज़रत अली के घर में व्यतीत हुआ।  आशूर के दिन जब जौन ने इमाम हुसैन से रणक्षेत्र में जाने की अनुमति मांगी और इमाम हुसैन ने उन्हें रोकना चाहा तो हज़रत जौन ने रोकर कहा कि क्या आप मुझे यह सौभाग्य देना नहीं चाहते हैं कि मेरा ख़ून आपके सुगन्धित ख़ून से मिल सके।  यह सुनकर इमाम हुसैन ने उन्हें अपने सीने से लगा लिया।  फ़ुरात के तट पर ख़ैमे लगे अभी दो दिन ही बीते थे कि यज़ीद के सेनापति उमरे साद की ओर से यह संदेश आया कि नदी से दूर जाकर ख़ैम लगाए जाएं।  यह सुनकर इमाम हुसैन के वीर साथियों को क्रोध आ गया, जिनमें उनके भाई अब्बास, सुपुत्र अली अकबर और भतीजे, भांजे व मित्र सभी सम्मिलित थे।   उन्होंने नदी का तट छोड़ने से इन्कार कर दिया परन्तु इमाम हुसैन, शत्रु को युद्ध छेड़ने का बहाना नहीं देना चाहते थे अतः उन्होंने ख़ैमों को नदी से दूर ले जाकर लगा दिया।  शत्रु की सेना की संख्या प्रतिदिनि बढ़ रही थी।  लोभियों और भौतिकवादियों की भीड़, सत्यवादी हुसैन की छोटी सी ईश्वरीय सेना को चारों ओर से घेर रही थी।  उधर इमाम हुसैन ने भी जागृत आत्मा वाले अपने कुछ मित्रों को पत्र भेजकर बुलाया था ताकि वे भी भटके हुए शत्रुओं को बुराई से रोकने और भलाई की ओर बुलाने में उनका साथ दें तथा अंत में सत्य की वेदी पर जीवन की भेंट चढ़ाकर अमर हो सकें।