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    अमर आंदोलन-९

    अमर आंदोलन-९
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    हमने गत कार्यक्रमों में कहा था कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम, अम्रबिल मारूफ़ व नहि अनिल मुनकर अर्थात भलाई की ओर बुलाने और बुराई से रोकने के लिए निकले थे और उनका यह उद्देश्य अत्यधिक विस्तृत था।  इसके अन्तर्गत वे शासन व्यवस्था में सुधार और भ्रष्ट तत्वों का अंत चाहते थे तथा साथ ही विद्वानों, बुदिजीवियों और समाज के वरिष्ठ लोगों के मौन को भंग करना चाहते थे।  शासन में सुधार इसलिए क्योंकि इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार शासन का प्रथम कर्तव्य, न्याय की स्थापना होता है और न्याय की स्थापना के लिए शासक के लिए अपने व्यक्तिगत जीवन को आर्थिक दृष्टि से जनता के निम्नस्तर पर लाना आवश्यक होता है, समाज के सभी वर्गों के हितों को दृष्टि में रखना पड़ता है और इस्लामी समाज की उन्नति और प्रगति के लिए  इस्लामी शिक्षाओं और सिद्धांतों को आधार बनाकर तथा पैग़म्बरे इस्लाम के कथनों और कार्यों के प्रकाश में प्रयास करना पड़ता है।  परन्तु यज़ीद केवल अपने और अपने क़बीले के हितों की पूर्ति कर रहा था।  उसने इस्लाम द्वारा वर्जित की जाने वाली बातों का प्रचलन और वैध की जाने वाली बातों को वर्जित कर रखा था।  वह पैग़म्बरे इस्लाम की बातों का मखौल उड़ाता था।  इमाम हुसैन देख रहे थे कि अन्याय व भ्रष्टाचार, जनता में फैलता जा रहा है और लोग इस्लामी शिक्षाएं भूलते जा रहे हैं।  दूसरी ओर बुद्धिजीवी वर्ग इस पूरी स्थिति पर चुप्पी साधे हुए था।  शासन के भय ने उनके साहस को समाप्त कर दिया था।  अच्छे बुरे की पहचान के बावजूद न किसी को बुराई से रोका जाता था न अच्छा काम करने पर प्रेरित किया जाता था।

    इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम, पैग़म्बरे इस्लाम के नाती थे।  अपने समय के वे सबसे अधिक ज्ञानी और साहसी थे अतः इस स्थिति से निपटने की चिंता भी सबसे अधिक उनको ही थी।  वे जानते थे कि यदि यह स्थिति यथावत बनी रही तो पैग़म्बरे इस्लाम के समस्त प्रयासों पर पानी फिर जाएगा।  दूसरी ओर यज़ीद को भी सबसे अधिक उनसे ही ख़तरा था।  वह जानता था कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को न तो सत्ता का लोभ है और न ही अपने व्यक्तिगत हितों की परवाह अतः वे जनता को जागृत करने का पूरा प्रयास करेंगे जो भ्रष्ट शासन के लिए अच्छा नहीं होगा।  इसलिए यज़ीद ने इमाम हुसैन का अंत करने के प्रयास में अपनी संपूर्ण शक्ति का प्रयोग कर डाला और इमाम हुसैन ने भी यज़ीदी दानव से सत्य की टक्कर के लिए अपने परिवार और मित्रों को अपने साथ ले लिया।

    इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के अभियान में सम्मिलित लोगों में सर्वोपरि कहा जाने वाला नाम हज़रत अब्बास का है।  हज़रत अली की पत्नी फ़ातिमा केलाबिया के ज्येष्ठ पुत्र, हज़रत अब्बास थे।  फ़ातेमा केलाबिया के चार पुत्र थे।  इसी कारण उन्हें उम्मुल बनीन अर्थात पुत्रों की माता के उपनाम से जाना जाता था।  हज़रत फ़ातेमा के स्वर्गवास के पश्चात हज़रत अली ने उम्मुल बनीन से इस कारण विवाह किया था क्योंकि उनका संबन्ध एक अत्यंत चरित्रवान और वीर परिवार से था।  हज़रत अली अलैहिस्सलाम सामाजिक और राजनैतिक परिस्थितियों को देखते हुए चाहते थे कि उनके घर में एसे बच्चे पैदा हों जो पैग़म्बरे इस्लाम के पुत्र कहे जाने वाले इमाम हसन और इमाम हुसैन का कड़ी परिस्थितियों में साथ दे सकें।

    हज़रत उम्मुल बनीन ने हज़रत अली के घर में क़दम रखने से पूर्व इस घर की चौखट को चूमा था और इमाम हसन तथा इमाम हुसैन से यह कहकर पैग़म्बरे इस्लाम के परिवार के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट की थी कि यह घर, जिसमें आपकी और आपकी माता जीवन व्यतीत कर चुकी हैं, मुझे अत्यन्त प्रिय हैं और मैं इस घर में आपकी मां बनकर नहीं बल्कि दासी बनकर आई हूं।  हज़रत उम्मुल बनीन ने अपने बच्चों को भी इसी भावना के साथ पाला था और उन्हें यह पाठ दिया था कि हज़रत फ़ातिमा के बच्चे चूंकि पैग़म्बरे इस्लाम से संबन्धित हैं अतः तुम उनकी बराबरी कभी न करना।  स्वयं को उनका दास समझना और पैग़म्बरे इस्लाम की संतान के प्रति सदैव वफ़ादार रहना और बच्चों ने भी वही कर दिखाया।  हज़रत अब्बास ने स्वयं भी इमाम हसन और इमाम हुसैन को सदैव “आक़ा” अर्थात मालिक कहा और अपने भाइयों को भी यही सिखाया था।

    इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम हज़रत अब्बास को अपना भाई नहीं बल्कि पुत्र के समान प्रेम करते थे और ज्यों-ज्यों अब्बास के व्यक्तित्व की विभिन्न विशेषताएं जैसे ज्ञान, साहस, विनम्रता, शौर्य, आध्यात्मिक शक्ति एवं वफ़ादारी आदि निखर रही थीं वैसे-वैसे इमाम हुसैन का उनके प्रति प्रेम भी बढ़ता जा रहा था।  अपने भाई को देखकर बड़ी से बड़ी कठिनाई में भी उनको शांति मिल जाती थी।  दूसरी ओर हज़रत अब्बास, इमाम हुसैन, बहन हज़रत ज़ैनब व उम्मे कुल्सूम और उनके बच्चों के दुख को सहन नहीं कर पाते थे।  इस संदर्भ में देखें तो करबला में हज़रत अब्बास, हर पल कठिन परीक्षा से गुज़र रहे थे।

    हुर ने जब कूफ़े के मार्ग में इमाम हुसैन को करबला आने पर विवश किया तो अब्बास की त्योरियों पर बल आ गए थे।  करबला में जब फ़ुरात के किनाने से ख़ैमे हटाए जाने को कहा गया था तो अब्बास बिफर गए थे।  सात मुहर्रम को जब पानी पर रोक लगाई गई तो अब्बास का ख़ून खौलने लगा था और जब प्यासे बच्चों के रोने की आवाज़ें अब्बास के कानों में पड़ती थीं तो दुख से उनका कलेजा फटने लगता था।  इन सब बातों के बावजूद हज़रत अब्बास विवश थे क्योंकि हर एसी परिस्थिति में उनके आक़ा हुसैन उन्हें छाती से लगा कर कहते थे कि भैया अब्बास धैर्य रखों हम अपनी ओर से युद्ध आरंभ करने का बहाना यज़ीदियों को नहीं देना चाहते हैं।  इसी प्रकार समय बीत रहा था कि आशूर का दिन आ गया।  हुसैन की छोटी सी सेना के वीरों ने अपने लहू में नहाकर स्वर्ग की ओर प्रस्थान करना आरंभ कर दिया था।  एसे समय में अब्बास चाहते थे कि उन्हें भी रणक्षेत्र जाने की अनुमति मिल जाए।  अब्बास को यदि युद्ध करने की अनुमति मिल जाती तो हुसैन का ३२ वर्षीय प्यासा भाई, रणक्षेत्र को शत्रुओं के शवों से पाट देता।  परन्तु हुसैन तो शत्रु को सत्य के मार्ग पर लाने का प्रयास कर रहे थे, उन्हें सुधरने के लिए समय देना चाहते थे, अतः वे हर बार यह कह देते थे कि अब्बास तुम तो मेरी सेना के सेनापति हो।  मेरी सेना का अलम, मेरी सेना की पताका तुम्हारे हाथों में हैं, मैं तुम्हें युद्ध की अनुमति कैसे दूं?  परन्तु देखते ही देखते एक एसा समय आ गया कि जब अब्बास को यह कहना पड़ा कि आक़ा, अब वह सेना कहां है जिसका मैं सेनापति हूं?  अब मुझे भी वहीं जाने दें जहां मेरी सेना गई है।  इमाम हुसैन ने जब यह सुना तो वे रोने लगे और उन्होंने कहा कि बच्चों की आस तुम्ही से है।  एसा करो कि प्यासे बच्चों के लिए तुम पानी ले आओ।  अब्बास ने अपने इमाम का, अपने आक़ा का आदेश सुना तो सिर झुका दिया।  छागल उठाई, सेना का अलम संभाला और एक हाथ में भाला लेकर घोड़े पर सवार हुए और फिर कुछ ही क्षणों के पश्चात संसार ने देखा कि अब्बास, शत्रु की सेना के बीच से कौंधती बिजली के समान गुज़रे, फ़ुरात नदी में घोड़ा डाला, पानी भरा और ख़ैमों की ओर चले परन्तु इस बार उनकी गति धीमी थी क्योंकि पानी से भरी छागल की सुरक्षा ही उनका उद्देश्य था।  शत्रु ने इसका लाभ उठाया।  तीरों की बौछार हुई और छागल पर लगने वाले तीरों ने अब्बास को बे आस कर दिया।  घात लगाकर बैठने वालों ने उस बलवान की भुजाओं को काट दिया।  जब उनके सिर पर गदा से आक्रमण हुआ तो वे घोड़े से भूमि पर आ गए।  प्यासे बच्चों की आशा, निराशा बन गई और हुसैनी सेना का अलम्दार अपनी सेना से जा मिला। (http://hindi.irib.ir)