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    अमर ज्योति़- १

    अमर ज्योति़- १
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    पवित्र क़ुरआन ईश्वर का ऐसा अमर व अमिट चमत्कार है कि उससे जब भी लाभ उठाया जाए, अपने संसार में उतरने के समय की ही भांति जीवनदायक व आकर्षक है और यह पुस्तक संस्कृति व सभ्यता के पैदा होने का स्रोत रही है। इतिहास साक्षी है कि कोई भी दूसरी पुस्तक अपने अनुयाईयों की दिनचर्या में क़ुरआन की भांति प्रभावी नहीं है और मन को आकर्षित करने और अपने समक्ष लोगों को विनम्र बनाने वाली नहीं रही है। इस ईश्वरीय पुस्तक की शिक्षाओं ने बहुत थोड़े से ही समय में अज्ञानता की भ्रष्ट संस्कृति को उखाड़ फेंका और बुद्धिमत्तापूर्ण संघर्ष के साथ समाज में प्रचलित ग़लत व असभ्य बातों को समाप्त कर दिया और पूरे संसार में एकेश्वरवाद और अंतर्ज्ञान व ईश्वरीय पहचान के दीप को जला दिया। पवित्र क़ुरआन के वास्तविक स्थान और मनुष्य के अध्यात्मिक व भौतिक जीवन में इसकी भूमिका को एक उदाहरण रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। पवित्र क़ुरआन प्रकाशमयी बनाने वाला और जीवन दायक है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि एक कोण से सूर्य देखना, कदापि पूरे सूरज को स्पष्ट नहीं कर सकता। दूसरी ओर सूरज को सभी आयामों से देखना मनुष्य की क्षमता व सीमा से बाहर है। इसीलिए पवित्र क़ुरआन के समुद्र में डुबकी लगाने वाले हर शोधकर्ता ने एक विशेष दृष्टि व आयाम से पवित्र क़ुरआन की विशेषता बयान की है। हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम का कहना है कि पवित्र क़ुरआन चांद और सूरज की भांति है जो सदैव चलते रहते हैं और लोगों के जीवन को संसार के नष्ट होने तक चमकाते रहते हैं। यह चमकता हुआ सूर्य धरती के हर भौगोलिक क्षेत्र पर, हर काल में हर पीढ़ी पर चमकता है और लोग अपनी क्षमता के अनुसार उससे ऊर्जा व मार्गदर्शन प्राप्त करते हैं, यह बात नहीं है कि सूरज से एक पीढ़ी के लाभान्वित होने से दूसरी पीढ़ी उसके लाभ से वंचित हो जाए। सूरए इब्राहीम की आरंभिक आयतों में हम पढ़ते है कि यह वह पुस्तक है जो तुम पर उतारी गयी है ताकि लोगों को उनके ईश्वर के आदेशानुसार अंधकार से निकालकर प्रकाश की ओर ले जाओ। धार्मिक मामलों के बहुत से विशेषज्ञों का मानना है कि इस समय पवित्र क़ुरआन के अपमान के लिए इस ईश्वरीय ग्रंथ को जलाने और इसमें फेर बदल करने हेतु इस्लाम के शत्रुओं की ओर से जो प्रयास किए जा रहे हैं, वह संबोधकों पर इस महान ईश्वरीय ग्रंथ के हतप्रभ व आश्चर्य चकित करने वाले प्रभावों के कारण है किन्तु रोचक बात यह है कि इन शत्रुओं की बेबस व प्रभावहीन कार्यवाहियां, लोगों द्वारा पवित्र क़ुरआन के सूक्षम अध्ययन और इस ईश्वरीय ग्रंथ की ओर अधिक रूझहान में वृद्धि की भूमिका प्रशस्त करती है। इस प्रकार से कि ईश्वर की इस चमत्कारिक पुस्तक की ओर रूझहान रखने वालों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है और यह भी पवित्र क़ुरआन का एक चमत्कार है। ब्रिटेन के प्रसिद्ध लेखक कैन्ट ग्रीक “मैंने किस प्रकार क़ुरआन को पहचाना” नामक पुस्तक में लिखते हैं कि एक मुसलमान पुरुष और महिला पर क़ुरआन जो प्रभाव डालता है वह उस आस्था से उत्पन्न होता है जो प्रत्येक मुसलमान क़ुरआन पर रखता है और यह एक स्वभाविक प्रभाव है किन्तु मेरे जैसा एक ग़ैर मुसलमान व्यक्ति बिना आस्था के क़ुरआन खोलता है और जैसे ही क़ुरआन को पढ़ना आरंभ करता है उससे प्रभावित होता और क़ुरआन पढ़ने में जितना वह आगे बढ़ता जाता है क़ुरआन का प्रभाव उस पर अधिक होता जाता है और वह क़ुरआन की आयतों में मंत्रमुग्ध होता जाता है और यह एक अलग ही विषय है। वह कहते हैं कि हम अंग्रेज़, चौदह शताब्दी पूर्व ब्रिटेन और ब्रिटेन के समस्त द्वीपों में बोली जाने वाली भाषाओं को नहीं समझते। फ़्रांसीसी विचारक जो भाषा के प्रोफ़ेसर भी हैं, चौदह शताब्दी पूर्व की फ़्रांसीसी भाषा को नहीं समझ सकते किन्तु समय के बीतने से क़ुरआन की भाषा पुरानी या अप्रचलित नहीं हुई है। जब हम क़ुरआन को पढ़ते हैं तो ऐसा है जैसे हम किसी अरबी भाषी देश में आज की किताबों या समाचार पत्रों को पढ़ रहे हैं। जब जर्मनी के प्रसिद्ध कवि और दर्शनशास्त्री गोएटे ने क़ुरआन का अध्ययन किया तो वह इससे बहुत अधिक प्रभावित हुए और उन्होंने क़ुरआन के दस सूरों की अच्छी, आकर्षक और सुन्दर आयतों को नोट कर लिया। वह अपने गुरू को पत्र लिखते हैं कि क़ुरआन, वैभव और आश्चर्यजनक वास्तविकता के साथ साथ ज्ञान का अथाह सागर है। मैं आपके लिए उसी प्रकार दुआ करना चाहता हूं जैसे क़ुरआन में हज़रत मूसा ने की है। हज़रत मूसा ने अपने ईश्वर से कहा ईश्वर मेरे सीने को विस्तार प्रदान कर दे। क़ुरआनी आयतों के दृष्टिगत, मनुष्य स्वयं को भय व बेचैनी से मुक्ति दिला सकता है, इस शर्त के साथ कि वह ईश्वर पर भरोसा करे और दिल को इस्लाम की स्वास्थ दायक विचारधारा के हवाले कर दे।गोयटे ईस्ट दीवान नामक अपनी पुस्तक में एक सुन्दर कविता में लिखते हैं कि क़ुरआन के संबंध में किए जाने वाले वाद विवाद से उनको कुछ लेना देना नहीं है और उसके बाद बल देकर कहते हैं कि मुझे केवल इतना मालूम है कि क़ुरआन, पुस्तकों की पुस्तक है।पवित्र क़ुरआन सर्वोच्च तत्वदर्शिता और विचाधाराओं से ओतप्रोत एक संसार है जिसमें अस्तित्व के रहस्य और वास्तविकताएं, ईश्वरीय सृष्टि की आश्चर्यजनक बातें व कारनामे और मनुष्यों के लिए प्रशिक्षण और नैतिकता के बेहतरीन कार्यक्रम पाये जाते हैं। इस ईश्वरीय पुस्तक ने नूर अर्थात प्रकाश, असत्य से सत्य के अंतर को स्पष्ट करने वाली और सबसे सीधे व सुदृढ़ मार्ग की ओर मार्गदर्शन करने वाली जैसी पवित्र व सुन्दर विशेषताओं से अपना परिचय करवाया है। क़ुरआन स्वयं को ईश्वर की याद दिलाने वाला बताता है और बल देता है कि एकेश्वरवाद की ओर मार्गदर्शन करने में वह सदैव डटा रहता है। पवित्र क़ुरआन में जगह जगह पर असमाए हुसना अर्थात ईश्वर के शुभ नाम और ईश्वर की महान विशेषताओं का नाम लिया गया है और ईश्वर को सृष्टि का आरंभकर्ता और उसमें विविधता उत्पन्न करने वाला बताया गया है। इस पुस्तक में फ़रिश्तों, ईश्वरीय दूतों और ईश्वरीय पुस्तकों की विशेषताओं का उल्लेख किया गया है। ईश्वर की यह अंतिम पुस्तक, सृष्टि के आरंभ व अंत अर्थात प्रलय व ईश्वर की ओर पलटने को बयान करती है और लोगों को कल्याण और बुराई के मार्ग से अवगत कराती है। इस समय हमारे काल में भी इन्हीं विशेषताओं के साथ क़ुरआन सबकी पहुंच में है। पवित्र क़ुरआन इस दृष्टि से कि यह ईश्वर का शब्द है, कभी भी इसमें असत्य प्रवेश नहीं कर सकता इसकी सत्यता को समाप्त नहीं कर सकता। पवित्र क़ुरआन महान और अद्वितीय पुस्तक है। जैसा कि हम सूरए फ़ुस्सेलत की आयत संख्या 42 में पढ़ते हैं कि जिसके निकट, सामने या पीछे किसी ओर से भी असत्य आ नहीं सकता कि यह तत्वदर्शी व सबसे ज्ञानी ईश्वर की ओर से उतारी गयी पुस्तक है। बहुत से लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है कि प्रगति और विकास के इस काल में भी क्या क़ुरआन लाभदायक रह गया है? इस ईश्वरीय पुस्तक के अमिट, अनमिट व अमर होने पर बहुत से तर्क मौजूद हैं जो इस बात के सूचक हैं कि क़ुरआन किसी एक काल से विशेष नहीं है, क़ुरआन की बहुत सी आयतें सभी लोगों को संबोधित करती हैं। जैसे हे लोगों या हे मनुष्य। पवित्र क़रआन में अतीत के राष्ट्रों और ईश्वरीय दूतों बहुत सी कथाएं वर्णित हैं किन्तु चूंकि क़ुरआन का लक्ष्य लोगों का मार्गदर्शन करना है, केवल उन्हीं चीज़ों का वर्णन किया गया है जो लोगों के मार्गदर्शन के लिए आवश्यक हैं ताकि बंदे इन घटनाओं और कथाओं से पाठ सीखें। स्पष्ट सी बात है कि अतीत की बातों और घटनाओं से पाठ सीखना, मनुष्य के लिए सदैव आवश्यक होता है। पवित्र क़ुरआन समस्त संसार की पुस्तक है और यह किसी विशेष स्थान, समय और किसी विशेष जाति या समुदाय की पुस्तक नहीं है क्यों कि क़ुरआन ने स्वयं को संसार व ब्रहमांड के लिए उपदेश बताया है जैसा कि हम पवित्र क़ुरआन में पढ़ते हैं कि क़ुरआन संसार के लिए उपदेश के अतिरिक्त कुछ और नहीं है। इसी प्रकार पवित्र क़ुरआन स्वयं को समस्त लोगों को डराने वाला बताता है। मनुष्यों की आवश्यकताओं का उत्तर देने के लिए आवश्यक यह है कि कभी भी प्राचीनता की धूल इस पर न बैठे और सदैव तरोताज़ा और प्रफुल्लता से ओतप्रोत रहे। क़ुरआन में वर्णित बातों को इस प्रकार से संजोया गया है कि कभी भी और किसी भी काल में इसकी अनन्त अनुकंपाओं और विभूतियों से लाभ उठाया जा सकता है। हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम कहते हैं कि क़ुरआने मजीद की प्रफुल्लता व ताज़गी इस लिए है कि ईश्वर ने इसको थोड़े समय किसी विशेष समय या कुछ विशेष लोगों के लिए नहीं भेजा क्योंकि यह सदैव बाक़ी रहने वाला और सबके लिए है, हर काल में नया है और हर समय के लोगों निकट, प्रलय के दिन तक मीठा और आकर्षक है। पवित्र क़ुरआन की आयतों के दो रूप हैं विदित रूप व भीतरी रूप। क़ुरआन के भीतरी रूप में गहरी व मूल्यवान ईश्वरीय पहचान व शिक्षाएं समायी हुई हैं कि बुद्धिजीवी विभिन्न आयामों से उनमें विचार करते और नये-2 अर्थ प्राप्त करते हैं जब कि इसकी ताज़गी में कदापि कोई कमी नहीं होती। इसी विशेषता ने क़ुरआन के अमर व सदैव रहने को सुनिश्चित कर दिया है। यदि क़ुरआन के संदेश किसी जाति या समाज से विशेष होते तो उस जाति के समाप्त होते ही उनके बारे में उतरी हुई आयतें अपना महत्त्व खो देती। हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम कहते हैं कि यदि किसी जाति के संबंध में कोई आयत उतरती और वह जाति मर जाती तो आयत भी मर जाती तो इस स्थिति में क़ुरआन के लिए कोई चीज़ न बचती किन्तु क़ुरआन ईश्वर की शिक्षाओं का सोता जबतक धरती व आकाश बाक़ी हैं बहता रहेगा।