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    अमर ज्योति-2

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    क़ुरआने मजीद, मुसलमानों का धर्म ग्रंथ है जो ईश्वर द्वारा पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पास भेजा गया है। क़ुरआने मजीद के आने का समय, अरबों में साहित्य, शब्दालंकारों तथा शेर-शायरी की चरम सीमा का काल था। उकाज़ नामक बाज़ार में शब्दों संस्कृति तथा साहित्य के कलाकार अपनी सर्वश्रेष्ठ कृतियों को प्रस्तुत करते थे और आलोचक उनमें से सबसे उत्तम कविता या कलाकृति का चयन करके उसकी घोषणा किया करते थे। सबसे अच्छी कविताओं को स्वर्ण अक्षरों से लिख कर काबे की दीवार पर टांग दिया जाता था जो किसी भी कवि के लिए गर्व का कारण होता था। मुअल्लक़ाते सब्अ के नाम से सात प्रख्यात क़सीदे या किसी के गुणगान स्वरूप लिखी जाने वाली कविताएं काबे की दीवार पर मौजूद थीं जिन्हें सर्वकालिक महानतम पद्य मान लिया गया था। जब ईश्वर ने क़ुरआने मजीद के रूप में अपने कथनों को पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पास भेजा तो उसके चमत्कारिक साहित्यिक गुणों, शब्दालंकारों तथा अद्भुत विषयों ने इस प्रकार उस समय के अरब साहित्यकारों व कवियों को प्रभावित कर दिया कि उन्होंने उसकी महानता के समक्ष शीश नवाना ही उचित समझा।जब लबीद इब्ने रबीआ ने, जो स्वयं एक महान कवि था और काबे पर टंगी सात कविताओं में से एक का रचयिता था, क़ुरआने मजीद की आयतें सुनीं तो इतना प्रभावित हुआ कि उसने शेर लिखना छोड़ दिया और अपना सारा समय क़ुरआन सुनने और पढ़ने में बिताने लगा। जब उससे पूछा गया कि अब तुम शेर क्यों नहीं लिखते तो उसने कहा कि क़ुरआन को सुनने के बाद अब मैं शेर नहीं लिख सकता। यदि क़ुरआन कथन है तो जो कुछ हम कहते हैं वह सब बेकार है। मुझे क़ुरआन में इतना आनंद आता है कि मेरी दृष्टि में इससे बढ़ कर कोई कथन हो ही नहीं सकता।पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने क़ुरआने मजीद के माध्यम से अपनी सत्यता को सिद्ध किया। ईश्वर की ओर से उनके पास भेजी जाने वाली विचित्र एवं मनमोहक आयतों में असाधारण चमत्कारिक विशेषताएं थीं, विशेष कर मक्का नगर में आने वाले क़ुरआने मजीद के छोटे सूरे, आयतों में पाए जाने वाले लय, संगीत और शब्दालंकार की दृष्टि से अद्वितीय थे। क़ुरआन का सुंदर एवं मर्म स्पर्षी गद्य, अरबों के बीच दो परस्पर विरोधी भावनाएं उत्पन्न कर देता था। वे एक ओर तो हृदय में उतर जाने वाली क़ुरआने मजीद की आयतों पर मोहित हो जाते थे क्योंकि वे आयतों में विषय वस्तु के नएपन, उनकी वाग्मिकता और शब्दालंकार को लेकर आश्चर्यचकित हो जाते थे और दूसरी ओर चूंकि इन आयतों में जो बातें कही जाती थीं वह उनकी अंधविश्वासी आस्थाओं के विरुद्ध होती थीं अतः वे उन्हें स्वीकार नहीं करते थे। उस समय के अरबों के लिए अपनी प्राचीन संस्कृति तथा परंपराओं को छोड़ना सरल नहीं था जिन्हें क़ुरआने मजीद ग़लत सिद्ध कर रहा था किंतु इसी के साथ वे क़ुरआन के ठोस तर्क तथा उसके द्वारा चिंतन का निमंत्रण दिए जाने का मुक़ाबला करने में भी असमर्थ थे। इस प्रकार से कुछ लोग तो क़ुरआने मजीद की आयतों से प्रभावित हो कर पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम पर ईमान ले आए किंतु कुछ अन्य उनके मुक़ाबले पर खड़े हो गए।क़ुरआने मजीद का प्रकाश फैलने के साथ ही धीरे-धीरे कुफ़्र एवं अनेकेश्वरवाद के केंद्र समाप्त होने लगे और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के निष्ठापूर्ण प्रयासों से इस्लाम पूरे अरब जगत में फैल गया। क़ुरआन की मधुर एवं तथ्यात्मक भाषा तथा उसकी शांतिदायक एवं जागरूकतापूर्ण शुभ सूचनाओं के चलते अरबी साहित्य की विख्यात हस्तियों ने उसका लोहा मान लिया और कहा कि यह न तो गद्य की पुस्तक है और न ही पद्य की बल्कि क़ुरआन, क़ुरआन है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के निधन के पश्चात इस्लामी समाज में कुछ ऐसी घटनाएं घटीं जिनके चलते कुछ भ्रामक व पथभ्रष्ट विचारधाराएं सामने आईं। उसी समय से क़ुरआने मजीद के संबंध में लोगों में कुछ ग़लत व भ्रष्ट विचार प्रचलित हो गए तथा हर गुट अपने हिसाब से क़ुरआन की आयतों की व्याख्या करने लगा। इस अनुचित परिस्थिति ने मुस्लिम विद्वानों और क़ुरआने मजीद के व्याख्याकारों को इस बात के लिए प्रेरित किया कि वे आयतों के संबंध में पूरी गंभीरता से चिंतन करें तथा सही मार्ग को ग़लत मार्ग से अलग कर दें। इसके बाद से ही ऐसी किताबें सामने आने लगीं जिनमें से प्रत्येक में क़ुरआने मजीद की विशेषताओं और उसके सुंदर आयामों का वर्णन किया गया था। तीसरी से नवीं शताब्दी हिजरी क़मरी तक इस्लामी जगत में ऐसे दसियों विद्वान और बुद्धिजीवी सामने आए जिन्होंने क़ुरआने मजीद और उसकी विशेषताओं के संबंध में पुस्तकें लिखीं। प्रख्यात अरब साहित्यकार जाहिज़ ने अपनी पुस्तक नज़्मुल क़ुरआन में यह सिद्ध किया कि साहित्यिक पद्य की दृष्टि से क़ुरआने मजीद एक विशिष्ट एवं अमर किताब है। छठी व सातवीं शताब्दी हिजरी क़मरी में इमाम फ़ख़्रे राज़ी और आठवीं तथा नवीं शताब्दी हिजरी क़मरी में जलालुद्दीन सुयूती नामक विद्वानों ने क़ुरआने मजीद की अनंत विशेषताओं तथा अमर तथ्यों के बारे में विभिन्न पुस्तकें लिखीं।एक सुंदर व सुदृढ़ इमारत उसमें प्रयोग होने वाले अच्छे मसालों और दक्ष इंजीनियरों द्वारा तैयार किए गए ज़बरदस्त नक़्शों और डीज़ाइनों का परिणाम होती है जिन्हें वे उचित ढंग से इमारत में प्रयोग करते हैं। कथन की इमारत भी ऐसी ही होती है। यदि अक्षर और शब्द, जो बात की इमारत के मूल तत्व हैं, दृढ़ एवं ठोस होंगे तो फिर वे एक ऐसी धाराप्रवाह, सरल, सुंदर एवं मनमोहक गद्य को अस्तित्व प्रदान करेंगे जो संबोधन का पात्र बनने वाले पर गहरा प्रभाव डालेगा। क़ुरआने मजीद जब अपनी विशेषताओं का वर्णन करता है तो इसी तथ्य की ओर संकेत करता है।क़ुरआने मजीद के सुरए ज़ुमर की आयत क्रमांक 23 में ईश्वर, क़ुरआने मजीद की विशेषताएं गिनवाते हुए उसे सबसे अच्छा कथन बताता है तथा इस महान किताब की विशिष्टताओं का वर्णन करता है। पहले वह इसे मुतशाबेह किताब का नाम देता है अर्थात ऐसी किताब जिसकी आयतें समन्वित व समान स्वर वाली तथा सुंदरता, मोहकता व गहराई की दृष्टि से एक समान हैं। मुतशाबेह ऐसे कथन को कहते हैं जिसके विभिन्न भाग एक दूसरे से संबंधित व समन्वित हों और उनमें किसी भी प्रकार का विरोधाभास न हो। वस्तुतः क़ुरआने मजीद का कथन, मनुष्यों की बातों के विपरीत है। मनुष्य जितना अधिक बात करता है उतना ही चाहे अनचाहे में उसकी बातों में विरोधाभास दिखाई पड़ने लगता है। कही उसकी बातें मनमोहक व अलंकृत होती हैं तो कभी बिल्कुल साधारण। प्रख्यात लेखकों और कवियों की पुस्तकों पर समीक्षात्मक दृष्टि डालने से भी यह बात सिद्ध हो जाती है किंतु क़ुरआने मजीद इस प्रकार नहीं है। इसकी आयतों में पाई जाने वाली असाधारण एकजुटता, विषय का आपसी ताल-मेल तथा अनुदाहरणीय लयबद्धता सब इस बात की गवाही देते हैं कि क़ुरआन, मानवीय कथन नहीं है। 

    इस किताब की एक अन्य विशेषता, आयतों की लक्ष्यपूर्ण पुनरावृत्ति है। इस प्रकार से कि विभिन्न सूरों में कुछ कथाएं, वृत्तांत, उपदेश तथा नसीहतें दोहराई गई हैं किंतु यह पुनरावृत्ति उबा देने वाली कदापि नहीं है बल्कि जिज्ञासा बढ़ाने और प्रफुल्लित करने वाली है। कथन की वाग्मिता का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि मनुष्य आवश्यकता पड़ने पर और संबोधक पर अधिक प्रभाव डालने के लिए किसी बात को दोहराए किंतु हर बार किसी नए और सृजनात्मक ढंग से कि जो संबोधक को उबाए नहीं। इसके अतिरिक्त क़ुरआने मजीद की व्याख्या के ज्ञान अर्थात तफ़सीर के अनुसार, क़ुरआने मजीद में दोहराई जाने वाली बातें एक दूसरे की व्याख्या करती हैं और उनसे बहुत सी शंकाएं दूर होती हैं।क़ुरआने मजीद के सुरए ज़ुमर की आयत क्रमांक 23 के अनुसार क़ुरआन की एक अन्य विशेषता, संबोधन का पात्र बनने वालों पर उसका गहरा व असाधारण प्रभाव है। यह आयत कहती है कि क़ुरआन की आयतें सुन कर उन लोगों के शरीर कांपने लगते हैं जो अपने पालनहार से डरते हैं, फिर उनके शरीर और मन ईश्वर की याद के लिए नर्म हो जाते हैं। ईश्वर, लालयित हृदयों पर क़ुरआने मजीद की मनमोहक आयतों के प्रभाव के बारे में इस प्रकार वर्णन करता है कि आयतें पहले उनके हृदयों में भय उत्पन्न करती हैं कि जो चेतना और गतिशीलता का कारण बनता है तथा मनुष्य का ध्यान महत्वपूर्ण दायित्वों की ओर आकृष्ट करता है। अगले चरण में आयतें, मनुष्य के भीतर सत्य को स्वीकार करने हेतु आवश्यक नरमी उत्पन्न करती हैं जिसके बाद मनुष्य को शांति व संतोष प्राप्त हो जाता है। क़ुरआने मजीद की तिलावत करने वालों में इन दो परिस्थितियों का आभास पूर्ण रूप से किया जा सकता है। ईश्वर से डराने वाली आयतें मनुष्य को चिंतन पर विवश करती हैं और सृष्टि के रचयिता की निशानियों तथा उसकी दया व कृपा पर ध्यान देने से उसका हृदय सत्य को स्वीकार करने हेतु नर्म हो जाता है।इस्लामी इतिहास, अनन्य ईश्वर पर विश्वास रखने वालों बल्कि ग़ैर मुस्लिमों तक पर क़ुरआने मजीद के प्रभाव की घटनाओं से भरा हुआ है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की पत्नी असमा कहती हैं कि जब भी पैग़म्बर के साथियों के समक्ष क़ुरआने मजीद की आयतों की तिलावत की जाती थी तो उनकी आंखों से आंसू बहने लगते थे और उनके शरीरों में कंपन होने लगता था। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने ईश्वर से डरने वालों के संबंध में इस तथ्य का उत्तम ढंग से वर्णन किया है। वे कहते हैं कि ईश्वर से डरने वाले रात के समय उठते हैं तथा ठहर-ठहर कर और समझ-समझ कर क़ुरआने मजीद की तिलावत करते हैं, अपने अस्तित्व को उसके साथ एक मनमोहक दुख में डुबा देते हैं और क़ुरआने मजीद से अपने दुखों का उपचार चाहते हैं। जब भी उन्हें क़ुरआन में ऐसी आयत दिखाई देती है जिसमें (स्वर्ग की) शुभ सूचना दी गई है तो वे उस पर मोहित हो जाते हैं, उनकी आत्मा की आंखें पूरे उत्साह के साथ उस पर जम जाती हैं और वे उसे अपना लक्ष्य बना लेते हैं। जब कभी उन्हें ऐसी आयत दिखाई देती है जिसमें (नरक की) आग से डराया गया है तो वे अपने मन के कान धर कर उन्हें सुनते हैं, मानो वे नरक की भयंकर आग में जलने वालों की चीत्कार और आग की लपटों के आपस में टकरान की आवाज़ सुन रहे हों।