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    अमर ज्योति-३

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    क़ुरआने मजीद, अंतिम ईश्वरीय किताब है जो मनुष्य के लिए उपहार स्वरूप भेजी गई है और बुद्धिजीवियों व चिंतनकर्ताओं के मतानुसार इस किताब की रचना मनुष्य की क्षमता से बाहर है। चूंकि यह किताब अनंतकालीन है और सभी कालों से संबंधित है अतः इसके चमत्कारिक आयाम भी अमर हैं। यही कारण है कि जैसे-जैसे मनुष्य के ज्ञान में वृद्धि होती जा रही है, वैसे-वैसे आश्चर्यचकित करने वाले क़ुरआने मजीद के नित नए आयाम भी सामने आते जा रहे हैं। पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पौत्र इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम कहते हैं कि क़ुरआने मजीद नई पीढ़ी के लोगों के लिए ईश्वरीय तर्क है जिस प्रकार से कि वह पिछली पीढ़ियों के लिए ईश्वरीय तर्क था अतः हर पीढ़ी को इसकी आयतों में नए नए आयाम मिल जाते हैं और जो कोई भी क़ुरआने मजीद का अध्ययन करे और उस के संबंध में चिंतन करे तो उसे हर बार एक नया बिंदु मिल जाता है जबकि शायरी और भाषण में यह विशेषता नहीं है।निश्चित रूप से मुसलमान अपनी आसमानी किताब पर विशेष ध्यान देते हैं और उसके संबंध में विशेष प्रयास करते हैं और यह इस किताब की महानता और अद्वितीय विशेषताओं का परिणाम है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का यह चमत्कार ईश्वरीय संदेश वहि की किरणों से अस्तित्व में आया है जो सौभाग्य एवं कल्याण की ओर मनुष्य का मार्गदर्शन करता है। यदि मानव समाज के विकास के चरणों को पाठशाला की कक्षाओं के समान माना जाए तो दूर अतीत में मानव के कमज़ोर ज्ञान और वैचारिक शक्ति के विकसित न हो पाने के कारण ईश्वर ने उसके मार्गदर्शन के लिए बड़े ही सरल और आरंभिक कार्यक्रम व किताबें भेजी थीं किंतु बाद के चरणों में ये आदेश विश्व व्यापी व अधिक व्यापक हो गए क्योंकि मनुष्य वैचारिक प्रौढ़ता एवं परिपूर्णता के एक चरण तक पहुंच चुका था और व्यापक क़ानूनों के आधार पर सही और ग़लत मार्ग को भली भांति समझ सकता था। क़ुरआने मजीद, संविधान की पुस्तक और ऐसी संस्कृति दायक किताब है जिससे लोग अपनी क्षमता व योग्यता के अनुसार उत्तम ढंग से लाभान्वित हो सकते हैं। ईश्वर के अनुसार क़ुरआन के संपूर्ण एवं व्यापक क़ानूनों के बाद अब किसी नई किताब और नए कार्यक्रम को भेजे जाने की आवश्यकता नहीं है। विशेष कर इस लिए कि क़ुरआने मजीद की आयतें, उसके शब्द और उसके अक्षर बिना किसी छोटे से परिवर्तन के बिल्कुल वही हैं जो पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के काल में उनके पवित्र हृदय पर उतरे थे और जिन्हें कातेबान वहि अर्थात पैग़म्बर के मुख से ईश्वरीय आयतों को सुन कर लिखने वालों ने अत्यंत साधारण साधनों से लिख लिया था। वर्ष 28 हिजरी क़मरी में क़ुरआने मजीद का कई प्रतियों में पूर्ण रूप से संकलन किया गया और फिर उसे सभी लोगों के अधिकार में दे दिया गया।वस्तुतः क़ुरआने मजीद की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता, मनुष्यों की विचार एवं व्यवहार को सुधारने में उसकी निर्माणकारी भूमिका है। क़ुरआन स्वयं को मार्गदर्शन की किताब बताता है और सभी मनुष्यों को अपने संबोधन का पात्र बनाता है। सूरए मुद्दस्सिर की 31वीं आयत में कहा गया है कि यह (क़ुरआन) मनुष्य को सचेत करने के साधन के अतिरिक्त कुछ और नहीं है। मनुष्य, हर वस्तु से पहले अपनी आत्मा की परिपूर्णता एवं संपन्नता के लिए क़ुरआने मजीद के प्रवाहित सोते से लाभान्वित हो सकता है और अपनी आंतरिक प्यास को बुझा सकता है। क़ुरआने मजीद के माध्यम से मनुष्य सृष्टि के रचयिता और उसके आकर्षक कथन से जो संबंध स्थापित करता है, उससे वह ईश्वर के असीम ज्ञान व शिक्षाओं से जुड़ जाता है और भौतिक बंधनों से स्वतंत्र हो जाता है। निश्चित रूप से मनुष्य की आत्मिक व नैतिक समस्याएं, शारीरिक रोगों से बहुत अधिक समानता रखती हैं। आत्मिक अशांति व शारीरिक रोग दोनों को ही उपचार और देख-भाल की आवश्यकता होती है। यदि इस प्रकार के रोगों की जड़ों को न खोजा जाए तो कभी कभी वे ऐसे चरण में पहुंच जाते हैं जहां उनका उपचार संभव नहीं होता। क़ुरआने मजीद स्वयं को उन लोगों के लिए उपचार बताता है जो अज्ञानता, अहं, घमंड, ईर्ष्या और मिथ्याचार जैसे आत्मिक रोगों से मुक़ाबले के लिए उठ खड़े होते हैं। इसी आधार पर ईश्वर क़ुरआने मजीद को दया व उपचार बताता है। सूरए इसरा की 82वीं आयत में ईश्वर कहता है और हम क़ुरआन से वह चीज़ उतारते हैं जो ईमान वालों के लिए दनवरी व दया है।

    क़ुरआने मजीद ने विभिन्न आयतों में फ़िरऔन, क़ारून व बलअम बाऊर जैसे मानसिक रोगियों के रोगों पर प्रकाश डाला है और कहानी की बड़ी सुंदर भाषा में और कभी कभी सांकेतिक या प्रत्यक्ष रूप से नैतिक बुराइयों के उपचार का मार्ग प्रस्तुत किया है। हज़रत आदम अलैहिस्सलाम तथा उनकी संतानों की रचना के वर्णन में क़ुरआने मजीद कुछ मनोवैज्ञानिक बिंदुओं की ओर संकेत करता है। उदाहरण स्वरूप हीन भावना और आत्म सम्मान का अभाव व्यक्तिगत एवं सामाजिक बुराइयों की जड़ है। जैसा कि इतिहास के अधिकांश युद्ध व रक्तपात वाली घटनाएं, मनुष्य की आत्मा व मानस पर ईर्ष्या, लोभ व अहं के हावी हो जाने का परिणाम हैं। जिस प्रकार से कि ईर्ष्या व द्वेष की प्रवृत्ति ने क़ाबली को अपने भाई हाबील की हत्या के लिए उकसाया था। जिस मनुष्य में आत्म सम्मान नहीं होता उसमें अपनी आंतरिक इच्छाओं को नियंत्रित करने की शक्ति नहीं होती और वह अपनी इन इच्छाओं की पूर्ति के लिए दूसरों को यातनाएं देता है तथा उनका अपमान करता है। क़ुरआने मजीद, मनुष्य का आदर करता है और उसे धरती में ईश्वर का उत्तराधिकारी बताता है। इस शैली से वह मनुष्य के भीतर की अनेक विध्वंसक भावनाओं को लगाम देता है तथा उसके भीतर ईमान व ईश्वर की पहचान के प्राण फूंक कर जीवन को अर्थ व दिशा प्रदान करता है। सूरए यूनुस की 57वीं आयत में इसी तथ्य की ओर संकेत करते हुए कहा गया है कि हे लोगो! तुम्हारे हृदयों को उपदेश देने व उपचार करने वाला (यह क़ुरआन) तुम्हारे पालनहार की ओर से उतारा गया है। इसी प्रकार हम सूरए फ़ुस्सेलत की 44वीं आयत में पढ़ते हैं कि हे पैग़म्बर! कह दीजिए कि यह (क़ुरआन) उन लोगों के लिए मार्गदर्शन व उपचार है जो ईमान ले आए हैं।वस्तुतः क़ुरआने मजीद, मनुष्य के अस्तित्व के कमज़ोर एवं रोगी आयामों की समीक्षा करके तथा उनके उपचार का मार्ग दिखा कर, मनुष्य के अस्तित्व के स्वस्थ एवं परिपूर्ण आयामों को सुदृढ़ बनाता है तथा प्रगति के मार्ग को, पथभ्रष्टता की राह से अलग कर देता है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपने एक मनमोहक कथन में सभी को इस बात का निमंत्रण देते हैं कि वे ईश्वरीय किताब की परिपूर्ण शिक्षाओं से लाभान्वित हों। वे कहते हैं कि इस किताब, सबसे बड़े रोगों जैसे, कुफ़्र, मिथ्या और पथभ्रष्टता जैसी पीड़ाओं का उपचार है। एक अन्य स्थान पर वे कहते हैं कि जान लो कि इस किताब में भविष्य के समाचार हैं, घटनाओं, रोगों के उपचार तथा तुम्हारे सामाजिक जीवन के सुव्यस्थित कार्यक्रम का वर्णन है, ईश्वर की किताब को मज़बूती से पकड़ लो क्योंकि यह बहुत सुदृढ़ सहारा है और यह अमर प्रकाश है। जो कोई क़ुरआन का दामन थाम लेता है, क़ुरआन उसे मुक्ति दिला देता है।अज्ञानता के काल के अरबों की स्थिति और इस्लाम के आरंभिक काल में क़ुरआन की शिक्षाओं की छाया में परवान चढ़ने वालों की तुलना, मनुष्य तथा समाज पर क़ुरआने मजीद के असाधारण प्रभाव को स्पष्ट कर देती है। शताब्दियों पूर्व, मूर्ति पूजा के प्रचलन के काल में पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने ईश्वर के आदेश से संसार वालों की गर्दन से दासता की ज़ंजीरें तोड़ दीं और ईश्वरीय संदेश वहि की मूल्यवान शिक्षाओं के माध्यम से उनमें सभ्यता व प्रतिष्ठा के प्राण फूंक दिए। उन्होंने अज्ञानता व अंधविश्वास को ईमान व मार्गदर्शन के प्रकाश से समाप्त कर दिया। पैग़म्बरे इस्लाम ने ज्ञान के प्रसार द्वारा अज्ञानता, पथभ्रष्टता व उद्दंडता भरे समाज को एक भले व सौभाग्यशाली समाज में परिवर्तित कर दिया। इतिहास में वर्णित है कि काफ़िरों का गुट यद्यपि पैग़म्बरे इस्लाम पर ईमान नहीं रखता था किंतु अपनी आंतरिक प्यास बुझाने के लिए गुप्त रूप से उनके घर के निकट खड़े हो जाता था और उनके द्वारा तिलावत की जाने वाली क़ुरआने मजीद की सार्थक एवं मनमोहक आयतों को सुना करता था।क़ुरआने मजीद की एक अन्य विशेषता यह है वह सत्य और असत्य को अलग कर देता है, इसी लिए उसका एक नाम फ़ुरक़ान भी है अर्थात सत्य व असत्य के बीच अंतर करने वाला और सत्य व असत्य के बीच अंतर का साधन। निश्चित रूप से यद्यपि मनुष्य की बुद्धि स्वयं ही एक पथप्रदर्शक दीपक की भांति है किंतु वह सभी वस्तुओं को बिल्कुल सही ढंग से नहीं समझ सकती। चूंकि यह संसार प्रकाश व अंधेर तथा सत्य व असत्य के बीच टकराव का केंद्र है और दूसरी ओर हर मनुष्य को स्वाभाविक रूप से अपने जीवन में विभिन्न प्रकार की समस्याओं और घटनाओं का सामना करना पड़ता है अतः वह केवल अपनी बुद्धि के भरोसे नहीं रह सकता। कृपाशील ईश्वर ने दया स्वरूप, सत्य और असत्य को अलग करने के लिए कुछ मार्गदर्शक भेजे हैं जिनमें सर्वोपरि क़ुरआने मजीद है।