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    अमर ज्योति-४

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    ईश्वर, क़ुरआने मजीद के सूरए रहमान में मनुष्य को दी जाने वाली आध्यात्मिक एवं भौतिक अनुकंपाओं तथा सृष्टि की रचनाओं की एक रोचक सूचि का वर्णन करता है। इसके बाद वह सृष्टि की आश्चर्यजनक वस्तुओं की ओर संकेत करते हुए, सभी को उसके द्वारा प्रदान की गई अनुकंपाओं की स्वीकारोक्ति का निमंत्रण देता है तथा इन्कार के लिए कोई गुंजाइश बाक़ी नहीं छोड़ता। इस सूरे में ईश्वर ने बारंबार यह प्रश्न पूछा है कि हे जिन्नों और मनुष्यो! तुम अपने पालनहार की कौन कौन सी अनुकंपाओं को झुठलाओगे। दयालु व तत्वदर्शी ईश्वर इस सूरे में सभी अनुकंपाओं का स्रोत क़ुरआने मजीद को बताता है जिसे सही ढंग से पहचान कर उसकी शिक्षाओं पर कटिबद्ध रहना चाहिए। यह अनंत ख़ज़ाना ऐसी शिक्षाप्रद किताब है जो मूल्यवान तथ्य प्रस्तुत करती है तथा मनुष्य को मोक्ष व कल्याण का मार्ग दिखाती है। ईरान के प्रख्यात कवि हाफ़िज़ शीराज़ी अपनी एक ग़ज़ल में कहते हैं।حافظا در کنج فقر و خلوت شبهاي تار …………………. تا بود وردت دعا و درس قرآن، غم مخورअर्थात हे हाफ़िज़ दरिद्रता के एकांत और अंधेरी रातों में जब तक तुम्हारे पास दुआएं और क़ुरआन का पाठ है तो दुख की कोई बात नहीं है।

    क़ुरआने मजीद की विशेषताओं में से एक, अन्य आसमानी किताबों पर उसकी श्रेष्ठता है। विभिन्न धर्मों की आसमानी किताबों के बारे में महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि ये सभी किताबें तत्वदर्शी रचयिता और ब्रह्मांड के संचालक की ओर से भेजी गई हैं तथा मनुष्य के प्रशिक्षण तथा परिपूर्णता के संबंध में इनमें संपूर्ण समन्वय पाया जाता है। सूरए आले इमरान की आयत क्रमांक दो से चार तक में ईश्वर कहता है कि ईश्वर (अनन्य है तथा उस) के अतिरिक्त कोई अन्य पूज्य नहीं है। वह जीवित तथा सदैव रहने वाला है। (हे पैग़म्बर!) वह वही है जिसने इस किताब (क़ुरआन) को आप पर सत्य के साथ उतारा कि जो अपने से पहले वाली किताबों की पुष्टि करती है और तौरेत और इंजील को इससे पूर्व लोगों के लिए मार्गदर्शन बना कर उतारा।आसमानी किताबों में मनुष्य की चरणबद्ध परिपूर्णता की आवश्यकता के अनुसार एक दूसरे से भिन्नता भी है। जब भी कोई पैग़म्बर नए मत के साथ आया तो वह मनुष्य के लिए अधिक संपूर्ण कार्यक्रम उपहार स्वरूप लाया। क़ुरआने मजीद की एक विशेषता यह है कि यह दो बार पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम पर उतरा है। पहली बार यह एक साथ संपूर्ण रूप से पैग़म्बर के हृदय पर उतरा और फिर उसके बाद 23 वर्षों के अंतराल में क्रमबद्ध ढंग से विभिन्न घटनाओं के बाद क़ुरआने मजीद की आयतें पैग़म्बरे इस्लाम पर उतरती रहीं। इस किताब में असत्य का कोई स्थान नहीं है और इसके आदेश, शिक्षाएं और कार्यक्रम मानव प्रवृत्ति से समन्वित हैं। यद्यपि तौरैत व इंजील जैसी किताबें भी ईश्वरीय किताबें हैं किंतु वे अपने काल के लोगों की वैचारिक एवं सामाजिक परिस्थितियों के दृष्टिगत भेजी गई हैं और उनके अनेक आदेश एवं क़ानून विशेष काल से संबंधित हैं। जबकि क़ुरआने मजीद एक अमर व सर्वकालिक चमत्कार है तथा विशेष जाति या काल तक सीमित नहीं है। इसकी आयतों में सदैव ताज़गी है और कभी भी क़ुरआन पर पुरानेपन की धूल नहीं बैठती।क़ुरआने मजीद और अन्य धर्मग्रंथों के बीच एक अंतर यह है कि क़ुरआन में ग़लत विचारों व अंधविश्वास का कोई स्थान नहीं है। क़ुरआने मजीद एकेश्वरवाद तथा ईश्वर की पहचान के मामले में ईश्वर का इस प्रकार उल्लेख करता है कि जो उसके पालनहार होने की विशेषता के अनुकूल है तथा उसे हर प्रकार की कमी और बुराई से दूर बताता है। क़ुरआने मजीद में ईश्वर को अनन्य, समकक्ष रहित और पूजनीय बताया गया है। जो कुछ आकाशों और धरती में है वह पालनहार ही का है और जीवित है तथा उसे अपने जीवन के लिए किसी की भी कोई आवश्यकता नहीं है। क़ुरआने मजीद पिछले पैग़म्बरों के जीवन के इतिहास का उल्लेख करता है, उन्हें उत्तम एवं सुंदरतम गुणों के साथ याद करता है और उनकी भली विशेषताओं की सराहना करता है। ईश्वर मार्गदर्शन करने वाले दूतों पर, जो उसकी ओर से चुने गए हैं, सलाम भेजता है और कहता है कि सलाम हो आले यासीन पर, सलाम हो नूह पर, सलाम हो इब्राहीम पर, सलाम हो पैग़म्बरों पर। किंतु तौरैत व इंजील जैसी किताबों की विषय वस्तु, समय बीतने के साथ फेर-बदल से सुरक्षित नहीं रह पाई और उसमें अंधविश्वास और ईश्वरीय पैग़म्बरों के बारे में अनुचित बातें भी सम्मिलित हो गई हैं। वर्तमान समय में मौजूद तौरैत में सामेरी का बछड़ा बनाने और मूर्तिपूजा का निमंत्रण देने को हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के भाई और उत्तराधिकारी हज़रत हारून अलैहिस्सलाम से संबंधित किया गया है जबकि बनी इस्राईल के सामेरी नामक एक व्यक्ति ने यह पाप किया था। क़ुरआने मजीद इन दोनों ईश्वरीय नेताओं अर्थात हज़रत मूसा व हारून अलैहिमस्सलाम को हर प्रकार के अनेकेश्वरवाद एवं मूर्तिपूजा से दूर एवं विरक्त बताता है।

    क़ुरआने मजीद की आत्मा को जीवन प्रदान करने वाली आयतें इस प्रकर सुव्यवस्थित एवं समन्वित हैं कि उन्हें याद करके जीवन के मामलों के संचालन में उनसे लाभान्वित हुआ जा सकता है। आज बड़ी संख्या में इस्लामी देशों के युवा इस ईश्वरीय ग्रंथ की आयतों को याद करते हैं, उनकी तिलावत करते हैं और इस किताब के आकर्षणों से प्रभावित होकर अपने में परिवर्तन लाते हैं। महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि क़ुरआने मजीद, सभी आसमानी किताबों का सम्मान करता है और बड़े स्पष्ट शब्दों में कहता है कि वह जो कुछ भी प्रस्तुत करता है वह पिछली आसमानी किताबों की पथप्रदर्शक शिक्षाओं का ही क्रम है। इसी के साथ वह इस तथ्य की ओर संकेत करता है कि वर्तमान आसमानी किताबें उन फेर-बदलों से भरी पड़ी हैं जो पथभ्रष्ट विद्वानों द्वारा उनमें किए गए हैं और इसके परिणाम स्वरूप उनमें वर्णित कुछ शिक्षाएं अपने मूल आधार से दूर हो गई हैं। क़ुरआने मजीद द्वारा पिछली आसमानी किताबों पर ध्यान, मुसलमानों तथा अन्य ईश्वरीय धर्मों के अनुयाइयों के बीच समानताओं की ओर संकेत के साथ ही, अन्य धर्मों की तुलना में इस्लामी शिक्षाओं के उच्च स्थान को भी स्पष्ट करता है।अलबत्ता क़ुरआने मजीद की दृष्टि में सभी आसमानी किताबें एक समान नहीं हैं। उसने तौरैत व इंजील को अधिक महत्व दिया है तथा अनेक आयतों में यहूदियों और ईसाइयों की कुछ ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन किया है। वस्तुतः इस्लाम की दृष्टि से पिछले आसमानी धर्म विशेष कर यहूदियत व ईसाइयत, पूरे इतिहास के धर्मों की परिपूर्णता की प्रक्रिया का भाग रहे हैं और यह प्रक्रिया अंततः उस समय पूरी हुई जब एक संपूर्ण धर्म के रूप में इस्लाम सामने आ गया। क़ुरआने मजीद के सूरए बक़रह की आयत क्रमांक 285 में कहा गया हे कि वास्तविक ईमान वाले न केवल क़ुरआन और पैग़्मबरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम पर आस्था रखते हैं बल्कि वे अन्य ईश्वरीय दूतों तथा उनकी आसमानी किताबों पर भी ईरान रखते हैं। क़ुरआने मजीद पहले पैग़म्बर हज़रत आदम अलैहिस्सलाम से लेकर अंतिम पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को एक ही मार्ग पर बताता है और उनके बीच कोई अंतर नहीं रखता। सूरए बक़रह की आयत क्रमांक 136 में क़ुरआन कहता है कि तुम सब कहो कि हम ईश्वर पर ईमान लाए और जो कुछ हम पर उतरा और इसी प्रकार जो कुछ इब्राहीम, इस्माईल, इस्हाक़, याक़ूब और उनके वंश के पैग़म्बरों पर उतरा और जो कुछ मूसा व ईसा को दिया गया और जो कुछ अन्य पैग़म्बरों को उनके पालनहार की ओर से दिया गया ईमान रखते हैं। हम इनमें से किसी के बीच अंतर नहीं समझते और हम ईश्वर के समक्ष नतमस्तक हैं।तौरैत व इंजील के विपरीत कि जिनके संबोधन का पात्र कोई विशेष जाति अर्थात बनी इस्राईल है, क़ुरआने मजीद की शिक्षाएं विश्व व्यापी , अनंतकालीन तथा संपूर्ण हैं और निश्चित रूप से कल्याण, सौभाग्य और परिपूर्णता की ओर सभी मनुष्यों का मार्गदर्शन करती हैं। ईश्वर सूरए तकवीर की 27वीं आयत में कहता है कि यह (क़ुरआन) समस्त संसार वासियों के लिए उपदेश के अतिरिक्त कुछ और नहीं है। कुल मिला कर यह कि यद्यपि क़ुरआने मजीद अन्य आसमानी किताबों की पुष्टि करता है किंतु एक प्रकार से उन्हें स्थगित व अप्रचलित बताता है और उनकी शिक्षाओं को स्वतंत्र रूप से पालन योग्य नहीं समझता। क़ुरआन की दृष्टि में केवल इस्लाम धर्म और उसकी शिक्षाएं ही सत्य और स्वीकार करने योग्य हैं। सूरए आले इमरान की आयत क्रमांक 19 में कहा गया है कि निश्चित रूप से धर्म (तो) ईश्वर के निकट (केवल) इस्लाम (ही) है। इसी प्रकार इसी सूरे की आयत क्रमांक 85 में ईश्वर कहता है कि तो जो कोई इस्लाम के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म को अपने लिए ग्रहण करे तो (यह काम) उससे स्वीकार नहीं किया जाएगा और वह प्रलय में घाटा उठाने वालों में से होगा।