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    अमर ज्योति-7

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    दयावान ईश्वर ने अपने अंतिम दूत को भेज कर पूरे विश्व के लिए अपनी दया व कृपा को संपूर्ण कर दिया तथा क़ुरआन नामक किताब के माध्यम से कल्याण का मार्ग सभी को दिखा दिया। धार्मिक आदेश, उपासना, नैतिक सिद्धांत, जीवन के संस्कार और जो कुछ मनुष्य के सौभाग्य का कारण बनता है सब कुछ इस किताब में वर्णित है। ईश्वर ने क़ुरआने मजीद को भेज कर जो एक संपूर्ण एवं व्यापक किताब है सभी लोगों के पास अपना तर्क भेज दिया है और कहा है कि कोई भी किताब क़ुरआने मजीद की भांति, मनुष्य की आवश्यकताओं को पूरा नहीं करती। क़ुरआन की आयतों का स्वरूप और उनका अद्भुत अंदाज़ तथा उसकी अद्वितीय विषय वस्तु स्पष्ट रूप से यह दर्शाती है कि उसे किसी मनुष्य ने नहीं लिखा है बल्कि यह एक अमर चमत्कार है जिसका स्रोत अनन्य ईश्वर है।चमत्कार किसी असाधारण कार्य को कहते हैं। सामान्य प्राकृतिक एवं स्वाभाविक क़ानूनों की परिधि से बाहर निकलने एवं प्रचलित मार्ग से हटकर किसी मार्ग के चयन को चमत्कार कहा जाता है। कोई भी व्यक्ति ईश्वर की इच्छा व अनुमति के बिना चमत्कार नहीं दिखा सकता। दूसरे शब्दों में जब तक कोई ईश्वरीय शक्ति न हो, इस प्रकार का कार्य प्रस्तुत करना किसी के लिए भी संभव नहीं है। इस आधार पर यदि कोई व्यक्ति चमत्कार प्रस्तुत करता है तो उसे उसके दावे के सही होने का प्रमाण माना जा सकता है। यह वह तथ्य है जिस पर बुद्धिजीवी सहमत हैं और इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं करते।ईश्वरीय दूतों के काल में सभी लोग ईश्वरीय चमत्कारों को देख सकते थे किंतु फिर भी बहुत से लोग इन चमत्कारों को नहीं मानते थे और वास्तविकता को स्वीकार नहीं करते थे किंतु बुद्धिजीवी और विचारक, पैग़म्बरों के चमत्कारों की पुष्टि करते थे। ईश्वर की तत्वदर्शिता की मांग थी कि सभी पैग़म्बर अपने काल की परिस्थितियों के अनुरूप चमत्कार प्रस्तुत करें। यह बात आवश्यक थी कि ये चमत्कार उस काल में प्रचलित ज्ञान एवं विशेषज्ञताओं से श्रेष्ठ हों ताकि उनके और चमत्कारों के बीच का अंतर बेहतर ढंग से स्पष्ट हो सके। इस मूल सिद्धांत के आधार पर जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को पैग़म्बरी के लिए चुना गया तो उनकी लकड़ी की लाठी, ईश्वर की ओर से चमत्कार का साधन बनी और एक बहुत बड़े अजगर में परिवर्तित हो गई। हज़रत मूसा के काल में जादू-टोना बहुत प्रचलित था किंतु जो लोग इस कार्य में दक्ष थे वे उनका चमत्कार देख कर समझ गए कि यह कार्य जादू-टोने से कहीं आगे है और एक इतर मानवीय महान शक्ति से जुड़ा हुआ है। यही वह समय था जब फ़िरऔन के लिए काम करने वाले जादूगर उसकी धमकियों से भयभीत हुए बिना ईश्वर पर ईमान ले आए और उसके समक्ष नतमस्तक हो गए। हज़रत ईसा के काल में चिकित्सा विज्ञान ने काफ़ी प्रगति की थी और यह ज्ञान बहुत प्रचलित था। सीरिया और फ़िलिस्तीन में चिकित्सक अनेक असाध्य रोगों का उपचार करते थे। ईश्वर की तत्वदर्शिता की मांग थी कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम का चमत्कार उस काल के चिकित्सकों की शैली से श्रेष्ठ हो। इसी कारण हज़रत ईसा मसीह ईश्वर की आज्ञा से मरे हुए लोगों को जीवित कर देते थे, असाध्य रोगों में ग्रस्त लोगों को अच्छा कर देते थे तथा जन्मजात अंधों को दृष्टि प्रदान कर देते थे। इस प्रकार की बातें चिकित्सकों की क्षमता से बाहर थीं।अरब जगत में अज्ञानता के काल के लोग विभिन्न कलाओं और ज्ञानों के बीच साहित्य में दक्ष थे और वागमिता एवं शब्दालंकार में निपुण थे। उस काल के लोगों में साहित्यिक दृष्टि से अरबों का डंका बजा हुआ था। ईश्वर की इच्छा यह हुई कि अपने अंतिम दूत को क़ुरआने मजीद की आयतों से गौरवान्वित करे कि जो वाग्मिता एवं शब्दालंकारों से ओत-प्रोत हैं ताकि अरब क़ुरआने मजीद की साहित्यिक विशेषताओं के समक्ष शीश नवा दें। प्रख्यात इस्लामी इतिहासकार इब्ने हेशाम ने लिखा है कि एक रात अबू सुफ़यान, अबू जहल और अख़नस एक दूसरे की उपस्थिति से अनभिज्ञ पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के घर के निकट पहुंचे और क़ुरआने मजीद की मनमोहक आयतों की तिलावत सुनने लगे। वापसी में उन्होंने एक दूसरे को देखा और आयतें सुनने के कारण अपने आपको बुरा भला कहने के बाद प्रण किया कि अब वे कभी पैग़म्बर के घर के निकट नहीं जाएंगे किंतु क़ुरआने मजीद की आश्चर्यजनक एवं आकर्षक आयतें उन्हें अपनी ओर बुला रही थीं अतः अगली रात भी वे अलग-अलग पैग़म्बरे इस्लाम के घर के निकट पहुंचे और छिप कर क़ुरआन की आयतें सुनने लगे। वापसी में उन्होंने पुनः एक दूसरे को देखा। यह क्रम तीन रातों तक जारी रहा। अंततः तीनों ने एक दूसरे को वचन दिया कि अब वे कभी भी क़ुरआने मजीद की आयतें सुनने के लिए पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के घर के निकट नहीं जाएंगे किंतु मिस्र के प्रख्यात विद्वान डाक्टर ताहा हुसैन के शब्दों में क़ुरआन का चमत्कार ऐसी बात है जिस तक मन स्वयं पहुंच जाता है और उसे स्वीकार कर लेता है। इस भावना को प्रकट करने में ज़बान और क़लम अक्षम हैं।इस बात पर भी ध्यान रहना चाहिए कि क़ुरआने मजीद के अतिरिक्त भी पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के अनेक चमत्कार थे, जैसे चांद का दो टुकड़े हो जाना, उनके आदेश पर कंकरियों का ईश्वर का गुणगान करना इत्यादि किंतु क़ुरआने मजीद उनका सबसे महत्वपूर्ण चमत्कार है। पैग़म्बरे इस्लाम के अन्य चमत्कार दूसरे पैग़म्बरों की भांति सामयिक थे। स्पष्ट है कि यदि चमत्कार किसी एक समय से विशेष होगा और उसी समय तक सीमित रहेगा तो आने वाली पीढ़ियां उसे अपनी आंखों से नहीं देख सकतीं तथा उसके बारे में की जाने वाली बातें समय बीतने के साथ परिवर्तित होती रहेंगी और उतनी विश्वस्त नहीं रह जाएंगी। अतः जिन लोगों ने चमत्कार को निकट से नहीं देखा है, उनके लिए ईश्वर का तर्क संपूर्ण नहीं होगा। अंतिम ईश्वरीय पैग़म्बर का चमत्कर सार्वकालिक एवं अमर होना चाहिए। क़ुरआने मजीद जिस प्रकार से पिछले समय के लोगों के लिए ईश्वरीय तर्क था उसी प्रकार आने वाली पीढ़ियों के लिए भी ठोस गवाह है और प्रतिदिन विज्ञान व तकनीक की प्रगति के साथ उसका चमत्कार अधिक स्पष्ट होता जा रहा है।मुस्लिम विद्वानों ने अपने अध्ययनों के आधार पर क़ुरआने मजीद के चमत्कार के अनेक आयाम प्रस्तुत किए हैं। प्रख्यात विद्वान जलालुद्दीन सुयूती कहते हैं कि चमत्कार के भौतिक व मानसिक जैसे दो भाग होते हैं। भौतिक चमत्कार पिछले पैग़म्बरों के चमत्कारों से संबंधित है किंतु चूंकि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम सभी मनुष्यों के मार्गदर्शन के लिए भेजे गए हैं अतः उनका चमत्कार सर्वकालिक एवं मानसिक है और वह क़ुरआने मजीद है। इमाम फ़ख़्रे राज़ी लिखते हैं कि क़ुरआने मजीद का चमत्कार, वाग्मिता, उसकी शैली और हर प्रकार की त्रुटि से दूर रहने में है। इब्ने अतियह भी क़ुरआने मजीद के चमत्कार को उसके सजे हुए शब्दों और अर्थों की सच्चाई बताते हैं।क़ुरआने मजीद की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि वह कल्याण व परिपूर्णता की ओर मनुष्य के मार्गदर्शन एवं नेतृत्व को सुनिश्चित बनाता है। प्रख्यात वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन कहते हैं कि क़ुरआन गणित, अंकगणित या रेखागणित की किताब नहीं है बल्कि क़ानूनों का एक संकलन है जो सही राह की ओर मनुष्य का मार्गदर्शन करता है, वह राह जिसके निर्धारण और परिभाषा में विश्व के सबसे बड़े बड़े दार्शनिक भी अक्षम हैं। जैसा कि इस आसमानी किताब ने अज्ञानता के काल के उद्दंडी एवं रक्तपात करने वाले अरबों का मार्गदर्शन किया, उन्हें मूर्तिपूजा व नैतिक बुराइयों से मुक्ति दिलाई तथा अल्पावधि में ही युद्ध, बर्बरता एवं अंधविश्वास को समाप्त कर दिया। क़ुरआने मजीद ने अरबों को एक ऐसे राष्ट्र में परिवर्तित कर दिया जो कई शताब्दियों तक उच्च संस्कृति, प्रकाशमान इतिहास और नैतिक गुणों से संपन्न रहा। इस्लाम का आरंभिक इतिहास ऐसे लोगों के साहस, वीरता व बलिदान से भरा हुआ है जिन्होंने क़ुरआने मजीद की शिक्षाओं की छाया में महान इस्लामी सभ्यता की नींव रखी। क़ुरआन के मार्गदर्शन ने अरबों के हृदयों को अज्ञानता के अंधकार से निकाल कर ज्ञान, बुद्धिमत्ता एवं तत्वदर्शिता से प्रकाशमयी कर दिया और उनके मन अनन्य ईश्वर पर आस्था और सत्य के मार्ग में प्रतिरोध से एक दूसरे के निकट आ गए।क़ुरआने मजीद अपने चमत्कार को सिद्ध करने के लिए कुछ आयतों में इस बात की ओर संकेत करता है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने अपने जीवन में कभी कुछ नहीं लिखा है। पैग़म्बरे इस्लाम ने भी अनेक बार इस बात पर बल दिया है। इसके बावजूद उन्होंने एक ऐसी किताब प्रस्तुत की है जो बौद्धिक शिक्षाओं और प्रशिक्षण व शिष्टाचार की बातों से भरी हुई है, इस प्रकार से कि उसने बुद्धिवजीवियों और विचारकों को अपनी ओर आकृष्ट कर लिया है।

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