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    अमर ज्योति-10

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    क़ुरआने मजीद एक ईश्वरीय चमत्कार है जो शताब्दियां बीत जाने के बावजूद यथावत जीवित है और अपने अस्तित्व से वास्तविकता का प्रकाश बिखेर रहा है। यह ईश्वरीय किताब, इस्लाम की निशानी और इस महान धर्म की सच्चाई का प्रमाण समझी जाती है। क़ुरआने मजीद के व्याख्याकारों तथा हदीस के विशेषज्ञों बल्कि ग़ैर मुसलिम अरबों ने भी क़ुरआन की वाग्मिताकों उसके ईश्वरीय चमत्कार होने का एक आयाम माना है। अरबी भाषा के सर्फ़, नह्व, लुग़त, मआनी और बयान जैसे व्याकारण के विभिन्न विषयों पर इस ईश्वरीय किताब का गहरा प्रभाव पड़ा है यही कारण है कि मजीद की साहित्यिक विशेषताओं के बारे में अत्यधिक पुस्तकें लिखी गई हैं। इन पुस्तकों में इस ईश्वरीय किताब के शाब्दिक एवं आध्यात्मिक चमत्कार के विभिन्न आयामों की चर्चा की गई है।क़ुरआने मजीद ने साहित्यिक बिंदुओं को सुरक्षित रखते हुए मनुष्य के मार्गदर्शन तथा वैचारिक परिपूर्णता के लिए जो तथ्य आवश्यक एवं लाभदायक हैं उन्हें अत्यंत सुंदर शब्दों में बयान किया है। इसी आधार पर दयावान ईश्वर ने उसे अहसनुल हदीस या सर्वोत्तम कथन कहा है। सूरए ज़ुमर की आयत नंबर 23 में कहा गया है कि ईश्वर ने सर्वोत्तम कथन को उतारा है। ऐसी किताब जिसकी आयतें (सुंदरता एवं विषय वस्तु की दृष्टि से) एक दूसरे के समान हैं, कुछ आयतों की पुनरावृत्ति है और इस किताब की आयतें सुनने के बाद उन लोगों के शरीर कांपने लगते हैं जो अपने पालनहार से डरते हैं। फिर उनके शरीर व हृदय नर्म पड़ कर ईश्वर के स्मरण में लग जाते हैं। इसी प्रकार ईश्वर सूरए इसरा की आयत नंबर 107 और 108 में वास्तविक बुद्धिमानों की बात करते हुए कहता है कि जब उनके समक्ष क़ुरआन की तिलावत की जाती है तो वे सजदा करते हुए धरती पर नतमस्तक हो जाते हैं और रोने लगते हैं तथा क़ुरआने मजीद की दिल में उतर जाने वाली आयतें ईश्वर के प्रति उनके भय में वृद्धि करती हैं। सूरए माएदा की आयत नंबर 83 में ईसाइयों के एक गुट की ओर संकेत करते हुए कहा गया है कि जब यह गुट क़ुरआन की आयतों की तिलावत सुनता है तो उनमें मिलने वाले तथ्यों के कारण उस गुट के सदस्यों की आंखों से आंसू जारी हो जाते हैं।अरबी भाषा में फ़साहत अर्थात शब्दालंकार का अर्थ होता है अर्थ व शैली की दृष्टि से शब्दों का स्पष्ट होना तथा जुड़ाव की दृष्टि से वाक्यों का धाराप्रवाह व सहज होना। बलाग़त या वाग्मिता का अर्थ होता है श्रोता के समक्ष प्रस्तुत की जाने वाली बात का पूर्ण रूप से स्पष्ट होना। उस काल में फ़साहत व बलाग़त में अरबों की दक्षता के दृष्टिगत, इन दोनों मैदानों में क़ुरआने मजीद की चमत्कारिक शैली ने अरबों के साहित्य विशेषज्ञों का ध्यान पूर्ण रूप से अपनी ओर आकृष्ट कर लिया। साहित्यकार हतप्रभ थे और क़ुरआने मजीद के बारे में कोई भी निर्णय करने में अक्षम थे। वे भली भांति जानते थे कि क़ुरआन की आयतें गद्य या पद्य नहीं हैं बल्कि ईश्वरीय कथन ने साहित्य में एक नई शैली प्रस्तुत की थी जिसमें गद्य और पद्य दोनों की रोचकता मौजूद थी और वह शेर के वज़्न, क़ाफ़िए और काव्य कल्पना के बंधनों में भी फंसा हुआ नहीं था।यद्यपि अज्ञानता के काल के अरब शब्दों के अर्थ, साहित्यिक ज्ञान और कथन के रोचक बिंदुओं के बारे में दक्ष थे किंतु नैतिक शिक्षाओं व बौद्धिक विचारधारा के बारे में कुछ नहीं जानते थे और इस प्रकार की बातों की व्याख्या में अक्षम थे। क़ुरआने मजीद ने रोचक एवं मनमोहक वाक्यों के माध्यम से इस्लाम के नैतिक व आस्था संबंधी आधारों का वर्णन किया और अज्ञानता के काल के विचारों को पूर्णतः ग़लत सिद्ध कर दिया। अतः अरब के भाषा विशेषज्ञों और साहित्यकारों ने क़ुरआने मजीद की साहित्यिक शैली को हर कथन से श्रेष्ठ पाया और वे कभी भी इस विशेष शैली में कथन प्रस्तुत करने में सफल नहीं हो सके किंतु तीसरी शताब्दी हिजरी क़मरी के बाद वाग्मिता के ज्ञान के आकार लेने के बाद औ जाहिज़ व अब्दुल क़ाहिर जुरजानी जैसे विद्वानों और ज़मख़शरी, तबरसी व फ़ख़्रे राज़ी जैसे क़ुरआने मजीद के व्याख्याकारों के सामने आने के बाद अन्य कथनों की तुलना में क़ुरआन की वाग्मिता व शब्दालंकारों के मानक पहचाने गए और साहित्यिक दृष्टि से क़ुरआन के चामत्कारिक आयाम सबके समक्ष स्पष्ट हो गए। इब्ने अतियह क़ुरआने मजीद के सजे हुए शब्दों, अर्थों की सच्चाई और अद्भुत वाग्मिता को उसका चमत्कार बताते हुए कहते हैं कि यदि हम क़ुरआने मजीद में से किसी भी शब्द को उसके स्थान से हटाएं और पूरी अरबी भाषा को उसके स्थानापन्न शब्द के लिए खंगाल डालें तब भी हमें कोई शब्द नहीं मिलेगा।पश्चिम के विद्वानों ने भी क़ुरआने मजीद का अध्ययन करने के बाद क़ुरआने मजीद की इस विशेषता को सर्वश्रेष्ठ बताया है। ब्रिटिश विद्वान कार्रलायल कहते हैं कि इस बात की अनदेखी करते हुए कि क़ुरआन ईश्वरीय वहि की किताब है, यह शब्दों व शब्दों के मेल की दृष्टि से सबसे उत्तम किताब है। यह किताब एक वास्तविक सिद्धांत और उच्च एवं पवित्र स्रोत से जुड़ी हुई है, इस प्रकार से कि इसके मुक़ाबले में सभी किताबें अत्यंत साधारण हैं तथा यह किताब हर प्रकार के अप्रिय सिद्धांतों से पवित्र है। फ़्रांसीसी विचारक डरमिंघम लिखते हैं कि क़ुरआने मजीद, मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम) का ऐसा अद्भुत चमत्कार है जिसका सुंदर व उच्च साहित्य और इसी प्रकार उसकी प्रकाशमयी शक्ति यथावत एक अनसुलझी गुत्थी के रूप में अब भी बाक़ी है।हर सूरे की आयतों के बीच आध्यात्मिक सामंजस्य भी क़ुरआने मजीद की सुंदर विशेषताओं में से एक है। क़ुरआन के सूरए एक साथ नहीं उतरे हैं बल्कि आयतें विभिन्न अवसरों पर विभिन्न घटनाओं के उपलक्ष्य में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पास भेजी गई हैं। आयतों का क्रमवार ढंग से अलग अलग अवसरों पर आना इस बात का कारण बनना चाहिए था कि आयतों के बीच आपसी संपर्क व सामंजस्य न हो जबकि विद्वानों ने विशेष कर वर्तमान काल के बुद्धिजीवियों ने क़ुरआने मजीद के सूरों के संबंध में जो अध्ययन किए हैं उनसे वे इस परिणाम तक पहुंचे हैं कि हर सूरे का कोई एक या कई विशेष लक्ष्य हैं जो उस सूरे की आयतों को आपस में जोड़े रखते हैं। सूरों का क्रम भी बहुत विशेष है। वे एक सुंदर व मनमोहक भूमिका के साथ आरंभ होते हैं और फिर अपने उच्च लक्ष्यों का वर्णन करते हैं और कभी कभी एक छोटे से निष्कर्ष के साथ समाप्त होते हैं। मिस्र के प्रख्यात अध्ययनकर्ता मुहम्मद अब्दुल्लाह दराज़ कहते हैं कि यहीं से हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि यद्यपि क़ुरआने मजीद की आयतें विभिन्न अवसरों पर विशेष घटनाओं के कारण भेजी गई हैं किंतु उनकी तार्किक व साहित्यिक एकजुटता सुरक्षित है और यही क़ुरआने मजीद के ईश्वरीय चमत्कार होने का सबसे बड़ा प्रमाण है।क़ुरआने मजीद ने साहित्यिक बिंदुओं का प्रयोग बड़ी सुंदरता से एवं सहज ढंग से किया है। क़ुरआन में रूपकों, उपमाओं और वक्रोक्तियों का प्रयोग बड़ी संख्या में हुआ है। यद्यपि इन सभी अवसरों पर अरबी साहित्य के प्रचलित शैलियों का पालन किया गया है किंतु हर स्थान पर आश्चर्यचकित करने वाले सौंदर्यबोध का प्रयोग हुआ है। साहित्यकारों ने स्वीकार किया है कि क़ुरआने मजीद की उपमाएं, अरबी भाषा में मिलन वाली सबसे ठोस उपमाएं हैं। इन उपमाओं में अद्भुत बिंदु देखने को मिलते हैं। अरबी भाषा के इतिहासकार व साहित्यविद इब्ने असीर इस संबंध में सूरए नबा की दसवीं आयत का उदाहरण देते हैं जिसमें रात को वस्त्र की उपमा दी गई है। इब्ने असीर के अनुसार रात्रि का अंधकार लोगों को दूसरों की दृष्टि से छिपाए रखता है। रात के समय मनुष्य स्वयं को शत्रुओं की नज़रों से छिपाए रख सकता है और अपने लिए बचने का कोई मार्ग खोज सकता है। इब्ने असीर कहते हैं कि यह उन उपमाओं में से है जो क़ुरआने मजीद के अतिरिक्त किसी अन्य पुस्तक मौजूद नहीं हैं क्योंकि रात्रि के व्यापक अंधकर को वस्त्र की उपमा देना, ऐसी साहित्यिक विशेषता है जिसके समान कोई भी उपमा अरबी साहित्य में मौजूद नहीं है चाहे वह गद्य हो या पद्य। इसी प्रकार सूरए बक़रह की आयत नंबर 187 में दंपति को स्नदूसर्र के वस्त्र की उपमा दी गई है जो अत्यंत सुंदर उपमाओं में से एक है। जिस प्रकार से वस्त्र मनुष्य के लिए शोभा का कारण होता है, उसकी शारीरिक त्रुटियों को छिपाता है और उसे सर्दी व गर्मी से सुरक्षित रखता है, उसी प्रकार से पति व पत्नी भी एक दूसरे के लिए शोभा होते हैं, एक दूसरे के अवगुणों की आड़ बनते हैं तथा एक दूसरे को लड़खड़ाने और बुराइयों में ग्रस्त होने से रोकते हैं। अतः यह एक अत्यंत सुंदर उपमा है।इस प्रकार हम देखते हैं कि क़ुरआने मजीद की सुंदर एवं बहुआयामी शैली ने बाद के कालों में साहित्यकारों, लेखकों व वक्ताओं की पुस्तकों व रचनाओं पर गहरा प्रभाव डाला है। ईरान के दो प्रख्यात कवियों मौलाना जलालुद्दीन रूमी की मसनवीये माअनवी तथा हाफ़िज़ की ग़ज़लों में इस प्रभाव को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। रूमी, हाफ़िज़ व सअदी उन प्रख्यात ईरानी कवियों में से हैं जिनकी कविताएं की सुंदरता और रोचकता महान साहित्यिक रचनाएं समझी जाती हैं। ईरान के एक लेखक और क़ुरआने मजीद के अनुवादक बहाउद्दीन ख़ुर्रमशाही का मानना है कि हाफ़िज़ ने ग़ज़ल में जो क्रांति उत्पन्न की वह फ़ारसी भाषा की काव्य परंपरा और ग़ज़ल के इतिहास के कारण नहीं अपितु क़ुरआने मजीद के सूरों के ढांचे के प्रभाव के कारण थी। इसी प्रकार प्रख्यात साहित्यकार और फ़ारसी साहित्य के प्रोफ़ेसर दिवंगत फ़ोरूज़ानफ़र का कहना है कि मौलाना रूम की महान रचना मसनवी को, क़ुरआने मजीद के प्रभाव के कारण ही इस प्रकार की गहरी व आध्यात्मिक शैली प्राप्त हो सकी है। http://hindi.irib.ir/