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    अमर ज्योति-12

    अमर ज्योति-12
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    मनुष्य के पास वस्तुओं की पहचान व ज्ञान के लिए दो महत्वपूर्ण स्रोत हैं जिनमें से एक ईश्वर का विशेष संदेश वहि है। इस अर्थ में कि ईश्वर ने पैग़म्बरों व आसमानी किताबों को भेज कर मनुष्य को संसार की गुप्त व प्रकट वास्तविकताओं से अवगत कराया है। दूसरा स्रोत बुद्धि है कि जो प्रकृति की विभिन्न वस्तुओं के बारे में चिंतन, प्रयास और अनुभव के मार्ग से ज्ञान व वस्तुओं की वास्तविक पहचान तक पहुंचाती है। इन दोनों स्रोतों के बीच का संबंध जिसे ज्ञान व धर्म के संबंध के नाम से जाना जाता है, मानव समाज के विचारकों की महत्वपूर्ण चिंताओं में से एक रहा है। इसी परिप्रेक्ष्य में विद्वानों व विचारकों के एक गुट ने क़ुरआने मजीद और नवीन विज्ञान के बीच संबंध की समीक्षा की। उन्हें पता चला कि नवीन विज्ञान के बहुत सी बातें, क़ुरआन के विषयों से पूर्ण रूप से समन्वित हैं अतः उक्त विद्वानों व शोधकर्ताओं ने इसे क़ुरआन के वैज्ञानिक चमत्कार का नाम दिया।सृष्टि, ईश्वर की महान कलाकृतियों में से एक है और विज्ञान हमें सृष्टि के रहस्यों से अवगत कराता है। पिछले कार्यक्रम में संसार के अस्तित्व में आने के विषय में क़ुरआने मजीद के वैज्ञानिक चमत्कार के बारे में बात की गई थी। इस विषय में यदि हम क़ुरआने मजीद का अध्ययन करें तो हमें ऐसी बहुत सी आयतें मिल जाएंगी जिनमें आकाशों, धरती, सूर्य, चंद्रमा, सितारों और छः चरणों में आकाशों की रचना की बात की गई है। फ़्रान्स के मॉरिस ब्यूकेल व साइमन लापलास और रूस के जार्ज गामोव जैसे बुद्धिजीवियों और वैज्ञानिकों के अनुसार क़ुरआने मजीद की बातें नवीन विज्ञान की वास्तविकताओं से समन्वित हैं। क़ुरआन की साढ़े सात सौ से अधिक आयतों में सृष्टि के रहस्यों के बारे में संकेत किया गया है। स्पष्ट है कि इस सृष्टि की सभी वस्तुएं अपनी व्यवस्था व लक्ष्य के अनुसार ही इस संसार में अपनी भूमिका निभा रही हैं। जिन आयतों में सृष्टि के आश्चर्यों की सूचना दी गई है वे वास्तव में सृष्टिकर्ता व संसार की व्यवस्था चलाने वाले की महानता का वर्णन करती हैं। उदारहण स्वरूप ऐसे असंख्य ग्रह व उपग्रह हैं जो गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण ही अपनी कक्षा में सुव्यवस्थित एवं सुरक्षित ढंग से स्थित हैं। न्यूटन को गुरुत्वाकर्षण शक्ति का पता लगाने के साथ ही उससे भी आगे की एक वास्तविकता का ज्ञान हुआ था। उनका कहना था कि ग्रहों व उपग्रहों की विचित्र व्यवस्था के वर्णन के लिए केवल गुरुत्वाकर्षण शक्ति पर्याप्त नहीं है बल्कि एक ज्ञानी एवं शक्तिशाली स्रोत ने उनके आकार, दूरी तथा गति का आकलन करके उन्हें एक निर्धारित कक्षा में रखा है और वह स्रोत ईश्वर है।क़ुरआने मजीद ने सूरए रअद की दूसरी आयत में गुरुत्वाकर्षण शक्ति की ओर संकेत करते हुए कहा है कि ईश्वर ने आकाशों की रचना देखे जाने वाले स्तंभों के बिना की है। अदृश्य स्तंभों से तात्पर्य, गुरुत्वाकर्षण शक्ति ही है। आयत में कहा गया है कि ईश्वर वही है जिसने आकाशों को उन स्तंभों के बिना उठाया है जो तुम्हारे लिए देखे जाने योग्य हों। फिर वह आकाश पर विराजमान हुआ और सूर्य तथा चंद्रमा को वश में किया कि उनमे से प्रत्येक निर्धारित समय तक अपनी यात्रा अर्थात परिक्रमा जारी रखता है। कार्यों की युक्ति करने वाला वही है और वही आयतों का विस्तार से वर्णन करता है ताकि शायद तुम्हें अपने पालनहार से भेंट पर विश्वास हो जाए। इसी प्रकार क़ुरआने मजीद की कुछ अन्य आयतें मनुष्य का ध्यान सितारों द्वार आकाशों को सुसज्जित किए जाने की ओर आकृष्ट करती हैं और आकाश व सितारों के सौंदर्य तथा सृष्टि के वैभव को ईश्वर का कार्य बताती हैं और फिर मनुष्य को उसमें चिंता का न्योता देती हैं। सूरए क़ाफ़ की छठी आयत में कहा गया है। क्या वे अपने (सिरों के) ऊपर आकाश को नहीं देखते कि हमने किस प्रकार उसे बनाया और फिर उसे सुसज्जित किया? और उसमें किसी भी प्रकार की दरार नहीं है।ईश्वर ने क़ुरआने मजीद की कुछ आयतों में सूर्य व उसके प्रकाश तथा चंद्रमा व उसकी चाल के बारे में बात करते हुए इन दोनों की सृष्टि को नियोजित बताया है। Astrophysics या खगोल भौतिकी द्वारा खोजे गए अंतिम तथ्यों के अनुसार सौर मंडल, जिसके केंद्र में सूर्य स्थित है, आकाश गंगा की दक्षिण पूर्वी दिशा की ओर बल खाते हुए बढ़ रहा है। सूरए यासीन की 38वीं आयत में सूर्य की चाल की ओर संकेत करते हुए कहा गया है कि सूर्य निरंतर अपने ठिकाने की ओर बढ़ रहा है और यह सक्षम एवं जानकार ईश्वर की युक्ति है। सूरए नूह की पंद्रहवीं और सोलहवीं ओयतों में आकाशों की संख्या का वर्णन करते हुए सूर्य व चंद्रमा द्वारा प्रकाश फैलाए जाने की ओर संकेत किया गया है। ईश्वर कहता है, क्या तुम नहीं जानते कि ईश्वर ने किस प्रकार एक के ऊपर एक सात आकाशों की रचना की है और चंद्रमा को आकाशों के बीच प्रकाश का साधन बनाया है तथा सूर्य को एक प्रकाशमान दिया बनाया है?क़ुरआने मजीद की कुछ आयतों में धरती और उसकी सृष्टि का चित्रण किया गया है। इन आयतों में धरती की परिक्रमा की ओर भी संकेत किया गया है। प्राचीन काल में लोगों का मानना था कि धरती एक ही स्थान पर ठहरी हुई है किंतु ईश्वर क़ुरआने मजीद के सूरए नम्ल की आयत नंबर 188 में कहता है कि तुम पर्वतों को देखते हो और सोचते हो कि वे जड़ है और एक ही स्थान पर ठहरे हुए हैं जबकि वे बादल की भांति चल रहे हैं। धरती की परिक्रमा, ऐसा विषय है जिसे आजका मनुष्य वैज्ञानिक तथ्यों से स्वीकार कर चुका है। क़ुरआने मजीद के कुछ व्याख्याकारों का मानना है कि इस आयत में पर्वतों के चलने की ओर संकेत, लोगों को धरती की परिक्रमा की ओर आकृष्ट करने के लिए है क्योंकि इन पर्वतों का आधार धरती क भीतर है और पर्वतों के चलने से तात्पर्य धरती की परिक्रमा है। सूरए ताहा कि 53वीं आयत में कहा गया है कि ईश्वर वही है जिसने धरती को तुम्हारे लिए पालना बनाया है। झूला या पालना बच्चों व शिशुओं के लिए प्रयोग किया जाता है ताकि उसके धीरे-धीरे झूलने से बच्चे को आराम मिले और वह सो जाए। धरती भी मनुष्य के लिए झूले के समान है। यद्यपि उसकी परिक्रमा का लोग आभास नहीं कर पाते किंतु उसकी परिक्रमा से लोगों को आराम मिलता है।धरती का अंडाकार होना भी उन रहस्यों में से हैं जिनके बारे में क़ुरआने मजीद ने सूचना दी है। सूरए मआरिज की चालीसवीं आयत में ईश्वर कहता है कि पूर्वों व पश्चिमों के पालनहार की सौगंध की हम सक्षम व शक्तिशाली हैं। यह आयत सूर्योदय व सूर्यास्त के कई स्थान होने की ओर संकेत करती है जिससे धरती का अंडाकार होना भी समझा जा सकता है। यदि धरती समतल होती तो केवल एक पूरब और एक पश्चिम होता किंतु चूंकि वह अंडाकार है अतः उसके हर क्षेत्र का एक पूरब और एक पश्चिम है। वस्तुतः पूरब व पश्चिम, धरती की परिक्रमा, उसके अंडाकार होने तथा क्षितिजों के अंतर के कारण विभिन्न स्थानों पर अस्तित्व में आते हैं।अलबत्ता जैसा कि हमने बताया, क़ुरआने मजीद द्वारा सृष्टि के रहस्यों के वर्णन का उद्देश्य लोगों को वास्तविकता और ईश्वर की पहचान की ओर उन्मुख करना है। इसी कारण ईश्वर, क़ुरआने मजीद में मनुष्य से कहता है कि वह एक ऐसे संसार में जीवन बिता रहा है जिसकी रचना सत्य के आधार पर की गई है। पूरी सृष्टि अपने वैभव व सौंदर्य के साथ मनुष्य के नियंत्रण में है। दूसरे शब्दों में संपूर्ण सृष्टि पर वर्चस्व रखने वाले मनुष्य का अस्तित्व अकारण व निरर्थक नहीं हो सकता अतः उसके लिए उचित है कि वह इस लक्ष्यपूर्ण संसार में अपनी स्थिति को समझे और सृष्टि की रचनाओं के बारे में चिंतन करे। जैसा कि सूरए अम्बिया की सोलहवीं आयत में इस बिंदु पर बल देते हुए कहा गया है कि हमने आकाश व धरती तथा जो कुछ इनके बीच हो उसे खिलवाड़ (में और निरर्थक) पैदा नहीं किया है। क़ुरआने मजीद के महान व्याख्याकार अल्लामा तबातबाई लिखते हैं कि क़ुरआने मजीद ने विभिन्न आयतों में मनुष्य को भौतिक विज्ञानों, गणित, दर्शनशास्त्र, साहित्य तथा कुल मिला कर उन सभी ज्ञानों को सीखने का निमंत्रण दिया है जो मनुष्य की पहुंच में हैं तथा उसके सौभाग्य व कल्याण का कारण बनते हैं किंतु शर्त यह है कि इन ज्ञानों की वास्तविक विचारधारा ईश्वर की पहचान पर आधारित हो अन्यथा वह ज्ञान क़ुरआन की दृष्टि में अज्ञानता के समान है जो मनुष्य को बेकर बातों में व्यस्त रखे तथा सच्चाई की पहचान से रोक दे।