islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. अमर ज्योति-13

    अमर ज्योति-13

    Rate this post

    संसार की सृष्टि एक लक्ष्यपूर्ण एवं समन्वित व्यवस्था के साथ तथा ईश्वरीय ज्ञान व तत्वदर्शिता के आधार पर की गई है और इस ज्ञान व तत्वदर्शिता के चिन्ह संपूर्ण सृष्टि में अत्यंत स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं। धरती पर ईश्वर के उत्तराधिकारी के रूप में मनुष्य, सृष्टि की अर्थपूर्ण व्यवस्था को खोजने व समझने तथा उसके नियमों को स्वयं व अन्य वस्तुओं के भीतर संकलित करने के प्रयास में है। इस बीच सबसे महत्वपूर्ण वस्तु स्वयं मनुष्य और उसके अस्तित्व में छिपी हुई योग्यताएं हैं।भ्रूण की परिपूर्णता के चरणों तथा मनुष्य की सृष्टि में प्रयोग होने वाले तत्वों का उल्लेख, क़ुरआने मजीद के वैज्ञानिक चमत्कारों में समझा जाता है जिसकी ओर सूरए अनआम, सूरए हज, सूरए मोमेनून, सूरए रूम और सूरए सजदा सहित विभिन्न सूरों में संकेत किया गया है। सूरए मोमेनून की 12वीं, 13वीं और 14वीं आयतों में भ्रूण के विकास का उल्लेख किया गया है। इन आयतों के आरंभ में मनुष्य की रचना मिट्टी से किए जाने पर बल दिया गया है। ईश्वर कहता है कि निश्चित रूप से हमने मिट्टी के सत से मनुष्य की रचना की। फिर उसे एक सुरक्षित ठिकाने अर्थात माता के गर्भाशय में शुक्राणु के रूप में रखा। फिर शुक्राणु को जमे हुए ख़ून का रूप दिया और जमे हुए ख़ून को लोथड़ा बनाया फिर उसे हड्डियों का रूप दिया और फिर हड्डियों पर मांस चढ़ाया और उसे एक नई सृष्टि दी तो महान है वह ईश्वर जो सर्वोत्तम सृष्टिकर्ता है।भ्रूण विज्ञान में नए नए तथ्यों के सामने आने के बाद, मनुष्य की सृष्टि के चरणों के बारे में क़ुरआने मजीद के इन गहरे इशारों ने अनेक चिकित्सकों व विशेषज्ञों को अचरज में डाल दिया है। डाक्टर कीथ मूर भ्रूण विज्ञान के जनक माने जाते हैं और उन्हें वर्ष 1984 में पोस्ट मार्टम विज्ञान में कनाडा का सबसे महत्वपूर्ण इनाम दिया गया था। उन्हें क़ुरआने मजीद में भ्रूण विज्ञान के संबंध में अपने विचार प्रस्तुत करने के लिए एक इस्लामी देश की यात्रा का निमंत्रण दिया गया। आरंभ में डाक्टर मूर ने इस यात्रा में रुचि नहीं दखाई और उनका विचार था कि जो किताब चौदह सौ वर्ष पूर्व आई है उसमें भ्रूण विज्ञान के बारे में कोई विशेष बात नहीं होगी विशेष कर इस लिए भी कि भ्रूण विज्ञान ने हालिया पचास वर्षों में ही ध्यान योग्य प्रगति की है किंतु उन्होंने अपने विचार में मुसलमानों के धार्मिक ग्रंथ में कोई कमज़ोर बिंदु खोजने के लिए इस निमंत्रण को स्वीकार कर लिया। जब उन्होंने भ्रूण के बारे में क़ुरआन की आयतों की समीक्षा आरंभ की तो उन्हें कई आश्चर्यजनक बिंदु मिले जिन्होंने उनके दृष्टिकोण को पूर्ण रूप से परिवर्तित कर दिया। वे कहते हैं कि भ्रूण विज्ञान के बारे में क़ुरआन की अधिकांश बातें इस विज्ञान की नई उपलब्धियों से पूर्ण रूप से मेल खाती हैं। कुछ आयतें ऐसी भी हैं जिनके बारे में मुझे वैज्ञानिक दृष्टि से संपूर्ण जानकारी नहीं है क्योंकि भ्रूण विज्ञान में अभी इस संबंध में कोई विचारधारा प्रस्तुत नहीं की गई है। मेरे विचार में इस बात की संभावना नहीं है कि किसी व्यक्ति या कुछ लोगों ने चौदह सौ वर्ष पहले यह किताब लिखी हो बल्कि यह ऐसे ज्ञानी ईश्वर का कथन है जो सभी बातों से अवगत है।डाक्टर मूर न केवल यह कि इस्लाम के आसमानी ग्रंथ में कोई कमज़ोर बिंदु नहीं खोज पाए बल्कि क़ुरआने मजीद के बारे में उन्हें जिन तथ्यों का पता चला उनके आधार पर उन्होंने मानव विकास नामक पुस्तक सहित अपनी अनेक पुस्तकों व लेखों में मूल परिवर्तन किए और उन्हें पुनः प्रकाशित किया। उनकी किताब मानव विकास को वर्ष 1982 में चिकित्सा के क्षेत्र में सर्वोत्तम पुस्तक का इनाम दिया गया और विभिन्न भाषाओं में उसका अनुवाद हुआ। यह पुस्तक भ्रूण विज्ञान में पाठ्य पुस्तक के रूप में पढ़ाई जाने लगी। डाक्टर कीथ मूर ने एक अंतर्राष्ट्रीय कान्फ़्रेंस में कहा कि बड़ी प्रसन्नता की बात है कि मानव विकास के संबंध में क़ुरआने मजीद की आयतों के अर्थों को स्पष्ट करने में मैं भी कोई भूमिका निभा सकूं। मेरे लिए यह बात पूर्ण रूप से स्पष्ट है कि यह कथन ईश्वर की ओर से हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम) के पास भेजा गया है क्योंकि भ्रूण से संबंध सभी बातें कई शताब्दियों बाद तक सामने नहीं आई थीं। मेरे लिए यह बात पूर्ण रूप से स्पष्ट हो चुकी है कि मुहम्मद, ईश्वर के पैग़म्बर हैं। डाक्टर मूर के दृष्टिकोण के अनुसार भ्रूण के विकास के चरण, जिन्हें आज वैज्ञानिक हलक़ों में बयान किया जाता है बहुत सरल व समझ में आने योग्य नहीं हैं किंतु क़ुरआन ने भ्रूण के विकास व परिपूर्णता के आधार पर एक स्पष्ट वर्गीकरण प्रस्तुत किया है। क़ुरआन में भ्रूण के विकास के विभिन्न चरणों का एक रोचक एवं व्यवस्थित वैज्ञानिक वर्णन है जो पूर्ण रूप से समझने योग्य है। क़ुरआने मजीद के आधार पर सृष्टि में सर्वश्रेष्ठ शक्ति अर्थात ईश्वर भ्रूण के विकास व परिपूर्णता के सभी चरणों का दिशा निर्देश करता है। सूरए इन्फ़ेतार की सातवीं व आठवीं आयतों में इस बात की ओर संकेत करते हुए कहा गया है कि ईश्वर वही है जिसने तुम्हारी सृष्टि की है, तुम्हें सुव्यवस्थित किया और जिस रूप में चाहा तुम्हें बनाया है।अपने जीवन के आरंभिक चरणों में मनुष्य जन्म से पूर्व भ्रूण के रूप में विकास के चरणों से गुज़रता है। फिर नवजात शिशु और दूध पीते बच्चे के रूप में उसके जीवन का एक नया चरण आरंभ होता है जिसके बाद उसका जीवन विभिन्न चरणों से गुज़रता रहता है। क़ुरआने मजीद की आयतों में मानव जीवन के चरणों का उल्लेख माता के पेट से लेकर बुढ़ापे तक हुआ है। सूरए हज की पांचवीं आयत में कहा गया है कि हे लोगों यदि तुम्हें प्रलय के दिन में संदेह है तो (इस बात पर ध्यान दो कि) हमने तुम्हें मिट्टी से पैदा किया है, फिर शुक्राणु से, फिर जमे हुए ख़ून से, फिर मांस के लोथड़े से जिसमें से कोई संपूर्ण हो जाता है और कोई अधूरा रह जाता है ताकि हम तुम पर अपनी शक्ति व क्षमता को स्पष्ट कर दें और हम जिस (भ्रूण) को भी चाहें एक निर्धारित समय तक के लिए माता के गर्भाशय में रखते हैं और फिर तुम्हें शिशु के रूप में बाहर ले आते हैं उसके बाद लक्ष्य यह है कि तुम युवावस्था तक पहुंच जाओ। इस बीच तुममें से कुछ मर जाते हैं और कुछ की आयु को जीवन के सबसे बुरे चरण (बुढ़ापे) तक पहुंचा दिया जाता है।भ्रूण विज्ञान की दृष्टि से, भ्रूण के विकास के दौरान जो इंद्री सबसे पहले संपूर्ण होती वह श्रवण शक्ति है। 24वें सप्ताह से भ्रूण आवाज़ें सुन सकता है। इसके बाद देखने की शक्ति संपूर्ण होती है और 28वें सप्ताह के बाद उसकी आंख का रेटीना, प्रकाश के समक्ष प्रतिक्रिया दिखाना आरंभ कर देता है। क़ुरआने मजीद, भ्रूण में इंद्रियों के उत्पन्न होने का वर्णन सूरए सजदा की नवीं आयत में इस प्रकार करता है। फिर ईश्वर ने उसके (शरीर के अंगों को) ठीक किया और फिर उसमें अपनी आत्मा फूंकी और तुम्हें कान, आंख व हृदय प्रदान किए किंतु तुम लोग उसकी अनुकंपाओं पर कम ही कृतज्ञता प्रकट करते हो।डाक्टर कीथ मूर, क़ुरआने मजीद के वैज्ञानिक तथ्यों की सच्चाई को समझने के बाद, उन कान्फ़्रेंसों में भाग लेते थे जो क़ुरआन के वैज्ञानिक चमत्कारों के संबंध में आयोजित होती थीं। इसी परिप्रेक्ष्य में उन्होंने मास्को में एक कान्फ़्रेंस में भाग लिया जिसमें मुस्लिम व ग़ैर मुस्लिम विद्वानों एवं वैज्ञानिकों द्वारा प्रस्तुत बातों व दृष्टिकोणों को मास्को टीवी के एक चैनल से प्रसारित किया गया। इस कान्फ़्रेंस का परिणाम रूस के 37 प्रख्यात वैज्ञानिकों के मुसलमान होने के रूप में सामने आया। उस कान्फ़्रेंस में डाक्टर मूर से पूछा गया कि क्या आपने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया है? तो उन्होंने उत्तर दिया कि मैं गवाही देता हूं कि क़ुरआन ईश्वर की किताब है और मुहम्मद उसके पैग़म्बर हैं। उनसे कहा गया कि इसका अर्थ यह हुआ कि आप मुसलमान हैं। उन्होंने कहा कि यद्यपि मैंने अपने मुसलमान होने की घोषणा नहीं की है किंतु फिर भी मुझ पर बहुत अधिक सामाजिक दबाव है। इसके एक वर्ष बाद भ्रूण विज्ञान के जनक कहे जाने वाले डाक्टर कीथ मूर ने औपचारिक रूप से घोषणा कर दी कि वे मुसलमान हो गए हैं। आज डाक्टर मूर के अतिरिक्त कई अन्य विद्वान भी हैं जिन्होंने विज्ञान में प्रगति और नए नए आविष्कारों के सामने आने के साथ ही क़ुरआने मजीद के तथ्यों के समक्ष सिर झुका दिया है। अमरीका के मार्शल जानसन, भ्रूण विज्ञान के क्षेत्र में क़ुरआन की आयतों के बारे में कहते हैं कि क़ुरआन में भ्रूण के विकास के चरणों का वर्णन संयोग नहीं हो सकता। केवल सशक्त माइक्रोस्कोप के माध्यम से ही इन तथ्यों तक पहुंचा जा सकता है जबकि क़ुरआन आज से चौदह शताब्दियों पूर्व आया था और उस समय संसार में कहीं भी कोई माइक्रोस्कोप नहीं था। यहां तक कि आरंभिक माइक्रोस्कोप भी दस गुना से अधिक चित्रों को बड़ा करके नहीं दिखाता था और उसके चित्र भी स्पष्ट नहीं होते थे। यह एक ठोस वास्तविकता है कि मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम) के कथनों में ईश्वरीय संदेश वहि की भूमिका थी।क़ुरआने मजीद ऐसी आयतों और वास्तविकताओं से भरा हुआ है जो सौभाग्य व कल्याण की ओर मनुष्य का मार्गदर्शन करती हैं। प्रकृति की वस्तुओं की ओर इस ईश्वरीय किताब के संकेत, बुद्धिमानों के लिए स्पष्ट एवं मार्गदर्शक चिन्ह हैं। सूरए आले इमरान की आयत क्रमांक 190 में कहा गया है। निसंदेह आकाशों और धरती की सृष्टि तथा रात-दिन के आने जाने में बुद्धिमानों के लिए (ईश्वर की स्पष्ट) निशानियां हैं। क़ुरआने मजीद की आयतें इस बात को भी याद दिलाती हैं कि मनुष्य की सृष्टि के दौरान ईश्वर ने अपनी प्रकाशमान विशेषताएं उसके भीतर रखी हैं। यदि ये योग्यताएं व्यवहारिक हो जाएं तो मनुष्य परिपूर्णता के सर्वोच्च चरण तक पहुंच सकता है। http://hindi.irib.ir/