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    अमर ज्योति-14

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    क्या आपने कभी सोचा है कि जब भूमिगत मीठा पानी, समुद्र के साथ मिलता है तो समुद्र के पानी का नमक मीठे पानी को प्रभावित व नमकीन क्यों नहीं करता? निश्चित रूप से आप जानते हैं कि यदि ऐसा होता तो भूमिगत पानी, पीने योग्य नहीं रह जाता। मीठे और खारे पानी के बीच सीमा के अस्तित्व की सूचना देना, क़ुरआने मजीद के वैज्ञानिक चमत्कारों में से एक है। हम, मनुष्य तथा सभी जीवित वस्तुएं के जीवन के मूल तत्व के रूप में पानी के महत्व से अवगत हैं। इस्लामी संस्कृति में पानी, जीवन का चिन्ह, पवित्रता का कारण, गंदगी व प्रदूषण को दूर करने वाला, सार्वजनिक संपत्ति तथा सर्वोत्तम पेय बताया गया है। इस्लाम के पवित्र ग्रंथ क़ुरआने मजीद में पानी के लिए अरबी भाषा में प्रयोग होने वाला शब्द मा उनसठ बार आया है। अनेक आयतों में पानी को जीवन का कारण बताया गया है। सूरए अम्बिया की तीसवीं आयत में ईश्वर कहता है कि हमने पानी से हर वस्तु को जीवित रखा है। पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने पानी को लोक-परलोक में सबसे अच्छा पेय बताया है। पैग़म्बरे इस्लाम के पौत्र इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम कहते हैं कि पानी का स्वाद, जीवन का स्वाद है।मीठा और खारा पानी, हाइड्रोलोजी या जलविज्ञान में सदैव ही चर्चा का विषय रहा है। क़ुरआने मजीद में इस विषय की ओर संकेत ने वैज्ञानिकों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया है। सूरए फ़ुरक़ान की आयत नंबर 53 में कहा गया है कि अनन्य ईश्वर वही है जिसने दो समुद्रों को एक दूसरे के साथ रखा है, जिनमें से एक शीतल व मीठा है जबकि दूसरा खारा व कड़वा है, तथा उसने इन दोनों के बीच एक विभाजक रखा है ताकि वे आपस में मिलने न पाएं तथा अलग अलग ही रहें। क़ुरआन ने समुद्रों के बारे में जो बातें कहीं हैं उनमें से अधिकांश से मनुष्य शताब्दियों तक अनभिज्ञ रहा है। सूरए नम्ल की 61वीं आयत में मीठे व खारे पानी के बीच सीमा की ओर संकेत करते हुए इसे ईश्वर की शक्ति का चिन्ह बताया गया है। आयत कहती है। वह कौन है जिसने धरती को ठहरा हुआ बनाया फिर उसके बीच नहरें जारी कर दीं और उसके लिए पर्वत स्थिर पर्वत बनाए तथा दो समुद्रों के बीच एक विभाजक रखा (ताकि वे एक दूसरे में गडमड न होने पाएं) तो क्या ईश्वर के साथ कोई दूसरा ईश्वर भी है? नहीं, बल्कि इनमें से अधिकांश लोग नहीं जानते। इसी प्रकार सूरए फ़ातिर की बारहवीं आयत में कहा गया है कि दो समुद्र एक समान नहीं हैं, यह एक ऐसा समुद्र है जिसका पानी शीतल व मीठा तथा इसका पीना सुखद है, और वह दूसरा खारा व कड़वा तथा गले में फंसने वाला है (किंतु) तुम इन दोनों में से ताज़ा मांस खाते हो और इनसे आभूषण निकाल कर पहनते हो। और तुम इनमें नौकाओं को देखते हो जो पानी को चीरती हैं (तथा गंतव्य की ओर बढ़ती हैं) ताकि ईश्वर की कृपा को खोज सको और शायद इस प्रकार उसकी अनुकंपाओं के प्रति कृतज्ञ रहो।विज्ञान के विकास से यह बात स्पष्ट हो गई कि समुद्र तट के निकट भूमिगत मीठा पानी मौजूद होता है और उस पर समुद्र के पानी के खारेपन का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। चूंकि मीठे पानी का वज़्न, खारे पानी से कम होता है, अतः तट के निकटवर्ती क्षेत्रों में मीठा पानी, समुद्र के खारे पानी के ऊपर रहता है। मीठे पानी और समुद्र के खारे पानी के बीच एक विभाजक और सीमा रहती है जिसे संयुक्त सीमा या इंटरफ़ेस कहा जाता है। तट के निकटवर्ती क्षेत्रों में, जीवित वस्तुओं की सबसे अधिक विविधता मौजूद होती है। इन क्षेत्रों की गहराई अधिकतम दो सौ मीटर होती है और यहां सूर्य का प्रकाश पहुंच सकता है। परिणाम स्वरूप विभिन्न प्रकार के शैवाल, घोंघे और मछलियां इस वातावरण में पल बढ़ सकते हैं कि जो मानव आहार की आपूर्ति के सबसे महत्वपूर्ण स्रोतों में से एक हैं। इसके अतिरिक्त तट के निकटवर्ती क्षेत्र, विभिन्न धातुओं की तलछट, लोहा, मेंगनीज़, अलमोनियम तथा अन्य धातुएं व नमक बनाने की दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण होते हैं।खारे समुद्र के विभिन्न उदाहरण मौजूद हैं जिनमें से प्रत्येक की अपनी विशेषताएं हैं। जैसे लाल सागर व हिंद महासागर। लाल सागर में नमक व तापमान, हिंद महासागर से अधिक है। इन दोनों के बीच पानी की एक ऐसी सतह है जो विशेषताओं की दृष्टि से इन दोनों समुद्रों की संयुक्त सीमा है। महासागर भी वस्तुतः अनेक सागरों से मिल कर बने हैं जिनका पानी घनत्व, तापमान, पाई जाने वाली वस्तुओं और जीवन के वातावरण की दृष्टि से भिन्न है किंतु उनके बीच एक अदृश्य सीमा है जो उनके आपस में गडमड होने को रोके रखती है। बीसवीं शताब्दी में विकसित उपग्रहों के माध्यम से महासागरों के चित्र लिए जाने के बाद वैज्ञानिकों को इस तथ्य का पता चला। समुद्र विज्ञान के विशेषज्ञों ने इन समुद्रों के पानी के रंग में भिन्नता देखने के बाद उनकी समीक्षा की तो उन्हें पता चला कि महासागर वास्तव में ऐसे समुद्रों से मिल कर बने हैं जो एक दूसरे से जुड़े हुए हैं किंतु वे एक निर्धारित सीमा से आगे नहीं बढ़ते और एक दूसरे से नहीं मिलते। वस्तुतः समुद्र तल का खिंचाव नामक एक भौतिक शक्ति इस बात का कारण बनती है कि विभिन्न विशेषताओं वाले दो समुद्रों का पानी एक दूसरे से न मिले। समुद्रों के पानी के घनत्व में पाए जाने वाले अंतर के कारण अस्तित्व में आने वाली यह शक्ति उनके बीच ठीक एक पतली दीवार की भांति काम करती है और उन्हें एक दूसरे से मिलने नहीं देती। यद्यपि इन दोनों समुद्रों में बड़ी बड़ी लहरें उठती हैं किंतु इसके बावजूद इनका पानी आपस में गडमड नहीं होता और इनके बीच की सीमा समाप्त नहीं होती।फ़्रान्स के विचारक एवं वैज्ञानिक डाक्टर मोरिस ब्यूकेल कहते हैं कि समुद्रों के बारे में क़ुरआने मजीद की कोई भी आयत, उसके उतरने के काल में पाए जाने वाले विचारों व अंधविश्वासों से मेल नहीं खाती। क़ुरआने मजीद की वह आयतें जिनमें महासागरों और समुद्रों के बारे में बात की गई है, विचार व चिंतन योग्य विषय एवं ईश्वर की शक्ति की निशानियां हैं। वे कहते हैं कि इस समय समुद्र के खारे पानी के तुरंत ही बड़ी नदियों के मीठे पानी में न मिलने की प्रक्रिया को भली भांति समझा जा चुका है। कुछ लोग सोचते हैं कि इस संबंध में क़ुरआन का संकेत दजला व फ़ुरात नामक नदियों की ओर है किंतु मिसी सीपि व यांग ज़ी जैसी अनेक बड़ी नदियों में भी यही विशेषताएं हैं। ये आयतें, ईश्वरीय चमत्कार होने के अतिरिक्त मनुष्य का ध्यान मीठे व खारे पानी से प्राप्त होने वाले मूंगों और मोतियों जैसे लाभों, अन्य वस्तुओं तथा बहुमूल्य आभूषणों की ओर आकृष्ट कराती हैं और पढ़ने वाले को अधिक चिंतन का न्योता देती हैं।जिन आयतों में समुद्रों के पानी के बीच अंतर की ओर संकेत किया गया है उनमें ईश्वरीय पहुचान के विशेष बिंदु भी निहित हैं। क़ुरआने मजीद के व्याख्याकारों ने इन आयतों की व्याख्या एक अन्य ढंग से भी की है। उनका कहना है कि ईश्वर ने मीठे व खारे पानी को एक दूसरे से निकट किया किंतु उन्हें आपस में नहीं मिलाया, यह ईश्वर पर ईमान रखने और न रखने वालों के बीच के अंतर का प्रतीक है। व्याख्याकारों का कहना है कि काफ़िर और मोमिन दोनों ही इस धरती पर एक दूसरे के साथ रहते हैं किंतु इसके बावजूद वे एक समान नहीं हैं। इन आयतों में मोमिन और काफ़िर की उपमा मीठे व खारे पानी से दी गई है, इस अर्थ में कि यद्यपि वे दोनों जीवन की बहुत सी बातों में एक समान हैं किंतु प्रगति व परिपूर्णता के चरणों तक पहुंचने में वे एक समान नहीं हैं। ईमान वाले व्यक्ति की प्रवृत्ति पवित्र एवं शुद्ध होती है और वह अपने सदकर्मों के माध्यम से सर्वकालिक एवं सदा का सौभाग्य व कल्याण प्राप्त करता है किंतु काफ़िर अपनी मावनीय प्रवृत्ति से विचलित होकर तबाही की खाई में जा गिरता है। ये दोनों मीठे व खारे पानी की भांति यद्यपि जीवन के अनेक प्रचलित मामलों में एक समान हैं और मछली व अन्य खाद्य पदार्थों जैसी ईश्वरीय अनुकंपाओं से लाभान्वित होते हंर किंतु जीवन के लक्ष्य व उद्देश्य में इन दोनों के बीच बहुत अधिक अंतर है।ईश्वर, क़ुरआने मजीद के सूरए नूर की आयत क्रमांक 39 में काफ़िरों के कर्मों को मृगतृष्णा की भांति बताता है। प्यासा व्यक्ति, मृगतृष्णा को पानी समझता है किंतु जब वह उसके निकट पहुंचता है तो उसे पता चलता है कि उसे कोई वस्तु नहीं मिली है। ईमान के प्रकाश से वंचित काफ़िर, घोर अंधकार में भटकते रहते हैं। सूरए नूर की चालीसवीं आयत में उस अंधकार की उपमा जिसमें काफ़िर भटकते रहते हैं, महासागरों की गहराइयों में पाए जाने वाले अंधकार से दी गई है। उल्लेखनीय है कि महासागरों के गहराइयों में लहरें एक दूसरे के ऊपर होती हैं जिसके कारण वहां पूर्ण अंधकार होता होता है। ओशियानोग्राफ़ी या समुद्र विज्ञान के अनुसार सूर्य का तीन से तीस प्रतिशत तक प्रकाश समुद्र की सतह पर प्रतिबिंबित होता है। फिर समुद्र की दो सौ मीटर की गहराई में नीले रंग को छोड़ कर प्रकाश के सभी रंग पानी में अवशोषित हो जाते हैं। इन आयतों में कहा गया है कि जो लोग काफ़िर हो गए उनके कर्म, मरुस्थल में दिखाए देने वाले मृगतृष्णा की भांति हैं जिसे प्यास मनुष्य दूर से पानी समझता है किंतु जब वह उसके निकट जाता है तो कुछ भी नहीं पाता और वह ईश्वर को अपने निकट पाता है, या उनके कर्म एक गहरे एवं महान समुद्र के अंधकार की भांति हैं जिसे लहर ने ढांक रखा है और उस लहर के ऊपर एक दूसरी लहर है तथा उसके ऊपर एक अंधकारमय बादल है। ऐसे अंधकार हैं जिनके ऊपर दूसरा अंधकार है।जिस बिंदु ने विचारकों व विद्वानों को अचरज में डाल दिया है वह समुद्रों में दो लहरों के अस्तित्व की ओर ईश्वर का संकेत है। तकनीक के विकसित होने और अति विकसित पनडुब्बियों को महासागरों की गहराइयों में भेजे जाने के बाद वैज्ञानिकों को पता चला कि समुद्रों की सतह पर मौजूद पानी की तुलना में गहराइयों में पाए जाने वाले पानी के अधिक घनत्व के कारण उस पानी के बीच दो प्रकार की लहरें बनती हैं। आंतरिक लहरें और तल की लहरें। निचली परतों की लहरें जो अंधकारमयी होती हैं, दिखाई नहीं देतीं किंतु उनके ऊपर की लहरें देखी जा सकती हैं। मानों एक के ऊपर एक लहरें एकत्रित हो गई हैं।जर्मनी के प्रख्यात समुद्र विज्ञानी प्रोफ़ेसर डोगारो, एक के ऊपर एक लहरों के अस्तित्व को एक वैज्ञानिक तथ्य एवं पूर्णतः स्पष्ट समझते थे और उनका मानना था कि विज्ञान की प्रगति के बाद धर्म की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती किंतु जब उन्होंने सूरए नूर की आयतें सुनीं तो बड़े आश्चर्य के साथ कहा कि इस बात की कोई संभावना नहीं है कि यह मनुष्य का कथन हो। ये आयतें इस्लाम धर्म के चमत्कार का प्रमाण हैं। अब सोचना चाहिए कि जो मनुष्य आजसे चौदह शताब्दियां पूर्व अरब के तपते एवं शुष्क मरुस्थल में रहता था, क्या वह ईश्वरीय ज्ञान के बिना महासागरों की गहराइयों में पाई जाने वाली लहरों के बारे में सूचना दे सकता था? यहां क़ुरआन व उसके चमत्कार के समक्ष सिर झुका देना चाहिए और सूरए आले इमरान की आयत क्रमांक 190 पर विचार करना चाहिए कि निश्चित रूप से आकाशों और धरती की सृष्टि तथा रात व दिन की आवाजाही में बुद्धिमानों के लिए स्पष्ट निशानियां हैं।