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    अमर ज्योति-18

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    क़ुरआने मजीद ने विभिन्न आयतों में अपना परिचय कराया है तथा अपनी विशेषताओं पर प्रकाश डाला है। एक स्थान पर वह कहता है कि वह अद्वितीय कथन है और यदि सभी मनुष्य एक दूसरे के सहयोग से उसके समान किताब लाने का प्रयास करें तो भी वे ऐसा नहीं कर सकते। क़ुरआने मजीद के व्याख्याकारों ने, क़ुरआन के समान कोई अन्य किताब लाने में मनुष्य की अक्षमता की सूचना को क़ुरआने मजीद के चमत्कारों की श्रेणी में रखा है। आजके कार्यक्रम में हम क़ुरआन की इसी चुनौती पर चर्चा करेंगे, कृपया हमारे साथ रहिए।यदि कोई लिखने, बोलने या किसी अन्य मामले और विशेषताओं में चुनौती का निमंत्रण दे तो उसे अरबी भाषा में तहद्दी कहा जाता है। तहद्दी क़ुरआने मजीद का एक चमत्कारिक आधार है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम अन्य लोगों को अपने चमत्कार के संबंध में चुनौती दिया करते थे, इस अर्थ में कि यदि यह किताब, ईश्वरीय कथन नहीं बल्कि मनुष्य का कथन है तो फिर मनुष्य इस जैसी दूसरी किताब ला सकता है किंतु मनुष्य कभी भी इस जैसी किताब नहीं ला सके जिससे पता चलता है कि यह क़ुरआन ईश्वरीय कथन है।इस्लाम के आरंभक काल में पैग़म्बरे इस्लाम के शत्रु, क़ुरआने मजीद जैसी एक अन्य किताब लाने के संबंध में बहुत उत्साहित थे क्योंकि वे शब्दालंकार और वाग्मिता की दृष्टि से बहुत सशक्त थे, अपनी परंपराओं के संबंध में बहुत कट्टर थे और अत्यंत हठधर्मी एवं घमंडी थे। क़ुरआने मजीद ने उनकी परंपराओं को ग़लत बताया, मूर्तिपूजा को अज्ञानता एवं अंधविश्वास ठहराया और घमंड की निंदा की। इस प्रकार उसने उन्हें चुनौती दी। मक्के के अनेकेश्वरवादियों ने क़ुरआन से मुक़ाबले के लिए विभिन्न योजनाओं पर काम किया। सबसे पहले तो उन्होंने प्रयास किया कि मस्जिदुल हराम में पैग़म्बरे इस्लाम को क़ुरआने मजीद की तिलावत करने से रोक दें। इस संबंध में अबू जह्ल ने धमकी दी कि यदि मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम) ने काबे व मक़ामे इब्राहीम के निकट नमाज़ पढ़ना जारी रखा तो वह उनकी हत्या कर देगा किंतु ईश्वर ने अपने पैग़म्बर को पूर्ण रूप से सुरक्षित रखा। कुछ अनेकेश्वरवादी लोगों से कहते थे कि वे क़ुरआन की तिलावत न सुनें या तिलावत के समय ऊंची आवाज़ से बोलने लगें ताकि क़ुरआन की तिलावत की आवाज़ उनके कानों तक न पहुंचे किंतु ईश्वर ने अपने पैग़म्बर के समर्थन में उन्हें आदेश दिया कि वे यथावत नमाज़ पढ़ते रहें और क़ुरआन की तिलावत करते रहें।काफ़िरों और अनेकेश्वरवादियों को इस बात की चिंता थी कि कहीं पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का चमत्कार, मक्के के लोगों को प्रभावित न कर दे और फिर उनके पास पैग़म्बर के विरोध का कोई बहाना न रह जाए। इस लिए उन्होंने बहुत प्रयास किया कि क़ुरआन के ईश्वरीय ग्रंथ होने की बात का ही इन्कार कर दिया जाए और इस पुस्तक की सत्यता पर से लोगों का विश्वास उठा दिया जाए। इस संबंध में कुछ लोगों ने क़ुरआन के मानवीय विचार होने का विचार प्रचलित करना और उसे जादू टोना बताना आरंभ किया। कुछ आयतों के अनुसार अनेकेश्वरवादियों के एक गुट ने दावा किया कि क़ुरआन क़िस्से और कहानी की किताब है। उस काल के कुछ साहित्यकारों ने लोगों में संदेह उत्पन्न करने के लिए दावा किया कि क़ुरआन जैसी पुस्तक लाना कोई कठिन कार्य नहीं है और वे भी क़ुरआन के सूरों व आयतों की भांति सूरे व आयतें प्रस्तुत कर सकते हैं।ऐतिहासिक स्रोतों में ऐसे अनेक लोगों का वर्णन किया गया है जो क़ुरआन जैसी ही किताब लाने का प्रयास कर रहे थे। उन्होंने अत्यधिक प्रयास के बाद बड़े ही तुच्छ एवं मूल्यहीन उदाहरण प्रस्तुत किए जो विद्वानों के लिए हास्यास्पद थे। इस प्रकार क़ुरआने मजीद से प्रतिस्पर्धा में उनकी पराजय ने, क़ुरआन जैसी पुस्तक लाने में मनुष्य की अक्षमता को सिद्ध कर दिया। मुसैलमए कज़्ज़ाब उन आरंभिक लोगों में से एक था जो क़ुरआन से मुक़ाबला करने के विचार में थे। मुसैलमए कज़्ज़ाब ने पैग़म्बरी का दावा किया था। उसने सूरए फ़ील की भांति कुछ आयतें प्रस्तुत कीं जो अत्यंत हास्यास्पद थीं और किसी भी रूप में क़ुरआन की आयतों की सुंदरता व सुंदर शैली उनमें नहीं थी।क़ुरआने मजीद अनेकेश्वरवादियों के इन षड्यंत्रों के उत्तर में स्वयं को एक महान चमत्कार बताते हुए सूरए अनकबूत की आयत क्रमांक 50 व 51 में कहता है। उन्होंने कहा कि ये चमत्कार उसके पालनहार की ओर से उसके पास क्यों भेजे गए। (हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि सभी चमत्कार ईश्वर के निकट हैं (और उसी के आदेश पर भेजे जाते हैं) मैं तो केवल (नरक से) खुल कर डराने वाला हूं। क्या उनके लिए यह पर्याप्त नहीं है कि यह किताब हमने आपके पास भेजी है जो निरंतर इन्हें पढ़ कर सुनाई जाती है? निश्चित रूप से इसमें उन लोगों के दया व पाठ सामग्री है जो ईमान लाते हैं। क़ुरआने मजीद के प्रख्यात व्याख्याकार आयतुल्लाह तबरसी कहते हैं कि ये आयतें स्पष्ट रूप से घोषणा करती हैं कि क़ुरआने मजीद, चमत्कार होने की दृष्टि से पर्याप्त बल्कि चमत्कार के सर्वोच्च चरण पर है क्योंकि ईश्वर ने इसे सभी चमत्कारों से आवश्यकतामुक्त करने वाला बताया है। क़ुरआने मजीद के पर्याप्त होने का अर्थ यह है कि अब उसके अतिरिक्त किसी भी अन्य की आवश्यकता नहीं रह गई है।इसके बावजूद क़ुरआने मजीद हर प्रकार की शंका व संदेह को दूर करने के लिए पूरे इतिहास के सभी लोगों से कहता है कि यदि उन्हें क़ुरआन के चमत्कार होने तथा ईश्वर की ओर से होने में संदेह है तो वे अपनी सभी वैचारिक, आध्यात्मिक एवं भौतिक क्षमताओं को एकत्रित करें और एक दूसरे के सहयोग से उसके जैसी आयतें प्रस्तुत करें। अपने निमंत्रण में ईश्वर कभी मनुष्य से कहता है कि यदि उसमें क्षमता है तो वह क़ुरआन जैसी कोई चीज़ लाकर दिखाए। सूरए इसरा की आयत क्रमांक 88 में कहा गया है। (हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि यदि सभी मनुष्य और जिन्न इस बात पर एका कर लें कि वे क़ुरआन जैसी कोई दूसरी किताब ले आएं तो वे ऐसा नहीं कर पाएंगे चाहे इस कार्य में उनमें से कुछ लोग, कुछ अन्य की सहायता ही क्यों न करें। सूरए हूद की आयत क्रमांक 13 में क़ुरआने मजीद ने अपनी चुनौती को कम करते हुए पूरे क़ुरआन के स्थान पर उस जैसे दस सूरे लाने की बात कही है। आयत में कहा गया है। क्या (काफ़िर) यह कहते हैं कि पैग़म्बर ने इस क़ुरआन को अपने पास से गढ़ लिया है? (हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि यदि तुम सच कहते हो तो तुम भी इस (क़ुरआन) की भांति दस सूरे ले आओ और ईश्वर के अतिरिक्त जिसे चाहे (इस कार्य में सहायता के लिए) बुला लो। अगले चरण में क़ुरआने मजीद अपनी चुनौती को अधिक कम करते हुए अपने सूरों जैसा केवल एक सूरा लाने का निमंत्रण देता है। सूरए बक़रह की आयत क्रमांक 23 में कहा गया है। और यदि तुम्हें उस चीज़ (क़ुरआन) के बारे में, जो हमने अपने दास (पैग़म्बर) पर उतारी है, संदेह है तो तुम कम से कम उस जैसा एक सूरह ही ले आओ और ईश्वर के अतिरिक्त जो तुम्हारी सहायता करने वाले हों, उन्हें भी बुला लो, यदि तुम सच्चे हो।इटली के एक विश्व विद्यालय में सभ्यता के इतिहास की प्रोफ़ेसर लॉरा वाकसिया वागलीरी लिखती हैं कि मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम) ने लोगों को निमंत्रण दिया कि यदि उनमें क्षमता हो तो वे क़ुरआन जैसी एक पुस्तक प्रस्तुत करें या कम से कम उसके सूरों जैसा एक सूरा ही प्रस्तुत करें। यद्यपि अरबों में बड़ी संख्या में लोग अपने आप को दक्ष व सक्षम प्रकट करते थे किंतु इसके बावजूद वे क़ुरआन जैसी एक भी आयत प्रस्तुत न कर सके। उन्होंने सशस्त्र हो कर पैग़म्बर से युद्ध किया किंतु क़ुरआन की महानता के समक्ष उन्होंने घुटने टेक दिए क्योंकि यह किताब अपनी आध्यात्मिक परिपूर्णता से हटकर शैली व साहित्यिक दृष्टि से भी अद्वितीय है। अर्थ व शब्दों की आत्मा की दृष्टि से यह किताब इससे कहीं ऊपर है कि इसकी नक़ल की जा सके। वे कहती हैं कि इस किताब में ज्ञान के ऐसे ख़ज़ाने हैं जो सबसे बुद्धिमान लोगों, महानतम दार्शनिकों और सबसे सशक्त राजनितिज्ञों की क्षमता से भी परे हैं। क़ुरआन का स्रोत केवल वह ईश्वर ही हो सकता जिसका ज्ञान आकाशों व धरती में मौजूद हर वस्तु के बारे में संपूर्ण है।अलबत्ता क़ुरआने मजीद जैसी ही कोई दूसरी पुस्तक प्रस्तुत करने का मामला सदैव ही बल्कि वर्तमान काल में भी कुछ लोगों के ध्यान का केंद्र रहा है किंतु अब तक कोई भी इस ईश्वरीय ग्रंथ के मुक़ाबले में कोई किताब प्रस्तुत नहीं कर सका है। कुछ समय पूर्व अमेरिका ऑन लाइन नामक एक अमरीकी कंपनी ने क़ुरआने मजीद से मुक़ाबले हेतु एक दुष्टतापूर्ण क़दम के अंतर्गत क़ुरआन की शैली की नक़ल करते हुए तथा आयतों में फेर-बदल करके और ग़लत एवं अनुचित अर्थों को एक दूसरे से गडमड करके अपने विचार में तैयार किए गए कुछ सूरों को इंटरनैट पर डाल दिया था। यह कार्य अत्यंत तुच्छ एवं हास्यास्पद था जिस पर मुसलिम हलक़ों व लेखकों ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। हाल ही में एक ब्रिटिश कंपनी की वेबसाइट ने भी उन्हीं जाली सूरों को इंटरनैट पर पुनः जारी किया है। बुद्धिजीवियों यहां तक कि ग़ैर मुस्लिम इस्लाम विशेषज्ञों ने भी इन वाक्यों को जिनमें क़ुरआन की नक़ल करने का प्रयास किया गया है, क़ुरआन की चुनौती का तर्कसंगत एवं बौद्धिक उत्तर देने के बजाए एक मज़ाक़ बताया है। इन वाक्यों में क़ुरआने मजीद की आयतों के टुकड़ों को एक दूसरे से जोड़ कर उन्हें अलग आयत या सूरों के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। स्पष्ट है कि जो भी क़ुरआने मजीद का थोड़ा सा भी ज्ञान रखता होगा वह समझ जाएगा कि यह क़ुरआन से मुक़ाबला नहीं बल्कि उसमें फेर-बदल है। यह एक अटल वास्तविकता है कि क़ुरआने मजीद की विषय वस्तु जो इस समय मनुष्य के पास है और डेढ़ अरब से अधिक मुसलमान उससे प्रेम करते हैं, ईश्वरीय संदेश के रूप में उसके अंतिम पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पास भेजी गई थी और उन्होंने इस महान चमत्कार को तेईस वर्षों के दौरान लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया।चर्चा का अंत पैग़म्बर सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के इस कथन से कर रहे हैं कि क़ुरआन एक मज़बूत रस्सी है जिसका एक सिरा ईश्वर और दूसरा लोगों के हाथ में है, ईश्वर की रस्सी से जुड़ाव, लोक-परलोक में कल्याण व सौभाग्य का कारण है। http://hindi.irib.ir