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    अमर ज्योति-19

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    क्या आप जानते हैं कि क़ुरआने मजीद में 114 सूरे हैं? इसका सबसे लम्बा सूरा, सूरए बक़रह है जिसमें 286 आयतें हैं जबकि सबसे छोटा सूरा, सूरए कौसर है। प्रिय श्रोताओ कार्यक्रम अमर ज्योति में हमने आपको क़ुरआने मजीद की वाग्मिता, शब्दालंकार तथा विभिन्न क्षेत्रों में इसके चमत्कारों के बारे में बताया। इसी के साथ इस बात पर भी चर्चा की गई कि पूरे इतिहास में कोई भी क़ुरआने मजीद की इस चुनौती का जवाब नहीं दे सका कि उसके जैसे एक पुस्तक या उसके सूरों के समान दस सूरे या कम से कम एक ही सूरा प्रस्तुत कर दे। अब हम ईश्वर की ओर से क़ुरआने मजीद को भेजे जाने के समय और परिस्थितियों पर एक दृष्टि डालेंगे क्योंकि यह मनुष्य के प्रशिक्षण की किताब है और इसने सबसे पहले उन लोगों को प्रभावित व परिवर्तित किया है जिनके काल में यह पुस्तक ईश्वर की ओर से भेजी गई है। उस कालखंड के बारे में ज्ञान, मुनष्य के विचारों को परिवर्तित करने में क़ुरआन की भूमिका को बेहतर ढंग से समझने में सहायक है। क़ुरआने मजीद वस्तुतः मक्का नगर में स्थित हेरा नामक पर्वत की एक गुफा में पैग़म्बर इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम पर उतरा। इस्लाम से पूर्व के अरब जगत का ढांचा, क़बायली था। हर क़बील का एक प्रमुख या सरदार हुआ करता था और उसकी बात क़ानून का दर्जा रखती थी। इस व्यवस्था में केवल जातीय व क़बायली संधियां ही निजी व सामाजिक अधिकारों को सुनिश्चित बनाती थीं। युद्ध व रक्तपात, इन क़बीलों की सबसे बड़ी पहचान थी। इस्लाम के उदय से पूर्व अरब जगत की वैचारिक व्यवस्था, मूर्ति पूजा पर आधारित थी। क़ुरआने मजीद ने उनमें से लात, उज़्ज़ा और मनात जैसी कुछ मूर्तियों के नामों की ओर संकेत किया है। कुछ लोग एकेश्वरवाद में भी आस्था रखते थे जिन्हें हज़रत इब्राहीम के धर्म का अनुयाई कहा जाता था। उस काल में मदीना नगर में यहूदियों के भी कुछ क़बीले रहते थे जबकि सीरिया व यमन के कुछ क्षेत्रों में ईसाई जीवन व्यतीत करते थे। ईश्वर द्वारा क़ुरआने मजीद को भेजे जाने से पूर्व अरब समाज, नैतिक व सामाजिक दृष्टि से बहुत पिछड़ा हुआ था। मानव समाज के आधे भाग के रूप में महिला को लोगों के बीच तनिक भी सम्मान व स्थान प्राप्त नहीं था। इस प्रकार से कि लड़कियों को जन्म लेते ही जीवित गाड़ दिया जाता था या फिर वे बड़े अपमानजनक ढंग से जीवन बिताने पर विवश होती थीं। उस अराजक समाज में चोरी, डकैती, अतिक्रमण, लूटमार, रक्तपात, निर्दयता और इसी प्रकार के विभिन्न अपराध हुआ करते थे। इसी प्रकार अज्ञानता व निरक्षरता ने अरब जगत पर अपनी काली छाया डाल रखी थी। क़ुरआने मजीद ने अपनी विभिन्न आयतों में उस काल के समाज के पतन का स्पष्ट चित्रण किया है। क़ुरआन की दृष्टि में उस समाज के लोग पिछड़ हुए, अज्ञानी व पतन की ओर अग्रसर थे। इसी के साथ अरबों में शायरी व भाषण का बड़ा प्रचलन था। अधिकांश शायरी की विषय वस्तु घमंड व गर्व पर आधारित हुआ करती थी और स्वाभाविक रूप से उसका बड़ा भाग झूठ का पुलंदा होता था।इस प्रकार के समाज में पैग़म्बर इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम पर जीवन के मूल सिद्धांत के रूप में ईश्वरीय संदेश वहि के रूप में क़ुरआने मजीद को भेजा गया। क़ुरआन के 114 में से 86 सूरे तेरह वर्षों के दौरान मक्का नगर में भेजे गए। ये सूरे प्रायः छोटे हैं और इनकी आयतें भी छोटी-छोटी हैं। इन सूरों में ईश्वर को एक से अधिक समझने की अनेकेश्वरवादियों की निराधार आस्थाओं को रद्द करते हुए ईश्वर के अतिरिक्त किसी भी अन्य वस्तु या मनुष्य से ईश्वरीय नाता जोड़ने के उनके तर्कों को अस्वीकार्य बताया गया है। इन सूरों में ईश्वर ने अनेकेश्वरवादियों के प्रश्नों व संदेहों का उत्तर दिया है तथा अपने ही दृष्टिगत चमत्कार प्रस्तुत करने की पैग़म्बर से उनकी मांग को अनुचित बताया है। ईश्वर की ओर से मक्के में भेजे जाने वाले सूरों में शब्दालंकार, वाग्मिता और लय जैसे साहित्यिक गुण अधिक स्पष्ट दिखाई देते हैं और इनमें अधिक तर एकेश्वरवाद, पैग़म्बरी और प्रलय जैसे इस्लाम के मूल सिद्धांतों या फिर सृष्टि की पहचान जैसे विषयों का उल्लेख किया गया है।ईश्वर की ओर से क़ुरआने मजीद को भेजे जाने के बाद पैग़म्बर इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने उसे विभिन्न अवसरों पर पढ़ना आरंभ किया। वे अपनी सभी नमाज़ों विशेष कर रात की उपासनाओं में क़ुरआने मजीद की आयतों की निंरतर तिलावत किया करते थे। यह कार्य पैग़म्बर को मानसिक रूप से अधिक सुदृढ़ बनाने तथा विभिन्न प्रकार की समस्याओं और कठिनाइयों का सामना करने हेतु तैयार करने में प्रभावी था। वे लोगों को क़ुरआने मजीद की आकर्षक एवं सार्थक विषय वस्तु से अवगत कराने के लिए काबे के निकट बैठ जाते और मोहक आवाज़ में क़ुरआने मजीद पढ़ते या फिर नमाज़ के लिए खड़े होते और क़ुरआन के सूरों की तिलावत करते थे। इस शैली से क़ुरआने मजीद की आयतें सभी के कानों तक पहुंच जाती थीं। क़ुरआने मजीद की आयतों और अनेकेश्वरवादियों की आस्थाओं एवं कल्पनाओं से कड़ा विरोधाभास रखने के बावजूद, क़ुरआन का आकर्षण इस बात का कारण बनता था कि लोग उसकी आयतें सुनने को आतुर रहते थे और अवसर मिलते ही ईश्वरीय संदेश की मार्मिक आयतें सुनने का प्रयास करते थे। ऐतिहासिक प्रमाणों से पता चलता है कि पैग़म्बर इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की इस प्रकार की युक्तियों से मक्के के कई लोग इस्लाम की ओर उन्मुख हो गए। उस्मान बिन मज़ऊन, ज़ेमाद बिन सअलबा और उत्बा का दास एदास इन्हीं लोगों में शामिल हैं।अल्बत्ता केवल मूर्तिपूजा करने वाले ही क़ुरआने मजीद से प्रभावित नहीं होते थे बल्कि आसमानी किताब रखने वाले ईसाई और यहूदी भी उन लोगों में से थे जिनकी आंखों से क़ुरआन की आयतें सुनने के बाद धाराप्रवाह अश्रु बहने लगते थे। सूरए माएदा की आयत क्रमांक 82 और 83 में क़ुरआने मजीद कहता है कि हे पैग़म्बर! आप ईमान वालों का सबसे निकट मित्र उन्हें पाएंगे जो कहते हैं कि हम ईसाई हैं। यह इस लिए है कि उनके बीच ऐसे लोग भी हैं जो विद्वान एवं संसार (के मायामोह) से दूर हैं और वे (सत्य के मुक़ाबले में) घमंड नहीं करते और जब भी वे उन आयतों को सुनते हैं जो पैग़म्बर के पास भेजी गई हैं तो आप देखेंगे कि उनकी आंखों से आंसू बहने लगते हैं, यह उस सच्चाई के कारण है जो उन्हें प्राप्त हो चुकी है। वे कहते हैं कि प्रभुवर! हम ईमान ले आए तो हमें (सत्य की गवाही देने वाले) गवाहों में लिख।इस बीच अनेकेश्वरवादियों ने इस बात का बहुत प्रयास किया कि पैग़म्बर इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को लोभ या धमकी द्वारा क़ुरआन की तिलावत करने और लोगों को इस्लाम धर्म का निमंत्रण देने से रोक दें किंतु उनकी किसी भी युक्ति का कोई प्रभाव नहीं हुआ बल्कि यह एक प्रकार से उनके द्वारा क़ुरआने मजीद की आयतों की महानता की स्वीकारोक्ति थी। प्रख्यात मुस्लिम इतिहासकार इब्ने असाकिर ने उत्बा बिन रबीबा के संबंध में लिखा है कि एक दिन क़ुरैश के प्रतिष्ठित लोग मस्जिदुल हराम में पैग़म्बर इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पास आए। उत्बा ने अपने मित्रों से कहा कि मुझे मुहम्मद से बात करने दो क्योंकि उनके संबंध में मेरा व्यवहार तुम लोगों से बेहतर है। इसके बाद वह पैग़म्बर के पास पहुंचा और उसने कहा कि पारिवारिक और उच्च स्थिति की दृष्टि से आप हम सबसे अधिक योग्य हैं किंतु आपने जो दावा किया है वह इससे पहले आपके क़बीले और जाति के किसी व्यक्ति ने नहीं किया था। यदि आप धन कमाना चाहते हैं तो हम इस बात के लिए तैयार हैं कि आपको इतना धन दे दें कि आप हम सबसे अधिक धनवान हो जाएं और यदि आप सरदारी चाहते हैं तो हम आपको अपना सरदार बनाने के लिए भी तैयार हैं और आपकी इच्छा के बिना हम कोई भी काम नहीं करेंगे।पैग़म्बर इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने उत्बा से पूछा कि क्या तुम्हारी बात पूरी हो गई? उत्बा ने कहा कि हां, मेरी बात पूरी हो गई। उस समय पैग़म्बर ने सूरए फ़ुस्सेलत की तिलावत आरंभ की और उसकी उस आयत तक पहुंचे जिसे पढ़ने या सुनने के बाद सजदा करना आवश्यक होता है, अतः उन्होंने सजदा और ईश्वर का गुणगान किया। उत्बा अपने हाथों को पीठ के पीछ बांधे हुए प्रतीक्षा कर रहा था। पैग़म्बर सजदे से उठे और उन्होंने उत्बा पर कोई ध्यान नहीं दिया। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे। वह उठा और अपनी जाति के लोगों के पास गया और कहने लगा। हे क़ुरैश के लोगो! तुमने जो बातें मुहम्मद से कहने का मुझे आदेश दिया था वह मैंने उनसे कह दी किंतु ईश्वर की सौगंध उन्होंने ऐसी बातों से मेरा उत्तर दिया जिन्हें मेरे कानों ने इससे पहले कभी नहीं सुना था और मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि उन्हें क्या उत्तर दूं। हे क़ुरैश के लोगो आज मेरी बात सुनो और वह यह है कि इस व्यक्ति को इसकी स्थिति पर छोड़ दो क्योंकि वह अपनी आस्थाओं को छोड़ने वाला नहीं है। बेहतर होगा कि उसे अरबों के साथ अकेला छोड़ दिया जाए, यदि उसने अरब क़बीलों को नियंत्रित कर लिया तो उसे जो सम्मान, प्रतिष्ठा और सरदारी मिलेगी वही तुम्हें भी मिलेगी किंतु यदि अरब क़बीलों ने उसे नियंत्रित कर लिया तो इस स्थिति में तुम मुहम्मद को दूसरों के हाथों से अपने मार्ग से हटाने में सफल हो जाओगे। यह सुनना था कि क़ुरैश के सरदारों ने आश्चर्य भरी दृष्टि से उत्बा को देखा और कहा कि हे उत्बा क्या तुम भी मुहम्मद पर ईमान ले आए हो? http://hindi.irib.ir