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    अमर ज्योति-20

    अमर ज्योति-20
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    क़ुरआने मजीद के एक व्याख्याकार सैयद क़ुत्ब कहते हैं कि वे अपने पांच मित्रों के साथ एक मिस्री जहाज़ के माध्यम से समुद्र से न्यूयार्क जा रहे थे। जहाज़ में कुल एक सौ बीस यात्री थे जिनमें महिलाएं व पुरुष दोनों ही थे। यात्रियों में केवल ये छः लोग मुसलमान थे और बाक़ी सब ईसाई थे। जहाज़ में एक ईसाई धर्म प्रचारक भी था जो सैयद क़ुत्ब और उनके साथियों को ईसाई धर्म का निमंत्रण देना चाहता था। सैयद क़ुत्ब कहते हैं कि शुक्रवार के दिन मैंने सोचा कि जहाज़ के डेक पर जुमे की नमाज़ पढ़ी जाए। जब हमने नमाज़ आरंभ की तो सभी यात्री हमारे निकट एकत्रित हो गए और बड़े ध्यान से हमें नमाज़ पढ़ते हुए देखने लगे। नमाज़ समाप्त होने के बाद कुछ लोग हमारे पास आए और इस धार्मिक कर्तव्य के पालन पर कुछ ने आश्चर्य और कुछ अन्य ने प्रसन्नता प्रकट की। उन्हीं में युगोस्लाविया की एक महिला भी थी। वह हमारे सार्वजनिक उपासना से अत्यधिक प्रभावित हुई थी और उसकी आंखों से आंसू जारी थे। वह किसी भी प्रकार अपनी भावनाओं को नियंत्रित नहीं कर पा रही थी। उसने बड़े भावनात्मक स्वर में और बड़ी विनम्रता के साथ अंग्रेज़ी भाषा में पूछा कि आप लोग किस राग में बात कर रहे थे। हमने उसे बताया हम अरबी भाषा में उपासना कर रहे थे और यह उपासना सभी मुसलमानों के लिए अनिवार्य है। उस महिला ने कहा कि यद्यपि मैं आपकी उपासना का एक भी शब्द नहीं समझ सकी किंतु आप लोगों की उपासना में कुछ वाक्य ऐसे थे जो अन्य वाक्यों से बिल्कुल अलग और संगीतमय थे। ये वाक्य इतने प्रभावी थे कि मेरे शरीर में कंपन्न उत्पन्न हो गया। मुझे लगता है कि जो व्यक्ति नमाज़ पढ़ते समय आगे खड़ा था (अर्थात इमामे जमाअत) उसका पूरा अस्तित्व इन वाक्यों को पढ़ते समय ईश्वर के प्रेम में डूबा हुआ था। सैयद क़ुत्ब कहते हैं कि जिन वाक्यों की ओर वह संकेत कर रही थी वे क़ुरआने मजीद की आयतें थीं जिनकी तिलावत मैंने नमाज़ के दौरान की थी। यह बात स्वयं मेरे लिए भी बहुत रोचक थी। क़ुरआने मजीद की लय और उसका संगीत इतना प्रभावी व रोचक था कि एक महिला, जो उसका एक शब्द तक नहीं समझ सकती थी, उससे इतनी प्रभावित हो गई थी कि उसकी आंखों से आंसू बहने लगे थे।उन तेरह वर्षों के दौरान जिनमें ईश्वर की ओर से पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम पर क़ुरआने मजीद उतरा, मक्के में उतरने वाले सूरों के दृष्टिगत, जो प्रायः छोटे हैं और उनकी आयतें भी छोटी हैं, पैग़म्बरे इस्लाम व उनके साथियों ने क़ुरआन को कंटस्थ करने की ओर ध्यान आकृष्ट किया। पैग़म्बरे इस्लाम का पूरा प्रयास यह था कि वे स्वयं पहले क़ुरआन को कंटस्थ करें, फिर उसे ठहर ठहर कर लोगों के सामने पढ़ें ताकि वे भी क़ुरआन को याद करें और उसकी शिक्षाओं व आदेशों को अपने जीवन में लागू कर सकें। वे ईश्वर के अंतिम दूत थे और लोगों को क़ुरआन तथा तत्वदर्शिता की शिक्षा देना उनका दायित्व था। अतः वे क़ुरआने मजीद को कंटस्थ करने का बहुत अधिक प्रयास करते थे। अत्यंत कड़ी परिस्थितियों में भी वे धीमी आवाज़ में क़ुरआने मजीद पढ़ा करते थे। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम बड़ी तीव्रता से क़ुरआन याद करना चाहते थे, उन्हें इस बात की चिंता थी कि कहीं कोई अक्षर या शब्द या बदल न जाए। ईश्वर ने उन्हें संतुष्ट कर दिया और उन्हें वचन दिया कि वह उनके सीने में क़ुरआन को सुरक्षित कर देगा तथा उसकी तिलावत एवं अर्थ समझने को उनके लिए सरल बना देगा। सूरए क़यामत की सोलहवीं और सत्रहवीं आयतों में ईश्वर कहता है कि हे पैगम़्बर! अपनी ज़बान को क़ुरआन पढ़ने के लिए तेज़ी से न घुमाइये क्योंकि उसे एकत्रित करना और पढ़ना हमारा दायित्व है।हज़रत ख़दीजा और हज़रत अली अलैहिस्सलाम जैसे पैग़म्बरे इस्लाम के कुछ निकटवर्ती तथा कुछ अन्य लोग, क़ुरआने मजीद की आयतों के गहरे प्रभाव के अंतर्गत उन्हें याद कर लेते थे। क़ुरआने मजीद याद करने के कारण लोगों में नैतिक व मानवीय गुण परवान चढ़ने लगे और अल्पावधि में ही क़ुरआने मजीद के हज़ारों क़ारी और हाफ़िज़ तैयार हो गए। उस काल में लिखने के माध्यम बड़ी सरलता से उपलब्ध नहीं होते थे और इसी प्रकार लिखने वाले भी बहुत कम थे, दूसरी ओर पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम क़ुरआन को लिखने पर बहुत अधिक बल देते थे और इसके लिए लोगों को प्रोत्साहित करते रहते थे और चूंकि वे स्वयं कुछ लिखते नहीं थे इस लिए उन्हें ऐसे लोगों की आवश्यकता थी जो ईश्वरीय संदेश वहि अर्थात क़ुरआन की आयतों को लिख सकें। ऐसे लोगों को कातिबान वहि कहा जाता है। पैग़म्बरे इस्लाम ने मक्के और मदीने में सबसे अच्छे पढ़े लिखे लोगों को क़ुरआने मजीद को लिखने के लिए आमंत्रित किया। मक्के में जिस व्यक्ति ने सबसे पहले वहि की किताबत का दायित्व संभाला वे हज़रत अली अलैहिस्सलाम थे और उन्होंने पैग़म्बर के जीवन के अंतिम क्षण तथा अपने दायित्व को भली भांति निभाया। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की भी यही इच्छा होती थी कि ईश्वर की ओर से जो भी आयत भेजी जाती है उसे हज़रत अली अलैहिस्सलाम लिखें ताकि उसका कोई भी अक्षर, शब्द या अंश छूटने न पाए।हज़रत अली अलैहिस्सलाम के एक मित्र सुलैम इब्ने क़ैस हेलाली कहते हैं कि एक दिन मैं कूफ़े की मस्जिद में हज़रत अली के पास बैठ हुआ था। कई अन्य लोग भी उनके निकट मौजूद थे। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि जब तक मैं तुम लोगों के बीच हूं, मुझसे प्रश्न कर लो। मुझसे ईश्वर की किताब के बारे में पूछो, ईश्वर की सौगंध ईश्वर की ओर से ऐसी कोई आयत नहीं भेजी गई जिसे पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने मेरे समक्ष न पढ़ा हो और उसका तात्पर्य तथा उसकी व्याख्या मुझे न बताई हो। एक व्यक्ति ने पूछा कि जब कोई आयत आती थी और आप उस समय वहां नहीं होते थे, तब क्या होता था? हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने उत्तर दिया कि जब मैं पैग़म्बर के पास पहुंचता था तो वे मुझे बताते थे कि हे अली तुम्हारी अनुपस्थिति में ईश्वर ने ये आयतें भेजी हैं। इसके बाद वे उन आयतों की तिलावत करते थे और मुझे उनकी व्याख्या से अवगत कराते थे।पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के काल में ही बड़े स्वाभाविक ढंग से क़ुरआने मजीद को एकत्रित करने का कार्य आरंभ हो गया था। उस समय आयतें काग़ज़, हड्डियों या खजूर के पेड़ की छाल पर लिखी जाती थीं। हर सूरा बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम अर्थात ईश्वर के नाम से जो अत्यंत कृपाशील व दयावान है, से आरंभ होता था और आयतें ईश्वर की ओर से भेजे जाने के समय के क्रम के अनुसार लिखी जाती थीं यहां तक कि दूसरा सूरा आरंभ हो जाता था। सूरों में आयतों का संकलन स्वयं पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के आदेश से हुआ करता था किंतु जब तक ईश्वर की ओर से आयतें भेजने का क्रम समाप्त नहीं हो गया तब तक सूरों का क्रम निर्धारित नहीं हुआ। ऐसा इस लिए था कि उनके जीवन में किसी भी क्षण ईश्वर की ओर से कोई सूरा या आयत आने की संभावना रहती थी। अधिकांश अध्ययनकर्ताओं और इतिहासकारों का मानना है कि क़ुरआने मजीद के सूरों का क्रमवार संकलन पैग़म्बरे इस्लाम के निधन के पश्चात उनके साथियों द्वारा किया गया जिनमें हज़रत अली अलैहिस्सलाम सबसे आगे थे।यद्यपि कुछ स्रोतों में क़ुरआने मजीद को एकत्रित करने के संबंध में हज़रत अली अलैहिस्सलाम की भूमिका के बारे में कोई बात नहीं की गई है किंतु ठोस प्रमाण इस बात के साक्षी हैं कि उन्होंने क़ुरआन की आयतों को समझने हेतु प्रकाशमान क्षितिज खोलने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के स्वर्गवास के पश्चात हज़रत अली ने किसी भी कार्य से पूर्व क़ुरआने मजीद को एकत्रित व संकलित करने का काम आरंभ किया। उन्होंने अपने घर में निरंतर छः महीनों के कठिन परिश्रम से यह कार्य पूरा किया। प्रख्यात इतिहासकार इब्ने नदीम का कहना है कि सबसे पहले क़ुरआने मजीद की जो प्रति संकलित हुई वह हज़रत अली अलैहिस्सलाम द्वारा तैयार की गई थी। पैग़म्बरे इस्लाम के कथनों को एकत्रित करने वाले प्रख्यात मुहद्दिस अकरमा ने कहा है कि अबूबक्र की ख़िलाफ़त के आरंभ में हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने अपने घर में बैठ कर क़ुरआने मजीद को संकलित किया।चूंकि क़ुरआन, इस्लाम की पहचान का सबसे बड़ा स्रोत और इस्लामी विचार धारा का आधार है, अतः तत्कालीन ख़लीफ़ा अबूबक्र ने क़ुरआने मजीद की एक संपूर्ण प्रति तैयार करने की इच्छा जताई। उन्होंने कातिबान वहि से कहा कि वे लकड़ियों या खालों पर लिखी गई क़ुरआने मजीद की आयतों और इसी प्रकार क़ुरआन को कंटस्थ करने वाले हाफ़िज़ों के माध्यम से सभी आयतों को एक स्थान पर एकत्रित करें। ज़ैद इब्ने साबित भी उन लोगों में से थे जिन्होंने क़ुरआन की आयतों को एकत्रित करने में भूमिका निभाई थी।तीसरे ख़लीफ़ा उसमान के शासनकाल में इस्लामी जगत को अन्य स्थानों के विचारों और सभ्यताओं का सामना हुआ। संसार के विभिन्न राष्ट्र अपने विशेष संस्कारों के साथ इस्लाम की ओर उन्मुख हुए। मुसलमान भी विभिन्न देशों और नगरों की ओर जाकर इस्लाम का प्रसार करने लगे। क़ुरआन का आकर्षण, नवमुस्लिमों को क़ुरआने मजीद को सीखने के लिए प्रेरित करता था किंतु चूंकि अरबी शब्दों के उच्चारण में कई प्रकार के परिवर्तन आ चुके थे और अरबी लीपि को पढ़ना बहुत सरल नहीं था अतः धीरे-धीरे क़ुरआने मजीद की तिलावत में मतभेद सामने आने लगे। वर्ष 25 हिजरी क़मरी में क़ुरआन के शिक्षकों और क़ारियों के बीच मतभेद काफ़ी बढ़ गया, इस अर्थ में कुछ लोगों ने कुछ अन्य की तिलावत को ग़लत बताना आरंभ कर दिया। इस बात ने तीसरे ख़लीफ़ा को इस बात पर विवश कर दिया कि वे कातिबाने वहि की एक समिति गठित करें जो क़ुरआने मजीद को एक ही तिलावत के आधार पर संकलित करे। इसके पश्चात उन्होंने आदेश दिया कि काग़ज़ों या हड्डियों पर संकलित की गई क़ुरआन की सभी प्रतियों को जला दिया जाए ताकि मतभेद का स्रो ही समाप्त हो जाए और सभी मुसलमान एक ही प्रकार से क़ुरआन की तिलावत करें। प्रख्यात मुस्लिम धर्मगुरू अल्लामा हिल्ली का कहना है कि उसमान ने उक्त समिति द्वारा संकलित क़ुरआन की प्रति को हज़रत अली अलैहिस्सलाम को दिखा कर उनसे स्वीकृति ली। क़ुरआने मजीद की अरबी लीपि में सुधार का कार्य भी पहली शताब्दी हिजरी क़मरी के पूर्वार्ध में आरंभ हुआ। हज़रत अली के एक शिष्य अबू असवद दुअली ने कूफ़े के शासक के आग्रह पर क़ुरआन के अक्षरों पर चिन्ह और नुक़्ते लगाने का कार्य आरंभ किया। http://hindi.irib.ir/