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    अमर ज्योति-21

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    क़ुरआने मजीद के सूरे ईश्वर की ओर से या तो मक्के में भेजे गए हैं या मदीने में। मक्की सूरों के बारों में हम किसी सीमा तक अवगत हो चुके हैं। क़ुरआने मजीद के सूरों का दूसरा भाग, मदनी अर्थात मदीने में भेजे जाने वाले सूरों पर आधारित है। पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम द्वारा मक्का नगर से मदीना पलायन के पश्चात, इस नगर में ईश्वर की ओर से बहुत सी आयतें भेजी गईं। मदीने में समाज व लोगों की स्थिति मक्के से भिन्न थी। मदीने में मुसलमानों की स्थिति धीरे-धीरे सुदृढ़ होती गई। इसी प्रकार मदीने में यहूदी व ईसाई तथा मिथ्याचारी भी मौजूद थे जिसके कारण इस नगर में विभिन्न घटनाएं सामने आईं। मदीना नगर की नई परिस्थितियां इस बात का कारण बनीं कि मदनी आयतों की विषयवस्तु मक्की आयतों से भिन्न हो। इसी आधार पर क़ुरआने मजीद की कुछ मदनी आयतों में काफ़िरों व अनेकेश्वरवादियों से पैग़म्बरे इस्लाम के वैचारिक संघर्ष या इस्लामी सेना के युद्धों की ओर संकेत किया गया है। मदनी सूरों में इसी प्रकार मिथ्याचारियों के कुछ षड्यंत्रों का भी पर्दा फ़ाश किया गया है या फिर उन घटनाओं का भी उल्लेख किया गया है जो पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम तथा मिथ्याचारियों के बीच मदीना नगर में घटने वाली कुछ घटनाओं का भी उल्लेख किया गया है। जीवन के विभिन्न पहलुओं में मनुष्य को जिन क़ानूनों और आदेशों की आवश्यकता होती है उनमें से अधिकांश को मदनी सूरों में देखा जा सकता है। ईश्वर की ओर से मदीने में भेजे जाने वाले अधिकांश सूरे प्रायः लम्बे हैं। क़ुरआने मजीद के प्रख्यात व्याख्याकार अल्लामा मुहम्मद हुसैन तबातबाई इस संबंध में लिखते हैं कि आयतों के मक्की या मदनी होने की पहचान का एकमात्र मार्ग उनकी विषयवस्तु पर ध्यान देना या पैग़म्बर के मदीने पलायन से पूर्व व बाद की स्थिति की समीक्षा करना है। यह शैली सूरों और आयतों के क्रम तथा उनके मक्की या मदनी होने की पहचान के संबंध में प्रभावी एवं लाभदायक है।क़ुरआने मजीद के एक ईरानी अध्ययनकर्ता हाशिम ज़ादे हरीसी, मक्की और मदनी सूरों की पहचान हेतु कुछ चिन्ह व निशानियां बताते हैं जो आयतों की अर्थ और विषयवस्तु से संबंधित हैं। वे कहते हैं कि जो सूरे हे लोगो! और हे आदम की संतान! जैसे संबोधन से आरंभ होते हैं वे प्रायः मक्की हैं क्योंकि उस समय तक मक्के के लोग ईमान नहीं लाए थे किंतु जो सूरे हे ईमान वालो! के संबोधन से आरंभ होते हैं वे प्रायः मदनी हैं। क़ुरआने मजीद की आयतों और सूरों का वर्गीकरण उन विषयों में से है जिन्होंने बहुत अधिक लोगों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया है। यह शैली अन्य पुस्तकों के अध्यायों के वर्गीकरण से बहुत भिन्न है। स्वयं क़ुरआने मजीद, विभिन्न आयतों में अपने वर्गीकरण की ओर संकेत करता है। उदाहरण स्वरूप सूरए इसरा की आयत क्रमांक 106 में कहा गया है। और (हे पैग़म्बर!) हमने क़ुरआन की आयतों को एक दूसरे से अलग किया ताकि आप ठहर ठहर कर उन्हें लोगों के समक्ष पढ़ सकें और हमने क़ुरआन क क्रमबद्ध ढंग से उतारा।क़ुरआने मजीद में कुल 114 सूरे हैं और यह ईश्वरीय किताब 30 समान खंडों में विभाजित है। प्रत्येक खंड को जुज़ या पारा कहा जाता है। प्रत्येक सूरे में कुछ आयतें हैं जिनका कोई एक या कई विशेष लक्ष्य हैं और उनमें बड़े गहरे अर्थ पाए जाते हैं। सूरा शब्द के कई अर्थ जिनमें उच्च स्थान व दर्जा, किसी वस्तु का कोई भाग, सुदृढ़ दुर्ग और नगर को शत्रु से सुरक्षित रखने हेतु बनाई जाने वाली ऊंची दीवार उल्लेखनीय हैं। क़ुरआने मजीद के हर अध्याय को इस लिए सूरा कहा जाता है कि उसमें वर्णित सभी बातें एकत्रित होती हैं। इस आधार पर क़ुरआने मजीद का एक विशेष स्थान और उच्च दर्जा है। सूरए तौबा को छोड़ कर क़ुरआन के सभी सूरे बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम की आयत से आरंभ होते हैं जिसका अर्थ है, ईश्वर के नाम से जो अत्यंत कृपाशील और दयावान है। कोई भी क़ुरआने मजीद में फेर बदल नहीं कर सकता और न ही उसकी आयतों में कुछ घटा बढ़ा सकता है।जैसा कि हम इससे पहले संकेत कर चुके हैं। क़ुरआने मजीद को ईश्वर द्वारा क्रमवार भेजे जाने की शैली में आयतें एक साथ पैग़म्बरे इस्लाम के पास नहीं भेजी गईं। क़ुरआन भेजे जाने का क्रम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की पैग़म्बरी की घोषणा के साथ आरंभ हुआ और वर्ष दस हिजरी क़मरी में उनके स्वर्गवास तक जारी रहा। क़ुरआने मजीद के चौदह सूरों के अतिरिक्त जिनकी आयतें एक साथ आई हैं, बाक़ी अन्य सूरों की आयतें क्रमवार ढंग से विभिन्न अवसरों पर और विभिन्न परिस्थितियों में भेजी गई हैं। इसके बाद पैग़म्बर के आदेश पर आयतों को उनके विशेष स्थान पर रखा गया है ताकि एक संपूर्ण सूरा बन जाए। हदीसों की प्रख्यात पुस्तक मसनद अहमद इब्न हम्बल में कहा गया है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पास निरंतर ईश्वरीय संदेश आता रहता था। जब भी कोई आयत आती वे क़ुरआन लिखने वालों या कातिबाने वहि में से किसी को बुला कर कहते थे कि इस आयत या इन आयतों को उस सूरे में लिखो जिसमें इस प्रकार की बातें कही गई हैं।क़ुरआने मजीद के सूरे, आयतों का समूह हैं। आयत शब्द का अर्थ होता है निशानी, अर्थात आयतें ईश्वर के अस्तित्व व उसके गुणों का चिन्ह हैं तथा पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के निमंत्रण तथा उनकी पैग़म्बरी की सच्चाई की निशानी हैं। क़ुरआने मजीद में दिन, रात, सूर्य, चंद्रमा, धरती पर पौधों के उगने, वर्षा के बरसने, हवाओं के बहने, बादलों के चलने और भाषाओं तथा लोगों के रंगों में विविधता जैसी बातों को ईश्वर की निशानी बताया है। इसी प्रकार हज़रत सालेह की ऊंटनी, हज़रत मूसा की लाठी, हज़रत ईसा के जन्म, हज़रत नूह के पानी के जहाज़ और ऐसे ही कुछ अन्य चमत्कारों को आयत या निशानी कहा गया है जिनमें लोगों के लिए शिक्षा सामग्री और ईश्वर की शक्ति व तत्वदर्शिता के चिन्ह हैं।क़ुरआने मजीद के हर सूरे का एक विशेष नाम है। क़ुरआने मजीद के व्याख्याकार अल्लामा तबातबाई इस संबंध में कहते हैं कि सूरों का नाम कभी उनमें आने वाले नामों या विषयों के आधार पर रखा जाता है, जैसे कि कहा जाता है सूरए बक़रह या सूरए आले इमरान और कभी सूरे की पहली आयत के अनुसार सूरे का नाम रखा जाता है जैसे सूरए क़द्र जिसे इन्ना अन्ज़न्लाहो भी कहा जाता है। इसी प्रकार कभी कभी क़ुरआने मजीद में सूरे के स्थान पर भी उस सूरे का नाम रखा जाता है जैसे सूरए हम्द जो क़ुरआन के आरंभ में आया है उसका नाम फ़ातेहतुल किताब अर्थात क़ुरआन का आरंभ भी है। आज सूरों का जो नाम है उनमें से अधिकांश सूरों का नाम पैग़म्बरे इस्लाम के काल में भी वही था।क़ुरआन से जुड़े विषयों के विशेषज्ञों का मानना है कि हर सूरा ईश्वर का एक चमत्कार और उसकी एक निशानी है और सभी सूरे, चाहे वे छोटे हों या बड़े, चमत्कार के स्तर तक पहुंचे हुए हैं। कुछ अन्य की दृष्टि में क़ुरआने मजीद को सूरों में बांटना इस बात की ओर संकेत है कि हर सूरे की अपनी विशेष शैली व पद्धति है। उदाहरण स्वरूप सूरए यूसुफ़ में हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की जीवनी का वर्णन किया गया है तथा सूरए इब्राहीम की अनेक आयतों में हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का उल्लेख हुआ है। यदि कोई पाठक क़ुरआन का कोई सूरा या उसकी कुछ आयतें पढ़े और फिर कोई दूसरा सूरा पढ़ना आरंभ करे तो वह थकन का आभास नहीं करेगा। चूंकि उसे नई नई विषयवस्तु मिलती जाएगी अतः वह अधि प्रफुल्लता के साथ क़ुरआन पढ़ना जारी रखेगा। वह एक यात्री की भांति होगा जो लम्बी यात्रा करना चाहता है और हर थोड़े समय के पश्चात आराम के लिए कहीं रुकता है और फिर अपनी यात्रा जारी रखता है।ब्रिटेन के एक विद्वान केनेट ग्रीक, क़ुरआने मजीद के सूरों और उनके शब्दों को अत्यंत आकर्षण का कारण बताते हुए कहते हैं कि क़ुरआन के सूरों में जो शब्दों की सादगी, विशेषण, उदाहरण, उपमाएं और सौगंधें हैं वे उन्हें उल्लेखनीय बना देती हैं। उनके विचार में एक युरोपीय अनुवादक, क़ुरआन के शब्दों के क्रम को अनुवाद में बाक़ी रखने का चाहे जितना प्रयास करे तब भी उसके अनुवाद में वह सुंदरता व वैभव नहीं आएगा जो मूल विषयवस्तु में है। वे लिखते हैं कि क़ुरआने मजीद के सूरों व आयतों के अनुवाद में मूल विषयवस्तु की रोचकता नहीं है और यह ऐसा ही जैसे कोई दक्ष कलाकार प्लास्टि से एक सुंदर फूल तैयार करे जिसमें विदित रूप से मूल फूल से कोई अंतर न हो किंतु अत्यंत स्पष्ट सी बात है कि नक़ली फूल में कभी भी अस्ली फूल जैसी सुगंध नहीं होगी। http://hindi.irib.ir