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    अमर ज्योति-22

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    इससे पूर्व हमने बताया कि क़ुरआने मजीद ऐसी आयतों का समूह है ईश्वर द्वारा अपने अंतिम दूत पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पास भेजी गई हैं। यह ईश्वरीय किताब इस्लाम की सभी शिक्षाओं और आदेशों का आधार है। यह किताब ज्ञानों का स्रोत है और इससे ईश्वरीय पहचान तथा तत्वदर्शिता के सोते फूटते हैं। मानव समाज के अनेक संस्कार इसी महान किताब के ऋणी हैं और विश्व के महान बुद्धिजीवियों ने इस किताब की भूमिका को स्वीकार किया है। पोलैंड के पूर्वी मामलों के प्रख्यात विशेषज्ञ काज़ीमिरेस्की कहते हैं कि क़ुरआन एक अत्यंत रोचक किताब है क्योंकि उसमें नैतिकता व शिष्टाचार, ज्ञान व राजनीति, शुभ सूचना व डरावा सभी कुछ है। फ़्रान्स के पूर्व विशेषज्ञ बार्टली सेंट हेलर लिखते हैं कि हम क़ुरआन की वाग्मिता को उसके अनुवाद में देखते हैं, इसी प्रकार दाऊद की मज़ामीर की सुंदरता का पता भी उसके अनुवाद से ही चलता है किंतु मज़ामीर में यहूदियों के लिए नागरिक क़ानून नहीं है जबकि यह क़ुरआन की विशेष शैली है कि वह मनुष्य के लिए आवश्यक विभिन्न विषयों की चर्चा करता है और उसके विभिन्न लाभ हैं। यह किताब धार्मिक गान भी है और ईश्वर की प्रशंसा भी। क़ुरआन जीवन के सिद्धांतों, सामाजिक क़ानूनों तथा उपदेशों से पूर्ण है। इसके अतिरिक्त वह अत्याचार से मुक़ाबले और न्याय की स्थापना का भी मार्ग दिखाता है और उसमें ऐतिहासिक घटनाओं और शास्त्रार्थों का वर्णन भी देखा जा सकता है।दूसरों ने क़ुरआने मजीद के बारे में जो कुछ कहा है कि वह उनके द्वारा इस महान किताब के अध्ययन और उसकी आश्चर्यचकित करने वाली बातों के समझने के आधार है किंतु ईश्वर, जिसने इस किताब को संसार में भेजा है, कुछ विशेष नामों और गुणों से इसका परिचय कराता है जिनसे इस अद्वितीय ईश्वरीय किताब की भूमिका व प्रभाव का पता चलता है। सृष्टि के रचयिता ने एक स्थान पर क़ुरआने मजीद को नूर या प्रकाश बताया है। जैसा कि सूरए निसा की आयत क्रमांक 174 में कहा गया है कि हे लोगो! तुम्हारे पास तुम्हारे पालनहार की ओर से स्पष्ट तर्क आ चुका है और हमने (क़ुरआन जैसा) स्पष्ट करने वाला प्रकाश भी तुम्हारी ओर भेजा है। इसी प्रकार सूरए माएदा की 15वीं आयत के एक भाग में कहा गया है कि ईश्वर की ओर से तुम्हारी ओर प्रकाश व स्पष्ट किताब आ चुकी है।निश्चित रूप से आप भी इस बात से अवगत होंगे यदि कोई व्यक्ति घोर अंधकार में हो तो उसके लिए सभी वस्तुएं एक समान होती हैं क्योंकि अंधकार में वस्तुओं को पहचनाना और मार्ग का चयन करना अत्यंत कठिन कार्य है। अब यदि प्रकाश मनुष्य की सहायता के लिए आ जाए तो फिर वह वस्तुओं के अंतर को समझने लगता है और वह सही व ग़लत मार्ग का अंतर समझ जाता है। क़ुरआने मजीद के प्रकाश होने का अर्थ यह है कि उसकी शिक्षाएं पूर्ण रूप से स्पष्ट एवं उज्जवल हैं और वह हर प्रकार के भ्रम एवं अंधकार से दूर है तथा मानव समाज को सभी प्रकार के वैचारिक व नैतिक अंधकारों से मुक्ति दिलाता है। ईश्वर कहता है कि यह किताब सीधे मार्ग व प्रकाश की ओर मनुष्य का मार्गदर्शन करती है। सूरए इब्राहीम की पहली आयत में ईश्वर कहता है कि (हे पैग़म्बर!) यह वह किताब है जिसे हमने आपकी ओर भेजा है आप ताकि लोगों को उनके पालनहार के आदेश से अंधकारों से प्रकाश की ओर ले जाएं। क़ुरआने मजीद सूर्य की भांति प्रकाश बिखेरता है, मनुष्य को जीवन प्रदान करता है तथा उसे प्रगति व परिपूर्णता के मार्ग पर ले आता है, इसी लिए कभी कभी हम क़ुरआने मजीद में बुद्धि जैसी वस्तुएं भी देखते हैं जिन्हें मार्गदर्शक और मुनष्य के विकास का कारक होने के कारण नूर या प्रकाश कहा गया है। यहां इस बात का उल्लेख भी रोचक होगा कि क़ुरआने मजीद में जितनी बार नूर शब्द का प्रयोग हुआ है उतनी ही बार अक़्ल अर्थात बुद्धि शब्द का भी प्रयोग हुआ है।क़ुरआने मजीद का प्रत्येक नाम उसके किसी न किसी चमत्कारिक आयाम का वर्णन करता है। इस ईश्वरीय किताब का सबसे प्रख्यात नाम क़ुरआन है और पूरे संसार में इसे इसी नाम से पहचाना जाता है। ईश्वर की ओर से पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पास अपना संदेश अर्थात वहि भेजे जाने के आरंभिक वर्षों में ही उसने अपने कथन का परिचय इसी नाम से कराया था। सूरए बुरूज की आयत क्रमांक 21 और 22 में कहा गया हैः बल्कि यह क़ुरआने मजीद है जो लौहे महफ़ूज़ अर्थात सुरक्षित पट्टिका में (मौजूद) है। क़ुरआन शब्द इस किताब में 68 बार आया है और कभी कभी हकीम अर्थात तत्वदर्शी, मुबीन अर्थात स्पष्ट रूप से वर्णन करने वाला, मजीद अर्थात प्रतिष्ठित, करीम अर्थात उदार तथा अज़ीम अर्थात महान जैसे विशेषणों के साथ इसका उल्लेख हुआ है। क़ुरआन का शाब्दिक अर्थ होता है पढ़ना या पढ़ा जाने वाले। इस आधार पर क़ुरआन पढ़ी जाने वाली किताब है जिसे पढ़ कर इसकी निर्माणकारी शिक्षाओं पर ध्यान देना चाहिए।फ़ुरक़ान शब्द भी क़ुरआन की एक विशेषता है। इस शब्द का अर्थ होता है वह वस्तु जो सत्य और असत्य को एक दूसरे से अलग कर दे। क़ुरआन में यह शब्द कुछ अन्य बातों के लिए भी प्रयोग हुआ है। उदाहरण स्वरूप ईश्वर ने बद्र नामक युद्ध को यौमुल फ़ुरक़ान अर्थात अंतर का दिन कहा है क्योंकि इस युद्ध ने अनेकेश्वरवाद के मोर्चे को ईमान के मोर्चे से पूर्ण रूप से अलग कर दिया था। ईश्वर अपने कथन को फ़ुरक़ान कहता है क्योंकि इस किताब की प्रकाशमान आयतों के कारण सत्य पूर्ण रूप से असत्य से अलग हो जाता है। क़ुरआने मजीद के प्रख्यात समकालीन व्याख्याकार आयतुल्लाह जवादी आमुली लिखते हैं कि फ़ुरक़ान में, जो सत्य व असत्य की पहचान का मादंड है, दो प्रकार के विशेष व सार्वजनिक प्रभाव पाए जाते हैं। उसका सार्वजनिक प्रभाव सभी मनुष्यों का मार्गदर्शन और लोगों को राह दिखाना है और उसका विशेष प्रभाव वास्तविकता की गहरी पहचान और दूरदर्शिता की प्राप्ति है। क़ुरआन से आत्मियता और उसकी शिक्षाओं के मनुष्य के मन व हृदय में बैठ जाने से वास्तविकता की मिठास उसके समक्ष प्रकट हो जाती है इस प्रकार से कि वह पाप की बुराई का आभास कर सकता है और पवित्रता की सुगंध को सूंघ सकता है।ईश्वर ने क़ुरआने मजीद को तिबयान भी कहा है जिसका अर्थ होता है हर वस्तु को बयान करने वाला। सूरए नहल की आयत क्रमांक 89 में ईश्वर कहता हैः और (हे पैग़म्बर!) हमने इस (आसमानी) किताब को आपके पास भेजा है जो हर वस्तु का वर्णन करने वाली, मार्गदर्शन व दया का साधन तथा मुसलमानों के लिए शुभ सूचना है। इस किताब में एकेश्वरवाद की शिक्षाएं और मनुष्य के प्रशिक्षण के सिद्धांत हैं तथा इसने लोगों के कल्याण के लिए सर्वोत्त्तम नियम व क़ानून विस्तार से बयान किए हैं। दूसरे शब्दों में हर वह वस्तु जो मनुष्य के कल्याण के लिए आवश्यक है उसका इस ईश्वरीय किताब में वर्णन कर दिया गया है। यह किताब विषय वस्तु की दृष्टि से हर प्रकार की ग़लती व त्रुटि से दूर है और अपनी शिक्षाओं को बड़े ठोस शब्दों में बयान करती है। क़ुरआने मजीद, ईश्वरीय शिक्षाओं को ग्रहण करने के लिए आतुर हृदय को पवित्र बनाता है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि मानव हृदय को उज्जवल बनाने के लिए क़ुरआने के अतिरिक्त कोई साधन नहीं है।अनन्य ईश्वर क़ुरआने मजीद को अन्य आसमानी किताबों की भांति सत्य व न्याय की मीज़ान या तुला बताता है। तुला या तराज़ू वस्तुओं के भार को नापने और उनके वज़्न को ठीक करने का माध्यम है। क़ुरआने मजीद ईश्वर की तुला है, दूसरे शब्दों में सही व ग़लत विचारों के बीच अंतर समझने का साधन क़ुरआने मजीद है अतः विचारों व दृष्टिकोणों की सत्यता को समझने और मनुष्य द्वारा बनाए गए कार्यक्रमों नियमों के सही व ग़लत होने की पहचान के लिए क़ुरआन जैसे महत्वपूर्ण मानक का सहारा लिया जाना चाहिए।बशीर व नज़ीर अर्थात शुभ सूचना देने वाला व डराने वाला भी ऐसी विशेषताएं हैं जो क़ुरआने मजीद के लिए प्रयोग हुई हैं। अपनी आंतरिक व प्राकृतिक इच्छाओं के दृष्टिगत मनुष्य कुछ बातों की ओर रुझान रखता है और कुछ बातों से विमुख रहता है। इस बीच क़ुरआने मजीद मनुष्य की इच्छाओं को संतुलित करके उसे अच्छे कार्यों के लिए प्रेरित करने और बुरे कार्यों व बुरे व्यवहार से रोकने वाले की भूमिका निभाता है। इसी प्रकार वह नैतिक बुराइयों को मनुष्य की तबाही का कारण बताते हुए उसे कड़े दंड की चेतावनी देता है। क़ुरआने मजीद के कई अन्य नाम व गुण हैं किंतु समय की कमी के कारण हम उन सभी की चर्चा नहीं कर पाएंगे। निश्चित रूप से क़ुरआने मजीद पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का महान चमत्कार तथा इस्लाम की सत्यता का प्रमाण है और मनुष्य केवल इस ईश्वरीय किताब की शिक्षाओं की छाया में ही अनंत कल्याण प्राप्त कर सकता है। http://hindi.irib.ir