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    अमर ज्योति-23

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    क़ुरआने मजीद, इस्लाम का अमर चमत्कार, अंतिम आसमानी किताब तथा सृष्टि के अनन्य रचयिता का कथन है। उसने स्वयं ही सूरए निसा की 166वीं आयत में कहा है कि (हे पैग़म्बर! यद्यपि काफ़िर आपकी पैग़म्बरी को स्वीकार नहीं करते) परंतु ईश्वर उस चीज़ के बारे में गवाही देता है जो उसने आपकी ओर भेजी है क्योंकि उसने उसे अपने ज्ञान के आधार पर उतारा है और फ़रिश्ते भी आपकी सत्यता पर गवाही देते हैं (यद्यपि) ईश्वर की गवाही (आपके लिए) काफ़ी है। ईश्वर, सृष्टि का पालनहार, तत्वदर्शी, युक्तिकर्ता, जीवित व सर्वसक्षम है। उसके नाम विश्व साहित्य और पूरे क़ुरआने मजीद में अत्यंत उल्लेखनीय हैं। उसकी शक्ति, ज्ञान व दया असीम है। आजके कार्यक्रम में ईश्वर की कुछ विशेषताओं और इस संबंध में क़ुरआने मजीद के दृष्टिकोण के बारे में चर्चा की जाएगी।क़ुरआने मजीद की आयतों में बड़े सुंदर एवं रोचक ढंग से ईश्वर क विशेषताओं का वर्णन किया गया है। ईश्वर, मनुष्य की गर्दन की नस से भी अधिक उससे समीप और सदैव उसका समर्थक है। जब हम क़ुरआने मजीद खोलते हैं तो सबसे पहली आयत उसी के नाम से आरंभ होती जिसमें उसके कृपाशील और दयावान होने की विशेषता बयान की गई है। इसके बाद क़ुरआने मजीद के पहले सूर अर्थात सूरए फ़ातेहा या सूरए हम्द में उसकी कई अन्य विशेषताओं का उल्लेख किया गया है। केवल अनन्य ईश्वर ही है जो हर प्रकार की त्रुटि व अवगुण से दूर है और केवल उसी में अच्छी विशेषताएं अपनी चरम सीमा पर मौजूद हैं। वह वही ईश्वर है जिसने सभी को अनुकंपाएं प्रदान की हैं। सभी रचनाओं को उसी ने अस्तित्व प्रदान किया है और वही सबको परिपूर्णता की ओर ले जाता है। उसकी दया व कृपा असीम है और वही संपूर्ण सृष्टि का स्वामी है। सूरए आले इमरान की आयत क्रमांक 189 में कहा गया है कि आकाशों और धरती का शासन ईश्वर ही के लिए है।क़ुरआने मजीद के व्याख्याकारों का मानना है कि इस ईश्वरीय पुस्तक में हर स्थान पर ईश्वर के अस्तित्व का आभास किया जा सकता है। विभिन्न आयतों में संसार की रचनाओं पर उसके प्रभुत्व का उल्लेख किया गया है। पूरी सृष्टि उसी की शक्ति के अधीन है और किसी भी वस्तु का अस्तित्व में आना उसी की इच्छा पर निर्भर है। यदि वह चाहे तो हर वस्तु की रचना कर सकता है और यदि उसकी इच्छा न हो तो कोई भी घटना नहीं होती। क़ुरआन के व्याख्यकारों ने, सृष्टि पर ईश्वर के प्रभुत्व को, जिसका अनेक आयतों में उल्लेख किया गया है, क़ुरआने मजीद के चमत्कार का एक आयाम बताया है। सूरए तकवीर की 26वीं से 29वीं तक की आयतों में कहा गया है। तो तुम किधर जा रहे हो? यह तो संसार वालों के लिए नसीहत के अतिरिक्त कुछ नहीं है। तुममें से उनके लिए जो सीधा मार्ग अपनाना चाहते हैं। और तुम लोग कुछ चाह ही नहीं सकते सिवाए इसके कि ब्रह्मांड का पालनहार चाहे। क़ुरआने मजीद में ईश्वर के गुणों का वर्णन अत्यंत उत्साहवर्धक है और मनुष्य को शिष्टाचारिक गुणों की प्राप्ति के लिए प्रेरित करता है, इससे उसके भीतर पाप से दूर रहने की भावना उत्पन्न होती है।ईश्वर, क़ुरआने मजीद में संसार की आश्चर्यचकित कर देने वाली व्यवस्था को अपने अस्तित्व का प्रमाण बताता है और विभिन्न प्रकार के प्रश्न करके मनुष्य को सोचने के लिए प्रेरित करता है। सूरए इब्राहीम की दसवीं आयत में वह कहता है कि उनके पैग़म्बरों में कहा कि क्या ईश्वर (के अस्तित्व) में कोई संदेह है? वह ईश्वर जिसने आकाशों व धरती की रचना की है। इस प्रकार सूरए तूर की 35वीं आयत में वह प्रश्न करता है कि क्या उन्हें बिना किसी साधन के पैदा कर दिया गया है? या वे स्वयं अपने रचयिता हैं।क़ुरआने मजीद की अनेक आयतों में भ्रूण के बढ़ने के चरणों, मनुष्य की विशेषताओं, आकाश व धरती की आश्चर्यजनक बातों, पेड़-पौधों के बढ़ने और ऐसे की ढेरों विषयों की चर्चा करके इस माध्यम से पालनहार के अस्तित्व को सिद्ध किया गया है। क़ुरआने मजीद में 750 अवसरों पर ईश्वर के अस्तित्व के बारे में चर्चा की गई है। ये आयतें इस बात पर बल देती हैं कि केवल अनन्य व सक्षम ईश्वर की शक्ति से ही सृष्टि बाक़ीरती है और मनुष्य अपनी सभी जटिलताओं के बावजूद उसकी शक्ति के सामने असहाय है। महान मुस्लिम दार्शनिकों का कहना है कि उन्होंने अपने ठोस तर्कों के लिए क़ुरआने मजीद से सहायता ली है। इस संबंध में क़ुरआने मजीद ज्ञान को मनुष्य व ईश्वर की पहचान के बीच एक पुल की संज्ञा देता है और मनुष्य की बुद्धि को फ़ैसला करने का निमंत्रण देता है ताकि वह सृष्टि की पुस्तक का अध्ययन करके संसार के पालनहार के संबंध में अपने ईमान को अधिक सुदृढ़ बनाए।क़ुरआने मजीद में ईश्वर एक जीवित, ज्ञान व अत्यंत प्रभावी अस्तित्व के रूप में प्रस्तुत किया गया है जो मनुष्य से भीतर भलाइयों से प्रेम और आगे बढ़ने की भावना को बल देता है। क़ुरआन अपनी रोचक शैली में मनुष्य का ध्यान इस बात की ओर आकृष्ट करता है कि ईश्वर सबसे पहले है और सभी वस्तुएं उसके अस्तित्व से प्रवाहित होती हैं। इसी प्रकार वह अनंतकालीन है और सभी वस्तुएं लौट कर उसी की ओर जाने वाली हैं। ईश्वर ऐसा जीवित अस्तित्व है कि मूल जीवन उसी की ओर से है और वह अन्य जीवों को भी जीवन प्रदान करता है। उसमें कभी भी निश्चेतना उत्पन्न नहीं होती। वह सभी प्रकट व गुप्त रहस्यों का जानकार है और उसका शासन व स्वामित्व सृष्टि की हर वस्तु पर है। ऐसा ईश्वर सभी मनुष्यों के प्रेम व गुणगान का पात्र है।इस संबंध में क़ुरआने मजीद के सूरए हश्र की 22वीं, 23वीं और 24वीं आयतें अत्यंत रोचक हैं जिनमें ईश्वर को भले नामों से याद किया गया है। ये आयतें कहती हैः ईश्वर तो बस वही है जिसके अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं, वह गुप्त व प्रकट बातों का ज्ञानी है, वह अत्यंत कृपाशील व दयावान है। वह ऐसा ईश्वर है जिसके अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं, वही सर्वशासक तथा हर प्रकार की बुराई से दूर, शांति प्रदान करने वाला, शरणदाता, संरक्षक, प्रभुत्वशाली, प्रभावशाली और गुणगान योग्य है और उसकी महिमा इससे कहीं पवित्र है कि किसी को उसका समकक्ष बनाया जाए। वही ईश्वर सृष्टिकर्ता, अस्तित्व प्रदान करने वाला और रूपकार है। सभी अच्छे नाम उसी से विशेष हैं। जो कुछ आकाशों और धरती में है उसी का गुणगान करता है और वह अत्यंत प्रभुत्वशाली व तत्वदर्शी है। क़ुरआने मजीद के प्रख्यात व्याख्याकार और उच्च धर्मगुरू आयतुल्लाह नासिर मकारिम शीराज़ी के शब्दों में, ये आयतें जो ईश्वर के नामों व गुणों के एक महत्वपूर्ण भाग का वर्णन करती हैं, असाधारण एवं प्रेरणादायक आयतें हैं तथा मनुष्य के प्रशिक्षण के लिए इनमें महान पाठ है क्योंकि ये आयतें मनुष्य को याद दिलाती हैं कि यदि वह ईश्वर का सामिप्य चाहता है और परिपूर्णता का इच्छुक है तो उसे अपने भीतर इन गुणों का प्रतिबिंबन उत्पन्न करना चाहिए। जब भी मनुष्य ईश्वर के इन गुणों व नामों में से किसी भी एक पर विचार करे तो वस्तुतः वह इस परिपूर्णता के मुक़ाबले में अपनी कमी को समझ जाता है और स्वयं को उसकी सहायता का पात्र समझता है तथा उससे संपर्क स्थापित करके उसे एक विशेष प्रकार के संतोष व सुरक्षा का आभास होता है।क़ुरआने मजीद ने अपनी आयतों में सृष्टि के रचयिता को उन नामों व गुणों से पवित्र बताया है जो उसके योग्य नहीं हैं। इस ईश्वरीय पुस्तक में लगभग पंद्रह आयतें ऐसी हैं जिनमें उसे हर प्रकार की त्रुटि व बुराई से दूर बताया गया है तथा पचास से अधिक आयतें ऐसी हैं जिनमें उसे असमाए हुस्ना या अच्छे नामों व गुणों से याद किया गया है। यह गुण इतने सुंदर एवं सार्थक हैं कि इनका प्रभाव मनुष्य के अस्तित्व की गहराइयों तक पहुंच जाता है और यह पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का अमर चमत्कार है। पालनहार का गुणगान हमें उस दयावान एवं तत्वदर्शी ईश्वर के समक्ष ले आता है जिसकी दया का वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता। उसकी उपासना मनुष्य की आत्मा में प्रतिष्ठा व स्वतंत्रता की भावना को सुदृढ़ बनाती है तथा उसे दूसरे की प्रशंसा से दूर रखती है। क़ुरआने मजीद के कुछ सूरे ईश्वर की गुणगान से आरंभ हुए हैं। क़ुरआन के शब्दों में जो कुछ आकाशों और धरती में है वह ईश्वर की प्रशंसा करता है। मनुष्य से भी कहा गया है कि वह सृष्टि की अन्य वस्तुओं से समन्वित हो कर अपने पालनहार का गुणगान करे और इसके लिए भोर व रात्रि के समय पर अधिक बल दिया गया है।इस प्रकार से क़ुरआने मजीद जिस ईश्वर का परिचय कराता है वह संपूर्ण परिपूर्णता का स्वामी, अनन्य तथा वास्तविक अनुकंपा प्रदान करने वाला है। क़ुरआने मजीद में अनेक स्थानों पर ईश्वर की दया, कृपा तथा उसकी ओर से लोगों में जगाई जाने वाली आशा को देखा जा सकता है। ईश्वर द्वारा क्षमा व दया का वादा मनुष्य के अस्तित्व से निराशा को समाप्त कर देता है। उसका स्मरण मनुष्य को प्रफुल्लित करता है और उसके मन व हृदय को शांति प्रदान करता है। http://hindi.irib.ir/