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    अमर ज्योति-24

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    पिछली चर्चा में हमने क़ुरआने मजीद के रचनाकार ईश्वर के बारे में बात की थी जिसका अस्तित्व पूर्ण रूप से सौंदर्य, भलाई, प्रभुत्व व तत्वदर्शिता है और संपूर्ण ब्रह्मांड का संचालन उसके हाथ में है। क़ुरआन, ऐसे ही ईश्वर का संदेश व कथन है। इस आधार पर इस किताब की तुलना मनुष्य द्वारा लिखी गई किसी भी पुस्तक से नहीं की जा सकती। क़ुरआने मजीद का संदेश, सर्वभौमिक व सर्वकालिक है तथा वह सबसे अच्छी राहों की ओर मनुष्य का मार्गदर्शन करता है। सूरए इसरा की आयत क्रमांक 9 में कहा गया हैः निश्चित रूप स यह क़ुरआन इस रास्ते की ओर मार्गदर्शन करता है जो सबसे अधिक सीधा व सुदृढ़ है। मनुष्य को अपने जीवन में सबसे अधिक अपने भविष्य की चिंता रहती है, यही कारण है कि वह मोक्ष व कल्याण की प्राप्ति और उच्च लक्ष्यों तक पहुंचने के लिए प्रयासरत रहता है। यदि हम ध्यानपूर्वक देखें तो न केवल मनुष्य बल्कि सृष्टि की हर वस्तु का एक निर्धारित लक्ष्य व गंतव्य है जिसकी ओर वह अपने अस्तित्व में आने के पहले दिन से ही बढ़ रही है। उदाहरण स्वरूप यदि धरती में गेहूं का एक दाना डाल दिया जाए तो कुछ समय बाद वह हरे भरे अंकुर के रूप में धरती के सीने से सिर उभारता है और फिर गेहूं की विभिन्न बालियों वाले एक पौधे में परिवर्तित हो जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में गेहूं के दाने को कई चरणों से गुज़रना होता है वह एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित होता हुआ अंततः गेहूं के एक संपूर्ण पौधे के रूप में सामने आता है। इस प्रकार से कहा जा सकता है कि आरंभ से ही गेहूं का दाना एक विशेष लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रयासरत था।मनुष्य सहित सृष्टि की सभी वस्तुएं किसी न किसी विशेष लक्ष्य व गंतव्य की ओर अग्रसर हैं। जैसा कि सूरए ताहा की 50वीं आयत में कहा गया है कि मूसा ने कहा कि हमारा पालनहार वही है जिसने हर वस्तु को उसकी रचना के अनुसार सभी आवश्यक बातें प्रदान कीं, फिर उसका मार्गदर्शन किया है। हिदायत अर्थात मार्गदर्शन शब्द का क़ुरआने मजीद में अनेक स्थानों पर अनेक अर्थों में प्रयोग हुआ है किंतु मूल रूप से इसके दो अर्थ हैं, प्रथम ईश्वर द्वारा संसार की सभी वस्तुओं में रखा गया स्वाभाविक मार्गदर्शन जिसे तकवीनी हिदायत कहा जाता है। इसका अर्थ यह है कि ईश्वर की इच्छा से निर्धारित नियमों के आधार पर सभी वस्तुएं अपनी परिपूर्णता के मार्ग पर अग्रसर हैं। क़ुरआने मजीद की दृष्टि में दूसरे प्रकार का मार्गदर्शन, वह है जिसके अंतर्गत पैग़म्बरों व आसमानी किताबों के माध्यम से अंतिम गंतव्य की ओर मनुष्यों का मार्गदर्शन किया जाता है। पैग़म्बरों व आसमानी किताबों की शिक्षाओं के द्वारा मनुष्य, परिपूर्णता का मार्ग तक पहुंचता है। इस प्रकार के मार्गदर्शन को हिदायते तशरीई कहा जाता है। क़ुरआने मजीद के सूरए अम्बिया की 73वीं आयत में कहा गया है। और हम ने (पैग़म्बरों को) ऐसे नेता बनाया जो हमारे आदेश पर (लोगों का) मार्गदर्शन करते हैं।क़ुरआने मजीद की आयतों के अनुसार मनुष्य को अपने व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन में ऐसे कुछ नियमों व मान्यताओं पर कटिबद्ध रहना चाहिए जिनकी ओर उसकी प्रवृत्ति भी उसे बुलाती है तथा पैग़म्बर भी उनकी ओर उसे निमंत्रण देते हैं। मानव प्रवृत्ति का तक़ाज़ा यह है कि वह आंतरिक इच्छाओं का पालन न करते हुए बल्कि बुद्धि के प्रकाश का सहारा लेकर आगे बढ़े। दूसरी ओर लक्ष्यपूर्ण जीवन के लिए एक ठोस एवं संकलित कार्यक्र आवश्यक है जो गंतव्य तक पहुंचने के मार्ग में मनुष्य की सहायता कर सके। ईश्वर ने, जो मनुष्य की प्रवृत्ति एवं विशेषताओं से पूर्ण रूप से अवगत है, क़ुरआने मजीद में एक सही जीवन को रेखांकित किया है और अपने अंतिम पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के माध्यम से उसे मानव जाति के समक्ष प्रस्तुत किया है। इस्लाम की अमर किताब क़ुरआने मजीद ऐसी शिक्षाओं से परिपूर्ण है जिनमें मनुष्य की वैचारिक, मानसिक और व्यवहारिक विशेषताओं की ओर संकेत किया गया है। इस संबंध में क़ुरआन ने मनुष्य के मन व आत्मा की दो परस्पर विरोधी प्रक्रियाओं की ओर संकेत किया है जो उसे भलाई या बुराई के लिए प्रेरित करती रहती हैं। आयतों में कहा गया है कि ये दो प्रक्रियाएं सदैव एक दूसरे से टकराती रहती हैं और भलाई व बुराई की शक्तियों के बीच टकराव निरंतर जारी रहता है। निश्चित रूप से भलाई व बुराई में से जो भी शक्ति मनुष्य के अस्तित्व में अधिक स्थान पाती है, उसी अनुपात से उसका व्यवहार परिवर्तित होता रहता है। मनुष्य की कामुकता, उसके अस्तित्व के एक महत्वपूर्ण तत्व के रूप में उसे आंतरिक इच्छाओं की पूर्ति व भोग विलास में व्यस्त रहने के लिए उकसाती है। उसके अस्तित्व का एक अन्य आयाम, ईश्वर से प्रेम है जो उसके अस्तित्व की गहराइयों से प्रवाहित होता है तथा उसे अनुचित एवं परिपूर्णता से विरोधाभास रखने वाली बातों से रोकता है। क़ुरआने मजीद बड़ी रोचक शैली में आंतरिक शक्तियों को नियंत्रित करने का मार्ग मनुष्य को दिखाता है तथा सबसे उचित राह की ओर उसका मार्गदर्शन करता है।जैसा कि क़ुरआने मजीद की आयतों से पता चलता है, मनुष्य सृष्टि का सर्वोच्च एवं रहस्यमयी जीव है। संसार के सृष्टिकर्ता ने अपनी समस्त रचनाओं में केवल मनुष्य के संबंध में ही स्वयं को सर्वोत्तम रचयिता कहा है। क़ुरआने मजीद के सूरए मोमेनून की 14वीं आयत में मनुष्य की सृष्टि के विभिन्न चरणों का उल्लेख करने के बाद ईश्वर ने कहा है तो महान है वह ईश्वर जो सबसे अच्छा रचयिता है। इसी प्रकार सूरए हिज्र की आयत क्रमांक 29 में कहा गया है कि ईश्वर ने मनुष्य में अपनी आत्मा फूंकी है। तो इस प्रकार की रचना इस योग्य है कि उसे धरती में ईश्वर के उत्तराधिकारी के रूप में परिचित कराया जाए। क़ुरआन की आयतों के अनुसार मनुष्य की रचना, पवित्र एवं एकेश्वरवादी प्रवृत्ति से हुई है और उसमें सभी उच्च गुणों की प्राप्ति की क्षमता है जिन्हें उसे व्यवहारिक बनाना चाहिए। क़ुरआने मजीद अपनी शिक्षाओं व कार्यक्रमों के माध्यम से मनुष्य को सच्चाई का मार्ग दिखाता है। सूरए अहक़ाफ़ की 30वीं आयत में ईश्वर कहता है। उन्होंने कहाः हे लोगो! हमने सुना है कि मूसा के बाद कोई किताब भेजी गई है जो उससे पहली वाली किताबों की निशानियों से समन्वित है और जो सत्य और सीधी राह की ओर मार्गदर्शन करती है।क़ुरआने मजीद की शिक्षाओं में ईश्वर को मनुष्य का उच्च व अंतिम गंतव्य बताया गया है क्योंकि वही हमारा जीवनदाता है और हमें लौट कर उसी की ओर जाना है। यदि ईश्वर नाम की ठोस वास्तविकता को मनुष्य के जीवन व उसकी संस्कृति से अलग कर दिया जाएग तो फिर सृष्टि और जीवन की कोई भी सही व्याख्या प्रस्तुत नहीं की जा सकेगी। क़ुरआने मजीद ज्ञानी व सर्वसक्षम ईश्वर को संपूर्ण सृष्टि का ध्रुव बताता है, मानव जीवन को उच्च लक्ष्य प्रदान करता है और उसे जीवन के प्रति आशावान बनाता है। इस आधार पर मनुष्य ईश्वर से निकट संबंध स्थापित कर लेता है और उससे प्रेम की छाया में जीवन की मिठास और रक्षा का आभास करता है। क़ुरआने मजीद में कहा गया है कि हृदय की शांति, ईश्वर की याद व उसके स्मरण से ही प्राप्त होती है।क़ुरआने मजीद, सभी मामलों में मनुष्य का मार्गदर्शक है। यह ईश्वरीय किताब, आत्मबोध, आत्मनिर्माण, अन्य लोगों के साथ व्यवहार, व्यापार, रोज़गार और आर्थिक, प्रशासनिक व क़ानूनी मामलों सहित जीवन के सभी मामलों में मनुष्य के लिए स्पष्ट व तर्कसंगत क़ानूनों का उपहार लेकर आई है। इसी कारण क़ुरआन में हिदायत या मार्गदर्शन का शब्द अत्यंत व्यापक अर्थों में और सभी आयामों में प्रयोग हुआ है। इस संबंध में क़ुरआन, मनुष्य के समक्ष अत्यंत उज्जवल क्षितिज खोलता है, सोए हुए विवेक को जगाता है तथा मनुष्य को नैतिक गुणों व पवित्र जीवन की शुभ सूचना देता है।अलबत्ता क़ुरआने मजीद की दृष्टि में मनुष्य का मार्गदर्शन या उसकी पथभ्रष्टता उसके विचार व कर्म का परिणाम है क्योंकि मनुष्य के कर्म और विचारों का अलग-अलग प्रभाव होता है। स्पष्ट है कि यदि मनुष्य का कर्म अच्छा हो तो उसका परिणाम अच्छे विचार और मार्गदर्शन के रूप में सामने आएगा। इस बात की पुष्टि सूरए अनफ़ाल की आयत क्रमांक 29 से होती है जिसमें कहा गया है कि हे ईमान वालो! यदि तुम ईश्वर से डरते रहोगे तो वह तुम्हें सत्य और असत्य को अलग-अलग करने की क्षमता प्रदान कर देगा, तुम्हारी बुराइयों को छिपा देगा और तुम्हें क्षमा कर देगा और ईश्वर अत्यधिक कृपा (करने) वाला है। किंतु यदि मनुष्य पथभ्रष्टता व तबाही के मार्ग पर क़दम बढ़ाए तो उसके हृदय का अंधकार बढ़ता जाता है, उसकी ग़लतियों और पापों में वृद्धि होने लगती है और कभी कभी वह ईश्वर के इन्कार की सीमा तक पहुंच जाता है। सूरए रूम की दसवीं आयत में कहा गया है कि फिर जिन लोगों ने बुरे कर्म किए उनका अंजाम यहां तक पहुंच गया कि उन्होंने ईश्वर की आयतों का इन्कार कर दिया और उनका परिहास करने लगे।मार्दर्शन या पथभ्रष्टता के विषय को एक सरल उदाहरण से स्पष्ट किया जा सकता है। जब मनुष्य किसी ख़तरनाक घाटी के पास से गुज़रता है तो जितना वह उसके निकट होता जाएगा, उसके घाटी में गिरने का ख़तरा उतना ही बढ़ता जाएगा और उसके बचने की संभावना उतनी ही कम होती जाएगी किंतु जितना वह स्वयं को घाटी से दूर रखेगा, उतना ही उसमें उसके गिरने की संभावना कम होगी। अधिक ध्यान व सावधानी, मार्गदर्शन व मुक्ति का कारण बनती है जबकि लापरवाही का परिणाम लड़खड़ाने व पतन के रूप में सामने आता है। अतः उचित है कि हम क़ुरआने मजीद की जीवनदायक शिक्षाओं को अपने जीवन का पथप्रदशक बनाएं ताकि पथभ्रष्टता की घाटी में गिरने से हमें मुक्ति मिल जाए। मार्गदर्शन के संबंध में क़ुरआन की विशेष शैली है जिसके बारे में हम अगले कार्यक्रम में चर्चा करेंगे। http://hindi.irib.ir/