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    अमर ज्योति-26

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    क़िस्सों का प्रयोग, मनुष्यों के मार्गदर्शन व प्रशिक्षण हेतु क़ुरआने मजीद की शैलियों में से एक है। क़िस्से प्रस्तुत करने की क़ुरआन की शैली अद्भुत एवं अद्वितीय है और इस ईश्वरीय किताब के चमत्कारिक आयामों में गिनी जाती है। इस चर्चा में हम क़ुरआने मजीद में सौंदर्य व कला के विषय पर बात करेंगे। इतिहास के दौरान धर्म और कला जैसे दो विषयों के बीच अटूट संबंध रहा है। शायद इसका कारण यह है कि यह दोनों ही मनुष्य की आत्मा की गहराइयों में बसे होते हैं। क़ुरआन ईश्वरीय कृपा का प्रतीक है और उसके क़िस्से, जो ईश्वर के अर्थपूर्ण कथन का भाग हैं, सच्ची मान्यताओं को लोगों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं। इन क़िस्सों के माध्यम से क़ुरआन मनुष्य के जिज्ञासु मन को सौंदर्य के प्रति आकृष्ट करता है। मूल रूप से सौंदर्य का निर्धारण और उसकी प्राप्ति की इच्छा मनुष्य के मन मस्तिष्क में बसी हुई है क्योंकि वह अपनी परिपूर्णता के मार्ग में उस अनन्य ईश्वर की ओर बढ़ता है जो सभी गुणों व सौंदर्य का स्रोत है।वास्तविक सौंदर्य की खोज के मार्ग में क़ुरआने मजीद मनुष्य को बौद्धिक बहसों में अकेला नहीं छोड़ता बल्कि उसे वास्तविक सौंदर्य दिखाता है और उसे इसकी वैभवपूर्ण झलकियां देखने के लिए प्रेरित करता है। सूरए हिज्र में वास्तविक और झूठे सौंदर्य को अलग करने के लिए इब्लीस की घटना का वर्णन किया गया है जिसने ईश्वर के समक्ष सौगंध खाई है कि वह बुराइयों को सुंदर बना कर, मनुष्य को वास्तविक सौंदर्य को समझने के संबंध में धोखा देगा। इस सूरे की 39वीं और 40वीं आयतों में कहा गया है कि इब्लीस ने कहा, प्रभुवर! जिस प्रकार से तूने मुझे बहकाया मैं भी उसी प्रकार धरती में (मनुष्यों के समक्ष बुराइयों को) सुंदर बना कर प्रस्तुत करूंगा तथा सबको बहकाऊंगा सिवाए उनके जो तेरे चुने हुए बंदे होंगे।वस्तुतः क़ुरआने मजीद का वास्तविक लक्ष्य मनुष्य की परिपूर्णता व कल्याण है। इस दृष्टिकोण के साथ क़ुरआन अपने क़िस्सों को विशेष अर्थ व आकर्षण प्रदान करता है। उदाहरण स्वरूप धैर्य व संयम के चित्रण के समय वह अपने संबोधक को अय्यूब पैग़म्बर के संयम व प्रतिरोध को देखने का निमंत्रण देता है और उसे याद दिलाता है कि कठिनाइयों के मुक़ाबले में संयम से काम लेना, एक सुंदर नैतिक व शिष्टाचारिक गुण है। यदि मनुष्य का मन मस्तिष्क इस गुण से सुसज्जित हो जाए तो उसका व्यवहार अच्छा व सराहनीय हो जाएगा। इस संबंध में क़ुरआने मजीद में कुछ अन्य घटनाओं का भी वर्णन किया गया है। जैसे अपने भाइयों की ईर्ष्या के मुक़ाबले में हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की क्षमा की आश्चर्यजनक भावना, हज़रत मरयम अलैहस्सलाम की घटना में पवित्रता व ईश्वर पर भरोसे का भव्य प्रदर्शन, मछली के पेट में फंसने के बाद हज़रत यूनुस द्वारा ईश्वर से प्रार्थना और आशा की भावना जिससे यह शिक्षा मिलती है कि कड़ी से कड़ी परिस्थिति में भी ईश्वर की दया व कृपा की ओर से निराश नहीं होना चाहिए। इन सभी क़िस्सों में क़ुरआन अपने संबोधक को एकेश्वरवादी धर्म के सिद्धांतों से सुसज्जित जीवन को देखने का निमंत्रण देता है तथा उसे अनन्य ईश्वर की ओर बुलाता है। इस ईश्वरीय पुस्तक में मिस्र के क्रूर शासक फ़िरऔन के क़िस्से में हम उसकी पत्नी आसिया का चित्र भी देखते हैं जिसने अपने पालनहार को प्रसन्न करने के लिए एक आश्चर्यजनक चयन किया और फ़िरऔन के साथ के वैभवपूर्ण जीवन और सांसारिक स्थान को ठोकर मार कर अनन्य ईश्वर की ओर उन्मुख हो गई। क़ुरआने मजीद के सूरए अनआम की आयत क्रमांक 79 में हम सृष्टि के पालनहार की उपासना के संबंध में हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की ज़बान से सुनते हैः मैंने अपना मुख उसकी ओर कर लिया है जिसने आकाशों और धरती की रचना की है, मैं अपने ईमान में निष्ठापूर्ण हूं और मैं अनेकेश्वरवादियों में से नहीं हूं।क़ुरआने मजीद के क़िस्सों के सौंदर्य का एक भाग, क़िस्सा प्रस्तुत करने की शैली व तकनीक और एक भाग क़िस्सों में वर्णित बातों से संबंधित है। क़ुरआन के क़िस्सों में पाई जाने वाली सुव्यवस्था व एकजुटता, चमत्कारिक है और ईश्वरीय कथन के सुंदर आयामों में से एक है। यद्यपि इन कथाओं में वर्णित सभी चरित्र व हस्तियां वास्तविक हैं किंतु उनका प्रस्तुतिकरण चमत्कारिक व मनुष्य की क्षमता से बाहर है। इन क़िस्सों के चरित्रों के बीच संबंध व समन्वय और क़िस्सों में पाई जाने वाली व्यवस्था ने उन्हें एक विशेष रोचकता प्रदान कर दी है और इन्हें पढ़ने वाला, वास्तविकता को उसकी पूरी उज्जवलता के साथ देखता है। क़ुरआन की कथाओं में जीवन का बड़े ही ठोस ढंग से आभास होता है और वह क़िस्सों को विशेष रोचकता प्रदान करता है। सूरए शोअरा में हज़रत मूसा व फ़िरऔन, हज़रत इब्राहीम, नूह, हूद, सालेह, लूत व शुएब के क़िस्सों का वर्णन किया गया है। इन क़िस्सों के आरंभ व अंत में एक समान लगने वाली आयतें दोहराई गई हैं और उनमें उच्च स्तर का समन्वय दिखाई पड़ता है।घटनाओं का दोहराया जाना भी क़ुरआने मजीद के क़िस्सों की एक विशेषता है। कभी कभी संबोधक को ऐसे क़िस्से पढ़ने को मिलते हैं जो कई बार दोहराए जा चुके हैं। जैसे हज़रत नूह व हज़रत मूसा अलैहिमस्सलाम और उनके द्वारा अत्याचारियों से मुक़ाबला करने के क़िस्से। इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह की दृष्टि में क़ुरआने मजीद के क़िस्सों में जो पुनरावृत्ति दिखाई देती है वह इस कारण है कि मनुष्यों के प्रशिक्षण व मार्गदर्शन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। वे कहते हैं कि क़ुरआन इतिहास की पुस्तक नहीं है बल्कि शिष्टाचार की किताब है। शिष्टाचार की किताब में पुनरावृत्ति होनी ही चाहिए। जो लोग, जनता को शिष्टाचार सिखाना चाहते हैं उन्हें अपनी बातें दोहरा दोहरा कर कहनी चाहिए ताकि लोगों में उनका प्रभाव हो सके। एक बार कहने से बात प्रभावी नहीं होगी। क़ुरआने मजीद का एक मूल्यवान बिंदु, उसके क़िस्सों की पुनरावृत्ति है। अलबत्ता यह केवल पुनरावृत्ति नहीं है बल्कि मनुष्य के प्रशिक्षण की शैली ही यही है। जो भी पन्ना खोला जाए उसमें ईश्वर से डरने का निमंत्रण दिखाई देता है। हज़रत मूसा व हज़रत इब्राहीम के क़िस्से जैसे कई क़िस्सों को दोहराया गया है। जो लोग क़ुरआन की संस्कृति से परिचित नहीं हैं वे कहते हैं कि काश क़ुरआन को अध्यायों में बांटा गया होता और हर अध्याय में किसी एक विषय पर बात होती। क़ुरआने मजीद इस लिए आया है कि लोगों का प्रशिक्षण करे। लोगों का प्रशिक्षण केवल एक बार कहने से संभव नहीं है।क़िस्से प्रस्तुत करने की शैलियों में प्रायः इस बात का प्रयास किया जाता है कि पाठक या श्रोता को अप्रत्याशित व औचक घटना से चौंका दिया जाए। क़ुरआने मजीद में भी इस शैली का प्रयास किया गया है। इसका उदाहरण क़ारून की घटना में देखा जा सकता है। इस क़िस्से में क़ारून की अत्याचारी प्रवृत्ति का इस प्रकार चित्रण किया गया है कि वह अपनी धन संपत्ति पर गर्व करता था और लोगों के उपदेशों को स्वीकार नहीं करता था। कुछ लोग क़ारून की धन संपत्ति को आश्चर्य की दृष्टि से देखते थे और कामना करते थे कि काश उनके पास भी उतना धन होता। केवल कुछ लोग ही ऐसे थे जो ईश्वर से पारितोषिक की प्रार्थना करते थे। जब कथा अपने चरम बिंदु पर पहुंचती है तो अचानक ही एक विचित्र घटना घटती है जो सभी के लिए अप्रत्याशित होती है। क़ारून अपनी संपूर्ण धन संपत्ति के साथ धरती में धंस जाता है और कोई भी उसकी कोई सहायता नहीं कर पाता। क़ुरआने मजीद के क़िस्से विशेष कलात्मक शैली के साथ सभ्यताओं और समाजों के पतन व उत्थान के कारकों का वर्णन करते हैं। सत्य को झुठलाना, पैग़म्बरों के निमंत्रण से मुंह मोड़ना, धरती में बिगाड़ फैलाना तथा उद्दंडता, सभ्यताओं के पतन के कारणों में से हैं। सूरए आले इमरान की आयत 137 में कहा गया हैः (हे मुसलमानो!) तुमसे पहले भी बहुत सी जातियां आईं और (उनके बारे में) ईश्वरीय परंपराएं मौजूद थीं, तो धरती में घूमो-फिरो और देखो कि (ईश्वरीय आदेशों को) झुठलाने वालों का अंत कैसा हुआ?मनुष्यों के कल्याण व प्रगति के कारकों पर भी क़ुरआने मजीद में चर्चा की गई है। इनमें से एक कारक अच्छी परंपराओं का पालन है जो सभ्यताओं के सुदृढ़ता तथा मनुष्य के कल्याण का कारण बनता है। जैसे ज्ञान व ईमान से सुसज्जित होना, समाज में न्याय की स्थापना तथा नैतिकता, शिष्टाचार और सच्चाई से परिपूर्ण जीवन। सूरए हूद की 58वीं आयत में हज़रत हूद अलैहिस्सलाम की कथा के अंत में कहा गया हैः और जब हमारा आदेश आ गया तो हमने हूद और उनके साथ ईमान लाने वालों को अपनी दया से मुक्ति प्रदान कर दी और हमने उन्हें एक कड़े दंड से बचा लिया।इस प्रकार क़ुरआने मजीद को पढ़ने वाला विभिन्न क़िस्सों और कथाओं के शिक्षाप्रद दृष्यों को देख कर पवित्रता और प्रतिभा को सराहता है तथा बुराइयों व अवगुणों से मुक़ाबला करने को तैयार रहता है। इस स्थिति में बुराई व अवगुणों से विरक्तता मनुष्य की प्रवृत्ति में परवान चढ़ती है और भलाई, सौंदर्य तथा पवित्रता प्राप्त करने की भावना उसके अस्तित्व में जड़ पकड़ती है। इमाम ख़ुमैनी क़ुरआने मजीद के क़िस्सों व कथाओं की भूमिका के बारे में कहते हैं। क़ुरआन, ईश्वर की पहचान, शिष्टचार तथा मनुष्य के प्रशिक्षण की किताब है किंतु चूंकि सभी लोगों की बौद्धिक क्षमता एक समान नहीं है अतः क़ुरआन की उच्च शिक्षाएं आम लोगों की बुद्धि के स्तर पर कथाओं के रूप में प्रस्तुत की गई हैं ताकि वे अपनी क्षमता व योग्यता के अनुसार, ईश्वर की इस महान अनुकंपा से लाभान्वित हों। http://hindi.irib.ir/