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    अमर ज्योति-28

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    मानवता के लिए पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की पैग़म्बरी के 33 वर्षों का उपहार क़ुरआने मजीद है। यह ऐसी किताब है जिसे उन्होंने नहीं लिखा है बल्कि यह ऐसा कथन है जो ईश्वर की ओर से उनके पास भेजा गया है। इस किताब को जितना भी अधिक पढ़ा जाए उसकी ताज़गी कम नहीं होती। जो कोई वास्तविकता प्राप्त करने के लिए सच्चाई और निष्ठा के साथ इस किताब की ओर उन्मुख होता है, उसे मार्ग मिल जाता है और वह मार्गदर्शन तथा मोक्ष की राह पर आ जाता है। यह एक ऐसी तत्वदर्शी किताब है जो अपनी प्रकाशमयी किरणों से लोगों को ज्ञान व दूरदर्शिता प्रदान करती है। ईश्वर के शब्दों में क़ुरआन एक सुरक्षित किताब है अतः कभी भी शत्रु उसमें फेर-बदल नहीं कर सकते। ईश्वर ने इस पवित्र व महान किताब की सौगंध खाकर इसके चमत्कारिक आयाम की ओर संकेत किया है। सूरए यासीन की पहली और दूसरी आयतों में कहा गया है। यासीन और सौगंध है इस तत्वदर्शी क़ुरआन की। इस चर्चा में हम क़ुरआन मजीद में वर्णित सौगंधों के संबंध में बताएंगे जो इस ईश्वरीय किताब का एक रोचक अध्याय है।प्रख्यात मुस्लिम विद्वान अफ़ीफ़ अब्दुल फ़त्ताह कहते हैं कि क़ुरआन मजीद की रोचकता व उसके चमत्कारिक आयाम में जो बात सैकड़ों गुना अधिक वृद्धि कर देती है वे उसकी सौगंधें हैं। सौगंध खाना एक अंतर्राष्ट्रीय प्रथा है और क़ुरआन ने यद्यपि विभिन्न विषयों के संबंध में तर्क प्रस्तुत किए हैं किंतु उसने इस शैली से भी लाभ उठाया है। क़ुरआन मजीद की सौगंधों के बारे में महत्वपूर्ण बिंदु उनका लक्ष्य व तर्क है। ईश्वर ने अपनी किताब में प्रकृति से संबंधित अनेक वस्तुओं व बातों की सौगंध खाई है और इस शैली को व्यापक रूप से प्रयोग किया है। अब प्रश्न यह है कि इन सौगंधों का लक्ष्य क्या है और इनका प्रभाव क्या है? क़ुरआने मजीद की सौगंधों के लक्ष्यों व प्रभावों के बारे में जो अध्ययन किए गए हैं उनसे पता चलता है कि ये सौगंधें मनुष्य को ज्ञान व ईश्वरीय पहचान प्रदान करती हैं और प्रकृति तथा आस-पास पाई जाने वाली वस्तुओं की ओर उसका ध्यान आकृष्ट करती हैं। इस प्रकार कहा जा सकता है कि क़ुरआन में वर्णित सौगंधें सृष्टि और उसकी वस्तुओं के संबंध में मनुष्य की दृष्टि के क्षितिज को अधिक विस्तृत कर देती हैं। ये सौगंधें मनुष्य को खगोलशास्त्र, भूशास्त्र, प्राणि विज्ञान, वनस्पति शास्त्र यहां तक कि समाजशास्त्र और मनोविज्ञान जैसे मानवीय ज्ञानों की प्राप्ति के लिए प्रेरित करती हैं।हर जाति व राष्ट्र के लोग अपने अपने संस्कारों व संस्कृति के दृष्टिगत उन वस्तुओं की सौगंध खाते हैं जो उनके निकट पावन व पवित्र होती हैं। निश्चित रूप से जब मनुष्य किसी बात को सिद्ध करने के लिए सौगंध खाता है तो उस चीज़ में और जिस वस्तु की सौगंध खाई गई है, संबंध स्थापित करता है और इस प्रकार उस वस्तु का महत्व दर्शाता है जिसकी सौगंध खाई गई है। उदाहरण स्वरूप जब कोई व्यक्ति यह कहता है कि मैं अपने प्राण की सौगंध खाता हूं कि जो कुछ मैंने कहा है वह सत्य है तो वास्तव में वह अपनी बात और अपने प्राण के बीच संबंध स्थापित कर देता है और यह कहना चाहता है कि जिस प्रकार मेरा प्राण सम्मानीय है उसी प्रकार मेरी बात भी मूल्यवान है। इसी प्रकार जो व्यक्ति ईश्वर की सौगंध खा कर किसी कार्य का दायित्व उठाता है वह इस माध्यम से इस बात के लिए कटिबद्ध होता है कि ईश्वर की महानता के कारण वह उस कार्य को अवश्य करेगा। क़ुरआन के प्रख्यात सुन्नी व्याख्याकार तन्तावी कहते हैं कि ईश्वर ने क़ुरआने मजीद में अपनी रचनाओं में चालीस की सौगंध खाई है जिनमें से बीस आकाशों और आध्यात्मिक बातों से संबंधित हैं जबकि अन्य बीस सौगंधें भौतिक बातों से संबंधित हैं। ईश्वर ने इन सौगंधों में अपने बंदों का ध्यान धरती व आकाश तथा जौ कुछ उनके बीच है, उनकी ओर आकृष्ट कराया है तथा उन्हें सृष्टि के संबंध में चिंतन करने के लिए प्रेरित किया है, इस आधार पर कहा जा सकता है कि क़ुरआन की सौगंधें, ज्ञानों की चाबियां हैं।क़ुरआने मजीद में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की जान की भी सौगंध पाई जाती है। जिस स्थान पर ईश्वर ने अपने प्रिय पैग़म्बर की क़सम खाई है और उसके बाद कोई बात बयान की है उसका अर्थ यह है कि जिस प्रकार उसकी दृष्टि में पैग़म्बरे इस्लाम बहुत अधिक प्रिय हैं उसी प्रकार वह विषय भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है। क़ुरआने मजीद की उन सौगंधों में भी जिनमें अंजीर या ज़ैतून जैसी वनस्पतियों या फलों की सौगंध खाई गई है, यह विषय बहुत अधिक महत्व रखता है क्योंकि ईश्वर इन वस्तुओं की सौगंध खा कर उनके महत्व व असंख्य लाभों की ओर मनुष्य का ध्यान आकृष्ट करता है। मजमउल बयान नाम क़ुरआन की व्याख्या के लेखक अल्लामा तबरसी इस संबंध में लिखते हैं कि ईश्वर ने अपनी इन रचनाओं की इस लिए सौगंध खाई है कि इनमें उसके बंदों के लिए बहुत अधिक लाभ हैं और साथ ही यह भी कि इनमें उसकी असीम शक्ति के चिन्ह भी स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।क़ुरआने मजीद के प्रख्यात व्याख्याकार जलालुद्दीन सुयूती ने क़ुरआने मजीद की सौगंधों को तीन भागों में बांटा है। वे कहते हैं कि पहले भाग में ईश्वर ने स्वयं अपनी सौगंध खाई है। जैसे सूरए हिज्र की आयत क्रमांक 92 में कहा गया है कि (हे पैग़म्बरः) आपके पालनहार की सौगंध! कि प्रलय में हम उन सबसे प्रश्न (और हिसाब-किताब) करेंगे। दूसरा भाग उन सौगंधों का है जिनमें ईश्वर ने अपने कर्म की क़सम खाई है। उदाहरण स्वरूप सूरए शम्स की पांचवीं आयत में कहा गया है। सौगंध है आकाश की और उसकी जिसने इसे बनाया। क़ुरआने मजीद में वर्णित तीसरे प्रकार की सौगंधें वे हैं जिनमें ईश्वर ने अपनी रचनाओं की क़सम खाई है जिसका लक्ष्य उन रचनाओं के स्थान की ओर ध्यान दिलाना है। जैसे कि सूरए नज्म की आरंभिक आयत में कहा गया हैः सौगंध है सितारे की जिस समय कि वह अस्त हो।कभी कभी क़ुरआने मजीद की सौगंधें वैचारिक पथभ्रष्टता, अंधविश्वास और अज्ञानता से मुक़ाबले के लिए होती हैं। उदाहरण स्वरूप क़ुरआन में आया है कि एक गुट अनन्य ईश्वर के संबंध में यह विश्वास रखता था कि उसके संतान है और फ़रिश्तों को ईश्वर की बेटियां कहता था। चूंकि ईश्वर पर आरोप लगाना, सत्य के मार्ग से हटने के अर्थ में है अतः ईश्वर सौगंध खा कर आरोप लगाने वालों को सचेत करता है कि इस आरोप के दंड स्वरूप उन्हें प्रलय में कड़ी सज़ा भुगतनी पड़ेगी। क़ुरआने मजीद में मनुष्य की भी सौगंध खाई गई है। सृष्टि में मनुष्य एक श्रेष्ठ जीव है जिसे प्रतिष्ठा का सुंदर वस्त्र पहनाया गया है और जो ईश्वर की दृष्टि में प्रिय व सम्मानीय है। इसी कारण क़ुरआन में मनुष्य की जान की सौगंध खाई गई है। सूरए शम्स की सातवीं आयत में कहा गया है। सौगंध है मनुष्य की जान की और उसकी जिसने (उसकी रचना की और) उसे व्यवस्थित किया। कहा जा सकता है कि क़ुरआन, सृष्टि की रचनाओं की सौगंध खा कर मनुष्य की आंखों के समक्ष ब्रह्मांड का एक स्पष्ट एवं सजीव चित्र प्रस्तुत करता है।क़ुरआने मजीद की कुछ सौगंधें संशय रखने वालों के प्रश्नों के उत्तर से संबंधित हैं। उदाहरण स्वरूप जो लो प्रलय के बारे में पैग़म्बर से प्रश्न करते थे और प्रलय के संबंध में शंका जताते थे, ईश्वर ने उनके उत्तर में प्रलय की सौगंध खाई है और उन्हें सचेत किया है कि निश्चित रूप से प्रलय हिसाब-किताब का दिन है और वह अवश्य आएगा। मिस्र के विद्वान मन्नाअ क़त्तान अपनी एक पुस्तक में सौगंध के बारे में लिखते हैं। सत्य को स्वीकार करने के संबंध में लोगों की योग्यता भिन्न भिन्न प्रकार की होती है। पवित्र लोग, जिन्होंने अपनी अंतरात्मा को बुराइयों से दूषित नहीं किया है, मामूली से इशारे से सत्य को समझ जाते हैं और उनका हृदय मार्गदर्शन के प्रकाश से उज्जवल हो जाता है किंतु जिस हृदय पर अज्ञान व आंतरिक इच्छाओं की धूल जम चुकी होती है और असत्य का अंधकार उस पर छा चुका होता है वे सरलता से सत्य को स्वीकार नहीं करते बल्कि उन्हें कड़ी चेतावनी की आवश्यकता होती है कि वे अपने हठ को छोड़ दें। सौगंध बल देने की शैलियों में से एक है जिसके साथ ठोस प्रमाण होता है और कभी कभी सत्य का इन्कार करने वाला व्यक्ति सौगंध के कारण सत्य को समझ और मान लेता है।दिन और रात का समय भी उन बातों में से एक है जिनकी क़ुरआने मजीद में सौगंध खाई गई है। अनन्य ईश्वर ने क़ुरआन में भोर समय, सूर्योदय, सूर्यास्त, रात, दिन और समय की सौगंध खाई है ताकि उन्हें अशुभ समझने वाले लोग, उनके बारे में चिंतन करके अपनी अंधविश्वासपूर्ण आस्थाओं को छोड़ दें और समय को ईश्वर की महानता का चिन्ह और सृष्टि की व्यवस्था का प्रतीक मानें। क़ुरआने मजीद के कुछ व्याख्याकारों के विचार में क़ुरआने मजीद में समय व युग की सौगंधों का लक्ष्य यह है कि मनुष्य समय की अनुकंपा के मूल्य को समझे और उसे यूं ही अपने हाथ से न जाने दे।निश्चित रूप से क़ुरआने मजीद की आयतों और उसकी सौगंधों के बारे में अधिक अध्ययन व चिंतन से संबोधकों के समक्ष नए क्षितिज खुलते हैं। पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पौत्र हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम कहते हैं कि ईश्वर अपनी रचनाओं की सौगंध खाता है ताकि मनुष्य को उस बात की ओर से सचेत करे जिससे उसे शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए क्योंकि सौगंध उस वस्तु की महानता का चिन्ह है जिसकी क़सम खाई गई है। http://hindi.irib.ir