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    अमर ज्योति-29

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    इससे पहले की चर्चा में हमने जाना कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का अमर चमत्कार, क़ुरआने मजीद विभिन्न शैलियों से मोक्ष व कल्याण की ओर मनुष्य का मार्गदर्शन करता है। क़िस्सों, उदाहरणों, सौगंधों और तर्कों से लाभ उठाना इन शैलियों में शामिल हैं। मनुष्यों में विचार व बुद्धि की शक्ति को सक्रिय करना भी एक ऐसी शैली है जिसे क़ुरआन ने मनुष्य के मार्गदर्शन के लिए प्रयोग किया है। क़ुरआने मजीद के संबंध में अध्ययन करने वालों का कहना है कि अज्ञान व बुद्धिहीनता से क़ुरआन का संघर्ष और ज्ञान पर इस ईश्वरीय किताब का विशेष ध्यान, उसके चमत्कारिक आयामों में शामिल है।

     

    ज्ञान को सभ्यताओं के अस्तित्व में आने और उनके जारी रहने के मूल आधारों में से एक समझा जाता है। ज्ञान की सहायता से मनुष्य ने प्रकृति को अपने वश में किया और वह प्रयास कर रहा है कि इस माध्यम से अपनी शांति, समृद्धता और अपनी प्रगति को सुनिश्चित बनाना चाहता है। मनुष्य के भौतिक जीवन में ज्ञान के जो महत्वपूर्ण प्रभाव हैं उनके अतिरिक्त उसके नैतिक एवं आध्यात्मिक जीवन के विभिन्न पहलुओं और अंततः उसके परलोक के जीवन में भी ज्ञान अत्यंत प्रभावी है क्योंकि यदि मनुष्य अपने ज्ञान द्वारा अपनी आवश्यकताओं की पूरा करने में सक्षम नहीं होगा और आर्थिक एवं वैचारिक दरिद्रता उसका पतन कर दे तो फिर इस बात की आशा नहीं रखी जा सकती कि वह उत्थान और परिपूर्णता के मार्ग पर चल सकेगा।

    जो कोई भी क़ुरआने मजीद का अध्ययन करे तो वह ईश्वर द्वारा ज्ञान को दिए जाने वाले महत्व को समझ जाएगा। क़ुरआने मजीद का यह प्रश्न कि क्या जानने वाले और न जानने वाले समान हैं? भली भांति ईश्वर द्वारा ज्ञान को दिए जाने वाले महत्व को दर्शाता है। ईश्वर जब कभी अपने किसी पैग़म्बर या प्रिय बंदे के उच्च स्थान को दर्शाना चाहता है तो कहता है कि हमने उसे ज्ञान व तत्वदर्शिता प्रदान की। क़ुरआने मजीद अपनी अनेक आयतों में मनुष्य को सृष्टि व उसकी आश्चर्यचकित करने वाली बातों पर विचार और चिंतन का निमंत्रण देता है। इन आयतों में क्या तुमने नहीं देखा, तो क्या तुम नहीं देखते और तो देखो जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है जो स्वयं ही एक प्रकार से ईश्वर की पहचान प्राप्त करने और ज्ञान की ओर उन्मुख होने का निमंत्रण है। क़ुरआन की संस्कृति में ज्ञानार्जन और शिक्षा की प्राप्ति पर इस सीमा तक बल दिया गया है कि उसमें शिक्षक व शिक्षार्थी और समय व स्थान की दृष्टि से कोई सीमितता नहीं है। यह किसी भी धर्म द्वारा मनुष्य को की जाने वाली सर्वोच्च सिफ़ारिश हो सकती है। क़ुरआने मजीद ज्ञान को प्रकाश और अज्ञान को अंधकार बताता है और कहता है कि निश्चित रूप से प्रकाश को अंधकार पर श्रेष्ठता प्राप्त है। क़ुरआन ने अध्यन और चिंतन के विषय के रूप में कुछ बातों का प्रस्ताव दिया है जिनका परिणाम प्राकृतिक ज्ञानों, गणित, जीवशास्त्र व इतिहास इत्यादि की शाखाएं हैं। ये ज्ञान आज के संसार में अपनी परिपूर्णता के चरणों को पहुंच रहे हैं। सूरए बक़रह की आयत क्रमांक 164 में कहा गया है। निसन्देह, आकाशों और धरती की सृष्टि में तथा दिन और रात के आने जाने में, और लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए समुद्र में चलने वाली कश्तियों में और आकाश से ईश्वर द्वारा उतारे गए पानी में, जिसके द्वारा उसने धरती को उसकी मृत्यु के पश्चात जीवित किया और उसमें विभिन्न प्रकार के जीव फैले हैं और इसी प्रकार हवाओं के चलने में तथा धरती व आकाश के बीच रहने वाले बादलों में, सोच-विचार और चिंतन करने वालों के लिए निशानियां हैं।

    दूसरी ओर पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने भी ज्ञान अर्जित करने वालों की बहुत अधिक सराहना की है। उन्होंने सुदूर क्षेत्रों तक से ज्ञान की प्राप्ति को आवश्यक बताया है और कहा है कि ज्ञान प्राप्त करो चाहे उसके लिए तुम्हें चीन तक जाना पड़े। एक स्थान पर वे कहते हैं कि ज्ञान, ईश्वर पर ईमान रखने वाले व्यक्ति की खोई हुई वस्तु है, जहां भी मिले वह उसके लिए अधिक योग्य है। पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों ने भी क़ुरआने मजीद की शिक्षाओं के अंतर्गत लोगों को ऐसे विभिन्न ज्ञानों की प्राप्ति के लिए प्रेरित किया है जिनकी मनुष्य को आवश्यकता होती है। पैग़म्बरे इस्लाम के पौत्र इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम कहते हैं कि मुझे यह बात अच्छी नहीं लगती कि तुम्हारे युवाओं की इन दो अवस्थाओं में से किसी एक में न देखों, या तो वे ज्ञानी हों या ज्ञान अर्जित कर रहे हों।

    क़ुरआने मजीद द्वारा ऐसी स्थिति में ज्ञान पर ध्यान दिया गया है जब ईश्वर की ओर से क़ुरआन की आयतों के भेजे जाने के समय, मनुष्य के ज्ञान का स्तर बहुत कम था। उस काल में अरब का अज्ञानी समाज विभिन्न प्रकार के अंधविश्वासों और निराधार संस्कारों में ग्रस्त था। उस समय लोग खगोलशास्त्र, भौतिकशास्त्र और जीवशास्त्र के बारे में बहुत कम ज्ञान रखते थे। चूंकि सृष्टि के बारे में अध्ययन हेतु पर्याप्त साधन नहीं थे इस लिए उस काल के लोग, अपने पूर्वजों से मिलने वाली कथाओं को ही वास्तविकता समझ बैठे थे। उदाहरण स्वरूप वे सोचते थे कि पर्वतों ने आकाश को ऊपर रोक रखा है अर्थात उनका मानना था कि धरती सपाट है और पहाड़ों की चोटियों ने आकाश को धरती पर गिरने से रोक रखा है। धरती, आकाश और सृष्टि की अन्य वस्तुओं के बारे में उनकी इस प्रकार के निराधार आस्थाओं को क़ुरआने मजीद की विभिन्न आयतों में ग़लत बताया गया है। जैसे कि सूरए रअद की दूसरी आयत में कहा गया है। ईश्वर वही है जिसने आकाशों को उन स्तंभों के बिना (ऊपर) उठाया है जिन्हें तुम देख सको। क़ुरआने मजीद के व्याख्याकारों के अनुसार यह आयत ब्रह्मांड के सितारों और उपग्रहों के बीच पाई जाने वाली गुरुत्वाकर्षण शक्ति के बारे में संकेत करती है जो मनुष्य के लिए अदृष्य है। याद होगा कि इस ईश्वरीय किताब ने सृष्टि के संबंध में कुछ मूल वास्तविकताओं का वर्णन किया जिनके बारे में हम बुद्धिजीवियों द्वारा क़ुरआने मजीद के चमत्कारिक आयामों के वर्णन के कार्यक्रमों में चर्चा कर चुके हैं।

    क़ुरआने मजीद की उच्च वास्तविकताओं व तथ्यों की छाया में ही मनुष्य अपनी गर्दन में पड़ी अज्ञान व अंधविश्वास की ज़ंजीरों को तोड़ पाया और ज्ञान के विकास के संबंध में बड़े बड़े क़दम उठा सका, इस प्रकार से कि अल्पावधि में ही उसने ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में आश्चर्यजनक प्रगति की। तीसरी शताब्दी हिजरी क़मरी से लेकर पांचवीं शताब्दी के अंत तक ज्ञान, विज्ञान, उद्योग, साहित्य और इसी प्रकार ज्ञान की विभिन्न शाखाओं में अभूतपूर्व प्रगति हुई और अधिकांश अध्ययनकर्ताओं का मानना है कि यह क़ुरआने मजीद द्वारा ज्ञान प्राप्ति हेतु किए जाने वाले प्रोत्साहन और इस्लामी समाजों से अंधविश्वासी आस्थाओं के समाप्त होने का परिणाम था। ब्रिटिश दार्शनिक बर्ट्रेंड रसेल लिखते हैं कि यदि मध्ययुगीन शताब्दियों में, मुसलमानों का ज्ञान प्रेम न होता तो निश्चित रूप से ज्ञान का पतन हो चुका होता। फ़्रांस के प्रख्यात विद्वान पियर रूसो भी ज्ञान का इतिहास नामक अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि पैग़म्बरे इस्लाम के स्वर्गवास को तीन शताब्दियां भी नहीं बीती थीं कि वर्तमान स्पेन के कार्डोबा नगर में जहां मुसलमानों का राज था और जिसकी जनसंख्या दस लाख थी अस्सी बड़े विद्यालय थे जिन्हें आज की भाषा में कालेज कहा जा सकता है और इसी प्रकार इस नगर में एक बहुत बड़ा पुस्तकालय था जिसमें अरबी और विश्व की अन्य महत्वपूर्ण भाषाओं की छः लाख से अधिक पुस्तकें मौजूद थीं। प्रख्यात जर्मन लेखिका सिग्रिड होनके अपनी पुस्तक में, जिसका अनुवाद है, अल्लाह का सूर्य पश्चिम के ऊपर, लिखती हैं कि मिस्र के एक शासक के पुस्तकालय में सोलह लाख पुस्तकें मौजूद थीं जिनमें से छः हज़ार केवल गणित के बारे में और अट्ठारह हज़ार दर्शनशास्त्र के बारे में थीं।

    अमरीका के प्रख्यात इतिहासकार जार्ज सार्टन कहते हैं कि शायद मध्ययुगीन शताब्दियों की सबसे महत्वपूर्ण और साथ ही दिखाई न देने वाली वैज्ञानिक सेवा, प्रायोगिक विचार को अस्तित्व प्रदान करना था जो प्रायोगिक विज्ञान की प्रगति की भूमिका बना। बारहवीं शताब्दी  ईसवी के अंत तक इस विचार की प्रगति, मुसलमानों के प्रयासों और क़ुरआन की शिक्षाओं की ऋणी रही है। निश्चित रूप से क़ुरआने मजीद ऐसे ज्ञान पर बल देता है जो विश्ववासियों के लिए लाभदायक और सार्थक हो। लाभदायक ज्ञान की छाया में ही मनुष्य की प्रगति व कल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है और साथ ही न्याय व शांति की स्थापना के लिए आवश्यक भूमि तैयार होती है। जो ज्ञान मनुष्य की सत्ता लोलुपता और तानाशाही की सेवा में हो, निश्चित रूप से उसका परिणाम पतन और तबाही के अतिरिक्त कुछ अन्य नहीं होता और वह समाज पर अत्यंत विध्वंसक प्रभाव डालता है।

    क़ुरआने मजीद द्वारा ज्ञान व शिक्षा पर बहुत अधिक बल दिए जाने के साथ ही इस ईश्वरीय किताब ने पूर्वजों और उनकी ग़लत आस्थाओं के अकारण व तर्कहीन अनुसरण से भी रोका है। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनमें पूर्वजों के तर्कहीन अनुसरण के कारण जातियां तबाही और पतन का शिकार हो गईं। इसी आधार पर क़ुरआने मजीद ने विभिन्न आयतों में बिना ज्ञान के पूर्वजों की बातों के अनुसरण की निंदा की है। सूरए बक़रह की आयत क्रमांक 134 में कहा गया है। वे ऐसे समुदाय थे जिनका अंत हो चुका है, जो कुछ उन्होंने किया वह उनेके लिए है और जो कुछ तुमने प्राप्त किया है वह तुम्हारे लिए है। जानना और पूछना भी उन बातों में से है जिनके लिए क़ुरआन ने मनुष्यों को प्रोत्साहित किया है और उससे कहा है कि जो कुछ वह नहीं जानता उसके बारे में पूछे। सूरए नहल की तैंतालीसवीं आयत में कहा गया है। यदि तुम नहीं जानते तो जानकारों से पूछो।

    क़ुरआने मजीद, मनुष्य को अज्ञानतापूर्ण कार्यों और विचारों से रोकने के साथ ही चिंतन के महत्व पर बल देता है। ईरान के प्रख्यात विद्वान अल्लामा मुहम्मद तक़ी जाफ़री के अनुसार क़ुरआन में लगभग 730 आयतों में ज्ञान और उसके परिणामों की बात कही गई है जिसका लक्ष्य पवित्र जीवन की व्याख्या करना और एक स्वस्थ जीवन तक पहुंचना है। प्रिय श्रोताओ अगले कार्यक्रम में हम क़ुरआने मजीद में चिंतन पर बल दिए जाने के विषय में चर्चा करेंगे, सुनना न भूलिएगा।