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    अमर ज्योति-30

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    क़ुरआने मजीद ईश्वर की वह महान पुस्तक है कि यदि सच्चे व पवित्र मन से उसकी आयतों में चिंतन किया जाए तो आंखों के सामने से पर्दे हट जाते हैं और वास्तविकताएं हमारे समक्ष प्रकट हो जाती हैं किंतु शर्त यह है कि इस किताब के बारे में हमारा दृष्टिकोण ज्ञान प्राप्ति का हो। पिछली चर्चा में हमने जाना कि क़ुरआने मजीद ने ज्ञान को प्रकाश बताया है और उसके चमत्कारिक आयामों में से एक यह है कि उसने अज्ञान व अंधकार में डूबे विश्व का मार्गदर्शन ज्ञान व सभ्यता की ओर किया है। स्पष्ट है कि ज्ञान, बुद्धि व चिंतन के साथ मानव समाज के लिए लाभदायक व कल्याणकारी है। इस चर्चा में हम क़ुरआने मजीद में चिंतन के विषय पर बात करेंगे।

     

    मनुष्य बुद्धि रखने वाला जीव है और इसी ईश्वरीय कृपा के कारण वह अच्छी और बुरी बात में अंतर करने की क्षमता रखता है। वस्तुतः बुद्धि ही मनुष्य में हर प्रकार के ज्ञान और वस्तुओं की पहचान का स्रोत है। यदि मनुष्य को बुद्धि की अनुकंपा प्राप्त न होती तो तथ्य उसके लिए अज्ञात रहते और सृष्टि की आश्चर्यजनक बातों से वह अवगत न हो पाता और अच्छे व बुरे में अंतर करना उसके लिए असंभव होता। बुद्धि के महत्व व लाभ के बारे में इतना कहना ही पर्याप्त होगा कि वह ज्ञान व शिक्षा का आधार है और मनुष्य की संस्कृति व सभ्यता, उसकी बुद्धि की ऋणी है। ईश्वर ने भी क़ुरआने मजीद में मनुष्य को बुद्धि से काम लेने और चिंतन करने का निमंत्रण दिया है। सूरए अम्बिया की आयत संख्या 10 में कहा गया है। निश्चित रूप से हमने तुम्हारे लिए एक किताब उतारी है जिसमें तुम्हारी चेतना (का साधन) है, तो क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लेते और चिंतन नहीं करते?

    वास्तविकताओं की व्याख्या, क़ुरआने मजीद की विशेषताओं में से एक है। यह किताब, स्पष्ट और ठोस शब्दों में वास्तविकताओं का उल्लेख करती है और इस माध्यम से मनुष्य के भीतर बुद्धि की शक्ति को जागृत करती है। सूरए ज़ुख़रुफ़ की तीसरी आयत में ईश्वर कहता है कि हमने इस किताब को अरबी क़ुरआन बनाया है कि शायद तुम चिंतन कर सको। जिस बिंदु ने विद्वानों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया है वह यह है कि ईश्वर क़ुरआने मजीद में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को सिफ़ारिश करता है कि वे लोगों को ईश्वर की ओर आमंत्रित करने के लिए तर्कसंगत एवं तत्वदर्शी बातों का सहारा लें। सूरए नहल की 125वीं आयत में ईश्वर, पैग़म्बर को संबोधित करते हुए कहता है। तत्वदर्शी बातों तथा अच्छे उपदेश द्वारा अपने पालनहार के मार्ग की ओर बुलाइये और (विरोधियों के साथ) उस पद्धति से शास्त्रार्थ कीजिए जो सबसे अच्छी है। बुद्धि व तर्क का अनुसरण एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है, इस प्रकार से कि ईश्वर ने बुद्धि को वास्तविकता की पहचान के महत्वपूर्ण तत्वों में से एक बताते हुए सूरए क़सस की साठवीं आयत में कहा है कि जो कुछ तुम्हें प्रदान किया गया है वह तो सांसारिक जीवन की सामग्री और उसकी शोभा है और जो कुछ ईश्वर के पास है वह उत्तम और शेष रहनेवाला है, तो क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लेते? क़ुरआने मजीद की आयतों के अनुसार मनुष्य का वास्वतविक मूल्य उतना ही है जितना वह अपनी बुद्धि से लाभ उठाता है। सूरए अनफ़ाल की 22वीं आयत में कहा गया है। ईश्वर के निकट धरती पर चलने वाले सबसे बुरे (जीव) वे बहरे और गूंगे हैं जो चिंतन नहीं करते।

    क़ुरआने मजीद ने सदैव ही मनुष्य को ज्ञानार्जन, शिक्षा प्राप्ति और बुद्धि से काम लेने का निमंत्रण दिया है। अनेक बुद्धिजीवी अपनी दूरदृष्टि और ज्ञानी निगाहों के चलते, सृष्टि के संचालन में एक ज्ञानी, युक्तिकर्ता व असाधारण शक्ति के स्वामी अस्तित्व को स्वीकार करते हैं और सृष्टि के रचयिता के समक्ष नतमस्तक हो जाते हैं। जैसा कि हम सूरए फ़ातिर की 28वीं आयत में पढ़ते हैं। निश्चित रूप से ईश्वर के बंदों में केवल ज्ञानी ही उससे डरते हैं। ईश्वर मनुष्य से चाहता है कि वह ईश्वर की आयतों और निशानियों के बारे में चिंतन करे और बौद्धिक सिद्धांतों के आधार पर उस पर ईमान लाए और वास्तविकताओं को स्वीकार करे। इसी कारण वह मनुष्य को विभिन्न बातों के संबंध में सोच-विचार और चिंतन का निमंत्रण देता है। ईश्वर ने विभिन्न आयतों में सृष्टि की वस्तुओं, परलोक के जीवन और इतिहास की घटनाओं की ओर संकेत करते हुए याद दिलाया है कि हमने इन विषयों का इस लिए वर्णन किया है कि तुम इनके बारे में चिंतन करो।

    जिस प्रकार से क़ुरआने मजीद लोगों को बुद्धि से काम लेने और चिंतन का निमंत्रण देता है उसी प्रकार, बुद्धि की पूंजि से लाभ न उठाने वालों की आलोचना भी करता है और सदैव इस बात की ओर संकेत करता है कि मनुष्य और पशु के बीच सीमा, बुद्धि से लाभ उठाना और चिंतन करना है। क़ुरआनी आयतों के अनुसार जो लोग चिंतन नहीं करते उन्हें मनुष्य का नाम शोभा नहीं देता क्योंकि बुद्धि से काम लेने और चिंतन करने के कारण ही वह ईश्वर के उत्तराधिकार का योग्य बना है। नरक और स्वर्ग के लोगों के बीच होने वाली वार्ता में इस बात का उल्लेख होता है कि नरक वालों का यह बुरा अंजाम इस कारण हुआ कि वे सोच-विचार नहीं करते थे। सूरए मुल्क की 10वीं आयत में कहा गया है कि (नरक वाले) कहेंगे कि यदि हम सुनते या बुद्धि से काम लेते तो हम दहकती आग में पड़नेवालों में से न होते।

    क़ुरआने मजीद, मनुष्य को हर उस बात से दूर रहने की सिफ़ारिश करता है जो उसे चिंतन करने और बुद्धि से काम लेने से रोकती है तथा उसे ग़लतियों में ग्रस्त कर देती है। अतः वह मनुष्य से कहता है कि वह इस प्रकार की बातों को स्वयं से दूर करे ताकि सही ढंग से सोच विचार करने की क्षमता से वंचित न हो जाए। क़ुरआन की दृष्टि में सोच व बुद्धि की पथभ्रष्टता का एक कारण, ग़लत विचारों का अनुसरण और काल्पनिक एवं अवास्तविक बातों के आधार पर किसी के विरुद्ध कोई कार्य करना है क्योंकि जब मनुष्य केवल कल्पना और सोच तक ही सीमित रहे और समझने का प्रयास न करे तो वह वास्तविकता तक नहीं पहुंच सकता। जो बातें मनुष्य के पतन का कारण बनती हैं उनमें से एक अन्य लोगों का बिना सोचे समझे और अंधा अनुसरण है। वैचारिक पथभ्रष्टता और बुराइयों से क़ुरआन का संघर्ष वस्तुतः इस किताब द्वारा बुद्धि के समर्थन के अर्थ में है। इसी कारण बिना चिंतन व सोच-विचार के ईश्वर पर ईमान और उसकी सही पहचान, क़ुरआने मजीद की दृष्टि में अस्वीकार्य है।

    क़ुरआन, प्रकाश, शेफ़ा और दया है। यह, मनुष्य को मनुष्य बनाने वाली तथा उसे ईश्वर के मार्ग पर चलने में सहायता देने वाली किताब है। इसी लिए इसकी ऐसी आयतों की संख्या बहुत अधिक है जिनमें मनुष्य को बुद्धि व तत्वदर्शिता की ओर बुलाया गया है। क़ुरआन की पंद्रह आयतों में मनुष्य के, बुद्धिमानों की पंक्ति में आने की आवश्यकता पर बल दिया गया है। कुल मिला कर कहा जा सकता है कि किसी भी मत या विचारधारा ने क़ुरआने मजीद की भांति स्पष्ट रूप से चिंतन और बुद्धि से काम लेने की आवश्यकता पर बल नहीं दिया है। वर्तमान युग के प्रख्यात मुस्लिम दार्शनिक अल्लामा तक़ी जाफ़री लिखते हैं कि क़ुरआने मजीद की उन आयतों की संख्या जिनमें मनुष्य को चिंतन, सोच-विचार और बुद्धि से काम लेने का निमंत्रण दिया गया है, अपने विषय के अनुसार इस प्रकार हैं। चालीस आयतों में बुद्धि को सुदृढ़ बनाने और उसका अनुसरण करने की बात कही गई है। पंद्रह आयतों में गहराई से चिंतन करने का निमंत्रण दिया गया है। सत्रह आयतों में सोच-विचार करने पर बल दिया गया है। इक्कीस आयतों में ज्ञान व विवेक की प्राप्ति के लिए आमंत्रित किया गया है। सौ आयतों में ज्ञान के अनुसरण और अज्ञान से दूर रहने की बात कही गई है जब बीस आयतों में सृष्टि की आश्चर्यजनक बातों को समझने हेतु उस पर गहरी दृष्टि डालने की मांग की गई है। क़ुरआने मजीद द्वारा मनुष्य को चिंतन करने और बुद्धि से काम लेने का जो निमंत्रण दिया गया है उससे यह बात भली भांति समझी जा सकती है कि वह बुद्धि को कितना महत्व देता है। http://hindi.irib.ir