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    अमर ज्योति-31

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    ईश्वर की ओर से क़ुरआने मजीद को भेजे जाने के 14 सौ वर्षों के बाद की अवधि में इस ईश्वरीय किताब की हज़ारों तफ़सीरें अर्थात व्याख्याएं लिखी जा चुकी हैं जिनमें से अधिकांश विश्व के विभिन्न पुस्तकालयों में सुरक्षित हैं। क़ुरआने मजीद का इतिहास अत्यंत स्पष्ट है। इसकी आयतें शत प्रतिशत वही हैं जो ईश्वर की ओर से भेजी गई हैं और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के काल में उनके सच्चे साथियों द्वारा लिखी गई हैं। क़ुरआन, इस्लाम की सच्चाई का सबसे बड़ा व जीवित साक्ष्य समझा जाता है और एकश्वरवाद, जीवन के सही मार्ग, व्यक्तिगत एवं सामाजिक संस्कारों तथा पैग़म्बरों की कथाओं और पिछली जातियों की घटनाओं की पहचान के संबंध में अत्यंत विश्वसनीय जानकारी मनुष्य को प्रदान करता है। आज, अन्य सभ्यताओं से संबंध रखने वाले विद्वान भी इस ईश्वरीय किताब की महानता को स्वीकार करने लगे हैं।

    क़ुरआने मजीद ने अपनी अनेक आयतों में ज्ञान प्राप्ति व बुद्धि से काम लेने की सिफ़ारिश की है। इसी के साथ वह केवल ज्ञान व बुद्धि को ही मनुष्य के सौभाग्य व कल्याण का साधन नहीं मानता। यह किताब ज्ञान, बुद्धि, ईमान और नैतिकता को एक साथ रख कर सर्वोत्तम राह की ओर मानवता का मार्गदर्शन करती है। क़ुरआने मजीद मनुष्य को बुराइयों से रोक कर तथा नैतिक गुणों से सुसज्जित होने की सिफ़ारिश करके उसकी नैतिक व मानवीय परिपूर्णता की नींव रखता है। श्रोताओ आजके कार्यक्रम में हम क़ुरआने मजीद में ईमान और नैतिकता व शिष्टाचार के विषय पर चर्चा करेंगे, आशा है आपको हमारा यह प्रयास भी पसंद आएगा।

     

    क़ुरआने मजीद ने इस दृष्टि से कि वह मनुष्य के मार्गदर्शन के लिए ईश्वर का अंतिम संदेश है, मनुष्य और उसके शिष्टचार एवं नैतिक गुणों के बारे में संपूर्ण बातें प्रस्तुत की हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि नैतिकता के पालन के लाभों में से एक यह है कि यह मानव जीवन को सुव्यवस्थित करता है किंतु क़ुरआन इस बात को इससे कहीं आगे बढ़ कर देखता है। क़ुरआने मजीद की दृष्टि में नैतिकता के सिद्धांत, उन मसालों की भांति है जो मानव के अनंत भविष्य की इमारत के आधारों में डाले जाते हैं। यह ईश्वरीय किताब मनुष्य का वास्तविक लक्ष्य, सौभाग्य व कल्याण बताती है। कल्याण, अनंत आनंदों तक पहुंचने के अर्थ में है और उसी व्यक्ति को सौभाग्यशाली कहा जा सकता है जो सदैव और निरंतर इन आनंदों से लाभ उठाता हो। क़ुरआन की दृष्टि में मनुष्य के अस्तित्व में विभिन्न भौतिक एवं आध्यात्मिक रुझान एकत्रित हैं। जो बात मनुष्य के भौतिक एवं व्यक्तिगत जीवन से संबंधित होती है, प्रायः वह उससे अवगत होता है। जैसे खाने-पीने और शरीर से संबंधित अन्य आवश्यकताएं किंतु परिपूर्णता से संबंधित रुझान छिपे होते हैं और उन्हें जागृत करना होता है ताकि वे परिपूर्णता की ओर मनुष्य की यात्रा का साधन बन सकें। जब परिपूर्णता के रुझान जागृत हो कर सक्रिय हो जाते हैं तो मनुष्य की आत्मा परिपूर्णता की ओर बढ़ने लगती है और आध्यात्मिक उत्थान और शांति की खोज में लग जाती है ताकि मोक्ष व कल्याण के तट तक पहुंच जाए। क़ुरआने मजीद इस अवस्था को नफ़्से मुतमइन्ना या संतुष्ट आत्मा कहता हे। जब मनुष्य अपने आरंभ और अंत के बारे में ध्यान से सोचे और आंतरिक इच्छाओं की ज़ंजीरों से मुक्त हो जाए तो फिर वह नैतिक परिपूर्णता के क्षेत्र में एक नया क़दम उठाता है।

    नैतिकता या शिष्टाचार, मान्यताओं व सदकर्मों के एक समूह का नाम है। क़ुरआन की दृष्टि में नैतिक गुणों से सुसज्जित होने के लिए ईमान के रास्ते पर चल कर मोमिनों की पंक्ति में आना पड़ता है। इस ईश्वरीय किताब के अनुसार ईमान, मनुष्य को सृष्टि के बारे में एक नई सोच प्रदान करता है और उसके विचारों के क्षितिज को विस्तृत कर देता है। जिन लोगों की अंतरात्मा, नूर के प्रकाश से उज्जवल हो जाती है वे सृष्टि की हर वस्तु को भलाई के आधार पर देखते हैं और सृष्टि की व्यवस्था को उत्तम व्यवस्था मानते हैं। जो मनुष्य, ईमान से सुसज्जित होता है वह अपनी भावनाओं को नियंत्रित कर सकता है। ईमान पर आधारित व्यवहार सदैव मनुष्य को प्रफुल्लित रखता है और उसके जीवन को अर्थ प्रदान करता है। ईश्वर पर ईमान की एक विशेषता, लोगों की परिस्थितियों एवं भावनाओं में आने वाला परिवर्तन है, इस प्रकार से कि वह उन्हें कठिन परिस्थितियों में भी प्रतिरोध करने की क्षमता प्रदान करता है और कभी कभी दुखों व समस्याओं को उनके लिए सुख व आनंदों में परिवर्तित कर देता है। ईश्वर, क़ुरआने मजीद के सूरए बक़रह की आयत क्रमांक 186 में ईमान का लक्ष्य, मनुष्य की प्रगति व उसकी क्षमताओं का निखार बताते हुए कहता है कि तो उन्हें चाहिए कि वे मेरा निमंत्रण स्वीकार करें और मुझ पर ईमान लाएं ताकि वे सीधा मार्ग पा लें (और गंतव्य तक पहुंच जाएं।)

    ईमान के व्यापक प्रभावों के दृष्टिगत क़ुरआने मजीद, धार्मिक आस्थाओं एवं विश्वासों को मनुष्य के लिए एक ज़बरदस्त व्यापार बताते हुए कहता है कि यदि उसने ईमान को हाथ से चले जाने दिया तो मानो उसने अत्यंत महत्वपूर्ण पूंजी खो दी और अपने बर्बादी का साधन तैयार कर लिया। सूरए सफ़्फ़ की दसवीं और ग्यारहवीं आयतों में कहा गया है। हे ईमान लाने वालो! क्या मैं तुम्हें एक ऐसा व्यापार बताऊँ जो तुम्हें पीड़ादायक दंड से बचा ले? ईश्वर और उसके पैग़म्बर पर ईमान लाओ।

    मनुष्य के मन व आत्मा का स्वास्थ्य भी बड़ी सीमा तक उसके ईमान पर निर्भर होता है। आंकड़ों से पता चलता है कि अनेक रोग, केवल ऐसे ही लोगों को होते हैं जो ईश्वर पर ईमान और सृष्टि के रचयिता पर विश्वास से वंचित होते हैं। इनमें से कुछ मानसिक रोगों का कारण सामाजिक वंचितता या जीवन में पाई जाने वाली कमियां हैं। ईश्वर पर ईमान, वैक्सिनेशन की भांति है। ईमान के अस्तित्व के चलते, कमियां और वंचितताएं मनुष्य को हतोत्साहित नहीं कर पातीं। मनोवैज्ञानिक और नए समाजशास्त्री अपनी चर्चाओं में इस बात पर बल देते हैं कि व्यक्ति व समाज के बीच आध्यात्मिक संबंध स्थापित होना चाहिए ताकि लोगों की समस्याओं के समाधान के साथ ही मानव समाज की सार्वजनिक स्थिति भी बेहतर हो जाए। प्रख्यात अमरीकी समाजशास्त्री विलियम जेम्ज़ कहते हैं कि चिंताओं के लिए सबसे प्रभावी दवा, ईमान और धार्मिक आस्थाएं हैं। ईमान, उन शक्तियों में से है जिनकी सहायता से मनुष्य जीवन बिताता है और उससे पूर्ण रूप से वंचित होना, मनुष्य के निश्चित पतन के अर्थ में है। प्रख्यात मनोवैज्ञानिक डाक्टर कार्ल यंग भी अपने रोगियों की मुख्य समस्या, जीवन की व्याख्या के लिए एक धार्मिक आस्था के अभाव को बताते हुए लिखते हैं कि मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि वे लोग इस कारण बीमार हुए थे कि जो कुछ जीवित धर्मों ने अपने अनुयाइयों को प्रदान किया है, उसे वे खो चुके थे और जो लोग अपनी धार्मिक आस्थाओं को पुनः प्राप्त न कर सके उनमें से किसी का भी उपचार नहीं हो सका।

     

    कहा जा सकता है कि ईमान, नैतिकता एवं शिष्टाचार के लिए एक मज़बूत सहारा है। नैतिक सिद्धांतों और आध्यात्मिक बातों का मूल आधार, धार्मिक आस्था और ईश्वर पर विश्वास है। ईश्वर क़ुरआने मजीद में अमानत, सच्चाई, भलाई, शांति, लोगों के साथ दयालुता और ईश्वर से भय को नैतिकता की सार्थक मान्यताएं बताता है और न्याय की स्थापना, मानवाधिकार के सम्मान और नैतिक गुणों से सुसज्जित होने पर बल देता है। क़ुरआने मजीद के सूरए हुजुरात में महत्वपूर्ण एवं जीवित नैतिक व सामाजिक संदेश और आदेश मौजूद हैं। इस सूरे की आयतों के अनुसार पूर्ण रूप से विकसित मनुष्य की विशेषताएं, नैतिक स्वास्थ्य और अन्य लोगों के साथ सही व न्यायपूर्ण सामाजिक संबंधों की स्थापना है। इसी कारण इस सूरे में सामाजिक अनुशासन, बात करने में विनम्रता, इस्लामी भाईचारे, अन्य लोगों के व्यक्तित्व के सम्मान और मानव जाति के बीच समानता जैसे व्यक्तिगत एवं सामाजिक विषयों के बारे में बात की गई है।

    फ़्रान्स के विद्वान रीवा कहते हैं कि क़ुरआने मजीद का तर्क अत्यंत सुंदर एवं विशेष है। उसके संदेश किसी पर भी थोपे नहीं जाते बल्कि वे अत्यंत मनमोहक हैं और संबोधक को संतुष्ट करने के लिए तर्क की शक्ति से लैस हैं। अमरीका के प्रख्यात इतिहासकार वेल डुरेंट भी क़ुरआने मजीद की नैतिक शिक्षाओं के महत्व की ओर संकेत करते हुए लिखते हैं कि क़ुरआन में क़ानून व नैतिकता एक ही है, क़ुरआन में धार्मिक व्यवहार, सांसारिक व्यवहार से अलग नहीं है और सभी आदेश ईश्वर की ओर से और उसके विशेष संदेश वहि के माध्यम से आए हैं। क़ुरआन में नैतिकता, स्वास्थ्य, विवाह, तलाक़, बच्चों के साथ व्यवहार, व्यापार तथा राजनीति इत्यादि के संबंध में तर्कसंगत सिद्धांत एवं मानदंड मौजूद हैं। चौदह शताब्दियों से यह किताब मुसलमानों के मस्तिष्क में सुरक्षित रही है, इसने उन्हें प्रेरित किया है, उनके व्यवहार को व्यवस्थित किया है और करोड़ों लोगों के रुझानों का मार्गदर्शन किया है। इस किताब ने पवित्र एवं अप्रदूषित लोगों की आत्माओं में स्पष्ट, सशक्त एवं भ्रांतियों से दूर आस्थाओं को अस्तित्व प्रदान किया है। मुसलमानों की नैतिक एवं सांस्कृतिक प्रगति में क़ुरआन की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है। ब्रिटेन के विद्वान फ़्रेड ग्यूम क़ुरआने मजीद के नैतिक सिद्धांतों की सराहना करते हुए लिखते हैं कि कोई भी इस वास्तविकता का इन्कार नहीं कर सकता कि क़ुरआन की नैतिक शिक्षाएं अत्यंत फलदायक हैं और सदैव गुणवान, सच्चे एवं विश्वस्त लोगोंका प्रशिक्षण करती हैं। http://hindi.irib.ir/