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    अमर ज्योति-32

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    जापान के प्रख्यात इस्लाम विशेषज्ञ तोशिहीको इज़ूत्सू ने क़ुरआने मजीद की उच्च शिक्षाओं की पहचान के लिए, क़ुरआन में ईश्वर व मनुष्य नामक पुस्तक लिखी। उनकी दृष्टि में क़ुरआन मनुष्य व ईश्वर के संबंध में जो चित्र प्रस्तुत करता है उसमें ईश्वर सभी वस्तुओं का केंद्र, सृष्टि का स्रोत और मनुष्य का रचयिता है। समस्त ज्ञान व शक्ति का स्रोत ईश्वर है। संपूर्ण क़ुरआन मनुष्य को सृष्टि में चिंतन और उसके रचयिता के प्रति आदर व सम्मान का निमंत्रण देता है। क़ुरआन का लक्ष्य यह है कि लोगों के हृदय में ईश्वर की सच्ची पहचान के साथ ईमान पैदा करे ताकि वे उसे समस्त सृष्टि का ध्रुव मानें और उनकी यह आस्था उनके विचार व व्यवहार में भी प्रदर्शित हो। दूसरे शब्दों में क़ुरआने मजीद लोगों से चाहता है कि वे ईश्वर को ध्रुव मान कर चिंतन करें और उसकी युक्ति व शक्ति पर ईमान के साथ अपने जीवन को दिशा प्रदान करें। क़ुरआन की विचारधारा वस्तुतः मनुष्य के कल्याण व मोक्ष पर आधारित है।

    क़ुरआने मजीद की शिक्षाओं के अनुसार ईश्वरीय संदेश, मनुष्य को उस गंतव्य तक पहुंचाने के लिए हैं जिसके लिए उसकी रचना की गई है। इस बात का चित्रण सूरए तीन में भली भांति किया गया है। इस सूरे की चौथी से लेकर आठवीं आयतों तक में कहा गया है कि मनुष्य की रचना सबसे सुंदर रूप में की गई है और जो लोग ईमान लाते हैं तथा भले कर्म करते हैं वे मोक्ष व कल्याण के तट तक पहुंच जाते हैं तथा ईश्वर के निकट उनके लिए उत्तम प्रतिफल है।

    क़ुरआने मजीद की आयतों में मनुष्य की आत्मिक एवं मनोवैज्ञानिक विशेषताओं पर ध्यान दिया गया है। यहां हम क़ुरआने मजीद की कुछ ऐसी आयतों का उल्लेख कर रहे हैं जिनमें मनुष्य की नकारात्मक विशेषताओं की ओर संकेत किया गया है। सूरए इब्राहीम की 34वीं आयत में कहा गया है कि मनुष्य अत्याचारी व कृतघ्न है। सूरए इसरा की 11वीं आयत में ईश्वर कहता है कि मनुष्य जिस प्रकार से भलाइयों को चाहता है उसी प्रकार को वह बुराइयों को भी चाहता है तथा वह बड़ा उतावला है। सूरए इसरा की ही 67वीं आयत में कहा गया है कि मनुष्य अत्यंत अकृतज्ञ है। इसी सूरे की 83वीं आयत में कहा गया है कि जब हम मनुष्य को कोई नेमत प्रदान करते हैं तो वह सत्य से मुंह मोड़ लेता है और घमंड के साथ आगे बढ़ जाता है किंतु जब उस तक कोई बुराई पहुंच जाती है तो वह निराश हो जाता है। सूरए मआरिज की 19वीं से 21वीं आयतों में कहा गया है कि निश्चित रूप से मनुष्य को अधीर व लोभी पैदा किया गया है, जब उसे कोई पीड़ा पहुंचती है तो वह घबरा उठता है किंतु जब उसे भलाई और संपन्नता मिलती है तो वह उसे दूसरों को नहीं देता। इसी प्रकार सूरए अलक़ की छठी और सातवीं आयत में कहा गया है कि निश्चित रूप से मनुष्य उस समय उद्दंडता करता है जब वह अपने आपको आवश्यकतामुक्त देखता है।

    इसी प्रकार क़ुरआने मजीद की अनेक आयतों में मनुष्य के सकारात्मक गुणों की ओर भी संकेत किया गया है। जैसे कि उसे धरती में ईश्वर का उत्तराधिकारी बताया गया है या विभिन्न आयतों में चयनित मनुष्यों का उल्लेख किया गया है जिन्होंने पूरी गंभीरता के साथ परिपूर्णता के मार्ग पर चल कर उच्च मानवीय दर्जों को प्राप्त किया है। क़ुरआन की आयतों में इस प्रकार के मनुष्यों की सराहना की गई है। क़ुरआन की विचारधारा में मनुष्य मनुष्य एक ऐसा अस्तित्व है जो अपने इरादे के अनुसार ही काम करता है अर्थात अपने कार्यों व चयन में वह स्वतंत्र है। वह जब भी परिपूर्णता तक पहुंचने और ईश्वर का सामिप्य प्राप्त करने के लिए प्रयास करे तथा स्वयं को ईमान व सद्कर्मों से सुसज्जित करे तो वह गुणों और परिपूर्णताओं से सुसज्जित हो जाता है। क़ुरआने मजीद की दृष्टि में यदि मनुष्य पवित्र शिष्टाचार के सौंदर्य को समझ जाए तो निश्चित रूप से बुरे व अप्रिय कर्मों से दूर हो जाएगा। दूसरे शब्दों में लोगों के झूठ बोलने का कारण यह है कि वे सच्चाई की सुंदरता को समझ नहीं पाए हैं अतः ऐसे लोगों में वास्तविकताओं की सच्चाई को समझने की भावना को सुदृढ़ बनाना चाहिए।

    क़ुरआने मजीद की आयतें लोक-परलोक में मनुष्य के कल्याण व मोक्ष हेतु सार्थक शिक्षाओं पर आधारित हैं। इस संबंध में क़ुरआन की शिक्षाओं का मुख्य लक्ष्य मनुष्य के व्यक्तित्व को निखारने हेतु नैतिक सिद्धांत प्रस्तुत करना और उसे बुरे कर्मों से दूर रखना है। क़ुरआने मजीद की नैतिक व्यवस्था में मनुष्य से सदैव यह मांग की गई है कि वह यथासंभव स्वयं को ईश्वरीय गुणों से निकट करे। उदाहरण स्वरूप क़ुरआने मजीद सूरए माएदा की आठवीं आयत में मनुष्य से कहता है कि वह दूसरों यहां तक कि अपने शत्रुओं के साथ न्याय व संयम का व्यवहार करे और शत्रुता के समय भी उद्दंडता व अतिशयोक्ति से दूर रहे। क़ुरआने मजीद में हर स्थान पर मनुष्य को यह नसीहत की गई है कि वह अन्य लोगों यहां तक कि स्वयं पर भी अत्याचार न करे जिस प्रकार से कि ईश्वर किसी पर भी मच्छर के पर जितना भी अत्याचार नहीं करता।

    क़ुरआने मजीद, मनुष्य में प्रेम व मित्रता की भावना को सुदृढ़ बनाने हेतु आरंभ में उससे कहता है कि वह अपने माता-पिता और परिजनों के साथ प्रेम व स्नेह का व्यवहार करे। फिर प्रेम व स्नेह के इस व्यवहार को पूरे समाज के स्तर तक बढ़ाते हुए अपने जैसे मनुष्यों के साथ प्रेम करने पर बल देता है। दया व स्नेह, वही ईश्वरीय गुण है जिससे मनुष्यों को सुसज्जित होना चाहिए। ईश्वर का एक गुण अपने बंदों के प्रति उसकी असीम क्षमा भी है। वह अत्यंत कृपालु व दयावान है और सदैव अपने बंदों की ग़लतियों को क्षमा करने के लिए तैयार रहता है। क़ुरआने मजीद की अनेक आयतों में ईश्वर के इस गुण का उल्लेख किया गया है और मनुष्यों से भी कहा गया है कि वे दूसरों को क्षमा करें।

    क़ुरआने मजीद के सूरए हुजुरात में अनेक मूल्यवान नैतिक व सामाजिक संदेश हैं। इस प्रकार से कि कुछ व्याख्याकारों ने इसे शिष्टाचार के सूरे का नाम दिया है। इस सूरे की ग्यारहवीं और बारहवीं आयतों में कहा गया है। हे ईमान लाने वालो! तुममें से न पुरुषों का कोई गुट दूसरे पुरुषों की हँसी उड़ाए कि संभव है वे उनसे अच्छे हों और न स्त्रियाँ दूसरी स्त्रियों का परिहास करें कि संभव है वे उनसे अच्छी हों, और न अपनों पर ताने कसो और न आपस में एक-दूसरे को बुरी (नामों व) उपाधियों से पुकारो। यह बहुत ही बुरी बात है कि तुम ईमान के पश्चात किसी पर अवज्ञाकारी का नाम रखो। और जो लोग (इस पर) तौबा न करें तो ऐसे ही लोग अत्याचारी हैं। हे ईमान लाने वालो! बहुत से बुरे विचारों से बचो क्योंकि कुछ बुरे विचार पाप होते हैं। और कदापि दूसरों की टोह में न रहो और न तुममें से कोई किसी की पीठ पीछे निन्दा करे, क्या तुममें से कोई इस बात को पसन्द करेगा कि वह अपने मरे हुए भाई का मांस खाए?

    इन आयतों का संबोधन महिलाओं व पुरुषों दोनों ही से है। क़ुरआन की दृष्टि में जो मनुष्य शारीरिक व मानसिक दृष्टि से स्वस्थ है तथा उसके पास बुद्धि जैसी अनुकंपा भी है, उसे अपनी आंतरिक इच्छाओं को नियंत्रण में रखना चाहिए। यह बात बहुत उचित है कि मनुष्य अन्य लोगों को न तो हीन समझे और न उनका परिहास करे क्योंकि इस ग़लत व्यवहार का स्रोत आत्ममुग्धता एवं घमंड है जो इतिहास में अनेक युद्धों व विवादों का कारण रहा है। यह विशेषताएं सबसे बुरे नैतिक अवगुणों में से हैं और व्यक्ति तथा समाज पर इनके अत्यंत नकारात्मक एवं विध्वंसक प्रभाव पड़ते हैं।

    सूरए हुजुरात में जिन बातों का वर्णन हुआ है, जैसे दूसरों का परिहास न करना, दूसरों में बुराई न निकालना या फिर दूसरों के कार्यों की टोह में न रहना, यदि समाज में इन बातों पर ध्यान दिया जाए तो सभी लोगों का सम्मान सुरक्षित रहेगा सभी एक दूसरे के व्यक्तित्व का आदर करेंगे। इस स्थिति में कोई भी किसी के सम्मान से खिलवाड़ नहीं करेगा, किसी को अपमानित करके प्रसन्न नहीं होगा, किसी के व्यक्तित्व की बुराइयों को सामने ला कर अथवा उसके लिए बुरे नाम रख कर उसक आदर व सम्मान को ठेस नहीं पहुंचाएगा। क़ुरआन की संस्कृति में यह बात कदापि उचित नहीं है कि कोई दूसरों के बारे में बुरे विचार रखे, उनके निजी जीवन के रहस्यों की टोह में रहे या फिर उनके अवगुणों को सबके सामने स्पष्ट करे। दूसरे शब्दों में मनुष्य के पास मूल्यवान आध्यात्मिक पूंजी है जिसे नैतिक शिक्षाओं की परिधि में सुरक्षित रखा जाना चाहिए।

    इस्लाम का प्रयास यह है कि समाज में सही अर्थों में शांति व सुरक्षा स्थापित हो ताकि लोग न केवल ज़बान बल्कि विचार की दृष्टि से भी सुरक्षित रहें। यह सुरक्षा की सर्वोच्च सीमा है जो केवल उसी समाज में संभव है जिसके सदस्य ईमान, शिष्टाचार और नैतिकता जैसे आभूषणों से सुसज्जित हों। कुल मिला कर यह कि क़ुरआने मजीद नैतिक मान्यताओं का वर्णन करके, सुंदर शब्दों के ढांचे में अत्यंत उच्च शिक्षाओं को लोगों के समक्ष प्रस्तुत करता है ताकि उनके भीतर आध्यात्मिक सौंदर्य प्रेम की भावना को जागृत करे। जब मनुष्य त्याग, बलिदान, न्याय, प्रतिरोध, शांतिप्रेम, विनम्रता और दानशीलता का सही स्वाद चख लेगा तो स्वयं ही भलाइयों, परिपूर्णता और सौभाग्य की ओर क़दम बढ़ाएगा। http://hindi.irib.ir/