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    अमर ज्योति-5

    अमर ज्योति-5
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    प्रोफ़ेसर मॉरिस ब्यूकेल का जन्म वर्ष 1920 में एक फ़्रान्सीसी घराने में हुआ। वे अपने माता-पिता की भांति ईसाई धर्म के अनुयाई थे। उन्होंने चिकित्सा के क्षेत्र में पढ़ाई की और शिक्षा पूरी करने के बाद पैरिस विश्वविद्यालय के सर्जरी विभाग के प्रमुख नियुक्त हुए। प्रोफ़ेसर ब्यूकेल ने कई वर्षों तक पवित्र ग्रंथों और नई तकनीकों की उपलब्धियों के बीच संबंध के बारे में अध्ययन किया और अंततः क़ुरआने मजीद की आयतों के गहन अध्ययन के बाद उन्होंने इस्लाम धर्म को स्वीकार कर लिया।प्रोफ़ेसर ब्यूकेल अपनी पुस्तक में पवित्र ग्रंथों की तथ्यात्मिक समीक्षा के पश्चात ऐसे तथ्य प्रस्तुत करते हैं जो क़ुरआने मजीद के बारे में पश्चिम में पाए जाने वाले दृष्टिकोणों को ग़लत सिद्ध कर देते हैं। वे अपने पाठक को यह समझाते हैं कि क़ुरआने मजीद को नई दृष्टि से देखना चाहिए। इस फ़्रान्सीसी चिकित्सक ने क़ुरआन के महासागर से मोती निकालने के लिए पहले अरबी भाषा सीखी और फिर जब उन्हें क़ुरआन में प्रकृति के संबंध में आयतें मिलीं तो वे हतप्रभ रह गए। ब्यूकेल कहते हैं कि इस्लाम, यहूदियत तथा ईसाइयत तीनों एकेश्वरवादी धर्मों के अपने विशेष ग्रंथ हैं। ये ग्रंथ ईमान वालों की आस्थाओं का आधार हैं चाहे वे मुसलमान हों, ईसाई हों या यहूदी हों। धर्मों के इतिहास के संबंध में विश्वस्त जानकारियां हमें पैग़म्बरों के पास ईश्वरीय संदेश वहि के रूप में भेजी गई बातों को स्वीकार करने के लिए विवश करती हैं किंतु इस विचार को ईसाई स्वीकार नहीं करते जबकि हज़रत ईसा मसीह के छः शताब्दियों के बाद आने वाला क़ुरआने मजीद, तौरैत व इंजील के संबंध में ध्यान योग्य विचार प्रस्तुत करता है। वह मुसलमानों को सिखाता है कि अपने से पहले वाले पवित्र ग्रंथों पर ईमान रखें और हज़रत नूह, इब्राहीम, मूसा व ईसा अलैहिमुस्सलाम जैसे ईश्वरीय पैग़म्बरों के उच्च स्थान का सम्मान करें। प्रोफ़ेसर ब्यूकेल कहते हैं कि इंजील ही की भांति क़ुरआने मजीद में भी ईसा मसीह अलैहिस्सलाम के जन्म को चमत्कारिक घटना बताया गया है। क़ुरआन, हज़रत मरयम का विशेष सम्मान करता है और इस ग्रंथ के 19वें सूरे का नाम उनके नाम पर सूरए मरयम रखा गया है किंतु इस बात को स्वीकार करना होगा कि क़ुरआन ने हज़रत ईसा व मरयम की जो सराहना की है वह पश्चिम वालों के बीच प्रायः अपरिचित ही है।डाक्टर ब्यूकेल हज़रत ईसा मसीह अलैहिस्सलाम और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के बाद उद्धरित की जाने वाली हदीसों की ओर संकेत करते हुए कहते हैं कि इन हदीसों में महान हस्तियों के जीवन, स्वभाव और बातों को उद्धरित किया गया है। जिन लोगों ने हज़रत मुहम्मद के जीवन की बातों को लिखा है वे उनके साथ रहे हैं और उन्होंने उनके व्यवहारिक एवं शिष्टाचारिक गुणों को निकट से देखा है किंतु चार औपचारिक इंजीलों को संकलित करने वालों ने उन घटनाओं को नहीं देखा है जिन्हें वे हज़रत ईसा के बारे में लिखते हैं। प्रोफ़ेसर मॉरिस ब्यूकेल के अनुसार ईसाइयत और इस्लाम के पवित्र ग्रंथों के बीच एक मूल अंतर यह भी है कि ईसाइयत में एकजुट व समन्वित विषयवस्तु की किताब नहीं है जबकि इस्लाम का ग्रंथ पूर्ण रूप से समन्वित व एकजुट है। क़ुरआने मजीद, ईश्वरीय वहि की आयतें हैं जो ईश्वर के सबसे निकटवर्ती फ़रिश्ते जिब्रईल के माध्यम से पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम पर उतारी गई हैं जिन्हें तुरंत ही क़ुरआन लिखने वालों ने लिख कर सुरक्षित कर लिया। इसके बाद इन आयतों को याद किया गया और फिर नमाज़ों में पढ़ा गया। पैग़म्बरे इस्लाम के काल में क़ुरआन को विभिन्न सूरों के अनुसार संकलित किया गया। क़ुरआने मजीद की इस महत्वपूर्ण विशेषता के विपरीत इंजील की आयतें विभिन्न लोगों की गवाहियों पर आधारित हैं और परोक्ष रूप से हज़रत ईसा के हवाले से उद्धरित की गई हैं।यह फ़्रान्सीसी अध्ययनकर्ता कहते हैं कि आरंभ में विद्वानों का मानना था कि पवित्र धर्म ग्रंथों और विज्ञान के बीच पूरा समन्वय है। एक पादरी सेन्ट ऑगस्टिन ने अपने एक पत्र में इस समन्वय की ओर स्पष्ट रूप से संकेत किया था किंतु जैसे जैसे विज्ञान में विस्तार आता गया, उन्होंने देखा कि पवित्र ग्रंथ और विज्ञान में बहुत अधिक मतभेद हैं अतः उन्होंने निर्णय किया कि अब वे कभी भी पवित्र ग्रंथों और विज्ञान की आपस में तुलना नहीं करेंगे। यह ऐसी स्थिति में है कि जब क़ुरआन की शिक्षाओं और वैज्ञानिक विषयों में कोई विरोधाभास नहीं है।

    डाक्टर ब्यूकेल कहते हैं कि उन्होंने किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रह के बिना और पूरी सच्चाई के साथ क़ुरआने मजीद और नवीन विज्ञान से उसके सामंजस्य के बारे में अनुसंधान आरंभ किया। अंत में उन पर यह बात पूर्ण रूप से स्पष्ट हो गई कि क़ुरआन में ऐसी कोई बात नहीं है जो नई वैज्ञानिक खोजों से विरोधाभास रखती हो। फिर उन्होंने उसी दृष्टिकोण के साथ बाइबल और ओल्ड टैस्टामेंट के संबंध में वही अनुसंधार आरंभ किया। अपने इस अनुसंधान के परिणामों के बारे में वे इस प्रकार बताते हैं।ओल्ड टैस्टामेंट और वर्तमान विज्ञान के बीच समन्वय का अभाव स्पष्ट था। इंजील को भी आप जब भी खोलें तुरंत ही आपको पता चल जाएगाकि हज़रत ईसा मसीह के वंश के बारे में मत्ता की इंजील या मैथ्यू की बाइबल की विषयवस्तु और लूक़ा की इंजील या ल्यूक की बाइबल की विषय वस्तु के बीच स्पष्ट अंतर है। लूक़ा की इंजील की विषयवस्तु इस बात के संबंध में नवीन विज्ञान से मेल नहीं खाती कि धरती पर मनुष्य का अस्तित्व कब से है।हज़रत नूह अलैहिस्सलाम का तूफ़ान इस्लाम, ईसाइयत तथा यहूदियत की संयुक्त आस्थाओं में से एक है। फ़्रान्सीसी विद्वान प्रोफ़ेसर मॉरिस ब्यूकेल ने इस घटना की समीक्षा के दौरान क़ुरआन और इंजील की बातों में अंतर देखा। वे कहते हैं। क़ुरआन इस संबंध में व्यापक एवं भिन्न ब्योरा देता है, इस प्रकार से कि इतिहास की दृष्टि से कोई आपत्ति न हो सके किंतु इंजील में हज़रत नूह के तूफ़ान के बारे में दो कहानियां हैं जो अलग-अलग कालखंडों में लिखी गई हैं और दोनों इस घटना का भिन्न समय बताती हैं। क़ुरआन, हज़रत नूह के तूफ़ान को उनकी जाति के लिए दंड बताता है और उसने जो कुछ इस संबंध में कहा है उसमें तथा नई वैज्ञानिक खोजों में कण मात्र भी अंतर नहीं है।डाक्टर ब्यूकेल इंजील, क़ुरआन व विज्ञान नामक अपनी किताब की भूमिका में कहते हैं कि क़ुरआन और नवीन विज्ञान के बीच यह असाधारण समन्वय वस्तुत: आश्चर्यजनक है। पश्चिम में सभी लोग धर्मज्ञान को यहूदियत और ईसायत से संबंधित समझते हैं और इस्लाम की ओर तनिक भी ध्यान नहीं देते। मेरी दृष्टि में पश्चिम में इस्लाम के संबंध में जो विचार प्रस्तुत किए जाते हैं वे अज्ञानता, अन्याय, और संकीर्ण सांप्रदायिकता का परिणाम हैं। उदाहरण स्वरूप यूनवरसैलिस इनसाइक्लोपीडिया या विश्वकोष के छठे खंड में लेखक क़ुरआन को एक व्यक्तिगत जीवन वृत्तांत बताता है जबकि सभी जानते हैं कि क़ुरआन का किसी जीवनी से कोई संबंध नहीं है बल्कि वह उपदेश है। ज्ञान-विज्ञान के संबंध में इस्लाम की नीति पूर्ण रूप से स्पष्ट है और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के इस कथन से अधिक स्पष्ट कोई बात नहीं हो सकती कि ज्ञान प्राप्त करो चाहे उसके लिए तुम्हें चीन ही क्यों न जाना पड़े। यह बात दृष्टिगत रहे कि उस समय अरब से चीन का मार्ग अत्यंत दुर्गम था। या यह कथन कि ज्ञान की प्राप्ति हर मुस्लिम महिला और पुरुष के लिए अनिवार्य है।प्रोफ़ेसर मॉरिस ब्यूकेल लिखते हैं कि क़ुरआन द्वारा ज्ञान-विज्ञान पर बहुत अधिक ध्यान दिया जाना मेरे भीतर गहरी जिज्ञासा और आश्चर्य का कारण बना क्योंकि उस समय तक मैं यह सोच भी नहीं सकता था कि चौदह शताब्दियों पहले की किसी किताब में इतने विभिन्न और पूर्ण रूप से नई वैज्ञानिक खोजों से समन्वित विषय पाए जा सकते हैं। इस किताब में सृष्टि के आरंभ, नक्षत्र विज्ञान, धरती, विभिन्न प्रकार के पशुओं, वनस्पतियों तथा मनुष्य के प्रजनन से संबंधित विषयों पर चर्चा की गई है जबकि तौरैत और इंजील में वैज्ञानिक दृष्टि से बहुत अधिक त्रुटियां हैं। क़ुरआने मजीद में मुझे ग़लतियों का कोई चिन्ह नहीं मिला। इस बात ने मुझे अपने आपसे यह पूछने पर विवश कर दिया कि यदि किसी मनुष्य ने क़ुरआन को लिखा होता तो वह किस प्रकार सातवीं शताब्दी ईसवी में ऐसी बात लिख सकता था जो आज के विज्ञान की खोजों के अनुकूल हो? अब मेरे लिए इस बात को स्वीकार करने में तनिक भी संदेह नहीं रहा कि आज हमारे हाथों में जो क़ुरआन है, वह वही है जो अपने समय में था और मुझे उसके समक्ष शीश नवाना चाहिए।