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    अमर ज्योति-8

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    क़ुरआने मजीद ऐसी आसमानी किताब है जो तर्कशक्ति और मानवता की रक्षा के लिए पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के हृदय पर उतारी गई है और जिसने मानवता को इस्लाम धर्म का उपहार दिया है। इतिहासकारों का मानना है कि क़ुरआन, ईश्वर की ओर भेजी गई ऐसी सबसे मूल्यवान एवं अमर किताब है जिसने मनुष्य को मार्गदर्शन एवं कल्याण का मार्ग दिखाया है। यह किताब कई आयामों से चमत्कारपूर्ण है। इसका एक चमत्कारी आयाम आयतों में दिखाई देने वाला समन्वय, समरुपता व शब्दों की अद्भुत सजावट है।

    हममें से प्रत्येक व्यक्ति ने अपने व्यक्तिगत जीवन में कई बार इस बात का आभास किया होगा कि जीवन के विभिन्न चरणों में प्राप्त होने वाली आस्थाओं व विश्वासों के कारण या फिर ज्ञान प्राप्ति के चलते विभिन्न विषयों के बारे में मनुष्य के विचार परिवर्तित होते रहते हैं। कभी कभी यह परिवर्तन इस सीमा तक होता है कि उसका नया विचार पिछले विचार से पूर्णता भिन्न होता है और दोनों के बीच स्पष्ट विरोधाभास होता है। यह बात विद्वानों के विचारों और दृष्टिकोणों में भी देखी जा सकती है, अर्थात समय के साथ उनके विचार व दृष्टिकोण बदलते रहते हैं। दूसरे शब्दों में मनुष्य के मन में जो नई बातें आती हैं वह प्रायः परिवर्तन, विरोधाभास या फिर कुछ कमियों के साथ होती हैं।सभी के लिए यह बात स्पष्ट है कि क़ुरआने मजीद ऐसी किताब नहीं है जो ज्ञान-विज्ञान की बहसें प्रस्तुत करने के लिए भेजी गई हो। यह दर्शनशास्त्र की किताब भी नहीं है किंतु इसी के साथ इस किताब में ज्ञान, विज्ञान व दर्शनशास्त्र की अत्यंत महत्वपूर्ण बातों को देखा जा सकता है। क़ुरआने मजीद ने कल्याण के सर्वोच्च मत के रूप में मानव जीवन की सभी छोटी-बड़ी बातों के संबंध में ऐसे सिद्धांत बनाए हैं जो अत्यंत स्पष्ट हैं और उनमें किसी भी प्रकार का विरोधाभास नहीं है। क़ुरआने मजीद पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के जीवन के 23 वर्षों के दौरान और विभिन्न परिस्थितियों व घटनाओं के अंतर्गत उतरा है। ईश्वर की ओर से कभी कभी किसी एक प्रश्न के उत्तर में या किसी ईश्वरीय आदेश के वर्णन हेतु कोई सूरा या कोई आयत भेजी जाती थी और कभी किसी समस्या के समाधान या संदेह के निवारण के लिए ईश्वर की ओर से पैग़म्बरे इस्लाम के पास क़ुरआन की प्रकाशमान आयतें आती थीं। यद्यपि इस आसमानी किताब की आयतें विभिन्न परिस्थितियों में तथा अनेक चरणों में पैग़म्बर के पास आई हैं किंतु उनके बीच समन्वय व समरुपता में किसी भी प्रकार का अभाव दिखाई नहीं देता। आयतों की विषय वस्तु और सामग्री में किसी भी रूप में कोई विरोधाभास नहीं है।क़ुरआने मजीद ने आर्थिक व सामाजिक विषयों की भी विवेचना की है और पारिवारिक समस्याओं, महिला अधिकारों, पर्दे या आवरण तथा नैतिक पवित्रता व सदाचार के बारे में अनेक आयतें मौजूद हैं। कुछ आयतों में इस बात का उल्लेख किया गया है कि ईमान वालों को अपने मत व धर्म या दूसरे मत व धर्म के लोगों के साथ किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिए। कभी क़ुरआने मानव के कल्याण में पैग़म्बरों की भूमिका व स्थान के बारे में बात करता है तो कभी एकेश्वरवाद तथा अनेकेश्वरवाद के परिणामों पर प्रकाश डालता है। आकाश, धरती व तारों सहित संपूर्ण सृष्टि के बारे में चिंतन का क़ुरआने मजीद में विशेष जलवा है। मनुष्य, तारे, बादल, वर्षा, समुद्र, वनस्पतियां, पशु-पक्षी सभी ईश्वर की आश्चर्यजनक रचनाएं व ईश्वरीय उपहार हैं। क़ुरआने मजीद के कुछ सूरो में राजनैतिक समझौतों तथा युद्ध व संधि के नियमों के बारे में चर्चा की गई है। इसी प्रकार कभी कभी कई सूरों में एक ऐतिहासिक घटना की ओर संकेत किया जाता है। एक ही वृत्तांत के वर्णन की पुनरावृत्ति के बावजूद, संबंधित आयतों में छोटा सा भी विरोधाभास दिखाई नहीं देता। उदाहरण स्वरूप हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की घटना का वर्णन कई सूरों में किया गया है किंतु हर सूरे में उक्त घटना के वर्णन का एक विशेष संदेश एवं विशेषता है जो उन दूसरे सूरों में नहीं दिखाई देती जिनमें इस घटना का वर्णन किया गया है किंतु इसी के साथ मूल घटना में तनिक भी परिवर्तन नहीं आता है। इसके अतिरिक्त क़ुरआने मजीद बुद्धि व चिंतन को विशेष महत्व देता है और सदैव मनुष्य को सचेत करता रहता है कि वह चिंतन क्यों नहीं करता?क़ुरआने मजीद की अनेक विशेषताओं पर ध्यान देने से यह वास्तविकता स्पष्ट हो जाती है कि यह आसमानी किताब सृष्टि के रचयिता की ओर से भेजी गई है और इस प्रकार की किताब लिखने मनुष्य के सामर्थ्य से बाहर है। वस्तुतः यदि यह किताब किसी मनुष्य के हाथ की लिखी होती तो निश्चित रूप से इसकी आयतों में अत्यधिक असमन्वय और विरोधाभास देखने में आता जबकि 14 सौ वर्षों से क़ुरआने मजीद अपने चमत्कार और अद्वितीय होने की विशेषता को सिद्ध करता आ रहा है। सूरए निसा की आयत नंबर 82 में क़ुरआन की इसी विशेषता की ओर संकेत करते हुए कहा गया है कि क्या वे क़ुरआन के बारे में चिंतन नहीं करते? (कि) यदि यह ईश्वर के अतिरिक्त किसी अन्य की ओर से भेजा गया होता तो वे इसमें बहुत अधिक मतभेद पाते। यह आयत बुद्धिमानों का इस ओर मार्गदर्शन करती है कि इतने ठोस सिद्धांतों व आधारों के साथ, यह ईश्वरीय किताब मनुष्य के हाथ की लिखी हुई नहीं हो सकती।क़ुरआने मजीद के महत्वपूर्ण चमत्कारिक आयामों में से एक उसके शब्दों के बीच अद्भुत समन्वय व सामंजस्य है जिसने विशेषज्ञों एवं विद्वानों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। क़ुरआन की इस विशेषता ने अरबी भाषा के साहित्यकारों एवं भाषाविदों को यह स्वीकार करने पर विवश कर दिया कि क़ुरआन की भांति कोई पुस्तक या उसके जैसा कोई सूरा लाना मनुष्य की क्षमता से बाहर है और यह केवल ईश्वर की वाणी हो सकती है। जब पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के सबसे बड़े विरोधियों में से एक अबू जह्ल ने उस समय के सबसे बड़े साहित्यकारों में से एक, वलीद इब्ने मुग़ीरा से क़ुरआन के बारे में उसका विचार पूछा तो उसने कहा कि मैं क़ुरआन के बारे में क्या कहूं? ईश्वर की सौगंध! तुममें से कोई भी मेरे जितना अरबी भाषा के शेरों व साहित्य से अवगत नहीं है और शायरी, वाग्मिता तथा शब्दालंकारों की जानकारी के बारे में कोई भी मेरी बराबरी नहीं कर सकता किंतु ईश्वर की सौगंध जो कुछ मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम) कहते हैं वह इनमें से किसी से भी समानता नहीं रखता। उनके कथन में एक विशेष प्रकार की मिठास है जो अच्छे से अच्छे शेर और अलंकृत कथन को धूल चटा देती है। उनकी बातें, नई, ठोस, अर्थपूर्ण एवं अद्भुत हैं जो सभी कथनों पर श्रेष्ठता रखती हैं और उनसे अधिक उच्च बातों की कल्पना नहीं की जा सकती।क़ुरआने मजीद की आयतों और शब्दों में पाया जाने वाला समन्वय व सामंजस्य, एक मनमोहक एवं आकर्षक गीत उत्पन्न करता है जो मनुष्य की भावनाओं में हलचल पैदा कर देता है और मन को अपनी ओर खींचने लगता है। ब्रिटिश विचारक एवं बुद्धिजीवी करबोल्ड ने जब पहली बार क़ुरआन की तिलावत सुनी तो बहुत अधिक प्रभावित हुए। वे कहते हैं कि अभी मेरी आंखें खुली ही थीं कि भोर समय मैंने एक मनमोहक एवं दिल लुभाने वाली आवाज़ सुनी। यह इस्लाम की आवाज़ और क़ुरआन की मीठी एवं तथ्यपूर्ण आयतें थीं। इस आवाज़ के कारण में वास्तविकता की दुनिया में खो गया। मैंने अपनी आंखें बंद कीं और स्वयं को आत्मा को मुग्ध कर देने वाली ईश्वर की आवाज़ के हवाले कर दिया ताकि वह जहां चाहे मुझे अपने साथ ले जाए।ईश्वर सूरए निसा की आयत नंबर 108 और 109 में कहता है कि जिन लोगों को पहले से ज्ञान दे दिया गया है जब उनके सामने क़ुरआन की तिलावत की जाते है तो वे नतमस्तक हो कर धरती पर गिर जाते हैं और कहते हैं कि पवित्र है हमारा पालनहार और निश्चित रूप से उसके वादे पूरे होने वाले हैं। ब्रिटिश बुद्धिजीवी करबोल्ड, क़ुरआने मजीद का अध्ययन करने के बाद एक अन्य बिंदु तक भी पहुंचे और वह यह कि क़ुरआन के शब्दों और आयतों के अर्थों के बीच भी संपूर्ण समन्वय व समरुपता है। वे कहते हैं कि जब क़ुरआने मजीद की कोई आयत अपने अर्थ में ईश्वरीय दया व कृपा का उल्लेख करती है और मनुष्यों को शुभ सूचना देती है तो उसके विदित रूप में भी यही बात पढ़ने वाले के मन में आती है और मनुष्य मोहित हो जाता है, अर्थात इन आयतों में वर्णमाला के ऐसे अक्षरों का प्रयोग हुआ है जो कोमलता का आभास कराते हैं। इसी प्रकार जो आयतें मनुष्यों की ग़लतियों व पापों तथा उनके ख़तरनाक परिणामों की ओर से सचेत करती हैं, उनका विदित स्वरूप भी कड़ा स्वर लिए हुए है अर्थात इन आयतों में वर्णमाला के उन अक्षरों का प्रयोग हुआ है जो कड़ाई का आभास दिलाते हैं। आयतों के तात्पर्य और विदित रूप के बीच इस समन्वय ने करबोल्ड को बहुत अधिक प्रभावित किया। वे कहते हैं कि क़ुरआन की शैली बहुत आश्चर्यजनक एवं अद्भुत है जो अन्य पुस्तकों में दिखाई नहीं देती। शब्दों का आपस में जुड़ाव और एक दूसरे से ताल-मेल, आयतों के अर्थों और विदित स्वरूप के बीच समन्वय, वाक्यों की सुंदरता, ठोस तर्क, उपमाओं में नवीनता और इसी प्रकार की हज़ारों विशेषताओं ने सदैव ही क़ुरआन को वाग्मिता और शब्दालंकार के शिखर पर पहुंचाए रखा है। http://hindi.irib.ir