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    अमर ज्योति-9

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    इतिहास के साक्ष्यों और क़ुरआने मजीद की आयतों के अनुसार हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ईश्वर के अंतिम दूत थे जिन्होंने ईश्वरीय पाठशाला के अतिरिक्त किसी भी पाठशाला का मुंह नहीं देखा और केवल ईश्वर के माध्यम से ही ज्ञान प्राप्त किया। वे ऐसे सुगंधित फूल हैं जिसकी सृष्टि के माली ने भली भांति देख-भाल की है और उसे परिपूर्णता के चरम तक पहुंचा दिया है। यद्यपि उन्होंने काग़ज़ व क़लम को हाथ नहीं लगाया किंतु उनके द्वारा प्रस्तुत की गई किताब में क़लम और लिखित सामग्री की सौगंध खाई गई है। ईश्वरीय संदेश वहि प्राप्त करने के पहले ही चरण में उन्हें पढ़ने का आदेश दिया गया। पैग़म्बरे इस्लाम के अनुसार मनुष्य को दी गई सबसे बड़ी अनुकंपाओं में से एक ज्ञान है। उन्होंने मक्के से मदीने पलायन और मदीना नगर में पहली इस्लामी सरकार की आधार शिला रखने के पश्चात सभी को ज्ञान प्राप्ति का निमंत्रण दिया। यद्यपि उन्होंने औपचारिक रूप से किसी शिक्षक से ज्ञान प्राप्त नहीं किया था और न ही वे किसी विश्वविद्यालय में नहीं गए थे किंतु वे मानवता के शिक्षक बन गए और उन्होंने ज्ञान के केंद्रों को अस्तित्व प्रदान किया।पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पौत्र इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम ने विभिन्न धर्मों के विद्वानों से वाद-प्रतिवाद के दौरान रासुल जालूत नामक एक विद्वान से कहा था कि पैग़म्बरे इस्लाम की सच्चाई के प्रमाणों में से एक यह है कि वे अनाथ व ग़रीब थे और उन्होंने किसी भी व्यक्ति से शिक्षा ग्रहण नहीं की थी किंतु फिर भी वे एक ऐसी किताब लाए जिसमें पैग़म्बरों के वृत्तांत तथा पिछली व आगामी पीढ़ियों के बारे में समाचार हैं। वास्तव में यह बात बहुत आश्चर्यजनक है कि सृष्टि के आरंभ, मनुष्य, शिष्टाचार और क़ानून के बारे में इतनी वाग्मिता के साथ क़ुरआने मजीद की ये उच्च शिक्षाएं उस व्यक्ति की ज़बान से जारी हुई हैं जिसने कभी किसी व्यक्ति से शिक्षा ग्रहण नहीं की। इस संबंध में क़ुरआन के सूरए जुमुआ में कहा गया है कि (तुम्हारा ईश्वर) वही है जिसने (मक्के के) अशिक्षितों में उन्हीं के बीच से अपनी ओर से एक पैग़म्बर भेजा जो उन्हें (क़ुरआन की) आयतें सुनाता है, उन्हें पवित्र बनाता है और उन्हें किताब (अर्थात क़ुरआन) तथा तत्वदर्शिता सिखाता है जबकि इससे पूर्व वे खुली हुई पथभ्रष्टता में थे। इसी प्रकार सूरए यूनुस की सोलहवीं आयत में कहा गया है कि (हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि यदि ईश्वर चाहता तो मैं तुम्हारे समक्ष ये आयतें न पढ़ता और ईश्वर तुम्हें इनसे अवगत नहीं कराता कि मैं इससे पूर्व लंबे समय तक जीवन व्यतीत कर चुका हूं। क्या तुम चिंतन नहीं करते?अलबत्ता कुछ लोग इस बात का इन्कार करते हैं कि पैग़म्बरे इस्लाम अशिक्षित थे किंतु धर्मगुरुओं का कहना है कि यदि हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम उम्मी न होते तो उनकी बातें और शिक्षाएं दूसरों से प्राप्त की हुई होतीं और वे अपने काल के विद्वानों के विचारों व ज्ञान से लाभ उठाते जबकि उन्होंने जो कुछ मानवता के समक्ष प्रस्तुत किया है वह न केवल यह कि उनके काल के लोगों के अज्ञानी विचारों व दृष्टिकोणों से मेल नहीं खाता बल्कि उनकी शिक्षाएं पूर्ण रूप से उन विचारों की विपरीत दिशा में हैं। इतिहास में वर्णित है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के काल के अधिकांश लोग मूर्तिपूजा, विभिन्न प्रकार के भ्रमों तथा अंधविश्वासों की ज़ंजीरों में जकड़े हुए थे जबकि कुछ दूसरे लोग तौरैत व इंजील से अपनी शिक्षाएं और धार्मिक आदेश प्राप्त करते थे। यदि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने अपनी शिक्षाएं, अपने काल के विद्वानों से ग्रहण की होतीं तो उन्हें उस काल में प्रचलित विचारों व आस्थाओं से प्रभावित होना चाहिए। उस स्थिति में कुरआने मजीद और तौरैत व इंजील की शिक्षाओं में एक प्रकार की समानता दिखाई पड़ती किंतु हम देखते हैं कि क़ुरआन ने उस काल की धार्मिक किताबों में पाए जाने वाले अंधविश्वासों का कड़ाई से मुक़ाबला किया। क़ुरआने मजीद के वैज्ञानिक तथ्य तथा बौद्धिक एवं ईश्वरीय शिक्षाएं, मार्गदर्शन की इस किताब को उस काल के समाज की संस्कृति व शिक्षाओं से पूर्ण रूप से अलग कर देती हैं।ईश्वर का इरादा यह था कि जिस व्यक्ति के पास क़ुरआन भेजा जाए वह पवित्र और त्रुटिहीन हो और जिसने अपने मन में किसी भी मत व पंथ का कोई प्रभाव न लिया हो। पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम अपने माता-पिता तक की शिक्षा से वंचित रह गए थे। उनका लालन-पालन बचपन से ही मरुस्थल में और उस काल की अज्ञानतापूर्ण संस्कृति से दूर हुआ। यह इस लिए था कि उनका अस्तित्व ईश्वरीय संदेश वहि के माध्यम से भेजी जाने वाली वास्तविकताओं को स्वीकार करने के लिए तत्पर हो जाए। इस प्रकार हेरा नामक गुफा में अचानक ही हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पवित्र मन में एक ज़बरदस्त क्रांति आई और उनकी ज़बान से ईश्वरीय कथन जारी हुए जो आज क़ुरआने मजीद के रूप में हमारे सामने मौजूद हैं। प्रख्यात मुस्लिम विद्वान एवं इतिहासकार इब्ने ख़लदून कहते हैं कि पैग़म्बरे इस्लाम ने किसी से शिक्षा ग्रहण नहीं की थी किंतु यही बात उनके लिए परिपूर्णता का कारण है क्योंकि उन्होंने अपना ज्ञान सीधे वहि के केंद्र से प्राप्त किया था जबकि हमारे लिए अशिक्षित होना अवगुण है क्योंकि यह अज्ञानता के समान है।ओरयन्टलिस्टों या पूर्वी मामलों के पश्चिमी विशेषज्ञों को, जो प्रायः इस्लाम के इतिहास को आलोचना की दृष्टि से देखते हैं, पैग़म्बर द्वारा लिखने या पढ़ने का छोटे से छोटा प्रमाण भी नहीं मिला है। उन्होंने स्वीकार किया है कि पैग़म्बरे इस्लाम अत्यंत साधारण जीवन बिताने वाले व अशिक्षित व्यक्ति थे तथा एक पिछड़े हुये राष्ट्र से उभरे थे। उन्होंने एक ऐसी किताब प्रस्तुत की जो सृष्टि के रहस्यों, धरती, आकाश, सूर्य, चंद्रमा तथा तारों की आश्चर्यजनक बातों पर आधारित है। फ़्रांस के प्रख्यात ओरयन्टलिस्ट कॉसिन डे पर्सवेल कहते हैं कि बुद्धि आश्चर्यचकित है कि इतनी स्पष्ट एवं तत्वदर्शिता से भरपूर आयतें किस प्रकार एक ऐसे व्यक्ति की ज़बान से निकली हैं जिसने किसी से शिक्षा ग्रहण नहीं की है।द स्टोरी ऑफ़ सिविलाइज़ेशन या सभ्यता का इतिहास नामक प्रख्यात पुस्तक के लेखक विल डुरान्ट कहते हैं कि उस काल में अरबों के निकट लिखने व पढ़ने की कला का कोई महत्व नहीं था। यही कारण था कि क़ुरैश के प्रख्यात क़बीले में केवल सत्रह लोग ही लिखना व पढ़ना जानते थे। पैग़म्बर बनने के बाद मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम) के कुछ विशेष कातिब या लिखने वाले थे। इसके बावजूद अरबी भाषा की सबसे प्रख्यात व वाग्मितापूर्ण किताब उनकी ज़बान से जारी हुई। मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम) सभी पढ़े लिखे लोगों से अधिक मामलों की बारीकियों को समझते थे। रोमानिया के प्रख्यात लेखक कॉन्स्टेन्टिन वर्जिल घियोरघियो (गियोरगियो) अपनी किताब मुहम्मद का जीवन में लिखते हैं। यद्यपि मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम) अशिक्षित थे किंतु उनके पास जो आरंभिक आयतें भेजी गईं उनमें क़लम और काग़ज़ अर्थात लिखने, शिक्षा प्राप्त करने और शिक्षा देने की बात कही गई है। बड़े धर्मों में से किसी एक में भी ज्ञान व शिक्षा को इतना अधिक महत्व नहीं दिया गया है और ऐसा कोई भी धर्म नहीं है जिसके आरंभ में ही ज्ञान व शिक्षा पर इतना बल दिया गया हो। यदि मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम) पहले से विद्वान होते तो हेरा नामक गुफा में इन आयतों के आने से दूसरों को आश्चर्य नहीं होता क्योंकि हर विद्वान स्वाभाविक रूप से ज्ञान के महत्व को समझता है किंतु वे शिक्षित नहीं थे और उन्होंने किसी भी व्यक्ति से शिक्षा ग्रहण नहीं की थी। मैं मुसलमानों को बधाई देता हूं कि उनके धर्म में ज्ञान प्राप्ति को इतना महत्वपूर्ण बताया गया है।पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के कुछ विशेष कातिब थे जिनका दायित्व पत्र, संधियां और समझौते लिखना था। जब भी वे कुछ लिखना चाहते थे तो इनमें से किसी एक को बुलाते और उससे वह चीज़ लिखवाते थे। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ईश्वरीय संदेश वहि को लिखने वाले लोगों में से एक थे। निश्चित रूप से एक अमर किताब के रूप में क़ुरआने मजीद के चमत्कार के विभिन्न आयाम हैं। अगले कार्यक्रमों में हम इस ईश्वरीय किताब के चमत्कार होने के कुछ अन्य आयामों पर चर्चा करेंगे, सुनना न भूलिएगा।