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    अमामा बाँधने के आदाब

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    सर पर अम्मामा बाँधना सुन्नत है और तहतुल हनक बाँधना सुन्नत है और अम्मामे का एक रुख़ आगे की तरफ़ और दूसरा पीछे की तरफ़, मदीने के सादात के तर्ज़ पर डाल लेना सुन्नत है। शेख़े शहीद अलैहिर्रहमा ने फ़रमाया है कि खड़े हो कर अम्मामा बाँधना सुन्नत है।जनाबे रसूले ख़ुदा सल्ललाहो अलैहे व आलिही वसल्लम से मंक़ूल है कि अम्मामा अरबों का ताज है जब वह अम्मामा छोड़ देगें तो ख़ुदा उन की अज़मत खो देगा।
    हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) से मंक़ूल हैं कि जो शख़्स अम्मामा सर पर बाँधे और तहतुल हनक न बाँधे और फिर ऐस दर्द में मुबतला हो जाये जिस की दवा मुम्किन न हो तो उस को चाहिये कि ख़ुद को मलामत करे।

    हज़रत इमाम रेज़ा अलैहिस सलाम से मंक़ूल है कि जनाबे रसूले ख़ुदा (स) ने अम्मामा बाँधा और उस का एक सिरा आगे की तरफ़ डाला और दूसरा पीछे की तरफ़ और हज़रत जिबरईल ने भी ऐसा ही किया।

    हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस सलाम से मंक़ूल है कि बद्र के फ़रिश्तों के सर पर सफ़ेद अम्मामे थे और उन के पल्ले छुटे हुए थे।

    हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) से मंक़ूल है कि जनाबे रसूले ख़ुदा (स) जनाबे अमीरुल मोमिनीन अलैहिस सलाम के सरे मुबारक पर अपने दस्ते हक़ परस्त से अम्मामा बाँधा और एक सिरा अम्मामे का आगे की तरफ़ लटका दिया दूसरा कोई चार उंगल कम पीछे की तरफ़ फिर इरशाद फ़रमाया जाओ और आप चले गये फिर फ़रमाया आओं चुंनाचे अप हाज़िर ख़िदमत हुए और फ़रमाया वल्लाह, फ़रिश्तों के ताज इसी शक्ल के हैं।

    फ़िक़ा ए रिज़वी में मज़कूर है कि जिस वक़्त अम्मामा सर पर बाँधे तो यह दुआ पढ़े, बिस्मिल्लाहि अल्ला हुम्मा अरफ़ा ज़िकरी व आला शानी व अइज़नी बे इज़्ज़तेका व अकरमनी बे करमेका बैना यदैक व बैना ख़ल्क़ेक़ा अल्ला हुम्मा तव्वजनी बेताजिल करामते वल इज़्ज़े वल क़ुबूले। (अल्लाह के नाम से शुरु करता हूँ या अल्लाह मेरा नाम बुलंद कर, मेरा रुतबा बढ़ा और तेरी इज़्ज़त का वास्ता मेरा इज़्ज़त में इज़ाफ़ा कर, और अपने करम से अपनी मख़्लूक़ में मेरा इकराम ज्यादा कर, या अल्लाह करामत व इज़्ज़त और क़बूलियत का ताज मुझे पहना।)

    मकारिमे अख़लाक़ में किताबे निजात से नक़्ल किया है कि यह दुआ पढ़े, अल्ला हुम्मा सव्वमनी बे सीमा इल ईमाने व तव्वजनी बे ताजिल करामते व क़ल्लिदनी हबलुल इस्लामे वला तख़्ला रिबक़ताल ईमाने मिन उनक़ी। (या अल्लाह ईमान की निशानी से मेरी शिनाख़्त हो, और मुझे बज़ुर्गी का ताज इनायत किया जाये, तस्लीम व रेज़ा का क़लादा मेरी गर्दन में पड़ा रहे और रिश्त ए ईमान आख़िरी वक़्त तक मुन्क़ता न हो।)

    और कहा है कि अम्मामा खड़े हो कर बाँधना चाहिये।

    जनाबे रसूले ख़ुदा (स) के पास कई क़िस्म की टोपियाँ थी जो पहना करते थे।

    उन लंबी लंबी टोपियों के बारे में जिन को हरतला कहते हैं यह वारिद है कि उन का पहनना यहूदियों का लिबास है और उलामा का क़ौल है कि मकरूह है।

    बाज़ अहादीस से ज़ाहिर होता है कि टोपी के नीचे के किनारे को ऊपर की तरफ़ मोड़ लेना मकरुह है।

    हज़रत रसूले ख़ुदा (स) से मंक़ूल है कि जिस ज़माने में मेरी उम्मत में तुर्की टोपियाँ पहनने का रिवाज ज़्यादा होगा ज़िना भी उन में ज़्यादा हो जायेगा। तुर्की टोपियों से ज़ाहिरन क़ादूक़ और बकताशी और उसी की जैसी टोपियाँ मुराद हैं।