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    अल्लामा अली दव्वानी

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    मेहदी मौऊद अल्लामा मजलिसी की बिहारुल अनवार किताब के 13वें खंड का अनुवाद है, इसका अनुवाद अल्लामा दव्वानी ने किया है और 12वें इमाम हज़रत मेहदी (अ) के संबंध में यह एक सम्रद्ध किताब है, इसमें इस विषय की विभिन्न आयामों से समीक्षा की गई है। मेहदी मौऊद किताब की प्रस्तावना 180 पन्नों पर आधारित है, वास्तव में यह 11वीं हिजरी क़मरी के महान विद्वान एवं मूल्यवान किताब बिहारुल अनवार के लेखक अल्लामा मजलिसी के जीवन के घटनाक्रमों का विवरण है। दव्वानी ने इस प्रस्तावना में वंश की पहचान, शिक्षा, शिष्य, ज्ञान का स्थान, गुरुओं और अल्लामा मजलिसी की किताबों की समीक्षा की है। मेहदी मौऊद नामक बिहारुल अनवार के इस खंड का अनुवाद, अद्वितीय विशेषताओं से सुसज्जित है कि जो इसे अन्य अनुवादों से अनूठा बनाता है।

    यह अनुवाद बहुत सरल एवं सहज है तथा इसमें हदीसों अर्थात पैग़म्बरे इस्लाम (स) और उनके पवित्र परिजनों के कथनों को उचित शीर्षकों द्वारा क्रमबद्ध किया गया है और किताब को एक समानता से बाहर निकाला गया है। इस अनुवाद में अनुवादक ने विस्तृत नोट लिखे हैं इस प्रकार से कि इन नोट्स से हदीसों के संबंध में पाए जाने वाले संदेह दूर हो जाते हैं। अल्लामा दव्वानी ने मेहदी मौऊद किताब में जगह जगह पथभ्रष्ट बहाई एवं बाबी समुदायों की आपत्तियों का उत्तर देने का प्रयास किया है ताकि हज़रत इमाम मेहदी के बारे में उनके झूठे दावों को रद्द कर सकें।

    अल्लामा दव्वानी के अध्ययन के अनुसार, बिहारुल अनवार के 13वें खंड के कुछ अंश प्रमाणित नहीं थे इसलिए वे उन्हें अपने अनुवाद में नहीं लाए।
    मेहदी मौऊद किताब में 36 अध्याय हैं कि जिन्हें विषयों के आधार पर सूचीबद्ध किया गया है। इस मोटी एवं विस्तृत किताब में हज़रत इमाम मेहदी (अ) के नाम एवं उपनाम और जन्मतिथि के बारे में चर्चा की गई है। इसी प्रकार, मेहदी मौऊद के बारे में पैग़म्बरे इस्लाम (स) और उनके वंशजों में से 11 पवित्र इमामों के कथन एवं क़ुरान की आयतों का भी उल्लेख किया गया है। इस किताब में बारहवें इमाम हज़रत इमाम मेहदी (अ) के प्रकट होने के बारे में पुरोहितों की भविष्यवाणी, धर्मशास्त्र से संबंधित अनेक मुद्दों की प्रश्न और उत्तर के रूप में प्रस्तुति, इमाम मेहदी (अ) के संबंध में महान विद्वानों के विचार, हज़रत इमाम मेहदी (अ) की पैग़म्बरे इस्लाम (स) और अन्य ईश्वरीय दूतों से समानता का तुलनात्मक जायज़ा, उनके लम्बी अवधि तक अदृश्य रहने की समीक्षा, उनके प्रकट होने की प्रतीक्षा, प्रकट होने के चिन्ह और इमाम मेहदी (अ) की शासन शैली को प्रस्तुत किया गया है।

    इस्लामी इतिहास आरम्भ से हिजरत तक अल्लामा दव्वानी की एक अन्य किताब है कि जिसमें अंतिम ईश्वरीय दूत हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स) के पैग़म्बर बनने की घटना को बहुत ही सुन्दरता के साथ पेश किया गया है। दव्वानी ने इस किताब में पैग़म्बरे इस्लाम (स) के पैग़म्बर बनने से पहले अज्ञानता के काल का भी आंकलन किया है और पैग़म्बरे इस्लाम (स) के पूर्वजों का भी विवरण पेश किया है कि जो अरब जगत में सम्मानित हस्तियां रही थीं। अल्लामा दव्वानी ने हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स) के पैग़म्बर बनने से पहले और बाद के घटनाक्रमों को बहुत ही ध्यानपूर्वक एवं समझदारी से बयान किया है, और क़ुरैश द्वारा पैग़म्बरे इस्लाम (स) का विरोध और उन्हें यातनाएं दिए जाने की घटनाओं को शिया एवं सुन्नी प्रमाणित ग्रंथों के आधार पर प्रस्तुत किया है। इस किताब में एक स्थान पर अल्लामा दव्वानी लिखते हैं कि पैग़म्बरे इस्लाम ने आरम्भ से ही हर आयाम से अपने व्यक्तित्व का निर्माण किया था। उन्होंने जीवन को शून्य से शुरू किया। सत्यवादी एवं ईमानदार मोहम्मद ने कदापि मक्के के लोगों के साथ रातों की महफ़िलों एवं उनमें पीने और पिलाने से कोई संबंध नहीं रखा। उनसे बचते थे और शहर से बाहर चले जाते थे, तथा गहरी सोच में डूब जाते थे। सदैव चिंतन मनन करते थे और तत्कालीन स्थिति से दुखी होते थे। उन्हें यह देख कर दुख होता था कि क्यों मक्के के पुरुष एवं महिलांए भटके हुए हैं, और अपने मूल्यवान समय को पीने और पिलाने एवं व्यर्थ कामों में नष्ट करते हैं। संक्षेप में यह कि अज्ञानता के काल में अरबों विशेषकर मक्का वासियों के बीच जो ग़लत रीति रिवाज एवं परम्पराएं थीं उनसे पैग़म्बरे इस्लाम (स) इतना अधिक दुखी होते कि प्रतिवर्ष कई बार हिरा पर्वत के आंचल में शरण लेते थे, और वहां ईश्वर की उपासना में लीन हो जाते थे।

    अल्लामा दव्वानी ने महिलाओं के बारे में भी एक किताब लिखी है जिसका नाम है क़ुरान में महिला, इस किताब में उन्होंने क़ुराने मजीद के अनुसार, कुछ अच्छी और बुरी महिलाओं का उल्लेख किया है। अच्छी महिलाएं उदाहरण स्वरूप हज़रत ईसा (अ) की मां हज़रत मरयम और फ़िरऔन की पत्नी हज़रत आसिया तथा बुरी महिला जैसे कि जनाबे लूत की पत्नी कि जिसे क़ुरान ने बुरा भला कहा है।
    अल्लामा दव्वानी इस किताब की प्रस्तावना में अंतिम ईश्वरीय पुस्तक क़ुराने मजीद के बारे में कहते हैं कि क़ुरान, मार्गदर्शन करता है और रास्ता दिखाता है, और उस समय मनुष्य को स्वतंत्र छोड़ देता है ताकि वह अपने लिए अच्छे एवं बुरे को पहचान ले और अपनी इच्छा के अनुसार उनमें से किसी एक का चयन कर ले, केवल मनुष्य अपनी इच्छा के अनुसार एवं स्वतंत्रतापूर्वक निर्णय लेता है और अपना भविष्य निर्धारित करता है।
    क़ुरान में अच्छी और बुरी महिलाओं के विषय के बारे में अल्लामा दव्वानी आगे लिखते हैं कि क़ुराने मजीद में जिन विषयों को प्रस्तुत किया गया है उनमें से एक वे महिलाएं हैं कि जिनका परिचय क़ुराने मजीद में बयान की गई कथाओं एवं ऐतिसाहिक घटनाक्रमों के अनुसार हुआ है। इन महिलाओं में से कुछ अच्छी और कुछ बुरी थीं, यही कारण है कि क़ुरान में उनका उल्लेख किया गया है। इस संदर्भ में क़ुराने मजीद दो ध्रुवों, नकारात्मक एवं सकारात्मक तथा सत्य एवं असत्य में महिला की भूमिका का उल्लेख करता है ताकि उनके अतीत से अन्य महिलाएं सीख लें और उन्हें अपना आदर्श बनाएं। उन महिलाओं को अपना आदर्श बनाएं कि जो पवित्र थीं और जिन्होंने सकारात्म कार्य किए और ऐसी महिलाओं से सीख लें कि जिनकी सोच विपरीत दिशा में थी और जो मानवता के लिए कलंक थीं तथा अपनी और दूसरों की बदनामी का कारण बनीं।

    क़ुरान ने इस तुलना में कुछ ऐसी धर्म में गहरी आस्था रखने वाली एवं ईमानदार महिलाओं का उल्लेख किया है कि जिन्होंने ईश्वर द्वारा प्रदान की गई बुद्धि का प्रयोग किया और स्वयं एवं अपने परिजनों तथा अपने युग के मनुष्यों को सम्मान दिया है। इसी प्रकार कुछ ऐसी महिलाओं के जीवन पर प्रकाश डाला है कि जिन्होंने स्वयं अपने लिए एवं समाज के लिए समस्याएं उत्पन्न की हैं, ताकि इन दोनों समूहों की स्थिति से अवगत होकर महिलाएं अपना आत्म निर्माण करें और अपने परिवार और समाज में सकारात्मक भूमिका निभाएं।
    अल्लामा दव्वानी की एक और रचना नहजुल बलाग़ा में नमाज़ का रहस्य है। यह किताब हज़रत अली (अ) के पवित्र भाषणों एवं कथनों पर आधारित पवित्र किताब नहजुल बलाग़ा को दृष्टि में रख कर लिखी गई है। लेखक का मानना है कि नमाज़ धर्म में गहरी आस्था रखने वाले के लिए सर्वश्रेष्ठ स्थिति है कि जिसका आदेश पूर्व समुदायों को भी दिया गया था। नमाज़ महत्वपूर्ण इस्लामी उपासनाओं एवं सिद्धांतों में से है कि जिसे ईश्वर ने अपने दूत पैग़म्बरे इस्लाम (स) के लिए अनिवार्य किया था। अल्लामा दव्वानी हज़रत अली (अ) की किताब नहजुल बलाग़ा को नमाज़ की वास्तविकता को पहचानने के लिए बेहतरीन स्रोत मानते हैं, इसलिए कि हज़रत अली (अ) पैग़म्बरे इस्लाम (स) के बाद प्रथम व्यक्ति थे कि जिन्होंने नमाज़ पढ़ी।
    नहजुल बलाग़ा में नमाज़ का रहस्य नामक किताब में जो विषय प्रस्तुत किए हैं वह इस प्रकार हैं: नमाज़ का महत्व, नमाज़ का समय, पेश इमाम और नमाज़ पढ़ने वालों की स्थिति पर ध्यान, नमाज़ उपासकों का प्रेम, इस्लाम की प्रमुख पहचान नमाज़े जुमा, अंहकार एवं घमंड से रोकने का कारण नमाज़।

    अल्लामा दव्वानी इस किताब में लिखते हैं कि पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स) के पैग़म्बर के रूप में चुने जाने के बाद नमाज़ पहला ईश्वरीय आदेश था तथा पैग़म्बरे इस्लाम ने ईश्वरीय आदेश का तुरंत पालन किया। ध्यान योग्य बिंदु यह है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) के बाद पुरुषों में नमाज़ पढ़ने वाले प्रथम व्यक्ति हज़रत अली (अ) थे। उन्होंने 9 वर्ष की आयु में नमाज़ पढ़ी और पैग़म्बरे इस्लाम (स) से नमाज़ पढ़ना एवं वुज़ू करना सीखा। हज़रत अली (अ) पैग़म्बरे इस्लाम (स) की पत्नी हज़रत ख़दीजा के साथ पैग़म्बरे इस्लाम के पीछे जमात से नमाज़ पढ़ते थे।

    अल्लामा दव्वानी पवित्र किताब नहजुल बलाग़ा में हज़रत अली (अ) की ज़बान से नमाज़ का उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि नमाज़ को जिस प्रकार अदा करना चाहिए अदा करो और उसकी सुरक्षा के लिए प्रयास करो, और जितना अधिक हो सके उसे अदा करो तथा उसके द्वारा ईश्वर से संपर्क स्थापित करो, इसलिए ईश्वर क़ुराने मजीद में कहता है कि नमाज़ ऐसी ज़िम्मेदारी है कि जो निर्धारित समय में धर्म में आस्था रखने वालों पर अनिवार्य की गई है। क्या तुमने क़ुरान में ईश्वर के कथनानुसार नर्क में जाने वालों का जवाब नहीं सुना है कि, किस चीज़ ने तुम्हें नर्क में डाल दिया है? वे कहते हैं कि हम नमाज़ अदा करने वालों में से नहीं थे। नमाज़, पापों को वृक्ष के पत्तों की तरह झाड़ देती है, और बंधे हुए पशुओं को स्वतंत्र करने की भांति मनुष्य को स्वतंत्र कर देती है। पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने नमाज़ को गर्म झरने की भांति बताया है कि जो किसी ऐसे व्यक्ति के घर में होता है जो रात-दिन में पांच बार उससे सफ़ाई करता है, और इस प्रकार उसके शरीर पर कोई गंदगी बाक़ी नहीं रहती।

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