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    अल्लामा आश्तियानी – 2

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    ऐसे समय में कि जब इस्लामी रहस्यवाद एवं दर्शन को अधिक महत्व नहीं दिया जाता था अल्लामा सैय्यद जलालुद्दीन आश्तियानी ने ज्ञान पर आधारित अपने प्रयासों से उसे पुनर्जीवित करने के लिए कमर कस ली। उन्होंने इस्लाम की शिक्षाओं एवं उसके बौद्धिक व वैचारिक सिद्धांतों के प्रचार एवं प्रसार के लिए भरपूर प्रयास किया और सत्य की खोज में अपना पूरा जीवन व्यतीत कर दिया। अल्लामा आश्तियानी की प्रकाशित होने वाली यह समस्त रचनाएं ज्ञान के मार्ग में उनके अथक प्रयासों को दर्शाती हैं।

    अल्लामा आश्तियानी को मुल्ला सदरा के दर्शन एवं रहस्यवाद में बहुत रूची थी सदरुल मुताल्लेहीन मुल्ला सदरा शीराज़ी हिकमते मुतालिया के संस्थापक एवं इस्लाम के महान दार्शनिकों में से एक हैं। उनकी लोकप्रियता ईरान की सीमाओं यहां तक कि इस्लामी जगत से निकल कर पश्चिम तक पहुंच गई और पश्चिम वासियों ने भी उनकी रचनाओं पर काफ़ी ध्यान दिया है। अल्लामा आश्तियानी ने कि जो इस दार्शनिक से बहुत श्रद्धा रखते थे “शरहे हाल व आराए फ़लसफ़ी मुल्ला सदरा” नामक किताब लिखी और इस मूल्यवान किताब में मुल्ला सदरा के विचारों एवं दृष्टिकोणों में अपनी दक्षता को दर्शाया।

    किताबों के अलावा अल्लामा आश्तियानी ने दर्शनशास्त्र एवं रहस्यवाद की महत्वपूर्ण किताबों की व्याख्या की और उन पर नोट लिखे तथा उनका संपादन किया, इस प्रकार उन्होंने काफ़ी हद तक अस्पष्ट बिंदुओं को दूर करने में सफलता प्राप्त की या उनके महत्व एवं मूल्यों में वृद्धि की। मुल्ला सदरा के रहस्यवादी एवं दार्शनिक विचारों से अल्लामा आश्तियानी की रूची कारण बनी कि उन्होंने उनकी अधिकांश किताबों की व्याख्या की और उन पर नोट लिखे। उदाहरण स्वरूप, मुल्ला सदरा की किताब शवाहिदुर्रुबूबियत पर प्रस्तावना और नोट लिखकर तथा उसका संपादन करके अल्लामा आश्तियानी ने इस किताब के आकर्षण में चार चांद लगा दिए। इसी प्रकार अल्लामा आश्तियानी ने मुल्ला सदरा की किताब अलमबदा वलमआद का संपादन किया और उस पर मूल्यवान प्रस्तावना लिखी और उसमें मुल्ला सदरा के रहस्यवादी एवं दार्शनिक विचारों एवं सिद्धांतों को स्पष्ट किया।

    शरहे मुक़दमए क़ैसरी बर फ़ुसूसुल हिकम, शरहे हाल व आराए फ़लसफ़ी मुल्ला सदरा और शरहे बर ज़ादुल मुसाफ़ेरीन मुल्ला सदरा नामक किताबों अल्लामा आश्तियानी ने रहस्यवादी एवं दार्शनिक समीक्षा की है।

    शरहे फ़ुसूसुल हिकम फ़ाराबी अल्लामा आश्तियानी की एक अन्य व्याख्या है। फ़ुसूसुल हिकम अबू नस्र फ़ाराबी की किताब है कि जिसमें पूर्ण अस्तित्व और ईश्वर के बारे में चर्चा की गई है। अल्लामा आश्तियानी ने मुल्ला सदरा के विचारों के आधार पर उसकी व्याख्या की और मुल्ला सदरा के हिकमते मुतालिया के प्राथमिक सिद्धांतों से फ़ाराबी के विचारों को प्रथक करते हुए ईरान में दर्शनशास्त्र के विषयों के इतिहास का विवरण पेश किया है।

    बहाई लाहीजि की किताब रिसालए नूरिए के भी अल्लामा आश्तियानी ने समीक्षा की है। इस किताब का विषय लोक और परलोक के बीच का जीवन है, अल्लामा आश्तियानी ने उसके संपादन के साथ साथ उस पर विस्तृत प्रस्तावना लिखी है। उन्होंने किताब की व्याख्या के साथ साथ ईरान और यूनान के प्राचीन दार्शनिकों, मश्शा दर्शनशास्त्रियों, शेख़ इश्राक़, इब्ने अरबी की किताबों और उनके अनुसरणकर्ताओं की किताबों का विवरण प्रस्तुत किया है और कहीं कहीं रिसालए नूरिए में अपने बौद्धिक विचारों को भी पेश किया है।

    तहक़ीक़ी दर दीने मसीह, नामक किताब अल्लामा आश्तियानी की रचना है कि जो ईसाई धर्म के बारे में उनके शोध का परिणाम है। लेखक ने इस किताब में ऐतिहासिक प्रमाणों एवं दस्तावेज़ों के आधार पर वर्तमान ईसाई धर्म के विश्लेषण का प्रयास किया है और उसकी समीक्षा की है, ताकि इस प्रकार कथाओं एवं मिथकों से वास्तविकता को अलग कर सकें और धर्म में आस्था रखने वाले निष्पक्ष एवं खोजी लोगों के लिए दीप जला सकें।

    तहक़ीक़ी दर दीने मसीह किताब के 14 खंड हैं और हर खंड में ईसाई धर्म पर एक आयाम से दृष्टि डाली गई है। पहले खंड में लेखक ने तीन बाइबिलों में हज़रत ईसा के जीवन की समीक्षा की है कि जिनमें हज़रत ईसा के चमत्कारों के अलावा कोई विवरण नहीं है। इस किताब के दूसरे खंड में हज़रत ईसा के बाद उनके साथियों और पॉल दी एपोस्टल का विवरण दिया गया है।

    तीसरे खंड में लेखक ने चर्च द्वारा स्वीकृत बाइबिलों का परिचय दिया है और उनके प्रकाशन की तारीख़ का उल्लेख किया है और यह संकेत दिया है कि इन बाइबिलों में से कोई भी हज़रत ईसा के साथियों और उनके वंशजों द्वारा नहीं लिखी गई है बल्कि दूसरी शताब्दी में बाइबिल लिखने का धीरे धीरे प्रचलन हुआ।

    चौथे खंड में ईसाई धर्म के स्थायित्व की प्रक्रिया और ईसाईयत के तेज़ी से फैलने कि जिसका कारण उसके जन प्रेमी एवं समाज के सामान्य वर्ग से संबंधित होना है विश्लेषण है। उसके बाद उस वातावरण की ओर संकेत किया गया है कि जिसमें ईसाई धर्म का विकास हुआ तथा लेखक का कहना है कि यह प्रसिद्ध है कि ईसाईयत का विस्तार फ़िलिस्तीन में और यहूदी संस्कृति में हुआ, लेकिन वर्तमान ईसाईयत हज़रत ईसा द्वारा तथा पहली शताब्दी में अस्तित्व में नहीं आई, बल्कि शताब्दियों के बाद वह वर्तमान रूप में ढली है इसलिए उसके विकास के रूप में केवल फ़िलिस्तीनी एवं रूमी वातावरण को प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।

    अल्लामा की एक और किताब, तहक़ीक़ी दर दीने यहूद, है। लेखक ने नौ खंडों वाली इस किताब में यहूदियों की पवित्र किताब की समीक्षा करते हुए बनी इस्राईल अर्थात यहूदी समयुदाय और धर्म के अस्तित्व में आने, यहूदी धर्म में ईश्वर, यहूदी धर्म की पहचान, पवित्र किताब में कहानियों एवं सिद्धांतों तथा यहूदी धर्म में सरकार के विषय का उल्लेख किया है।

    अल्लामा सैय्यद जलालुद्दीन आश्तियानी इस किताब की प्रस्तावना में लिखते हैं कि मूसा और जिस धर्म को उनसे संबंधित माना जाता है उसके बारे में छोटा सा भी ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है, दूसरा बिंदु कि जिसकी ओर ध्यान देना बहुत ज़रूरी है वह यहूदियों की पवित्र किताब में चरित्रों एवं कथनों का क़ुराने मजीद में उल्लेख चीज़ों से विरोधाभासी होना है, क़ुरान की दृष्टि में वर्तमान तोरा, परिवर्तित हुई किताब है कि जिसे यहूदी धर्म गुरुओं ने अपनी ओर से गढ़ा है।

    इसके बाद अल्लामा इस शोध पुस्तक में अपनी शैली को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि “पाठक ध्यान दें कि इस किताब में यहूदी धर्म का विश्लेषण पूरी तरह से यहूदियों की पवित्र किताब, विशेषज्ञ विद्वानों के शोध कार्यों और गिरजाघरों के प्रतिभाशाली अधिकारियों के विचारों पर आधारित है तथा क़ुराने मजीद और इस्लामी व्याख्याकारों के दृष्टिकोण के आधार पर यहूदी धर्म की समीक्षा नहीं की गई है।

    अलमज़ाहिरुल इलाहिया इस्लामी रहस्यावाद के विषय पर अल्लामा आश्तियानी की एक अन्य किताब है। अल्लामा इस किताब में मनुष्य के लिए सर्वश्रेष्ठ भलाई एवं सौभाग्य को ईश्वरीय ज्ञान की प्राप्ति मानते हैं। अल्लामा के विचार में ईश्वर और उसकी विशेषताओं का ज्ञान और परलोक एवं उसके चरणों के बारे में जानकारी मनुष्य की रहस्यवाद के मार्ग में क़दम रखने में सहायता करती है। दूसरी ओर अल्लामा आश्तियानी के अनुसार, ईश्वरीय शिक्षाओं से अनभिज्ञता मनुष्य की समस्त समस्याओं का स्रोत है।

    अलमज़ाहिरुल इलाहिया किताब यद्यपि संक्षेप में है लेकिन उसमें ब्रह्माण के आरम्भ और अंत, प्रथम वास्तविकता का ज्ञान, ईश्वर की विशेषताएं एवं उसके नाम, सीधे मार्ग की पहचान, विकास के चरण, वास्तविकता तक पहुंचने की शैली एवं मृत्यु के बाद पुनर्जीविन का ज्ञान जैसे विषयों का उल्लेख है।
    अल्लामा की एक और किताब हस्ती अज़ नज़रे फ़लसफ़े व इरफ़ान अर्थात दर्शन एवं रहस्यवाद की दृष्टि में जीवन है। अल्लामा आश्तियानी ने कि जो दर्शनशास्त्र एवं रहस्यवाद में दक्ष हैं, इस किताब में रहस्यवाद के चरणों के सिद्धांतों को प्रमाणित करने का प्रयास किया है जो बीस खंडों पर आधारित है।

    इस किताब में विभिन्न दृष्टिकोण रखने वाले दार्शनिकों एवं मुल्ला सदरा की दृष्टि में जीवन के विषय की समीक्षा की गई है। अल्लामा ने अपनी इस किताब में दर्शनशास्त्र एवं रहस्यवाद के विभिन्न मतों की समीक्षा के साथ साथ जीवन को सही तरीक़े से समझने के लिए उनके प्रमाणों, विश्लेषणों एवं आलोचनात्मक अध्ययनों से सहायता प्राप्त की है और मुल्ला सदरा एवं महान रहस्यवाद के विचारों तथा क़ुराने मजीद की कुछ आयतों की दार्शनिक एवं रहस्यवादी व्याख्या की है।

    अल्लामा की अन्य मूल्यवान रचनाओं में से एक पांच प्रथक खंडों पर आधारित “ईरान के ईश्वरीय विद्वानों की चयनित रचनाएं” है। इस किताब में पिछली चार शताब्दियों में जीवन करने वाले चालीस से अधिक ईरानी रहस्यवादियों एवं दार्शनिकों के विचारों, दृष्टिकोणों एवं रचनाओं का उल्लेख है। उनमें से कुछ हस्तियां इस प्रकार हैं: मीरदामाद, मीरफ़न्दरस्की, मुल्ला अब्दुर्रज़ाक लाहीजि, मुल्ला मोहसिन फ़ैज़ काशानी, शेख़ हुसैन तुनेकाबुनि, मुल्ला मोहम्मद बाक़र सब्ज़वारी, मुल्ला मोहम्मद मेहदी नराक़ी और मुल्ला नस्र अली गीलानी।

    अल्लामा आश्तियानी ने अपने जीवन में किताबें लिखने के अलावा, अनेक लेख भी लिखे हैं। वे एक अज्ञात विद्वान हैं कि जिसने इस्लामी दर्शन के दीप को जलाए रखा और इस प्रकार शोधकर्ताओं की मूल्यवान सेवा की।

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