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    अल्लामा आश्तियानी

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    इस्लामी एवं पूर्वी मामलों के फ्रांसीसी विशेषज्ञ प्रोफ़ैसर हेनरी कोर्बिन का कहना है कि मेरी दृष्टि में आश्तियानी साहब, मुल्ला सदरा के समान हैं। मानो मुल्ला सदरा पुनर्जीवित हो गए हैं। मुझे नहीं लगता कि मैं इससे अधिक उनकी प्रशंसा कर सकता हूं। श्रीमान आश्तियानी एक ईरानी दार्शनिक हैं कि जो प्राचीन दर्शनशास्त्र के वरिष्ठ प्रतिनिधि हैं, लेकिन ऐसा प्राचीन दर्शनशास्त्र कि जो पूर्ण रूप से वर्तमान समय के आधार पर समझा गया हो। इस प्रकार उनकी रचनाओं में ऐसा नया विचार मिल जाता है कि जिसके बहुत से चिन्हों को आज के ईरान में देखा जा सकता है।

    सैय्यद जलालुद्दीन आश्तियानी बुद्धिमान, दर्शनशास्त्र और वर्तमान समय में इस्लामी जगत के महान विद्वानों में से हैं कि जिन्हें अनेक समकालीन धार्मिक विद्वान उनकी महत्वपूर्ण गतिविधियों के कारण द्वितीय मुल्ला सदरा कहते हैं।

    वास्तव में अल्लामा आश्तियानी, इस्लाम के प्राचीन दर्शनशास्त्रियों और विद्वानों की रचनाओं को पुनर्जीवित करने वाले एवं रहस्यवाद के ध्वजवाहक हैं। सैय्यद जलालुद्दीन कि जो 17वीं शदाब्दी के महान दार्शनिक मुल्ला सदरा के दर्शन से कि जिसे हिकमते मुतालिया कहा जाता है विशेष श्रद्धा रखते थे, और वे बड़ी ही मिनम्रता से कहते थे कि अगर मुल्ला सदरा इस बंदे को अपनी कृपा एवं विचार के बाग़ के फल चुनने वालों में गिन लें तो उन्होंने बंदे को उसके स्तर से काफ़ी ऊंचा उठा दिया है।
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    सैय्यद जलालुद्दीन मूसवी आश्तियानी का 1925 में अराक शहर के निकट आश्तियान में जन्म हुआ। पांच वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी दादी के मदरसे में क़ुरान पढ़ा और फ़ारसी लिखना सीखा। बुद्धिमान होने और पढ़ने एवं लिखने में सक्षम होने के कारण प्राथमिक विद्यालय में प्रवेश लेते ही उन्हें तीसरी कक्षा में भेज दिया गया और वहां उन्होंने छटी कक्षा तक शिक्षा प्राप्त की, लेकिन उसके बाद मदरसे में वापस लौट गए और उस समय में प्रचलित विषयों की पारम्परिक शैली में शिक्षा ग्रहण की। गुलिस्ताने सादी, कलीले व दिमने, निसाबुस्सिबयान, तारीख़े मोजम, जामेउल मुक़द्दमात जैसी किताबों को उसी मदरसे में पढ़ा।

    शिक्षा एवं विद्या प्राप्ति में बुद्धि और प्रतिभा के कारण सैय्यद जलालुद्दीन ने शहर के बड़े धर्मगुरु का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया और उन्होंने इस बात को समझा कि इस युवा को इस छोटी सी जगह में नहीं रहना चाहिए बल्कि विद्या के समुद्र में डुबकी लगानी चाहिए। इस प्रकार 1944 में अल्लामा आश्तियानी क़ुम चले गए और हज़रत फ़ातेमा मासूमा के पवित्र मज़ार के निकट रहकर शिक्षा ग्रहण की।

    अल्लामा ने पवित्र शहर क़ुम में दक्ष विद्वानों से दर्शनशास्त्र एवं धार्मिक विषयों का ज्ञान प्राप्त किया। इसी प्रकार सैय्यद जलालुद्दीन ने आठ वर्षों तक आयतुल्लाहिल उज़मा बोरुजर्दी से धर्मशास्त्र की उच्च शिक्षा प्राप्त की और पांच वर्षों तक क़ुरान के व्याख्याकर्ता एवं दार्शनिक अल्लामा तबातबाई से दर्शनशास्त्र, रहस्यवाद, क़ुरान की व्याख्या और धर्मशास्त्र के सिद्धांत जैसे विषयों का ज्ञान प्राप्त किया। धीरे धीरे उन्हें मुल्ला सदरा के दर्शनशास्त्र से विशेष रूची होने लगी इसलिए कि महान दार्शनिक मुल्ला सदरा के विचार, दर्शन एवं रहस्यवाद का संगम हैं, मानो इस विद्वान ने बुद्धि एवं प्रेम द्वारा वास्तविकता को प्राप्त कर लिया है। अल्लामा आश्तियानी ने मुल्ला सदरा के दर्शन गहराई से समझने के लिए क़ज़वीन शहर की यात्रा की ताकि आयतुल्लाह रफ़ीई क़ज़वीनी से पढ़ें, इसलिए कि वे दर्शनशास्त्र एवं हिकमते मुतालिया के अद्वितीय गुरु थे। अल्लामा आश्तियानी ने आयतुल्लाह रफ़ीई को इस प्रकार याद किया है: उन्हें मुल्ला सदरा की किताबें, असफ़ार, मफ़ातिहुल ग़ैब और हिकमते इशराक़ पर मुल्ला सदरा के संक्षिप्त नोट याद थे मानो ईश्वर ने उन्हें असफ़ार पढ़ाने के लिए ही इस दुनिया में भेजा था।

    1957 में अल्लामा आश्तियानी उच्च धार्मिक शिक्षा ग्रहण करने हेतु नजफ़ चले गए। उसी काल में गंभीर रूप से बीमार पड़ गए और विवश होकर ईरान लौट आए। उन्होंने 1959 में मशहद विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग में पढ़ाना शुरू किया और 1969 में प्रोफ़ैसर बन गए तथा 1996 तक इस विश्वविद्यालय में पढ़ाते रहे। बौद्धिक एवं धार्मिक सिद्धांतों का प्रथक न होना अल्लामा आश्तियानी की शिक्षाओं का महत्वपूर्ण विषय था। उन्होंने धार्मिक शिक्षा केन्द्र में पढ़ाने और शोध करने के साथ साथ इस्लामी रहस्यवाद एवं दर्शन के क्षेत्र में विभिन्न किताबों की रचना की। अल्लामा पढ़ने, पढ़ाने एवं शोधकार्यों में इतना लीन रहे कि उन्होंने विवाह ही नहीं किया। 1997 में अल्लामा आश्तियानी को देश का सर्वश्रेष्ठ बुद्धिजीवी चुना गया। एक वर्ष बाद उनकी किताब शरहे क़ैसरी बर फ़ुसूसुल हिकम को इस्लामी गणतंत्र ईरान की वार्षिक किताब के रूप में चुना गया। इसी प्रकार ईरान के अमर चेहरे शीर्षक दूसरे सम्मेलन में उन्हें देश के शैक्षिक अमर चेहरे के रूप में चुना गया और शिक्षा के क्षेत्र में राष्ट्रपति के हाथों उन्हें पुरस्कृत किया गया।

    अल्लामा आश्तियानी को पढ़ने और पढ़ाने में इतनी अधिक रूची थी कि अन्य कामों एवं मनोरंजन के लिए उनके पास समय नहीं बचता था। वे हर दक्ष गुरु के ज्ञान से भरपूर लाभ उठाना चाहते थे और अपने जीवन के महत्वपूर्ण समय को किसी भी स्थिति में नष्ट नहीं करते थे। इसी कारण हम देखते हैं कि उस काल के अनेक दक्ष गुरुओं से अल्लामा आश्तियानी ने शिक्षा ग्रहण की है।

    स्वतंत्रता से प्रेम, दुनिया से दूरी और अध्ययन एवं शोध से प्रेम अल्लामा आश्तियानी की विशेष विशेषताएं थीं। अल्लामा इमाम हुसैन (अ) से प्रेम करते थे और बहुत ही जोश से उन्हें प्रेमियों का उद्देश्य कह कर याद करते थे।
    अल्लामा आश्तियानी के जीवन का अधिक समय शैक्षिक कामों में बीतता था, लेकिन विनम्रता और ईश्वर के भय के साथ। वे फ़ारसी लिपि में बहुत ही सुन्दर लिखते थे। मसनवी का अच्छी तरह अध्ययन किया था और साअदी में बहुत रूची रखते थे उन्होंने शाहनामे फ़िरदौसी में भी बहुत ध्यान से सोच विचार किया था। वे वैश्विक संबंध तोड़कर शैक्षिक श्रद्धा एवं पवित्रता में आदर्श बन गए। वे चापलूसों से प्रभावित नहीं होते थे और न ही शत्रुओं के हुल्लड़ हंगामे से डरते थे। जो भी सही समझते थे कहते थे और किसी का मूंह देखकर बात नहीं करते थे।

    अल्लामा आश्तियानी अपनी विशेष वीरता से जिस समय इमाम ख़ुमैनी का नाम लेना भी अपराध था अपनी रचनाओं में बहुत ही सम्मानपूर्वक उनका नाम लेते थे और प्रशंसा करते थे। उदाहरण स्वरूप शरहे मुक़दमये क़ैसरी में उल्लेख है कि इमाम ख़ुमैनी वर्तमान शताब्दी में रहस्यवाद के महान गुरु हैं तथा बौद्धिक एवं रहस्यवादी सिद्धांतों में एक विशेष प्रतिभा रखते हैं। उनकी दो महत्वपूर्ण किताबें, मिस्बाहुल हितायत एललख़िलाफ़त वलविलायत और दूसरी शरहे दुआए सहर प्रकाशित हुई हैं कि जो महान गुरु के उच्च ज्ञान को दर्शाती हैं।

    इस कभी नहीं थकने वाले इंसान का रोग के कारण वर्ष 2005 में 70 वर्ष की आयु में निधन हो गया। अल्लामा आश्तियानी को भीषण बर्फ़बारी के दौरान उनके मित्रों और शिष्यों ने पवित्र शहर मशहद में स्थित इमाम रज़ा (अ) के मज़ार के आज़ादी प्रांगण में दफ़्ना दिया।

    सैय्यद जलालुद्दीन आश्तियानी ने प्राचीन एवं वर्तमान पुस्तकों का अध्ययन करके इतिहास के विभिन्न कालों के खोए हुए विचारों को खोजने में सफलता प्राप्त की। वास्तव में अल्लामा ने अपने अनगिनत शोध कार्यों से इस्लामी दर्शनशास्त्र के इतिहास को और अधिक समृद्ध कर दिया।

    अल्लामा आश्तियानी का दृष्टिकोण पश्चिमी दार्शनिकों की भांति नहीं था कि जो दर्शनशास्त्र के इतिहास को ही दर्शनशास्त्र समझते हैं और इस प्रकार प्रत्येक विचार को इतिहास के दर्पण में देखते हैं। उनका मानना था कि दार्शनिक विचार एक ज़जीर की कड़ियों की भांति एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। इस प्रकार अल्लामा आश्तियानी ने इस्लामी रहस्यवा एवं दर्शन के खोई हुई कड़ियों को खोजने में अत्यधिक प्रयास किया।
    प्रारम्भ में इस्लामी दर्शनशास्त्र के इतिहास में केवल इब्ने सीना, फ़ाराबी और कुछ अन्य दक्ष दार्शनिक ही दिखायी पड़ते थे, लेकिन दूसरे दर्शनशास्त्री अज्ञात ही रहे। अल्लामा आश्तियानी ने भरसक प्रयास किया ताकि दार्शनिक विचारों की अज्ञात कड़ियों को खोजें और उन्हें सामने लायें। इसी प्रकार उन्होंने बहुत से ग़लत विचारों को बाहर निकाल फेंका। इस प्रकार अल्लामा ने शोधकर्ताओं की उल्लेखनीय सहायता की और शोधकर्ताओं के लिए रास्ता आसान कर दिया।

    अल्लामा आश्तियानी ख़ाली रहस्यवाद को भटकना मानते थे और सूफ़वाद का दावा करने वालों को इस भटके हुए मार्ग पर देखते थे। अल्लामा की दृष्टि में रहस्यवाद, एकेश्वरवाद एवं विलायत अर्थात पैग़म्बरे इस्लाम (स) के पवित्र वंशजों के अनुसरण पर आधारित है और वे पैग़म्बरे इस्लाम (स) के पवित्र वंशजों की शिक्षाओं को रहस्यवाद के साथ जोड़ने में सफल रहे।

    इसी प्रकार वे हिकमते मुतालिया और इस्लामी दर्शनशास्त्र के इतिहास को यूनानी दर्शनशास्त्र के सिद्धांतों की तुलना में अधिक संपूर्ण मानते थे।
    कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि अल्लामा आश्तियानी विभिन्न क्षेत्रों में जैसे कि दार्शनिक एवं रहस्यवादी किताबों की व्याख्या एंव संपादन, इस्लामी दर्शनशास्त्र के इतिहास में शोध और रहस्यवाद में एक विशेष स्थान रखते थे।

    वे विनम्रतापूर्वक अपनी रचनाओं को व्याख्या एवं अज्ञानता कहते थे, और कहते थे कि वास्तव में सदैव अपनी मृत्यु के बारे में सोचता हूं और मुझे यह विश्वास हो गया है कि यह रचनाएं एवं व्याख्याएं स्वयं की व्याख्या एवं इच्छाओं की व्याख्या के अतिरिक्त कुछ नहीं है। अगर परलोक में कोई चीज़ स्वीकार्य एवं पेश करने योग्य होगी इस शर्त के साथ कि वह पूरी श्रद्धा के साथ अंजाम दी गई हो तो वह वही ख़ामोशी से की गई जन सेवा है। उनके एक साथी का कहना है कि बीमारी की स्थिति में मैं उनसे प्रार्थना करता था कि मुझे कुछ सिफ़ारिश कर दीजिए, गुरुजी कहते थे कि जितना भी हल्के रहेंगे, शायद उतना ही आसानी से पैग़म्बरे इस्लाम (स) की सेवा में उपस्थित हो सकेंगे।

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