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    अल्लाह की पहचान

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    दीन का आधार सृष्टि के रचयता के वुजूद पर विश्वास रखना है और भौतिकवादी व इलाही विचारधारा के बीच मुख्य अंतर भी इसी विश्वास का होना और न होना है।

    इस आधार पर सत्य के खोजी के सामने जो पहली बात आती है और जिस का जवाब उसके लिए किसी भी दूसरे बात ते ज़्यादा ज़रूरी होता है वह यह है कि किसी अल्लाह का वुजूद है या नहीं? और इस सवाल का जवाब खोजने के लिए जैसा कि इस से पहले के पाठ में हमने बताया है कि सत्य के खोजी को अपनी अक़्ल का इस्तेमाल करना होगा ताकि निश्चित परिणाम तक पहँच सके, चाहे वह नतीजा सकारत्मक हो या नकारात्मक।
    नतीजा अगर सकारत्मक होगा तो उस दशा में अल्लाह के बाद के विषयों पर विचार व चिंता की बारी आएगी अर्थात फिर उसके बाद उसके गुणों के बारे में सोचना होगा कि अगर अल्लाह हो तो कैसा है? उस की खोज विशेषताएँ क्या हैं? लेकिन अगर जवाब नकारत्मक रहा अर्थात सत्य का खोजी चिंतन व विचार के बाद इस नतीजा पर पहुँचा कि इस सृष्टि को कोई रचयता नहीं है तो भौतिकवादी विचार धारा प्रमाणित होगी और फिर दीन से संबंधित दूसरे विष्यों पर विचार या चिंतन की कोई ज़रूरत नही होगी।
    आध्यात्मिक पहचान और हासिल की जाने वाली पहचान
    अल्लाह के बारे में दो तरह से पहचान व इल्म हासिल किया जा सकता है स्भाविक रूप से और दूसरे स्थान से हासिल करके।
    स्वाभाविक पहचान का आशय यह है कि इंसान चिंतन व समीक्षा के बिना विशेष तरह की मनोस्थिति व आध्यात्मिक ताक़त द्वारा यह विश्वास हासिल कर ले कि अल्लाह है और यह भी जान ले कि वह कैसा है।
    स्पष्ट है कि अगर किसी को इस तरह से अल्लाह की पहचान और उसके बारे में इल्म हासिल हो जाए, जैसा कि कुछ लोग दावा करते हैं, तो फिर उसें चिंतन और विचार के चरणों से गुज़रने की ज़रूरत नहीं होगी लेकिन जैसा कि हम पहले बता चुके हैं इस तरह का इल्म किसी साधारण मनुष्य के लिए संभव नहीं है और आध्यात्म के इस स्थान तक पहुँचने के लिए बहुत इबादत करनी पड़ती है और अगर कुछ साधारण लोगों में इस तरह की ताक़त अत्यन्त क्षीण रूप में मौजूद भी हो तो चूंकि उन्हें उन की जानकारी नहीं होती और उसके साथ इल्म भी नहीं होता इस लिए इस तरह के नतीजा और धार्मिक विचारधारा तक पहुँचने के लिए उस काफ़ी नहीं समझा जा सकता है।
    हासिल की जाने वाली पहचान का मतलब यह है कि इंसान बेनयाज़ रचयता, ज्ञानी, सक्षम जैसे अर्थों की सहायता से एक अदृष्य ताक़त के बारे में विचारधारा बना ले और केवल इतना विश्वास पैदा कर ले कि इस तरह कोई ताक़त हैं जिसने इस दुनिया की रचना की है फिर इस संदर्भ में ज़्यादा विचार करके दूसरे तरह की बातों व अल्लाह की विशेषताओं का इल्म हासिल करे तो फिर विचारों और विश्वासों के इस समूह धार्मिक विचारधारा का नाम दिया जा सकता है।
    तार्किक दलीलों और दार्शानिक विचारों के बात अपरोक्ष रूप से जो चीज़ हासिल होती है उसे हासिल की जाने वाली पहचान व इल्म का नाम दिया जाता है और जब इस तरह की पहचान हासिल हो जा तो फिर उस के बाद इंसान स्वाभाविक व आध्यात्मिक पहचान हासिल करने की भी कोशिश कर सकता है।
    स्वाभाविक पहचान
    हम प्रायः यह सुनते रहते हैं कि अल्लाह की पहचान इंसान की प्रवृत्ति में है और इंसान स्वाभाविक रूप से अल्लाह की पहचान रखता है। इस तरह के वाक्यों के मतलब को ज़्यादा समझने के लिए प्रवृत्ति और स्वभाव के बारे में हम कुछ चर्चा करेंगे।
    प्रवृत्ति व स्वभाव से आशय वह दशा होती है जो किसी भी प्राणी के जन्म के साथ उस में पाई जाती है और उस तरह के सभी प्राणियों में यह विशेषता व स्वभाव समान होता है। इस तरह से प्रवृत्ति व स्वभाव के लिए तीन विशेषताओं पर ध्यान दिया जा सकता हैः
    1.  प्रवृत्ति हर प्राणी में उस के जैसे दूसरे प्राणियों की तरह होती है भले ही किसी में प्रबल और किसी में क्षीण हो।
    2.  प्रवृत्ति हमेशा एक जैसी होती है और इतिहास से भी यह साबित होता है कि प्रवृत्ति में कभी तबदीली नहीं आता है आज इंसान की जो प्रवृत्ति हो वह हज़ार साल पहले भी थी।
    3.  प्रवृत्ति से संबंधित विशेषताओं को सीखने सीखाने की ज़रूरत नहीं होती अगरचे उसे सजाया संवारा जा सकता है और इस के लिए प्रिशिक्षण व सीखने की ज़रूरत हो सकती है।
    इंसान की प्रवृत्ति व फितरत को दो हिस्सों में बाँटा जा सकता हैः
    1.    प्रवृत्ति व स्वभाव संबधी पहचान जो हर इंसान में बिना किसी प्रशिक्षण व शिक्षा के पाई जाती है।
    2.    व्यक्तिगत स्वभाव व इच्छाएँ जो हर इंसान में अलग अलग भी हो सकती हैं।
    इस आधार पर किसी तरह की इलाही पहचान अगर प्रत्येक इंसान के लिए एक प्रमाणित विषय हो और उस के लिए उसे कुछ सीखने की ज़रूरत न हो तो फिर इस तरह की पहचान को अल्लाह की स्वाभाविक पहचान का नाम दिया जाता है और अगर इंसान में अल्लाह और उसकी इबादत की ओर सवाभाविक रूप से रुझान पाया जाता हो तो फिर उस स्वाभाविक इबादत का नाम दिया जा सकता है।
    दूसरे पाठ में हमने बताया था कि बहुत सी बुद्धिजीवी अल्लाह व दीन की ओर इंन्सान के रुझान को स्वाभाविक व मनोवैज्ञानिक विषय मानते हैं और उसे दीन बोध या दीन भावना का नाम देते हैं। यहाँ पर हम यह कहेंगे कि अल्लाह की पहचान भी इंसान के लिए स्वाभाविक बताई गयी है। लेकिन जिस तरह अल्लाह की पहचान की प्रवृत्ति भी जानी बूझी नहीं है कि साधारण लोगों को इस संदर्भ में चिंतन व विचार की ज़रूरत ही न पड़े। अर्थात हम ने जो यह कहा है कि अल्लाह की पहचान हर इंसान में स्वाभाविक रूप से होती है तो इस का मतलब यह नहीं होगा कि इंसान को अल्लाह की पहचान हासिल करने की दिशा में कोशिश की ज़रूरत ही नहीं है क्योकिं उस में यह पहचान स्वाभाविक रूप से मौजूद होती है।
        लेकिन इस बात को भी नहीं भूलना कि हर इंसान जिसे कम ही सही लेकिन अल्लाह की आध्यात्मिक पहचान होती है वह थोड़ा से चिंतन और विचार करके अल्लाह के वुजूद को स्वीकार कर सकता है और धीरे धीरे अपने बोध, इल्म और पहचान में वृद्धि करके चेतना व इल्म के चरण में पहुँच सकता है।
    नतीजा यह निकला की अल्लाह की पहचान व बोध के स्वाभाविक होने का यह मतलब है कि इंसान का दिल अल्लाह को पहचानता है और उसकी रूह की गहराईयों में इलाही पहचान की रौशनी मौजूद होता है जिसे बढ़ाया भी जा सकता है लेकिन साधारण लोगों में यह स्थिति ऐसी नहीं होती कि उन्हें चिंतन व विचार की ज़रूरत ही न रहे।

    सवालः
    1.  सृष्टि के बारे में विचारधारा का सबसे मुख्य विषय किया है? क्यों?
    2.  अल्लाह के बारे में पहचान के दोनों प्रकारों का बयान करें?
    3.  क्या आध्यात्मिक पहचान को तर्कों द्वारा हासिल किया जा सकता है क्यों?
    4.  हासिल की जाने वाली पहचान आध्यात्मिक पहचान के बारे में क्या भूमिका निभा सकती है?
    5.  प्रवृत्ति व फितरत का क्या मतलब होता है?
    6.  स्वाभाविक व फितरत कार्यों को विशेषताएँ बताएँ ?
    7.  स्वाभाविक बातों की किस्में बताएँ ?
    8.  कौन सा स्वाभाविक काम अल्लाह से संबंधित है ?
    9.  अल्लाह की स्वाभाविक पहचान का बयान करें ?
    10.  स्वाभाविक रूप से अल्लाह की पहचान होने के कारण इंसान इस संदर्भ में सोचने व चिंतन से मुक्त हो जाती है ? क्यों ?