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    अहले सुन्नत की इक़तेदा

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    अहले सुन्नत की इक़तेदा (यानी अहले सुन्नत के पीछे नमाज़ पढ़ना)
    (हज़रत आयतुल्लाह ख़ामेनई की नज़र में)

    सवाल 596: क्या अहले सुन्नत के पीछे नमाज़ जाएज़ है?
    जवाब:  इस्लामी इत्तेहाद के तहफ़्फ़ुज़ के लिये उनके पीछे नमाज़े जमाअत पढ़ना जाएज़ है।
    सवाल 597:  मैं कुरदों के इलाक़े में सरविस करता हूं वहां पर ज़्यादा तर आइम्मा जुमा व जमाअत अहले सुन्नत हैं उनके पीछे नमाज़ पढ़ने के सिलसिले में क्या हुक्म है? और क्या उनकी ग़ीबत जाएज़ है?
    जवाब:  वहदते इस्लामी के तह़फ़ुज़ के लिये उनके साथ उनकी जमाअत और जुमा की नमाज़ों में शिरकत करने में कोई हर्ज नहीं है और ग़ीबत से परहेज़ करना लाज़िम है।
    सवाल 598:  अहले सुन्नत के साथ समाजी और उनके साथ मेल जोल की बिना पर नमाज़े पंजगाना में शिरकत के दौरान कुछ मौक़ों पर हम भी उन ही की तरह अमल में मसलन हाथ बांध कर नमाज़ पढ़ना वक़्त की रिआयत व पाबन्दी न करना और जा नमाज़ पर सजदा करना, तो क्या ऐसी नमाज़ का दोबारह अदा करना ज़रूरी है?
    जवाब:  अगर इस्लामी इत्तेहाद इन तमाम चीज़ों का तक़ाज़ा करे तो इन के साथ नमाज़ पढ़ना सही और काफ़ी है यहां तक कि जा नमाज़ पर सजदा वग़ैरह में भी कोई हर्ज नहीं है, लेकिन इनके साथ नमाज़ में हाथ बांधना जाएज़ नहीं, मगर ये कि हालात और ज़रूरत इसका भी तक़ाज़ा करें।
    सवाल 599:  हम मक्के और मदीने में, अहले सुन्नत के साथ नमाज़े जमाअत पढ़ते हैं और ऐसा काम हम इमाम ख़ुमैनी रह0 के फ़त्वे की वजह से करते हैं और कुछ औक़ात (कभी-कभी) मस्जिद में नमाज़ की फ़ज़ीलत हासिल करने की ग़र्ज़ से ज़ोहर व मग़रिब की नमाज़ के बाद, असर व इशा की नमाज़ें भी हम अहले सुन्नत की मस्जिदों में सजदागाह के बग़ैर फु़रादा पढ़ते हैं, इन नमाज़ों का क्या हुक्म है?
    जवाब: ज़िक्र किये हुऐ मसअले में अगर फ़रीज़ा तक़य्ये के साथ कोई हर्ज न हो तो सजदा ऐसी चीज़ पर करना चाहिये जिस पर सजदा करना सही हो।
    सवाल 600: हम शियों के लिये दूसरे मुल्कों की मस्जिदों में अहले सुन्नत की नमाज़ में शिरकत करना कैसा है? जबकि वो हाथ बांधकर नमाज़ पढ़ते हैं? और क्या उन की तरह हाथ बांधना हमारे ऊपर वाजिब है या हम हाथ बांधे बगैर नमाज़ पढ़ें?
    जवाब:  अगर इस्लामी इत्तेहाद का ख़याल हो तो अहले सुन्नत की इक़तेदा जाएज़ है और उनके साथ नमाज़ पढ़ना सही और काफ़ी है लेकिन नमाज़ में हाथ बांधना वाजिब नहीं है बल्कि जाएज़ भी नहीं है मगर ये कि वहां के हालात इसका तक़ाज़ा करें।
    सवाल 601:  अहले सुन्नत की नमाज़े जमाअत में शिरकत के वक़्त क़याम की हालत में दोनों तरफ़ खड़े हुए शख़्स के पैरों की छोटी उंगली से उंगली मिलाने का क्या हुक्म है? जिसको अहले सुन्नत लाज़िम समझते हैं?
    जवाब:  ये वाजिब नहीं है और अगर कोई ऐसा करे तो उससे नमाज़ पर कोई असर नहीं होता।
    सवाल 602:  अहले सुन्नत अज़ाने मग़रिब से पहले मग़रिब की नमाज़ पढ़ते हैं क्या हज के ज़माने में या इसके अलावा हमारे लिये उनकी इक़तेदा करना और उस नमाज़ पर भरोसा करना सही है?
    जवाब:  ये मालूम नहीं है कि वो वक़्त से पहले नमाज़ पढ़ते हैं लेकिन अगर मुकल्लफ़ (वोह शख़्स जिस को यह मसअला पैश आया है) के लिये वक़्त का दाखिल होना साबित न हुआ हो तो उसका नमाज़ में शामिल होना सही नहीं है हां अगर इस्लामी इत्तेहाद इसका तक़ाज़ा करे तो उस वक़्त उनके साथ नमाज़ पढ़ने और उसी नमाज़ को काफ़ी समझने में कोई हर्ज नहीं है।