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    आदर्श जीवन शैली – 6

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    हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपने बेटे इमाम हसन अलैहिस्सलाम से वसीयत में कहते हैं, “ जीवन में अत्यंत कोशिश करो क्योंकि जो व्यक्ति किसी चीज़ की प्राप्ति के लिए कोशिश करता है तो वह उस चीज़ के पूरे भाग या कम से कम किसी एक भाग को पा लेता है।” काम और रोज़गार मनुष्य को अनुचित गतिविधियों व क्रियाकलापों से रोक देता है। बेरोज़गारी, निठल्लापन और अनुचित वैचारिक तल्लीनता से मनुष्य के मानसिक स्वास्थ पर बुरा प्रभाव पड़ता है। जो लोग उपयोगी व रचनात्मक गतिविधियों से दूर रहते हैं वे हानिकारक गतिविधियों में व्यस्त हो जाते हैं। आज कल कार्य, मनोरंजन, और स्वस्थ गतिविधियों को मानसिक रोगों के उपचार की सबसे महत्वपूर्ण शैलियों में गिना जाता है। कार्य से न केवल यह कि मानसिक विकार रुकता है बल्कि यह प्रतिभाओं एवं व्यक्तित्व के सही विकास के लिए भी ज़रूरी है। व्यवसायिक संतोष, मानसिक स्वास्थय की निशानियों में से एक निशानी है। व्यवसायिक संतोष से उपयोगिता बढ़ती और कार्य में ग़लतियां कम होती हैं। व्यवसायिक संतुष्टि, अधिकारियों के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है। क्योंकि जो कर्मचारी या मज़दूर अपने काम से संतुष्ट होगा उसमें कार्यक्षमता अधिक होगी।

    कभी कोई कार्य किसी कर्तव्य को अंजाम देने के लिए किया जाता है और कभी कोई कार्य व्यक्ति पूरी रूचि से करता है। किसी कार्य को कर्तव्य भावना से अंजाम देना यद्यपि बहुत मूल्यवान है किन्तु ये रूचि के साथ किए जाने वाले कार्य का स्थान नहीं ले सकता। जो कार्य व्यक्ति रूचि से अंजाम देता है उससे वह ऊबता नहीं है। इस स्थिति में रचनात्मकता विकसित होती है और कार्य बेहतरीन ढंग से अंजाम पाता है। किन्तु यदि कोई व्यक्ति अपने कार्य व व्यवसाय से संतुष्ट न हो तो अवसाद का शिकार हो जाएगा और उसके काम का अपेक्षाकृत परिणाम भी नहीं निकलेगा। इस स्थिति में व्यक्ति का परिवार और समाज भी प्रभावित होंगे।

    किताब Every street is paved with gold के लेखक किम वू चूंग लिखते है, “ बहुत दुख की बात है कि लोग कार्य और व्यवसाय को केवल अपने पेट भरने का साधन समझें और इससे भी अधिक दुख की बात यह है कि लोग युवावस्था में उच्च मनोबल व आशा से भरे होने के बजाए अपने कार्य व व्यवसाय में थकन व ऊबने का आभास करें। यदि अपने कार्य व व्यवसाय में गर्व करें और उसे अंजाम देने में संतुष्टि का आभास करें तो इस स्थिति में आपका कार्य व व्यवसाय आपके लिए आनंद व ख़ुशी का आधार बनेगा।”
    यदि कार्य आनंद से करेंगे तो थकन का आभास नहीं करेंगे क्योंकि कार्य आपके लिए मनोरंजन समान हो जाएगा। कार्य से संबंधित स्वस्थ मानसिकता के बारे में एक महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि कार्य को मनुष्य की क्षमता व रूचि के अनुरूप होना चाहिए। हर व्यक्ति में एक विशेष क्षमता है। ऐसा नहीं है कि व्यक्ति के अस्तित्व में हर कार्य व व्यवसाय की क्षमता मौजूद है। लोगों को विभिन्न क्षमताओं व रूचियों के साथ पैदा किया गया है। सफलता का एक राज़ यह भी है कि मनुष्य ऐसा कार्य व व्यवसाय चुने जो उसकी योग्यता के अनुरूप हो। इस बात में शक नहीं कि व्यक्ति की विफलता का एक कारण इस मूल सिद्धांत का अनुसरण न करना भी है। यदि कार्य व व्यवसाय व्यक्ति की योग्यता के अनुरूप होगा तो कामयाबी मिलेगी। एडिसन से किसी ने पूछा कि क्यों अधिकांश युवा सफल नहीं होते? उन्होंने कहा, “पहली बात यह कि स्वयं को नहीं पहचान पाते और दूसरी ओर क़दम बढ़ाते हैं। ऐसे लोग दो प्रकार से समाज को हानि पहुंचाते हैं पहले यह कि ऐसा काम करते हैं जिसके योग्य नहीं होते। दूसरे यह कि ऐसा काम का दायित्व लेते हैं जिसे अच्छी तरह कर नहीं पाते।”
    विचारों में एकाग्रता और इसमें बिखराव से बचना भी मनुष्य के मन और जीवन पर कार्य का पड़ने वाला एक और सकारात्मक प्रभाव है। यदि व्यक्ति की वैचारिक शक्ति अच्छे कार्य पर केन्द्रित हो तो फिर बुरे विचारों के पनपने की भूमि ही प्रशस्त नहीं होती। चूंकि बुरे विचार का मनुष्य के मन पर बुरा प्रभाव पड़ता है और उसे पाप के लिए उकसाते हैं, इसलिए यह कहना सही है कि सही कार्य मनुष्य को मानसिक स्वास्थय की गैरंटी देता है।

    इन दिनों कार्यालयों व संगठनों के कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थय को सुनिश्चित बनाना सभी दूरदर्शी अधिकारियों की चिंता का विषय है। कार्यस्थल में मानसिक स्वास्थय के नियमों के पालन से कार्य में संतोष मिलता है और उपयोगिता में वृद्धि होती है।
    कार्य के स्वस्थ मन से अंजाम देने में कई तत्व प्रभावी होते हैं। जैसे कार्यस्थल का न्यायपूर्ण माहौल, स्वयं कार्य का स्वास्थय की दृष्टि से सही होना, रोज़गार सुरक्षा और इसी प्रकार कार्य का स्वरूप जैसे तत्व प्रभावी होते हैं। शोध दर्शाते हैं कि कार्य के घंटों के बीच आराम, स्वास्थय रक्षा के ख़र्चों की पूर्ति, आराम के समय आराम करना, कर्मचारी और अधिकारी के बीच सही संबंध और कार्यस्थल की स्थिति का बेहतर होना, ये सब प्रभावी तत्वों के नेटवर्क हैं जिनका मानसिक स्वास्थय और कार्य की गुणवत्ता पर प्रभाव पड़ता है और किसी न किसी तरह इनका जीवन शैली पर भी प्रभाव पड़ेगा।

    जैसा कि आप जानते हैं कि लोग अपने जीवन का ज़्यादातर समय कार्यस्थल में बिताते हैं इसलिए कार्यस्थल का माहौल व्यक्ति के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थय की दृष्टि से बहुत महत्व रखता है। कार्यस्थल में मानसिक दबाव के कारण कार्य करने वाला, कार्यस्थल पर न होने के बावजूद तनावग्रस्त रहता है। इस समस्या का व्यक्ति के समाज और विशेष रूप से परिवार के सदस्यों के साथ संबंधों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। कार्यस्थल पर मानसिक स्वास्थ का कार्य के माहौल के सही होने का कारण बनता है कि इस प्रकार कार्य करने वाला मानसिक विकार का शिकार नहीं होता। रोज़गार गैरंटी की ओर से चिंता, पारिवारिक समस्याएं, परिवार के सदस्यों का एक दूसरे से दूर होना, कार्यरत माओं में अपने शिशुओं के प्रति चिंता, सामाजिक व आर्थिक समस्याएं वे तत्व हैं जिनका विभिन्न विभागों में कार्यरत लोगों के मन पर दबाव पड़ता है कि इन तत्वों को दूर करने पर मनोवैज्ञानिक बल देते हैं। इन सब तनाव के कारण लोग, जिन कार्य व ज़िम्मेदारियों को सामान्य स्थिति में भलिभांति अंजाम देने की क्षमता रखते हैं, बड़ी मुश्किल से अंजाम दे पाते हैं या यह कि बिलकुल ही अंजाम नहीं दे पाते जिससे उन संस्थाओं को समस्याओं का सामना होता है जिनमें वे काम करते हैं।

    आपस में सहयोग का वातावरण बनाना, कर्मचारियों में परस्पर सम्मान की भावना, ज़ोर ज़बर्दस्ती पर आधारित शैली से परहेज़, क्षमता की पहचान और उसके विकास का माहौल बनाना, और निर्णय लेते समय कर्मचारियों की राय लेना तथा सही अवसर पर उन्हें प्रोत्साहित करना वे तत्व हैं जिनके द्वारा अधिकारी कर्मचारियों पर दबाव कम कर सकते हैं और मानसिक स्वास्थय मुहैया कर उनकी कार्यक्षमता बढ़ा सकते हैं।

    इस्लाम की ओर से कार्य और प्रयास पर इस्लाम की ओर से अत्यधिक बल दिए जाने के बावजूद कार्य में मध्यमार्ग अपनाने की अनुशंसा की गयी है। इस्लामी शिक्षाओं में कार्य के साथ साथ स्वस्थ मनोरंजन पर भी बल दिया गया है।