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    आदर्श जीवन शैली – 9

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    ख़ाली समय के महत्त्व और इससे लाभ उठाने के मार्गों पर चर्चा करेंगे।

    जैसा कि हमने इससे पूर्व बयान किया था कि आदर्श जीवन शैली में यह समस्त चीज़ें सम्मलित हैं कि हम किस प्रकार का वस्त्र धारण करें, कैसा आहार लें, ख़ाली समय को कैसे व्यतीत करें और हमारे सामाजिक संस्कार और लोगों से हमारे संबंध कैसे होने चाहिए। यह सब चीज़ें आदर्श जीवन शैली के भाग हैं जो मनुष्य की आइडियालाजो और उसकी आस्था से प्रेरित होते हैं। भौतिक सोच में आदर्श जीवन शैली जो पश्चिमी विचारधारा के नाम से प्रसिद्ध है, धार्मिक या एकेश्वरवादी विचारधारा से बहुत भिन्न है। इस आधार पर यह दोनों विचार अलग अलग विचार धारा को जन्म देते हैं। धार्मिक सोच का दावा है कि ईश्वर की ओर से मनुष्य के जीवन के हर बिन्दु के लिए कार्यक्रम हैं और उसका समस्त कार्यक्रम लक्ष्य पूर्ण होता है। पश्चिमी जीवन के विपरीत इस्लामी जीवन शैली केवल व्यक्तिगत आनंदों पर आधारित नहीं होती बल्कि व्यक्ति आनंदों से लाभ उठाने के साथ इसमें यह भी बयान किया जाता है कि जीवन को किसी प्रकार लक्ष्यपूर्ण बनाएं और दूरदर्शिता के साथ अपना जीवन व्यतीत करें। इसमें मनोरंजन और विश्राम के समय को किसी प्रकार व्यतीत करें यह सब भी बयान किया गया है। आइये अब इस विषय पर चर्चा करते हैं कि ख़ाली समय का कितना महत्त्व है और ख़ाली समय से कैसे लाभ उठाया जाए।

    आजकल ख़ाली समय का मुद्दा, नगरों में रहने की चाह, औद्योगिक काल और आधुनिक युग की देने है। मनुष्य अपनी दिनचर्या व्यतीत करने के लिए सदैव सक्रिय रहने पर विवश है और वह अपने जीवन के कई महत्त्वपूर्ण घंटे अपने कार्यालय और सीमित व बंद वातावरण में गुज़ारता है। यह विषय मानसिक, आत्मिक समस्याओं और शारीरिक हानियों का कारण बनता है जबकि कुछ लोग ख़ाली में अधिक से अधिक काम लेकर इससे लाभ उठाते हैं। इसी के साथ कुछ लोग ऐसे भी हैं जो ख़ाली समय को मनुष्य के हर प्रकार की प्रतिबद्धताओं, क़ानूनों और सीमित्ताओं से स्वतंत्रता का समय समझते हैं। इस गुट के अनुसार, ख़ाली समय अर्थात बिना ज़िम्मेदारी, केवल और केवल स्वतंत्रता और सामाजिक ज़िम्मेदारियों से फ़रार का समय।

    यह विचारधारा इस्लामी विचारधारा से बहुत भिन्न है। इस्लाम की दृष्टि में ख़ाली समय कभी भी निठल्ला बैठने और बिना ज़िम्मेदारी के रहने के अर्थ में नहीं है क्योंकि जब भी मनुष्य में बुद्धि, अधिकार, जागरूकता और शक्ति पायी जाएगी, उस पर ज़िम्मेदारियां भी होंगी। इस आधार पर ख़ाली समय को कभी भी बिना ज़िम्मेदारी, केवल स्वतंत्रता और ज़िम्मेदारियों से फ़रार का समय नहीं कहा जा सकता। ख़ाली समय, बेकार बैठने के अर्थ में भी नहीं है। क्योंकि बेकार का अर्थ होता है कि मनुष्य निठल्ला बैठा हो और उसके पास करने को कुछ न हो किन्तु ख़ाल समय में करने के लिए तो बहुत से काम होते हैं। कुछ इस्लामी कथनों में ख़ाली समय को बेकार बैठने के अर्थ में बताने की बड़ी निंदा की गयी है और बेकार व्यक्ति को उस व्यक्ति के रूप में याद किया गया है जिससे ईश्वर क्रोधित होता है। कथनों में बयान किया गया है कि जान लो कि ईश्वर, अधिक सोने और निठल्ले रहने वाले व्यक्ति को शत्रु समझता है।
    ख़ाली समय के मापदंडों में से एक यह है कि मनुष्य अपने दिनचर्या के कामों से स्वतंत्र हो। शायद इसी विशेषता के कारण कुछ लोग ख़ाली समय को बेकारी के अर्थ में समझते हैं किन्तु यह बात स्पष्ट है कि दिनचर्या और आधिकारिक कामों से छुट्टी या स्वतंत्र रहना बेकार बैठने के अर्थ में नहीं है। ख़ाली समय की दूसरी विशेषता यह है कि व्यक्ति ख़ाली समय में ज़ोर ज़बरदस्ती थोपे गये काम को अपनी गतिविधियों के रूप में चयन नहीं करता और अपनी रुचि के काम करना पसंद करता है। दूसरे शब्दों में इन समय में अपने रुचि के कामों का चयन करने के लिए मनुष्य के पास अधिक अधिकार और शक्ति होती है। यही कारण है कि ख़ाली समय में हर एक अपनी पसंद का काम करता है। संभव है कि एक व्यक्ति ख़ाली समय में कठिन व थका देने वाला काम अंजाम दे। इसीलिए यह कहा जा सकता है कि ख़ाली समय बिताना इस बात से प्रभावित होता कि व्यक्ति कैसा है, उसकी सामाजिक, प्रशिक्षण संबंध और शिष्टाचारिक पहचान कैसी है?

    ख़ाली समय में लोग सामान्य रूप से भौतिक चीज़ों के बारे में नहीं सोचते। लोगों के ख़ाली समय को इस प्रकार से व्यवस्थित कर दिया जाए कि सामाजिक स्तर पैसों की आवाजाही और अर्थव्यवस्था के मज़बूत होने का कारण बने। ख़ाली समय किसी विशेष वर्ग या आयु से विशेष नहीं है। समाज के सभी लोगों को ख़ाली समय की आवश्यकता होती है। यही आवश्यकता, ख़ाली समय के लिए बेहतरीन कार्यक्रम बनाने के महत्त्व की सूचक है।
    समय के महत्त्व और निठल्ले पन और सुखभोग की निंदा के महत्त्व के बारे में इस्लामी समस्त शिक्षाओं के दृष्टिगत कहा जा सकता है कि ख़ाली समय के बारे में इस्लाम का दृष्टिकोण, प्रशिक्षण व शिष्टाचार संबंधी दृष्टिकोण है और कभी भी बिना लक्ष्य के समय बिताना नहीं है।

    ख़ाली समय का एक और महत्त्व यह है कि यह संस्कृति बनाने का बेहतरीन समय है। ख़ाली समय को सही ढंग से व्यवस्थित करके मनुष्य अपनी आस्थाओं, मूल्यों, व्यवहारों, रुचियों और अपनी इच्छाओं को दृष्टिगत दिशा की ओर ले जा सकता है। वर्तमान समय में अधिकतर पश्चिमी देशों में सांस्कृति के क्षेत्र में अधिकतर पूंजीनिवेश फ़िल्मों, धारावाहिकों, एनीमीश्न, खिलौनों और कंप्यूटर गेम्स के निर्माण में किया जा रहा है जिसका मूल्य लक्ष्य लोगों के ख़ाली समय को भरना है। इन सांस्कृतिक उत्पादन ने पश्चिमी मूल्यों व विचारधाराओं को प्रचलित करके आज पूरी दुनिया को प्रभावित कर रखा है।
    ख़ाली समय में विभिन्न प्रकार के कार्य किए जा सकते हैं ताकि जीवन वही पुरानी व घिसी पिटी चीज़ों व पुराने ढर्रे की परिधि से निकल जाए और शारीरिक व मानसिक थकन, दायित्वों के निर्वाह में लापरवाही का कारण न बने। ख़ाली समय, लोगों की क्षमताओं के पुनर्निमाण का कारण बन सकता है और उसके परिणाम को उच्च स्तर पर पहुंचा सकता है।
    ख़ाली समय, बहुत की मानसिक व आत्मिक समस्याओं, अवसाद, भय और क्रोध को नियंत्रित कर सकता है और परिणाम स्वरूप आत्मा व मन की शांति व शारीरिक सुख प्राप्त होता है। ख़ाली समय के सामाजिक गतिविधियों में व्यतीत होने की स्थिति में मनुष्य का सामाजिक विकास होता है और उसके सामाजिक संबंध मज़बूत होते हैं। ख़ाली समय के सही प्रबंधन और उसे सही ढंग से व्यवस्थित करने से सामाजिक व व्यक्तिगत हानियों में कमी और समस्याएं समाप्त होती हैं।

    ख़ाली समय में सबसे महत्त्वपूर्ण काम यह है कि अपने धार्मिक व उपासना संबंधी कामों को अधिक अंजाम दिया जाए और धर्म के बारे में अपनी जानकारियों में वृद्धि की जाए। हज़रत अली अलैहिस्सलाम इस संबंध में कहते हैं कि यह न भूलो अपने स्वास्थ्य, शक्ति, ख़ाली समय, जवानी और उत्साह को परलोक की प्राप्ति के लिए प्रयोग करो।
    ख़ाली समय अपनी समस्त विशेषताओं के साथ यदि इसको सही ढंग से व्यवस्थित न किया जाए तो यह समाज की आत्मिक व नैतिक सुरक्षा के लिए एक गंभीर ख़तरा बन सकता है। यह कहा जा सकता है कि समाज में फैली अधिकतर बुराइयों और पथभ्रष्टता का मुख्य कारण, सामाजिक व व्यक्ति रूप से ख़ाली समय का सही उपयोग न होना है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम का कहना है कि ख़ाली समय में शैतानी इच्छाओं की ओर रुझहान पैदा होता है।
    पवित्र क़ुरआन, पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम और उनके पवित्र परिजनों की शिक्षाओं ने ख़ाली समय को सही से व्यतीत करने के लिए संपूर्ण क़ानून और मापदंड निर्धारित किए हैं और कुछ विषयों को छोड़कर छोटे छोटे मामलों में प्रविष्ट नहीं होते। बहुत से विषय समय और स्थान पर निर्भर होते हैं जो परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होते रहते हैं। कुछ आयतों और कथनों से यह सिद्ध किया जाता है कि इस्लाम हमसे चाहता है कि उच्च स्थान प्राप्त करने के किसी भी अवसर को हाथ से न जाने दो। जब भी हम किसी महत्त्वपूर्ण काम से छुटकारा पायें तो हमें दूसरे महत्त्वपूर्ण कार्य में व्यस्त हो जाना चाहिए। यह आदेश देने का उद्देश्य यह है कि हमारे पास अपने जीवन के लिए कुछ कार्यक्रम होने चाहिए और हमें सदैव अपने मुख्य लक्ष्य की ओर बढ़ते रहना चाहिए।

    ईश्वर पवित्र क़ुरआन के सूरए नशरह की आयत संख्या सात व आठ में कहता है कि इसलिए जब आप किसी महत्त्वपूर्ण कार्य से छुट्टी पायें तो दूसरे महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम में व्यस्त हो जाएं और अपने ईश्वर की ओर रुख़ करें।
    इस आयत के आधार पर पैग़म्बरे इस्लाम से ईश्वर यह चाहता है कि वह विकास और प्रगति के लिए कोई भी अवसर हाथ से जाने न दें। ईश्वर कहता है कि जब भी महत्तवपूर्ण काम समाप्त हो जाए तो अपनी पसंद के दूसरे काम में व्यस्त हो जाओ।
    धार्मिक संस्कृति के आधार पर हमें इस बात का अधिकार नहीं है कि अपने जीवन के एक क्षण को भी निठल्ला व्यतीत न करें क्यों हमें अपने जीवन के हर क्षण के बारे में उत्तर देना होगा। कथनों में आया है कि प्रलय में जिन चीज़ों के बारे में पूछा जाएगा उनमें से एक यह भी है कि हमने अपने जीवन को कैसा व्यतीत किया। यही कारण है कि पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों ने सदैव इस बात से सचेत किया है कि तुम्हारे पास जो अवसर है और जो समय है उसका ध्यान रखो, न समय को बचाने की संभावना है और न बीते समय को पलटाना संभव है।

    हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम का कहना है कि मैं पसंद नहीं करता कि तुम्हारे बीच एक ऐसे युवा हो किन्तु इन दो परिस्थितियों में से एक हो। या विद्वान व बुद्धिजीवी हो या शिष्य हो। उस ईश्वर की सौगंध जिसने पैग़म्बरे इस्लाम को अपना दूत बनाया। यदि कोई इन दोनों में से न हो तो उसने लापरवाही की है और उस स्थिति में उसने अपने जीवन को बर्बाद कर दिया और जिसने अपने जीवन को बर्बाद कर दिया वह पापी है और जो पापी है वह नरक में रहेगा।

    इस्लाम जो चीज़ हमसे चाहता है वह यह है कि अपने ख़ाली समय को बहुत अच्छे ढंग से व्यतीत करें और सुव्यवस्थित ढंग से ख़ाली समय को अच्छे ढंग से प्रयोग करें। इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम सहीफ़ये सज्जादिया में इस संबंध में ईश्वर से मांग करते हैं कि हे मेरे पालनहार यदि तूने हमारे लिए काम से कुछ ख़ाली समय निर्धारित किया है तो उसे सुरक्षित रख कि उसमें हमसे पाप न हो और हमें थकन न हो ताकि फ़रिश्ते और बुरे कर्म लिखने वाले हमारे पास ऐसे कर्मपत्र लेखकर आएं जिसमें पाप न हों और अच्छाई लिखने वाले उन अच्छाइयों के कारण जो उन्हें लिखा है प्रसन्न हों।