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    आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई 1

    आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई 1
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    ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई का जन्म २४ तीर १३१८ हिजरी शम्सी बराबर १९३९ ईसवी को ईरान के पूर्वोत्तर में स्थित पवित्र नगर मशहद में हुआ था। वह अपने परिवार के दूसरे बेटे थे और उनकी प्रशिक्षा पूर्णरूप से एक धार्मिक परिवार में हुई थी। उनके पिता पवित्र नगर मशहद के एक वरिष्ठ धर्मगुरू और माता एक ईमानदार, पवित्र, पुस्तकों का अध्ययन प्रेमी और सुशील व्यवहार की महिला थीं। ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता अपने माता- पिता के बारे में कहते हैं” हमारे माता- पिता बहुत अच्छे माता-पिता थे। हमारी माता एक बहुत ही समझदार, पढ़ी लिखी, पुस्तकों का अध्ययन करने वाली और शेर एवं कला से प्रेम करने वाली महिला थी। वह दीवाने हाफिज़ से प्रेम करती थी और कुर्आन से पूर्ण रूप से अवगत थी।

    कम खर्च, सादा जीवन और प्रेम इस परिवार की विशेषता थी। इस आधार पर घर में प्रेम और निष्ठा का वातावरण व्याप्त था। सैयद अली ख़ामनेई ४-५ वर्ष की आयु में सदैव अपने बड़े भाई सैयद मोहम्मद के साथ पवित्र क़ुरआन सीखने के लिए मदरसे जाते थे। उसके बाद दोनों भाई शिक्षा अर्जित करने के लिए “दारूत्तालिम दियानती”नामक एक इस्लामी मदरसे में जाते थे। उस मदरसे में प्राइमरी की बेसिक शिक्षा के अतिरिक्त पवित्र क़ुरआन का पढ़ना सिखाया जाता और दूसरी इस्लामी किताबों को भी पढ़ाया जाता था। इसके अतिरिक्त गणित और अरबी भाषा के आरंभिक व्याकरण की शिक्षा भी दी जाती थी।
    स्वयं ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता के कथनानुसार इस्लामी शिक्षा ग्रहण करने का आरंभ सबसे पहले उनके घर और उसके बाद मदरसे से हुआ। उनके माता- पिता ने बचपन में ही नह्व और सर्फ़ नामक अरबी व्याकरण की शिक्षा दी। आयतुल्लाह खामनेई शिक्षा ग्रहण करने में अपनी मूल रूचि के बारे में कहते हैं” सामान्यरूप से मैं धार्मिक शिक्षा ग्रहण करता था और प्राइमरी के बाद मैं धार्मिक मदरसे गया यानी १२ वर्ष के बाद। इस आधार पर आरंभ से ही यह ज्ञात था कि मैं धार्मिक शिक्षा ग्रहण करूंगा”
    ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता १४ वर्ष की आयु में “सुलैमान ख़ान” नामक मदरसे गये और वहां पर उन्होंने इस्लामी शिक्षा ग्रहण करने में अधिक परिश्रम व प्रतिभा का परिचय दिया। अतः उनके पिता ने उसी आयु में उन्हें “शरहे लोमा”नाम की उच्च स्तर की धार्मिक पुस्तक की शिक्षा देने का निर्णय किया। उस समय वर्ष १३३१ हिजरी शम्सी बराबर १९५२ में सैयद मुजतबा नव्वाब सफवी कुछ इस्लामी संघर्षकर्ताओं के साथ पवित्र नगर मशहद जाते हैं और वहां पर वह मदरसे सुलैमान में बड़ा जोशीला, इस्लाम और ईश्वरीय शिक्षाओं के जीवित होने के संबंध में भाषणा दिया। आयतुल्लाह खामनेई उस समय मदरसे सुलैमान के एक धार्मिक छात्र थे और वे साम्राज्य विरोधी नव्वाब सफवी के जोशिले भाषण से बहुत प्रभावित हुए। वरिष्ठ नेता इस संबंध में कहते हैं” उसी समय नव्वाब सफवी के भाषण से मेरे अंदर इस्लामी क्रांति की ज्योति जल उठी और मुझे इस बात में कोई संदेह नहीं है कि दिवंगत नव्वाब सफवी ने ही मेरे हृदय में पहली ज्योति जलाई”
    ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने साढ़े पांच वर्षों में धार्मिक शिक्षा की आरंभिक पुस्तकों को पढ़ लिया और १८ वर्ष की आयु में उन्होंने उच्च धार्मिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रयास आरंभ किया। स्वयं वरिष्ठ नेता के कथनानुसार उच्च धार्मिक शिक्षा ग्रहण करने के दौरान वे सबसे छोटे शिष्य थे और ज्ञान अर्जित करने में यह उनकी तेज़ व प्रखर बुद्धि की सूचक है। ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता सैयद अली ख़ामनेई पवित्र नगर मशहद में महान धर्मगुरू आयतुल्लाह मीलानी से धर्म की उच्चतम शिक्षा प्राप्त की और धार्मिक शिक्षा ग्रहण करने में उन्होंने अपने पिता से भी लाभ उठाया। वरिष्ठ नेता इस संबंध में कहते हैं” मुझे कहना चाहिये कि ज्ञान अर्जित करने में मेरे पिता की सहायता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है”
    ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई ज्ञान अर्जित करने में काफी परिश्रम के बाद उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए इराक के पवित्र नगर नजफ चले गये ताकि हज़रत अली अलैहिस्सलाम के पवित्र रौज़े के दर्शन के साथ महान धर्मगुरूओं से उच्च धार्मिक शिक्षा अर्जित कर सकें। वह कुछ दिनों तक नजफ में थे परंतु अपने पिता के कहने पर इराक़ के पवित्र नगर नजफ से ईरान के पवित्र नगर मशहद लौट आये और वहां से इस्लामी शिक्षाओं के केन्द्र ईरान के पवित्र क़ुम रवाना हो गये। आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई ने वर्ष १३३७ हिजरी शम्सी से १३४३ हिजरी शम्सी तक पवित्र नगर क़ुम में धर्मशास्त्र, ऊसूल और दर्शनशास्त्र सहित विभिन्न इस्लामी ज्ञानों को अर्जित किया। इस अवधि में उन्होंने आयतुल्लाह बुरूजेर्दी, इमाम ख़ुमैनी और अल्लामा तबातबाई जैसे महान धर्मगुरूओं से धार्मिक शिक्षा ग्रहण की। धार्मिक शिक्षा अर्जित करने की अवधि में ही आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई के गुरूओं ने उनकी क्षमता व प्रतिभा को समझ लिया था और वे कहने लगे थे कि उनका भविष्य बहुत उज्वल होगा।
    दूसरी ओर आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई वर्ष १३४१ हिजरी शम्सी अर्थात १९६२ से पवित्र नगर कुम में शाह के विरुद्ध इमाम खुमैनी की क्रांति से जुड़ गये और उन्होंने गम्भीर रूप से अपने राजनीतिक संघर्ष का आरंभ किया। ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई अपने युवाकाल के बारे में कहते हैं”” मैं स्वयं एक बहुत सक्रिय व उत्साही युवा था। इस्लामी क्रांति के आरंभ से पहले भी साहित्यिक, कलात्मक और इस जैसी गतिविधियों में सक्रिय होने के कारण मैं अपने जीवन में बहुत सक्रिय था और क्रांति के बाद भी कि उसके लिए १३४१ से प्रयास आरंभ हो गये थे और उस समय मैं २३ वर्ष का था। स्वाभाविक रूप से देश में जो कुछ हो रहा था मैं उससे पूरी तरह अवगत था और वर्ष १३४२ में मुझे दोबारा जेल में डाल दिया गया। गिरफ्तारी, जेल, पूछताछ। आप जानते हैं कि इन सब चीज़ों से मनुष्य का उत्साह बढ़ता है। इसके बाद जब मनुष्य जेल से बाहर आता था तो वह उन बहुत सारे लोगों को, जो इन मूल्यों में रूचि रखते थे और इमाम ख़ुमैनी जैसे मार्गदर्शक को देखता था कि इमाम खुमैनी लोगों का मार्ग दर्शन करते थे और कार्यों, सोचों तथा मार्गों का सुधार करते थे तो उस व्यक्ति का उत्साह अधिक हो जाता था। यह था हम जैसे लोगों का जीवन जो इस बारे में सोचते थे हम अपने जीवन में बहुत सक्रिय थे””
    ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता को पहली बार इमाम ख़ुमैनी की ओर से यह ज़िम्मेदारी सौंपी गयी कि वह इमाम खुमैनी के संदेश को आयतुल्लाह मीलानी और खुरासान प्रांत के दूसरे धर्मगुरूओं तक पहुंचा दें। इमाम ख़ुमैनी ने इन धर्मगुरूओं से सिफारिश की थी कि वे मोहर्रम के दिनों में और अपने भाषणों में शाह की अत्याचारी सरकार के अपराधों का रहस्योदघाटन करें। ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाह मीलानी तक संदेश पहुंचाने के बाद स्वयं खुरासान प्रांत के एक नगर में गये और वहां पर उन्होंने धर्म का प्रसार किया और पहलवी सरकार का रहस्योदघाटन तथा ईरान के आंतरिक मामलों में अमेरिकी हस्तक्षेप को बयान किया। इसी कारण उन्हें शाह की सरकार ने गिरफ्तार कर लिया। ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता की व्यक्तिगत विशेषताओं ने दिन- प्रतिदिन उन्हें लोगों के मध्य लोकप्रिय बना दिया। अतः शाह की गुप्तचर सेवा सावाक भी उनके साहस से डरती थी और उसके बाद वह उन पर पैनी दृष्टि रखती थी।
    वर्ष १३४२ हिजरी शम्सी बराबर १९६३ में और इमाम ख़ुमैनी की गिरफ्तारी के बाद आयतुल्लाह खामनेई को भी पवित्र नगर क़ुम में उनकी गतिविधियों के कारण गिरफ्तार करके पवित्र नगर मशहद स्थानांतरित कर दिया गया। वरिष्ठ नेता को १० दिनों तक जेल में बहुत प्रताडित किया गया और वहां पर उन्हें नाना प्रकार की यातनाएं दी गयी परंतु सैयद अली ख़ामनेई, जिन्होंने ईरान के आंतरिक मामलों में विदेशी हस्तक्षेप और अत्याचार के विरूद्ध संघर्ष व प्रतिरोध का मार्ग चुना था, संघर्ष से पीछे नहीं हटे और उन्होंने अपने कुछ साथियों के साथ ईरान के विभिन्न नगरों में जाने का निर्णय किया ताकि लोगों को शाह के अत्याचारों व अपराधों और शाही सरकार की व्यवस्था से अवगत करें। इन यात्राओं में वरिष्ठ नेता के साहस, स्पष्ट भाषण और शाही सरकार के अत्याचारों के रहस्योदघाटन में क्रांतिकारी उत्साह अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया और सावाक ने एक रात उन्हें गिरफ्तार करके विमान से तेहरान भेज दिया। तेहरान में उन्हें दो महीने तक जेल में अकेले सेल में रखा गया और वहां पर उन्हें नाना प्रकार की यातनाएं दी गयीं और प्रताड़ित किया गया। ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई युवाकाल में अपनी गतिविधियों के उद्देश्यों के बारे में कहते हैं”” उस समय हम और हम जैसे लोग संघर्ष के बारे में गम्भीर रूप और गहराई से सोचते थे। हमारा पूरा प्रयास था कि जहां तक संभव हो सके, युवाओं को शाही सरकार के सांस्कृतिक प्रभाव से बाहर निकालें। जैसे स्वयं मैं मस्जिद जाता था, क़ुरआन की व्याख्या करता था, नमाज़ के बाद भाषण देता था, कभी नगरों व उपनगरों में जाता था वहां भाषण देता था। मेरा मूल उद्देश्य यह था कि कि युवाओं को शाही सरकार के सांस्कृति जाल से बाहर निकाल लूं। स्वयं मैं उस समय इस चीज़ को दिखाई न देने वाले जाल की संज्ञा देता था। मैं कहता था कि दिखाई न देने वाला एक जाल है जो सबको एक ओर खींच रहा है जहां तक संभव हो वहां तक मैं इस दिखाई न देने वाले जाल को फाड़ देना चाहता हूं और जितना हो सके युवाओं को इस जाल से बाहर निकाल लूं। पश्चिमी और शहनशाही सोच की इस जाल से वही लोग बाहर निकल पाते थे जो सबसे पहले धार्मिक हों और दूसरे वे लोग जो इमाम ख़ुमैनी के विचारों की ओर रुझान रखते थे। वह दिन इस प्रकार था। बाद में वही पीढ़ी भी क्रांति की मूल आधार बनी।

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