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    आयतुल्लाह ख़ामेनई के बयान की रौशनी में इस्लामी आइडियालॉजी

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    दुनिया में हमारी दीनी ज़िम्मेदारियों की बुनियाद एक ख़ास आइडियालॉजी पर आधारित है। वह ज़िम्मेदारियां चाहे हमारे निजी जीवन से सम्बंध रखती हों या उनका सम्बंध हमारी समाजी ज़िन्दगी से हो। हमें कोई भी क़दम उठाते समय इस आईडियालॉजी को और उन सिद्धांतो को नज़र में रखना होता है। यह वह आईडियालॉजी है जिसे इस्लामी और क़ुरआनी आइडियालॉजी कहते हैं। इस आईडियालॉजी की पाँच महत्वपूर्ण चीज़ें आज मैं आपके सामने बयान करुँगा।
    असली पिलर
    इन पाँच चीजों में से एक तौहीद है। तौहीद यानी इस बात पर ईमान कि इस अजीबो ग़रीब और अनोखे संसार और दुनिया को बनाने वाले कोई ऐसा दिमाग़ है जिस तक कोई नहीं पहुँच सकता, इस संसार को उसी नें बनाया है और यह ख़ुद से नहीं बना है। अलबत्ता जो भी इन्सान सोच विचार करता होगा, सही दिमाग़ वाला होगा वह इस नतीजे तक पहुँचेगा कि इस सिस्टम की किसी नें ज़रूर बनाया है। दूसरे यह हस्ती और ताक़त न कोई इन्सान है, न कोई बुत है, न कोई ऐसी चीज़ है जिसको हमारी यह आँखे देखती हैं बल्कि वह हमारी सोच से काफ़ी ऊपर है, वह ज्ञानी है, ताक़त वाला है, एक है, उस जैसा कोई नहीं है।
    ’’هُوَ اللَّهُ الَّذِي لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ الْمَلِكُ الْقُدُّوسُ السَّلَامُ الْمُؤْمِنُ الْمُهَيْمِنُ الْعَزِيزُ الْجَبَّارُ الْمُتَكَبِّرُ سُبْحَانَ اللَّهِ عَمَّا يُشْرِكُونَ‘‘
    सभी धर्म वाले उसको अपना ख़ुदा, अपना पालनहार, अपना दाता मानते हैं। हिन्दू धर्म के वेद अगर आप पढ़ें तो आपको पता चलेगा कि उनमें शुद्ध तौहीद की बातें हैं, इससे मालूम होता है कि उस धर्म की शिक्षाओं की असलियत पाक और शुद्ध थी। इसलिये इस्लाम का असली पिलर और बुनियाद तौहीद है। हमारे सारे सिद्धांतों, मूल्यों, विचारों और कामों का बेस यही है। अगर हमारे जीवन की गाड़ी इसके बिना चल रही है तो इसका मतलब यह है कि हम इस्लाम की गाड़ी पर नहीं बैठे हैं बल्कि किसी और गाड़ी पर बैठे हैं।
    इन्सान का साम्मान
    दूसरी चीज़ इन्सान का सम्मान है जिसे हम दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि इन्सान सन्सार का केन्द्र है। अलबत्ता इस्लाम में इन्सान को जो महत्व दिया गया है और उसका जो सम्मान है वह पश्चिम के ह्यूमन राइट्स से बिल्कुल अलग चीज़ है। उसमें और इसमें ज़मीन आसमान का अन्तर है। उसमें भी इन्सान को सन्सार का केन्द्र माना जाता है और यहाँ भी माना जाता है लेकिन यह दोनों नाम में एक जैसे हैं आईडियालॉजी में बिल्कुल अलग अलग हैं। इस्लाम की नज़र में सन्सार का सब कुछ इन्सान के लिये बनाया गया है।
    ’’أَلَمْ تَرَوْا أَنَّ اللَّهَ سَخَّرَ لَكُم مَّا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ‘‘ ’’سَخَّرَ لَكُم ‘‘
    इसका क्या मतलब है? इसका मतलब यह है कि ईश्वर नें तुम्हे इतनी ताक़त और क्षमता दी है कि तुम सबको अपने कंट्रोल में कर सकते हो, तुम सब पर भारी पड़ सकते हो लेकिन इसके लिये तुम्हे ख़ुद मेहनत करनी है और अपने आपको बनाना है, इन्सान के अलावा दूसरी चीज़ों में यह क्षमता नहीं है। ज़ाहिर है जिसको ख़ुदा नें इतना महत्व दिया हो उसे सर्वश्रेष्ठ होना चाहिये।
    ’’وَلَقَدْ كَرَّمْنَا بَنِي آدَمَ‘‘
    हमनें इन्सान को महानता दी है। उसे हर चीज़ से महान बनाया है। इसी लिये इंसान पर ख़ुदा नें इतनी ज़िम्मेदारी डाली हैं, उसके लिये क़ानून और शरियत बनाई है, उसके लिये एक सख़्त रास्ता रखा है जिस से गुज़र कर उसे ख़ुदा तक पहुँचना है।
    मरने के बाद भी जीवन है
    इस्लामी आइडियालॉजी में तीसरी चीज़ जीवन का जारी रहना है यानी मोत के बाद जीवन ख़त्म नहीं होता बल्कि उसके बाद भी जारी रहता है। केवल इस्लाम में ही नहीं बल्कि दूसरे धर्मों में भी यह चीज़ है। सभी धर्म जिनके यहाँ जीवन की कोई सही धारणा है, यह मानते हैं कि इस दुनिया के बाद एक और दुनिया है जहाँ इन्सान के पुण्य और पाप का हिसाब होना है। इन सारी चीज़ों का जीवन में और हमारे कामों में रोल है। मरने के बाद हम एक नई स्टेज में पहुँच जाते हैं। ऐसा नहीं है कि इन्सान मरा और ख़त्म हो गया बल्कि एक दुनिया से होकर वह दूसरी दुनिया में क़दम रखता है, उसके बाद क़यामत और हिसाब व किताब (पूछताछ) की स्टेज है।
    इन्सान की क्षमता
    इस आईडियालॉजी की चौथी चीज़ यह है कि इन्सान में बहुत ज़्यादा क्षमता पाई जाती है। इन्सान के अन्दर इन्सानियत की आख़िरी हद तक पहुँचने के लिये पूरी बल्कि बहुत ज़्यादा क्षमता पाई जाती है। इन्सान के अन्दर यह क्षमता है कि दुनिया में वह जहाँ तक आगे बढ़ना चाहे, बढ़ सकता है। दूसरी चीज़ों में यह क्षमता नहीं पाई जाती। क़ुरआने मजीद फ़रमाता है।
    ’’لَقَدْ خَلَقْنَا الْإِنسَانَ فِي أَحْسَنِ تَقْوِيمٍ‘‘
    इसका मतलब यह नहीं है कि हमनें इन्सान को बहुत ख़ूबसूरत बनाया और उससे ख़ूबसूरत कोई नहीं है, ख़ुदा नें जो भी बनाया है वह ख़ूबसूरत है। इस आयत का मतलब यह है कि इन्सान के अन्दर सबसे ज़्यादा क्षमता रकी है। ऐसी क्षमता जो किसी में नहीं है। अलबत्ता उसे उन्हीं चीज़ों की सहायता से आगे बढ़ना है जो जो दुनिया में हैं इसी लिये यह सब उसी के लिये बनाया है।
    ’’خَلَقَ لَكُم مَّا فِي الأَرْضِ جَمِيعًا‘‘
    उसके अनुसार इन्सान इसी दुनिया में, इसी ज़मीन पर रह कर आगे बढ़ेगा, ऐसा नहीं है कि उसके लिये स्पेस पर जाना होगा। हो सकता है इन्सान स्पेस पर पहुँच जाए लेकिन अभी इन्सान न बना हो। यह सन्सार और इन्सान एक दूसरे पर प्रभाव डालते हैं। सन्सार की यह चीज़ें इन्सान पर प्रभाव डालती हैं और यह सारी चीज़ें इन्सान से प्रभावित होती हैं।
    दुनिया का अन्त
    इस्लामी आईडियालॉजी के लेहाज़ से इस दुनिया का अन्त हक़ और नेकी पर होना चाहिये। यानी दुनिया को अन्त में उस रास्ते तक पहुँचना है जहाँ ख़ुदा उसे ले जाना चाहता है। सारे नबी और अल्लाह के ख़ास बंदे इसी लिये आए ताकि इन्सान को उस ओर ले जाएं। वह असली हाईवे जहाँ इन्सान को जंगलों, रेगिस्तानों, बंजर ज़मीनों से निकाल कर उसी असली रास्ते की ओर ले जाने के लिये आए। अभी इन्सान उस रास्ते तक नहीं पहुँचा है, यह उसी समय पहुँचेगा जब हमारे इमाम का ज़ुहूर होगा। इस्लामी आईडियालॉजी यही है कि दुनिया का अन्त नेकी, अच्छाई, शांति पर होगा, देर से भी हो सकता है और जल्दी भी हो सकता है। हमें इसके लिये दुआ करनी चाहिये और कोशिश करनी चाहिये कि हम उस रास्ते तक पहुँचने के लिये ख़ुद को तैयार करें।