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    आयतुल्लाह ख़ामेनई के बयान की रौशनी में हमारी ज़िम्मेदारियां

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    हम मुसलमान हैं। इस्लाम और उसकी आईडियालॉजी पर ईमान रखते हैं। इसलिये इस आईडियालॉजी के अनुसार हमारी कुछ ज़िम्मेदारियां हैं जिन्हें हमें निभाना है ताकि हमारे अमल और इस्लामी आईडियालॉजी में तालमेल हो। इस समय हम कुछ अहेम ज़िम्मेदारियों को आपके सामने बयान करने जा रहे हैं।
    ख़ुदा का आज्ञापालन
    यह संसार ख़ुदा नें बनाया है और वही इसका मालिक है। हम भी इस संसार का एक हिस्सा हैं, हमें भी उसी ख़ुदा नें बनाया है इसलिये हमारा मालिक भी वही है। संसार को चलाने के लिये ख़ुदा नें एक ख़ास सिस्टम और क़ानून बनाया है और पूरे संसार को उसी सिस्टम और क़ानून के साथ चलना है। ख़ुदा के क़ानून और संसार के लिये बनाए हुए सिस्टम के साथ चलने को, आज्ञा पालन कहा जाता है।
    ’’يُسَبِّحُ لِلَّهِ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ‘‘
    ज़मीन और आसमान में जो कुछ है वह ख़ुदा की तस्बीह करता है।
    ’’فَقَالَ لَهَا وَلِلْأَرْضِ اِئْتِيَا طَوْعًا أَوْ كَرْهًا قَالَتَا أَتَيْنَا طَائِعِينَ‘‘
    आसमान और ज़मीन नें कहा- हम आज्ञा पालन करने वाले हैं। संसार की हर चीज़ ख़ुदा का हुक्म मानती है और उसकी आज्ञा का पालन करती है। हम इन्सानों को भी इस सिस्टम के साथ जुड़कर उसकी इबादत और इताअत करना चाहिये। हम इन्सान दीन और शरियत के बनाए हुए अहकाम पर अमल करके इस संसार के साथ चल सकते हैं। यह चीज़ हम इन्सानों को आगे बढ़ने में सहायता देती है। अलबत्ता ख़ुदा की आज्ञा पालन करने का मतलब केवल उसकी इबादत करना नहीं है बल्कि उसके अलावा सबकी इबादत को छोड़ना भी है। यानी केवल ख़ुदा के सामने झुकना, केवल उसका सजदा करना, केवल उसकी इबादत करना। ख़ुदा के अलावा हम न इन्सानों के आगे सर झुका सकते हैं और नाहि अपनी बनाई हुई चीज़ों के सामने। जीवन में बहुत सी चीज़ें जिनको हम ख़ुदा की इबादत और आज्ञा पालन में शामिल करते हैं, जिनमें सबसे क़रीबी चीज़ हमारा नफ़्स है। यानी हम ख़ुदा की भी इबादत करते हैं और नफ़्स की आज्ञा का पालन करते हैं, यह सही नहीं है। यह तौहीद के विरुद्ध है। यह शिर्क है। हाँ अल्लाह के रसूल की आज्ञा का पालन, इसी तरह इमामों की आज्ञा का पालन, ख़ुद ख़ुदा की आज्ञा से है इसलिये वह शिर्क नहीं है बल्कि वह भी तौहीद है।
    हर क़दम उन्नति की ओर
    दूसरी ज़िम्मेदारी ख़ुदा की ओर बढ़ते रहना है। यानी इन्सान हर लेहाज़ से हर दिन आगे बढ़ता जाए। न केवल ख़ुद बढ़े बल्कि दूसरों को भी उस रास्ते में आगे बढ़ाए। ज्ञान, विज्ञान, सोच, अमल, अख़लाक़, समाजी कामों, सियासत, हर चीज़ में आगे बढ़ना। सबकी ज़िम्मेदारी है कि कोशिश करें कि समाज में हर एक को अच्छी शिक्षा मिले, सबकी सोच सही हो, सबका अख़लाक़ अच्छा हो, सबके पास खाने को हो, सबके पास घर हो। इन्सान किसी भी लेहाज़ से पीछे न हो बल्कि आगे बढ़ता रहे। ख़ास कर रूहानी लेहाज़ से क्योंकि यही इन्सान की असलियत है। क्योंकि सम्भव है कि किसी के पास बहुत पैसा न हो लेकिन उसका ईमान, उसका अख़लाक़ बहुत अच्छा और पक्का हो, वह उस कमज़ोर ईमान से ज़्यादा अच्छा है जिसके पास बहुत ज़्यादा पैसा हो।
    आख़ेरत को दुनिया पर प्राथमिकता देना
    तीसरी ज़िम्मेदारी आख़ेरत में सफलता को दुनियावी फ़ायदे पर प्राथमिकता देना है। जब दुनिया और आख़ेरत में टकराव हो यानी एक तरफ़ दुनिया हो और दूसरी तरफ़ दीन और आख़ेरत हो तो इस्लामी आईडियालॉजी पर ईमान रखे, इन्सान की ज़िम्मेदारी है वह आख़ेरत को दुनिया पर प्राथमिकता दे। केवल इतना ही नहीं बल्कि अगर दुनिया का कोई काम आख़ेरत से न टकरा रहा हो तो भी उस काम को आख़ेरत और दीन के लिये अन्जाम दे। एक तरफ़ गुनाह है जिससे कुछ फ़ायदा मिल रहा है, जैसे थोड़ा बहुत पैसा, कोई पोस्ट, झूठी इज़्ज़त या इस तरह की कोई चीज़ और अल्लाह की मरज़ी और आख़ेरत का फ़ायदा है एक मुसलमान इन दो चीज़ों में आख़ेरत को चुनता है और दुनिया के लिये गुनाह नहीं करता। हर मुसलमान का कर्तव्य है कि वह इस चीज़ को अपनी ज़िन्दगी में लागू करे। इन्सान अपनी दुनिया के कामों को इस तरह चलाए कि उनका आख़ेरत के साथ टकराव न हो, ऐसा करना कठिन ज़रूर है लेकिन असम्भव नहीं है।
    काम और कोशिश
    चौथी चीज़ जो एक मुसलमान पर और ख़ुदा व क़ुरआन पर ईमान रखने वाले इन्सान पर वाजिब है, वह है कि हमेशा काम, कोशिश और संघर्ष करता रहना है। निजी जीवन में भी और समाजी कामों में भी एक मुसलमान का कर्तव्य है कि वह सुस्ती न दिखाए बल्कि हर काम को ज़िम्मेदारी के साथ अन्जाम देने की कोशिश करता रहे। दीनी और समाजी ज़िम्मेदारियों से मुँह न मोड़े और यह न कहे कि मुझसे क्या मतलब। मुसलमान को ऐसा नहीं होना चाहिये कि जो उसका मन चाहे करे, जो उसकी मरज़ी हो करे, जो उसे अच्छा लगे करे, नहीं जब वह एक दीन को मानता है तो उसे वही करना है जो दीन कहे। दीन सुस्ती और बेकार बैठने को पसंद नहीं करता बल्कि उसका विरोधी है, दीन कहता है कि अल्लाह के लिये उठो, कोशिश करो, संघर्ष करो, अपनी ज़िम्मेदारी को अन्जाम दो। खाओ, पियो, मौज मस्ती करो वाली ज़िन्दगी दीन को पसंद नहीं है।
    सफलता की उम्मीद
    पाँचवी चीज़ यह है कि हर सिचुवेशन में सफलता की उम्मीद रखे। उसकी ज़िम्मेदारी केवल यह है कि वह अल्लाह के लिये काम करे, सफलता ख़ुदा को देनी है। बस वह यह उम्मीद रखे कि जब वह ख़ुदा के लिये कोशिश कर रहा है तो ख़ुदा भी उसे ज़रूर सफलता देगा। मुसलमान को निराश होने का कोई अधिकार नहीं है उसे यक़ीन रकना चाहिये कि सपलता ज़रूर मिलेगी। अब हो सकता है जल्दी मिल जाए या कुछ समय लग जाए। आप इतिहास उठाकर देखें जब भी मुसलमानों नें अल्लाह के लिये क़दम उठाया और संघर्ष किया है तो उन्हें सफलता मिली है लेकिन जहाँ भी उन्हें नाकामी हुई है उसका कारण यह रहा है कि वहाँ उनकी नज़रें दुनिया पर थीं, माल और दौलत पर थीं। अल्लाह के लिये संघर्ष की शर्त यह है कि इन्सान को उस रास्ते और काम पर ईमान हो, उसे पहचानता हो और उसकी नियत में दुनियावी फ़ायदा न हो अगरचे ख़ुदा उसे दुनिया भी देगा लेकिन वह दुनिया के पीछे न हो।
    यह चीज़ें हर सिचुवेशन में मुसलमानों पर वाजिब हैं और उन की ज़िम्मेदारी में आती हैं चाहे उनके पास हुकूमत और ताक़त हो या न हो। अगर हुकूमत दुश्मन की भी, काफ़िर की भी, ऐसे लोगों की जो ज़ुल्म और अत्याचार करने वाले हैं तो भी मुसलमानों को उन चीज़ों पर अमल करना है। हाँ समाजी कामों में कुछ की ज़िम्मेदारी कम होती है और कुछ की ज़्यादा होती है। सभी नबियों, इमामों और अल्लाह के ख़ास बंदों की यह ज़िम्मेदारी रही है कि वह लोगों को उनकी दीनी ज़िम्मेदारियों के बारे में बताएं। उनकी एक ज़िम्मेदारी यह थी कि अल्लाह की हुकूमत और दीन के राज्य के लिये कोशिश करें और उसके लिये उन्होंने जेहाद भी किया है और लोगों नें उनके साथ लड़ाई भी की है।
    ’’كَأَيِّن مِّن نَّبِيٍّ قَاتَلَ مَعَهُ رِبِّيُّونَ كَثِيرٌ ‘‘
    जंग, जेहाद और अल्लाह के दुश्मनों के साथ लड़ाई केवल इस्लाम में वाजिब नहीं है बल्कि उससे पहले नबियों नें भी ऐसा किया है और जब हुकूमत मोमिनीन के हाथों में हो, जब इस्लामी हुकूमत हो तो ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है और भी ज़्यादा सख़्त हो जाती है।