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    आयतुल्लाह ख़ामेनई 4

    आयतुल्लाह ख़ामेनई 4
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    धार्मिक एवं दक्ष व्यक्तियों का अस्तित्व व्यापक एवं विस्तृत आयाम लिए होता है इसी कारण विभिन्न क्षेत्रों में वे महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। आयतुल्लाहिल उज़मा सैय्यद अली ख़ामेनई भी इसी तरह के लोगों में से हैं। उन्होंने अपने पूर्ण जीवन में कभी कोई विशेष पद ग्रहण करने के लिए प्रयास नहीं किया किन्तु इसी के साथ इस्लामी क्रांति की प्रगति के लिए सदैव हर प्रकार के सहयोग के लिए तैयार रहे और इसे अपना दायित्व समझते रहे।

    क्रांति परिषद में सदस्यता ग्रहण के बाद इमाम ख़ुमैनी द्वारा जो दूसरी महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनई को सौंपी गई वह मई 1980 में सर्वोच्च प्रतिरक्षा परिषद में सदस्यता थी। उस समय कि जब इस्लामी गणतंत्र ईरान की व्यवस्था की नई नई स्थापना हुई थी, क्रांति विरोधी तत्व सैन्य और प्रशासनिक विभागों में मौजूद थे, अतः इस बात की आवश्यकता थी कि ऐसे लोगों का पता लगाया जाए ताकि इस्लामी व्यवस्था को नुक़सान न पहुंचा सकें। आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनई ने इस समस्या के समाधान में भी अहम भूमिका निभाई। उसके बाद तथा क्रांति विरोधी गुटों के षडयंत्रों एवं सीमा पर गतिविधियों के चरम पर पहुंचने के बाद इमाम ख़ुमैनी कि जो आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनई पर पूरा भरोसा रखते थे एक आदेशानुसार सर्वोच्च प्रतिरक्षा परिषद में उनको अपना वरिष्ठतम सलाहकार चुन लिया। इस आदेश के अनुसार, हर सप्ताह, रक्षा संबंधित घटनाओं एवं आवश्यक सूचनाओं से इमाम ख़ुमैनी को अवगत कराना आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनई की ज़िम्मेदारी हो गई।

    इसके अतिरिक्त उसी समय इमाम ख़ुमैनी की ओर से उन्हें तेहरान का इमामे जुमा नियुक्त कर दिया गया। तेहरान जैसे महत्वपूर्ण शहर का इमामे जुमा किसी ऐसे व्यक्ति को होना चाहिए कि जो अधिक धार्मिक जानकारी के अलावा राजनीतिक विश्लेषण की भी उच्चतम दक्षता रखता हो। इसलिए कि नमाज़े जुमा में उसके ख़ुतबों अथवा भाषणों को विश्व में व्यापक कवरेज मिलता है। आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनई में यह विशेषताएं थीं तथा इसके अतिरिक्त वाकपटुता एवं नमाज़ को मनमोहक स्वर में पढ़ने की कला ने इमाम ख़ुमैनी के चयन को सही सिद्ध कर दिया। आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनई की ओर इमाम ख़ुमैनी के विशेष ध्यान का कारण उनकी वैज्ञानिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक विशेषताएं थीं। आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनई के तेहरान का इमामे जुमा बनने के बाद तेहरान की नमाज़े जुमा में चार चांद लग गए।

    . प्रारंभ से ही इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था के कट्टर शत्रु थे कि जो आतंरिक षडयंत्रों एवं विदेशी दबाव द्वारा उसके पतन के लिए प्रयास करते रहते थे। यही कारण था कि पश्चिमी सरकारों और कुछ अरब सरकारों के समर्थन से इराक़ के तानाशाह सद्दाम ने वर्ष 1980 में ईरान पर हमला कर दिया। देश के भीतर भी क्रांति के बाद अभी अनियमितताएं पाई जाती थीं तथा सेना अभी किसी विस्तृत युद्ध के लिए तैयार नहीं थी। आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनई ने इन परिस्थितियों को समझने तथा ईरानी युवाओं का उत्साह देखने के बाद देश की रक्षा का निर्णय लिया और स्वयं सैन्य वर्दी पहनी तथा युद्ध के मोर्चों पर स्वयंसेवकों को व्यवस्थित किया। इसके बावजूद वे प्रति शुक्रवार को तेहरान पहुंचते थे और नमाज़े जुमा में युद्ध की घटनाओं से लोगों को अवगत कराते थे। उनके नामज़े जुमा के ख़ुतबे इस्लामी शिक्षाओं, राजनीतिक एवं सामाजिक विश्लेषणों, तथा मूल्यवान मार्गदर्शन पर आधारित होते थे जिनसे देश के संवेदनशील मामलों में जनता की जानकारी में वृद्धि होती थी।

    . योग्यता, श्रेष्ठ नैतिकता, विज्ञान, ज्ञान और आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनई के व्यक्तित्व के दूसरे आयामों ने उन्हें एक मूल्यवान व्यक्ति बना दिया और उन्होंने सदैव इस्लामी गणतंत्र की सेवा की। महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारियों और दायित्वों के बावजूद वे सदैव युवाओं के संपर्क में रहते हैं तथा युवा पीढ़ी एवं विद्यार्थियों के लिए आकर्षण का केंद्र रहते हैं। आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनई के एक मित्र हुज्जतुल इस्लाम नातिक़ नूरी का कहना है कि आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनई कर्तव्य निभाने के साथ साथ बहुत ही सुशील और प्रफुल्ल व्यक्ति हैं तथा उस समय के आधुनिक विचारकों में गिने जाते थे और विद्यार्थियों के साथ अच्छे संबंध रखते थे तथा उस समय गिने चुने धार्मिकगुरु ही विद्यार्थियों से इतने विस्तृत संबंध रखते थे।

    . वर्ष 1980 में भारी बहुमत के साथ आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनई तेहरान से संसद सदस्य बने। एक साल बाद उनके और दूसरे निष्ठावान लोगों के साहसिक रहस्योदघाटनों से तत्कालीन राष्ट्रपति बनी सद्र और उसके जासूसों के देशद्रोही कृत्यों का पर्दाफ़ाश हुआ। आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनई के प्रयासों के बाद संसद ने बनी सद्र को बरख़ास्त कर दिया और वह फ़्रांस भाग गया। किन्तु क्रांति विरोधी तत्वों ने उसके एक दिन बाद एक मस्जिद में आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनई के भाषण के दौरान एक आतंवादी कार्यवाही द्वारा उनकी जान लेने का प्रयास किया। इस आतंकवादी कार्यवाही में वे गंभीर रूप से घायल हो गए और उनका दायां हाथ शक्तिहीन हो गया। इमाम ख़ुमैनी ने इस आतंकवादी कार्यवाही के बारे में कहा था कि क्रांति के विरोधी यह पाखंडी इतनी भी राजनीतिक सूझबूझ नहीं रखते क्योंकि उन्होंने संसद, नमाज़े जुमा और राष्ट्र के समक्ष आपके भाषण के तुरंत बाद इस देशद्रोही कृत्य को अंजाम दिया और ऐसे व्यक्ति पर हमला किया कि जिसकी दृढ़ आवाज़ विश्व भर के मुसलमानों के कानों में गूंज रही है।

    आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनई के कुछ स्वस्थ हो जाने के बाद क़्रांति के मित्रों और शुभ चिंतकों ने उनसे राष्ट्रपति के चुनाव में प्रत्याशी बनने के लिए आग्रह किया। आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनई ने भी देश की संवेदनशील स्थिति के दृष्टिगत इस सलाह को स्वीकार कर लिया तथा अक्तूबर सन् 1981 में भारी बहुमत के साथ देश के राष्ट्रपति चुने गए। इस संदर्भ में उनका कहना है कि मैं दो चरणों के लिए राष्ट्रपति चुना गया। हर चरण में मैं स्वीकार नहीं कर रहा था। दूसरे चरण में भी मैं इमाम ख़ुमैनी की सेवा में उपस्थित हुआ और कहा, श्रीमान जी मैं स्वीकार नहीं कर रहा हूं, इस बार मैं चुनाव में भाग नहीं लूंगा। इमाम ख़ुमैनी ने कहा तुम्हारे लिए यह अनिवार्य है, जो भी मेरे लिए अनिवार्य होता है मैं उसकी ज़िम्मेदारी से नहीं बचता हूं। उन्होंने राष्ट्रपति के महत्वपूर्ण पद पर रहते हुए भी अथक प्रयास किए तथा उस संवेदनशील समय में कि जब युद्ध भी जारी था सार्थक परिवर्तन किए। देश की संस्थाओं को स्थिर करना और हर एक के कर्तव्यों का निर्धारण एवं पार्दर्शिता लाना, संस्थाओं में समनव्य स्थापित करना तथा उनके बीच मतभेदों का निवारण, देश के अति महत्वपूर्ण कार्यालयों और ढांचे को व्यवस्थित करना उनके राष्ट्रपति काल के कार्यों में से हैं।

    इसके अतिरिक्त विदेश नीति स्तर पर भी आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनई एख सक्रिय राष्ट्रपति रहे तथा विदेशी प्रतिनिधियों, राजनीतिज्ञों एवं हस्तियों के साथ आपने 185 बैठकों में भाग लिया। अधिक पत्राचार एवं विदेश नीति स्तर पर उनकी सक्रिय उपस्थिति इस्लामी क्रांति के नेता के जीवन का उज्जवल बिंदु है।
    उन्होंने अपने राष्ट्रपति काल में राजनीतिक प्रतिबंधों और इस्लामी गणतंत्र ईरान पर अत्यधिक दबाव के बावजूद अनेक देशों की यात्रा की और इस्लामी क्रांति का महान संदेश उन तक पहुंचाया।

    . 4 जून सन् 1989 को इस्लामी क्रांति के संस्थापक इमाम ख़ुमैनी के निधन के बाद वरिष्ठ नेता का चयन करने वाली संसद का सत्र आयोजित हुआ ताकि भविष्य के नेता का चयन किया जा सके। इस संवेदनशील सत्र में लगभग समस्त सदस्यों ने आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनई के बारे में सहमति जताई। विशेषकर यह भी स्पष्ट हो गया कि इमाम ख़ुमैनी अपने बाद नेतृत्व के लिए उन्हें योग्य मानते थे। इस सत्र में एकमात्र विरोधी स्वयं आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनई थे कि जो नेतृत्व की अति महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी के दृष्टिगत इस पद को स्वीकार करने से बच रहे थे।

    किन्तु अंततः वरिष्ठ नेता का चयन करने वाली संसद ने क्रांति के नेता के रूप में उनका चयन कर दिया। आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनई वरिष्ठ धर्मगुरू तथा एक दक्ष व्यक्ति हैं कि जो क्रांति की सफ़लता के लिए अनेक बार जेल गए तथा यातनाएं सहन कीं और इस्लामी क्रांति की सफ़लता के बाद उसकी प्रगति एवं विकास के लिए अपना समस्त जीवन समर्पित कर दिया। समस्त लोगों की दृष्टि में केवल आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनई इमाम ख़ुमैनी के बाद क्रांति का नेतृत्व संभालने की योग्यता रखते थे तथा अब तक उनके उज्जवल वैज्ञानिक एवं व्यवहारिक कार्यों ने सिद्ध भी कर दिया कि आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनई नेतृत्व के लिए सर्वश्रेष्ठ विकल्प थे।

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