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    आयतुल्लाह जाफ़र सुबहानी

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    आयतुल्लाह जाफ़र सुबहानी ईरान के ऐसे दार्शनिक एवं इतिहासकार हैं कि जिनकी इस्लामी जगत के विभिन्न विषयों के बारे में अनेक रचनाएं हैं। उन्होंने क़ुरान की व्याख्या विषय अनुसार एवं क्रमानुसार, इस्लामी इतिहास, वहाबियत का अध्ययन एवं आलोचना, पैग़म्बरे इस्लाम (स) की जीवनी, पैग़म्बरे इस्लाम (स) और उनके पवित्र परिजनों के कथनों और विभिन्न विषयों के बारे में किताबें लिखी हैं।

     

    आयतुल्लाह जाफ़र सुबहानी अपनी किताब, आस्था की ओर वापसी का युग में इस बिंदु की ओर संकेत करते हैं कि पश्चिमी समाज में जीवन से धर्म की समाप्ति से वहां के समाज में जटिल सम्सयाएं उत्पन्न हो गई हैं। जैसा कि हम आज पश्चिम में आध्यात्मिक, पारिवारिक एवं सामाजिक गंभीर संकट देख रहे हैं। इस संदर्भ में आयतुल्लाह सुबहानी ने लिखा है कि मशीनी जीवन एवं उद्योग से पश्चिम की विफलता एवं अनेक समस्याओं के समाधान में विज्ञान की विफलता ऐसा विषय है कि जिसके बारे में बहुत से बुद्धिजीवियों ने बात की है। सभी इस बात से सहमत हैं कि यह न सुलझने वाली गुत्थी कि जो पश्चिमी राष्ट्र के जीवन में उत्नपन्न हुई है, जीवन में नैतिक एवं धार्मिक मूल्यों से दूरी, जीवन से धर्म और आध्यात्म का निष्कासन तथा भौतिकवाद एवं टैक्नॉलॉजी की ओर संपूर्ण झुकाव का परिणाम है। थोड़ी बहुत अब यह बात पश्चिमी रचनाओं में देखी जा सकती है कि इससे मुक्ति प्राप्त करने का पूर्वी आध्यात्मिकता का सहारा लेने के अतिरिक्त कोई और उपाय नहीं है तथा भविष्य को मनुष्य के धर्म और मनुष्य की ओर वापसी के रूप में देखा जाना चाहिए।

     

     

    आयतुल्लाह सुबहानी अपनी इस मूल्यवान किताब में इस बुनियादी बिंदु की ओर संकेत करते हैं कि ईश्वर की खोज की भावना मनुष्यों में प्राकृतिक है और वे लिखते हैं कि ईश्वर का ज्ञान प्राप्त करने एवं आध्यात्म में रूची, समय तथा विश्व के किसी विशेष क्षेत्र से विशेष नहीं है। इसका सुबूत इतिहास एवं प्राचीन धरोहर हैं।

    आयतुल्लाह सुबहानी की दृष्टि में धार्मिक भावना एक आंतरिक एवं प्राकृतिक भावना है कि जिसके विशेष चिन्ह हैं। इस प्रकार कि आज धरती के महत्वपूर्ण भाग पर धार्मिक स्थल, चर्च और मस्जिदें हैं और हर शुक्रवार को मस्जिदों से अल्लाहो अकबर की आवाज़ तथा हर रविवार को चर्चों से घंटा बजने की आवाज़ समस्त विश्ववासियों के कानों तक पहुंचती है।

    आयतुल्लाह सुबहानी अंत में आकाशीय धर्म इस्लाम एवं इस्लामी आस्था को मनुष्यों की मुक्ति के लिए सर्वश्रेष्ठ मार्ग क़रार देते हैं।

    इस्लामी नैतिक व्यवस्था आयतुल्लाह सुबहानी की एक अन्य मूल्यवान रचना है। यह किताब, पवित्र क़ुरान के हुजरात सूरे को ध्यान में रखकर लिखी गई है तथा लेखक ने प्रयास किया है कि वह नैतिक सिद्धांत जो इस सरे में हैं उनका विवरण पेश करें। आयतुल्लाह सुबहानी लिखते हैं कि राष्ट्रों की बुनियाद नैतिक मूल्यों पर हैं जिससे उन्होंने ख़ुद को सुसज्जित किया है और जब तक उन पर नैतिक मूल्यों का प्रभुत्व है यह राष्ट्र स्थिर हैं, और अगर किसी समय नष्ट एवं विलुप्त हो जाएं तो उसका कारण यह है कि उन्होंने नैतिक मूल्यों की उपेक्षा की है और अराजकता में ग्रस्त हो गए हैं।

     

     

    आयतुल्लाह सुबहानी का मानना है कि प्रत्येक व्यक्ति इस्लामी शिक्षा की प्राप्ति के कारण ही उच्च नैतिक मूल्यों से सुसज्जित हो सकता है, इसी के मद्देनज़र वे कुछ दार्शनिक मतों की आलोचना करते हैं। वे अपनी किताब में लिखते हैं कि प्राचीन यूनान के दो प्रसिद्ध बुद्धिजीवियों सुक़रात और अरस्तू का मानना था कि भावनाओं का सही दिशानिर्देशन तथा मनुष्य के भीतर नैतिकता एवं विद्वत्ता के वृक्ष का फलना फूलना ज्ञान एवं शिक्षा के रूप में ही संभव होता है, तथा उनका नारा यह था कि नैतिकता ज्ञान की छाया में। इसमें कोई मतभेद नहीं है कि ज्ञान, नैतिकता की उत्कृष्टता में प्रभावी भूमिका निभाता है तथा कुछ अपराधों में वृद्धि से रोकता है, किन्तु इस बात को पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं किया जा सकता कि ज्ञान एवं बोध, सदैव एवं समस्त व्यक्तियों में विद्रोही इच्छाओं को निंयत्रण करने वाले हैं, तथा समाज के बुरे लोग सबके सब वह हैं कि जो अशिक्षित हैं, और इसके मुक़ाबले में समाज के विशिष्ट लोग वह हैं कि जिन्होंने विद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में शिक्षा प्राप्त की है। इसलिए कि न केवल समाज की जानकारी रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति इस बात को झुटलाता है, शिक्षित लोगों के बीच विभिन्न प्रकार के भ्रष्टाचारों में वृद्धि से कोई इनकार नहीं कर सकता, बल्कि विश्व की पत्रिकाओं में छपने वाले आंकड़े, इस बात को मज़बूती से प्रमाणित करते हैं।

    मंशूरे जावीद, आयतुल्लाह सुबहानी की 12 खंडों में विषय पर आधारित किताब है कि जिसमें सुन्दरता से क़ुरान के विभिन्न विषयों की व्याख्या की गई है। इस किताब के विषयों में से एक विषय सजदा है तथा लेखक ने इस विनम्रतापूर्वक प्रार्थना से संबंधित आयतों को क्रमानुसार रखा है। क़ुरान के विषयों में से एक सजदा है। वास्तव में सजदा, ऐसे सृष्टिकर्ता के प्रति जिसके समान कोई नहीं है असीम विनम्रता है एवं क़ुरान के अनुसार, विश्व के समस्त कण चंद्रमा, सूर्य और तारों से लेकर छोटे से छोटे कण तक ईश्वर को सजदा करते हैं। आयतुल्लाह सुबहानी लिखते हैं कि क़ुरान की महान शिक्षाओं में से एक यह है कि विश्व के समस्त कण ईश्वर को सजदा करते हैं और उसका नाम जपने में व्यस्त हैं। यह वास्तविकता इतने विस्तृत स्तर पर क़ुरान के अतिरिक्त किसी और धर्म से नहीं सुनी गई है। इसका अर्थ है कि समस्त ब्रह्माण्ड विनम्र व नतमस्तक, कान व ज़बान, आत्मा व भावना, समझ व दायित्व, प्रकाश व ज्ञान व बोध है।

    आयतुल्लाह सुबहानी इस संदर्भ में क़ुरान की आयतों का उल्लेख करते हैं और कहते हैं कि सूरए हज की 18वीं आयत में उल्लेख है कि क्या ईश्वर को नहीं देखते, जो कुछ आकाश और धरती पर है, और सूर्य व चंद्रमा व तारे व पर्वत व वृक्ष व पशु और अधिकतम मनुष्य सजदा करते हैं। सजदे की वास्तविकता को समझना महत्वपूर्ण है और यह कि किस प्रकार हर वस्तु वह बुद्ध रखती हो या नहीं ईश्वर की महानता के समक्ष अपने को छोटा समझती है। मनुष्य का सजदा, सामान्यतः धरती पर शरीर के अंगों के रखने जैसे कि माथा टेकने से होता है। यह सजदे का स्पष्ट स्वरूप है, लेकिन उसकी आत्मा वही ईश्वर के समक्ष विनम्रता और झुकना है, क़ुरान के अनुसार, स्यवं को किसी भी प्रकार से छोटा करके पेश करना सजदा है।

    फ़रुग़े अबदियत अर्थात सदैव का प्रकाश आयतुल्लाह सुबहानी की रचना है जिसमें उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम (स) की जीवनी का विश्लेषण किया है। उन्होंने इस किताब में, बहुत ही सरल ढंग से एवं पूर्णतः प्रमाणित रूप से पैग़म्बरे इस्लाम के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं का वर्णन किया है। यह किताब दो खंडों में छपी है और महान पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स) की प्रकाशमय जीवनी है कि जो इस्लामी इतिहास के प्राचीनतम व महत्वपूर्ण दस्तावेज़ों पर आधारित है। इस किताब की एक और विशेषता यह है कि लेखक ने इसमें केवल ऐतिहासिक घटनाओं का विवरण नहीं दिया है बल्कि विभिन्न घटनाओं के कारणों और उनके परिणामों का भी विश्लेषण किया है। इस किताब की एक और महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इतिहास के प्रमाणित दस्तावेज़ों से पूर्ण रूप से समन्वय रखती है तथा पैग़म्बरे इस्लाम की जीवनी में जो मनघड़त कहानियां एवं अंधविश्वास दूषित हाथों द्वारा भर दिए गए हैं उनसे ख़ाली है।

     

    आयतुल्लाह सुबहानी की एक और महत्वूर्ण किताब, वहाबियत, वैचारिक आधार एवं व्यवहारिक कारनामा है। उन्होंने इतिहास की इस छोटी सी किताब में इस पथभ्रष्ट सम्प्रदाय की उत्पत्ति का विवरण पेश किया है और उसके अंधविश्वासी विश्वासों की आलोचना की है। आयतुल्लाह सुबहानी ने क़ुराने मजीद की प्रकाशमय आयतों के उपयोग, पैग़म्बरे इस्लाम (स) और उनके परिजनों के कथनों व आचरणों एवं सुन्नी मुसलमानों की महत्वपूर्ण धार्मिक किताबों से सिद्ध किया है कि मज़ारों के दर्शन से इनकार, ईश्वरीय दूतों से संपर्क स्थापित करना और प्रलय के समय उनसे मुक्ति की प्राथना को वर्जित बताना जैसे वहाबियों के विश्वास न केवल इस्लामी नहीं हैं, बल्कि ग़लत परम्परा प्रचलित करना एवं महा पाप है। उदाहरणस्वरूप, आयतुल्लाह सुबहानी ने मुक्ति के संदर्भ में लिखा है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) एवं अन्य सच्चे मुक्तिदाताओं द्वारा मुक्ति, ईश्वर से प्राथना के अतिरिक्त कुछ नहीं है, तथा उनकी दुआ ईश्वर के निकट उनके स्थान के दृष्टिगत स्वीकार होती है और प्राकृतिक रूप से ईश्वर पापी को क्षमा कर देता है, पैग़म्बरे इस्लाम (स) की बात तो और है धार्मिक व्यक्ति से दुआ के अनुरोध में भी कोई आपत्ति नहीं है। अगर हम कहते हैं कि हे वह कि जो ईश्वर के निकट विशेष स्थान रखता है, ईश्वर से हमारी मुक्ति के लिए प्राथना कर, अर्थात हमारे लिए दुआ करो कि ईश्वर हमारे पापों को क्षमा कर दे।

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