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    आयतुल्लाह नासिर मकारिम शीराज़ी – 2

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    आयतुल्लाह नासिर मकारिम शीराज़ी का जन्म, सन् 1926 में एक धार्मिक एवं विशिष्ट परिवार में ईरान के दक्षिण में स्थित ऐतिहासिक एवं सुन्दर शहर शीराज़ में हुआ। उनके पिता और दादा इसी शहर में व्यापार करते थे तथा उनके सदगुणों के कारण शहर के निवासी उनका सम्मान करते थे। वे शहर निवासियों की समस्याओं का समाधान करते थे तथा सदैव शीराज़ के वरिष्ठ धर्मगुरुओं के संपर्क में रहते थे। आयतुल्लाह मकारिम शीराज़ी अपने पिता के बारे में कहते हैं कि पिता जी को क़ुरान से बहुत अधिक लगाव था। जिस समय मैं प्राथमिक शिक्षा प्राप्त कर रहा था, कभी कभी रात में मुझे अपने कमरे में बुलाते थे ताकि क़ुराने मजीद की प्रकाशमय आयतों को अनुवाद के साथ उनके लिए पढ़ूं।
    आयतुल्लाह मकारिम को बचपन से ही क़ुरान की तिलावत से लगाव हो गया। क़ुराने मजीद के आकर्षण ने धीरे धीरे उन्हें अपनी ओर आकर्षित कर लिया यहां तक कि बाद में उन्हें क़ुरान का अर्थ और महत्वपूर्ण बिंदुओं को समझने में रूची हो गई। इस विषय में आयतुल्लाह मकारिम ने अथक प्रयास किए और क़ुरान का अध्ययन करने वाले एक समूह के साथ मिलकर इस ईश्वरीय पुस्तक की व्याख्या की कि जो तफ़सीरे नमूना के नाम से प्रकाशित हुई और उसका अनेक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।

    आयतुल्लाह मकारिम शीराज़ी का बचपन और शिक्षा ग्रहण का काल आश्चर्यजनक है। उन्हें अपनी असाधारण बुद्धि और समझदारी के कारण पांच वर्ष की आयु में स्कूल में प्रवेश मिला और कई क्लासों को उन्होंने बग़ैर पढ़े तय किया, इस प्रकार 14 वर्ष की आयु में उन्होंने बारहवीं क्लास पास कर ली। किन्तु हाई स्कूल की पढ़ाई के दौरान ही उन्हें धार्मिक विषयो के अध्ययन में रूची हो गई। इसी कारण उन्होंने अपने भविष्य निर्धारण वाला निर्णय लिया और इंटर मीडिएट के बाद विश्वविद्यालय में प्रवेश नहीं लिया, बल्कि मनुष्य को शिष्टाचार सिखाने वाली एनं धार्मिक शिक्षा को वरीयता दी। आयतुल्लाह मकारिम अपनी लगन एवं विशेष प्रतिभा के कारण शीघ्र ही अपने शिक्षकों एवं साथियों के बीच काफ़ी लोकप्रिय हो गए। उन्होंने अपनी विशेष बुद्धिमत्ता एवं प्रयास के कारण, धार्मिक शिक्षा का 10 वर्षीय प्रथम चरण केवल चार वर्षों में वह भी सर्वश्रेष्ठ नम्बरों के साथ तय किया और सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थियों में शामिल हो गए।
    18 वर्ष की आयु में आयतुल्लाह मकारिम ने अपने शिक्षकों के प्रोत्साहन के कारण पवित्र क़ुम के धार्मिक शिक्षा केन्द्र में प्रवेश किया ताकि वहां के वरिष्ठ धार्मिक गुरुओं से शिक्षा प्राप्त कर सकें। क़ुम के धार्मिक शिक्षा केन्द्र में भी उन्होंने शीघ्र ही अपना स्थान बना लिया, इस प्रकार की शियों के महान धर्मगुरु आयतुल्लाह ब्रुजर्दी की क्लास में क़दम रखा तथा उच्च स्तर के धार्मिक विद्यार्थियों के साथ उनसे शिक्षा प्राप्त करना आरम्भ किया। आयतुल्लाह मकारिम शीराज़ी स्वयं इस बारे में कहते हैं कि आयतुल्लाह ब्रुजर्दी धर्म में गहरी आस्था रखने वाले, बुद्धिमानी एवं आकर्षण व्यक्तित्व के स्वामी थे तथा धर्मशास्त्र में दक्ष थे, मैंने युवावस्था के प्रारम्भ 18 – 19 साल की आयु में उनकी क्लास में जाना शुरू किया जबकि उस समय धार्मिक शिक्षा केन्द्र के वरिष्ठ लोग उनकी क्लास में भाग लेते थे तथा मेरे जैसे युवक का उस क्लास में जाना थोड़ा अजीब लगता था। विशेषकर ऐसी स्थिति में कि जब मैं क्लास के दौरान प्रश्न करता था, किन्तु आयतुल्लाह ब्रुजर्दी मुस्कुराहट के साथ मेरे सवालों के उत्तर दिया करते थे।

    उस काल के दक्ष धर्मगुरुओं से लाभान्वित होने के लिए सन् 1950 में आयतुल्लाह मकारिम ने इराक़ के पवित्र शहर नजफ़े अशरफ़ की यात्रा की। महान धर्मगुरुओं की क्लासों में भाग लेकर वे सफल हुए और 24 वर्ष की आयु में धर्मशास्त्र में अध्ययन के उच्चतम स्तर पर पहुंच गए।
    इस आयु में धर्मशास्त्र में अध्ययन के उच्चतम स्तर पर पहुंचना असामान्य बात है और इससे आयतुल्लाह मकारिम की बुद्धिमत्ता एवं निरंतर प्रयासों का पता चलता है। उन्होंने शिक्षा प्राप्ति के मार्ग में महान शिक्षकों की सहायता ली और उनसे काफ़ी प्रेरणा ली। इसलिए कि मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, शिक्षकों द्वारा प्रोत्साहन ज्ञान प्राप्त करने वाले के लिए उड़न खटोले की भांति हो सकता है और उसे ज्ञान की ऊंची चोटियों पर पहुंचा सकता है।
    क़ुम वापस लौटने के बाद आयतुल्लाह मकारिम ने कुछ अन्य दक्ष धर्मगुरुओं के साथ क़ुम धार्मिक शिक्षा केन्द्र अध्यापक संगठन की स्थापना की। वे अब तक शिक्षा एवं संस्कृति के क्षेत्र में अधिक गतिविधियां अंजाम दे चुके हैं। वे लगभग चालीस साल से धर्मशास्त्र एवं धर्मशास्त्र के सिद्धांत की उच्च स्तर पर शिक्षा दे रहे हैं और इस अवधि में अनेक शिष्यों को शिक्षा-दिक्षा दे चुके हैं। आयतुल्लाह मकारिम के बहुत से शिष्य आज देश के उच्च पदों पर आसीन हैं या फिर धार्मिक शिक्षा केन्द्र में दक्ष शिक्षकों में से हैं।
    यह बिंदु भी ध्यान देने योग्य है कि आयतुल्लाह मकारिम ने शिक्षा के क्षेत्र में भरसक प्रयासों के बावजूद, युवावस्था से ही धार्मिक किताबों का संकलन करके अपने जीवन यापन का ख़र्च पूरा किया तथा अब तक कभी भी धार्मिक छात्रों को मिलने वाली छात्रवृत्ति से अपने ख़र्च पूरे नहीं किए।

    आयतुल्लाह मकारिम की रचनाएं किसी विशेष विषय में सीमित नहीं हैं, उन्होंने अधिकतर इस्लामी विषयों के बारे में किताबें लिखी हैं। उनकी कुछ किताबें वर्तमान आपत्तियों का उत्तर हैं इस प्रकार कि कहा जा सकता है कि उनकी अनेक किताबें समय की आवश्यकता के अनुसार लिखी गई हैं। जिस प्रकार कि उन्होंने विभिन्न विषयों को युवाओं की धार्मिक आवश्यकताओं के दृष्टिगत पढ़ाया है। उदाहरण स्वरूप वे वर्षों से क़ुरान एवं नहजुल बलाग़ा की व्याख्या करके दक्ष शिष्य पैदा कर रहे हैं और अधिक रचनाएं प्रकाशित करा चुके हैं। शिक्षा एवं संस्कृति के क्षेत्र में आयतुल्लाह मकारिम की दूसरी सेवाओं में से चार मदरसों की स्थापना है। इन मदरसों में से एक क़ुरान की व्याख्या से विशेष है जिसमें धार्मिक छात्रों को क़ुराने मजीद की सही व्याख्या का तरीक़ा सिखाया जाता है। इसी प्रकार उन्होंने ईरान के धार्मिक शहरों विभिन्न धर्मशालाएं एवं क़ुरान की संस्थाओं की स्थापना की है।
    आयतुल्लाह मकारिम ने युवाओं में धर्म विरोधी विचार के प्रचार की शत्रुओं की साज़िशों की भरपूर जानकारी के साथ, युवाओं को उनसे अवगत कराने और उनमें जागरुकता लाने के लिए विस्तृत प्रयास किए। उन्हीं में से एक यह है कि आयतुल्लाह मकारिम ने विभिन्न किताबें लिखीं ताकि पश्चिम के भौतिक दर्शन की वास्तविकता को सामने ला सकें। दार्शनिकों के जैसे, किताब ऐसी ही किताबों में से एक है कि जिसमें पश्चिमी एवं भौतिकवादी दार्शनिकों की आलोचना की गई है। यह किताब लगभग 30 बार प्रकाशित हो चुकी है और आज भी उसी तरह से लोकप्रिय है।
    आयतुल्लाह मकारिम ने अपनी एक दूसरी किताब सच्चाई का प्रकाश में सूफ़ियों के दृष्टिकोणों को रद्द किया है। आयतुल्लाह ब्रुजर्दी ने भी इस किताब की प्रशंसा की थी। आयतुल्लाह मकारिम युवा नस्ल की मुक्ति के लिए धार्मिक विश्वासों के विषय पर सम्मेलनों का आयोजन करके वर्तमान आपत्तियों का उत्तर देते थे और युवाओं को क़ुरान एवं पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों के अनुसरण के लिए प्रेरित करते थे। उस समय वे इस्लामी मत नामक पत्रिका में अपने विभिन्न लेखों द्वारा ईरान की पूर्व तानाशाही व्यवस्था की वास्तविकता का उल्लेख करते थे तथा युवाओं को अत्याचारी शासक शाह के अत्याचारों से अवगत कराते थे।

    ईरान में तानाशाही के शासनकाल में आयतुल्लाह मकारिम उसकी बहुत आलोचना करते थे। ईरान में क्रांति से पूर्व वे हमेशा इस्लामी व्यवस्था की स्थापना हेतु राजनीतिक प्रयास करते रहे। क़ुम के धार्मिक शिक्षा केन्द्र के अन्य धर्मगुरुओं के साथ मिलकर वे तानाशाही शासन के विरुद्ध आंदोलन करते रहे तथा शाही शासन के विरुद्ध जारी होने वाली अनेक विज्ञप्तियों में उनके हस्ताक्षर मौजूद हैं। शाही अत्याचारी शासन के विरुद्ध गतिविधियों के कारण आयतुल्लाह मकारिम अनेक बार जेल गए या फिर सीमावर्ती शहरों में भेज दिए गए।
    1979 में ईरान की महान इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद, वे जनता द्वारा संविधान संकलन करने वाली सभा के सदस्य चुने गए तथा संविधान के संकलन में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे हमेशा ख़ुद को वरिष्ठ नेता का आज्ञाकारी मानते हैं तथा लोगों से वरिष्ठ नेता के आज्ञापालन एवं इस्लामी व्यवस्था की सुरक्षा का आहवान करते हैं।
    आयतुल्लाह नासिर मकारिम का बीस वर्ष पूर्व उच्चतम धर्मशास्त्री के रूप में चयन किया गया था, आज भी वे क़ुम में शिष्यों की शिक्षा – दिक्षा में व्यस्त हैं।

    वर्तमान विषयों के बारे में उनकी जानकारी तथा आधुनिक विश्व की समस्याओं के समाधान के बारे में उनके फ़तवों ने अत्यधिक सहायता की है। कुछ धार्मिक संवेदनशील मामलों में आयतुल्लाह मकारिम के समाधान किसी से ढकी छिपी बात नहीं हैं। दूसरी ओर शिया और सुन्नी मुसलमानों के बीच एकता के क्षेत्र में उनका चेहरा चिर परिचित है। अन्य देशों के मुसलमानों की धार्मिक आवश्यकताओं का उत्तर देने के लिए संपर्क स्थापित करना आयतुल्लाह मकारिम शीराज़ी की एक दूसरी गतिविधित है। आयतुल्लाह मकारिम ने अब तक अनेक मस्जिदों एवं मदरसों का निर्माण कराया है और उनके कार्यालय ईरान के अलावा, मदीना, नजफ़ और लंदन में भी सक्रिय हैं। वरिष्ठ धर्मगुरू आयतुल्लाह नासिर मकारिम शीराज़ी के अन्य महत्वपूर्ण कार्यों में विलायत टीवी चैनल का संचालन है कि जो पैग़म्बरे इस्लाम (स) और उनके पवित्र परिजनों की शिक्षाओं के प्रचार प्रसार में व्यस्त है।

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