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    आयतुल्लाह नासिर मकारिम शीराज़ी – 3

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    आयतुल्लाह नासिर मकारिम शीराज़ी की एक प्रसिद्ध संकलित किताब का नाम तफ़सीरे नमूना है जो पवित्र क़ुरआन की व्याख्या पर आधारित है। 27 जिल्दों पर आधारित इस किताब को आयतुल्लाह नासिर मकारिम शीराज़ी ने कुछ दूसरे शोधकर्ताओं के साथ फ़ारसी भाषा में इस किताब को संकलित किया है और इस किताब का अंग्रेज़ी, अरबी और उर्दू भाषा में भी अनुवाद किया गया है। पवित्र क़ुरआन की व्याख्या पर आधारित किताब तफ़सीरे नमूना की भाषा सरल है जिससे आम लोग बड़ी आसानी से लाभान्वित हो सकते हैं। इसी प्रकार इसका अपटूडेट होना भी इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है। तफ़सीरे नमूना में प्रशैक्षिक दृष्टि से भी ध्यान दिया गया है। इस तफ़सीर में पवित्र क़ुरआन की व्याख्या की शैली यह अपनाई गयी है कि पहले हर सूरे के आरंभ में मूल बिन्दुओं का उल्लेख किया गया है फिर उस परिस्थिति का उल्लेख है जिसमें सूरा उतरा और सूरे में वर्णित महत्वपूर्ण विषयों की ओर संकेत किया गया है और फिर आयत के विषय की विश्लेषणात्मक शैली में समीक्षा और अंत में मानव जीवन से संबंधित मामलों की व्याख्या की गयी है।

    तफ़सीरे नमूना में आयतुल्लाह नासिर मकारिम शीराज़ी और उनके सहकर्मियों ने पवित्र क़ुरआन के कुछ नैतिक, सामाजिक और धार्मिक बिन्दुओं की वर्तमान समय के सामाजिक, सांस्कृतिक यहां तक कि राजनैतिक मामलों से अनुकूलता दर्शाकर मानव समाज के लिए इस किताब के रूप में बहुत मूल्यवान उपहार दिया है। दूसरी ओर आयतुल्लाह नासिर मकारिम शीराज़ी ने इस तफ़सीर द्वारा समाज के विभिन्न वर्गों के लिए पवित्र क़ुरआन को समझने योग्यता मुहैया कर दी है जिससे इस किताब के महत्व का पता चलता है। उदाहरण स्वरूप आयतुल्लाह मकारिक शीराज़ी ने अनुशासन के महत्व के बारे में तफ़सीरे नमूना की दूसर जिल्द में लिखा हैः जीवन चाहे व्यक्तिगत हो या सामाजिक बिना अनुशासन के सुव्यवस्थित नहीं होती। इस आधार पर ईश्वर ने इस अनुशासन के साधन मनुष्य के हवाले किए और धरती की सुव्यवस्थित परिक्रमा को स्वयं उसकी और सूर्य की कक्षा में रखा और इसी प्रकार चांद की सुव्यवस्थित परिक्रमा को समय निर्धारण के लिए बनाया ताकि भौतिक एवं आत्मिक सहित जीवन के कार्यक्रम अनुशासन के अंतर्गत आ जाएं। सोचें यदि दिन और रात सुव्यवस्थित न होते, सूरज और चांद न होते और समय को मापने की कोई कसौटी न होती तो हमारे पूरे जीवन में कितनी बेचौनी होती? इसलिए ईश्वर ने इस वास्तविकता को अपनी ओर से महत्वपूर्ण उपहार की संज्ञा दी है और इस संदर्भ में सूरए यूनुस की आयत क्रमांक 5 में कह रहा हैः उसने सूर्य को जगमगाता बनाया और चांद को प्रकाश दिया और उसके लिए मंज़िले निश्चित की ताकि वर्षों की गिनती और हिसाब लगा सको। ईश्वर ने यह सब कुछ उद्देश्यपूर्ण पैदा किया है। वह अपनी निशानिया उन लोगों के लिए खुल कर बयान किया जो ज्ञान रखते हैं।
    आयतुल्लाह नासिर मकारिम शीराज़ी की एक और मूल्यवान किताब का शीर्षक हैः इस्लाम दर येक निगाह। उनका मानना है कि इस्लाम विश्वदर्शन और आस्था संबंधी सिद्धांतों की जानकारी तथा उसके नवीन नियमों के पालन का नाम है। तो मुसलमानों को चाहिए कि उसके पास इस्लाम की मूल तथा माध्यमिक शिक्षाओं का संतोषजनक ज्ञान होना चाहिए। इस्लाम दर येक निगाह नामक किताब में एक महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि इस किताब में आयतुल्लाह नासिर मकारिम शीराज़ी ने इस्लामी नियमों के प्रशैक्षिक एवं सामाजिक आयाम को बहुत ही सुंदर ढंग से बयान किया है ताकि पढ़ने वाला इस्लामी नियम अच्छी समझ के साथ क्रियान्वित करे।

    वह इस किताब में धर्म की परिभाषा में लिखते हैः जीवन में धर्म की भूमिका को समझने के लिए पहले धर्म की परिभाषा और उसकी प्रवृत्ति को समझना चाहिए और संक्षेप में धर्म की यह परिभाषा होगीः धर्म मनुष्य के विचार और आस्था में सुधार तथा उच्च नैतिक सिद्धांतों के चलन के लिए व्यापक आंदोलन है। धर्म मनुष्य के सामाजिक संबंधों को बेहतर बनाता है और ग़लत भेदभाव को ख़त्म करता है। धर्म ईश्वर पर आस्था और आतंरिक दायित्व की भावना के आधार पर मनुष्य के व्यवहार को सुधारता है।
    आयतुल्लाह नासिर मकारिम शीराज़ी इस किताब में मनुष्य को धर्म की आवश्यकता का पांच कारण बताते हैं। उनके विचार में धर्म नैतिक सिद्धांतों तथा जीवन की कठिन घटनाओं से संघर्ष का आधार मुहैया करता है। मनुष्य धर्म द्वारा वैचारिक शून्य से संघर्ष कर सकता है और धर्म की सहायता से ज्ञान-विज्ञान में प्रगति कर सकता है। आयतुल्लाह मकारिम शीराज़ी भेदभाव से संघर्ष को भी धर्म की एक और विशेषता बताते हैं। इस्लाम धर्म में एक दूसरे पर वरीयता से का मापदंड केवल ईश्वर से भय व सदाचारिता है इसलिए श्वेत और श्याम, निर्धन और धनवान, पुरुष और महिला सबके सब ईश्वर के निकट अपने अच्छे कर्मों के आधार पर परखे जाएंगे न कि भौतिक तत्वों या त्वचा के रंग के आधार पर।
    इस्लाम दर येक निगाह मनुष्य की इस्लाम के संबंध में मनुष्य की पहचान के स्तर को बढ़ा सकती है और धर्म की मनुष्य की आवश्यकता की इस किताब में बड़े अच्छे ढंग से विवेचना की गयी है। संगीत
    हज़रत अली अलैहिस्सलाम के भाषणों, पत्रों और कथनों पर आधारित किताब नहजुल बलाग़ा भी मानवता के लिए मूल्यवान उपहार है। इस काल में भी हज़रत अली अलैहिस्सलाम के तत्वदर्शी कथन बहुत सी सामाजिक व व्यक्तिगत समस्याओं और मानवता की बहुत सी पीड़ाओं का निवारण कर सकती है।
    हालांकि बहुत से इस्लामी विद्वानों ने नहजुल बलाग़ा की व्याख्या की है किन्तु इस मूल्यवान किताब की और विस्तृत व्याख्या की ज़रूरत लगती है और आज के वातावरण में इसकी ताज़ा व्याख्या की ज़रूरत का अधिक आभास किया जा रहा है। यही कारण है कि आयतुल्लाह नासिर मकारिम शीराज़ी ने तफ़सीरे नमूना के लिखने का काम समाप्त होने के बाद नहजुल बलाग़ा की नई व्याख्या पर आधारित किताब लिखने में व्यस्त हो गए और फिर तेरह जिल्दों पर आधारित पयामे इमाम अमीरुल मोमेनीन नामक किताब लिख डाली जिसका अरबी भाषा में भी अनुवाद हो चुका है।

    पयामे इमाम अमीरुल मोमेनीन नामक किताब बहुत ही आकर्षक ढंग से लिखी गयी है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम के कथनों की व्याख्या बहुत ही प्रवाहित व सरल भाषा में लिखी गयी है और सभी महत्वपूर्ण शब्दों की उत्पत्ति का भी इस व्याख्या में उल्लेख किया गया है। इसी प्रकार हज़रत अली अलैहिस्सलाम के भाषणों और पत्रों से संबंधित ऐतिहासिक घटनाओं का भी उल्लेख किया है। आयतुल्लाह मकारिम शीराज़ी ने नहजुल बलाग़ा में आस्था, नैतिकता, समाज और राजनीति से संबंधित विभिन्न विषयों की हज़रत अली अलैहिस्सलाम के काल के मामलों की समीक्षा के साथ पेश किया जिससे पढ़ने वाले को किताब का समझना आसान हो जाता है।

    आयतुल्लाह नासिर मकारिम शीराज़ी ने एक और मूल्यवान किताब लिखी है जिसका शीर्षक है ज़िन्दगी दर परतोए एख़लाक़। इस किताब में आयतुल्लाह मकारिम ने मनुष्य के प्रशिक्षण में नैतिकता की भूमिका का बहुत की सुदंर ढंग से वर्णन किया है। आयतुल्लाह मकारिम जीवन में नैतिकता को विशेष रूप से महत्व देते हैं। वह अपनी किताब की प्रस्तावना में पश्चिमी दृष्टिकोण की आलोचना करते हुए लिखते हैः विश्व के सभी व्यवहारिक क़ानूनों ने कि जो विदित रूप से मनुष्य के कल्याण के लिए क्रियान्वित किए जाते हैं, न केवल यह कि मनुष्य को एक आदर्श जीवन देने में कोई योगदान न दे सके बल्कि भविष्य में इसकी आशा भी समाप्त कर दी है। पता नहीं कब तक इन घिसे हुए सिद्धांतों को बार बार आज़माया जाएगा। ये तो उनका भी समर्थन नहीं करते जो उन्हें लाने वाले हैं तो दूसरों की तो बात ही अलग है। आयतुल्लाह मकारिम का मानना है कि नैतिकता द्वारा मनुष्य अपनी सरकश व विनाशकारी इच्छाओं को लगाम लगा सकता है और ये नैतिकता उसे समाज के लिए एक शुभचिन्तक व भला व्यक्ति बना सकती है। आयतुल्लाह मकारिम नैतिकता पर अधिक ध्यान दिए जाने के महत्व के बारे में आगे लिखते हैः नैतिकता वह सिद्धांत है जो शक्तिशाली लहर की भांति हर रुकावट को पार कर जाता है और मनुष्य की आत्मा में मार्ग पैदा करता है, उससे आत्ममंथन कराता है और उसे उच्च विशेषताओं से संपन्न एक सदाचारी व्यक्ति बनाता है। यह नैतिकता व्यक्ति की सोच को ऊंची बनाती है और इसकी सहायता से वह रुकावट पैदा करने, संकीर्णता, और बदले की भावना को छोड़ देता है और अपने जैसे दूसरे मनुष्य के साथ एक वास्तविक इकाई का भाग बन जाता है।
    आयतुल्लाह मकारिम अपनी किताब ज़िन्दगी दर परतोए एख़लाक़ में प्रशिक्षण को वास्तविक व्यक्ति के निर्माण का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम बताते हैं। वह मनुष्य को ऐसा प्राणी मानते है जिसमें परिवर्तन होता रहता है जो प्रशिक्षण द्वारा उसमें उच्च विशेषताएं पैदा की जा सकती हैं। अलबत्ता ऐसा प्रशिक्षण जो इस्लाम के मार्गदर्शक आदेशों व नियमों पर आधारित हो कि जिसका स्रोत पवित्र क़ुरआन और पैग़म्बरे इस्लाम तथा उनके पवित्र परिजनों के कथन हैं। इस्लामी प्रशिक्षण की यह शैली मनुष्य को यह सिखाती है कि वह किस प्रकार अपने भीतर अच्छे गुण पैदा करे और किस प्रकार अपनी सरकश इच्छाओं को नियंत्रित करे। आयतुल्लाह मकारिम इस किताब में नैतिकता के संबंध में कुछ पश्चिमी विचारकों के दृष्टिकोण की आलोचना तो कुछ विचारकों के दृष्टिकोण की सराहना की है।

    मनुष्य के प्रशिक्षण में अच्छी संगत और सामाजिक वातावरण के महत्व सहित दूसरे मूल्यवान बिन्दुओं का उल्लेख किया गया है। कुल मिलाकर इस किताब को नैतिकता के महत्व और अच्छे नैतिक गुणों को पैदा करने के मार्ग को समझने में बहुत अच्छा मार्गदर्शक कहा जा सकता है।

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