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    आयतुल्लाह नासिर मकारिम शीराज़ी

    आयतुल्लाह नासिर मकारिम शीराज़ी
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    विषयों के आधार पर क़ुरान की व्याख्या “पयामे नूर” आयतुल्लाह नासिर मकारिम एवं अन्य बुद्धिजीवी समूह की मूलियवान रचना है कि जो अद्वितीय विशेषताओं के दृष्टिगत सबके लिए लाभदायक हो सकती है।

    इस पुस्तक के 10 खंड हैं और इसे नई शैली के अनुसार लिखा गया है, यह शिक्षाओं एवं विश्वासों का एक संपूर्ण संग्रह है कि जो ईरान के विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल है।

    पयामे क़ुरान की स्पष्ट विशेषता किसी एक आयत या कई आयतों के संबंध में संक्षेप विवरण है। वास्तव में संक्षेप व्याख्या में विस्तृत अर्थ, पयामे क़ुरान की महत्वपूर्ण विशेषता है। इस बात के प्रमाण हैं कि शोध पर आधारित इस रचना के लाभार्थी वह युवा हैं कि जो सरल और आसान पुस्तकें पढ़ते हैं। वे क़ुरान की इस व्याख्या से क़ुराने मजीद के विषयों की थोड़ी बहुत जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

    आयतुल्लाह नासिर मकारिम ने पयामे क़ुरान के चौथे खंड में ईश्वर में पाये जाने वाले गुणों का विवरण पेश किया है। ईश्वर के ज्ञानी एवं बुद्धिमान होने के बारे में वे लिखते हैं कि ईश्वर सम्मान एवं शक्ति के गुणों से सुसज्जित होने के कारण कोई भी काम करने में असमर्थ नहीं है और उसके निर्णय के सामने कोई रुकावट या अवरोध नहीं है। संसार की हर प्रकार की व्यवस्था पर उसका निंयत्रण है और वह अपने ख़ास बंदों के दोस्तों की सहायता की शक्ति रखता है। वह ज्ञानी होने के दृष्टिगत, अपने बंदों की समस्त आवश्यकताओं, कार्यों के लाभ एवं नुक़सान और समस्त ब्रह्माण्ड के रहस्यों से अवगत है। ईश्वर के इन दो गुणों यानी शक्ति एवं ज्ञान के कारण, संसार में सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था लागू है। आयतुल्लाह मकारिम आगे कहते हैं कि ईश्वर के समस्त कार्य ज्ञान के साथ हैं, अनेक आयतों में ज्ञानी एवं बुद्धिमानी शब्दों का प्रयोग हुआ है, यहां तक कि ईश्वर का दंड या क्षमा कुछ भी बिना हिसाब किताब के नहीं है, बल्कि लोगों की नियतों एवं उनकी नैतिक व जानकारी की योग्यता के आधार पर है।

    आयतुल्लाह नासिर मकारिम शीराज़ी ने प्रयास किया है कि मनुष्य की दैनिक समस्याओं एवं कठिनाईयों का हल क़ुराने मजीद से निकालें और इस ईश्वरयी पुस्तक को मनुष्यों के जीवन में शामिल कर दें। उनका मानना है कि अनैतिकता का संकट और उससे उत्पन्न होने वाली समस्याएं आज के मानव समाज का महत्वपूर्ण विषय है और क़ुराने मजीद एवं इस्लामी ग्रंथों में उससे मुक्ति के रास्तों का उल्लेख किया गया है। जबकि भौतिकवादी बुद्धिजीवियों की कोशिश होती है कि अपनी बुद्धि के आधार पर सामाजिक संकट का समाधान करें, लेकिन परिणामों से सिद्ध होता है कि वे अब तक मानवता को मुक्ति दिलाने वाले समाधान पेश नहीं कर सके हैं। आयतुल्लाह शीराज़ी ने अनैतिकता के संकट के समाधान के लिए क़ुराने मजीद से संपर्क किया है ताकि मनुष्यों के लिए ईश्वरीय समाधान प्रस्तुत करें। उन्होंने तीन खंडों वाली “क़ुरान में नैतिकता” शीर्षक किताब में क़ुरान में नैतिक सिद्धांतो और क़ुरान की प्रकाशमय आयतों के मार्गदर्शन की रोशनी में सदगुणों एवं अवगुणों की समीक्षा की है। आयतुल्लाह शीराज़ी इस किताब के प्रस्तावना में लिखते हैं कि नैतिकता के बारे में विचार करते समय मैं गहरी सोच में चला गया कि कौन से क्रम एवं प्रक्रिया के तहत इस कठिन विषय का अध्ययन करूं? क्या नैतिकता को चार भागों ज्ञान, न्याय, वासना और क्रोध में बांटते हुए यूनान के दार्शनिकों की शैली का अनुसरण करूं? जबकि इसका क़ुराने मजीद की आयतों से समन्वय नहीं है, और न ही त्रुटि से पाक एवं संपूर्ण है, क्या पूर्व और पश्चिम के नैतिक मतों का अनुसरण करते हुए अपनी बात शुरू करूं? जबकि इनमें से हर एक की अपनी समस्याएं हैं और केवल इतना ही नहीं बल्कि नैतिकता के संबंध में क़ुरान की विषय-वस्तु के आधार पर व्याख्या से समन्वय संभव नहीं है। अचानक ईश्वर की कृपा और आंतरिक संदेश द्वारा मेरे दिमाग़ में एक नई शैली का विचार आया कि स्वयं जिसका प्रेरणा स्रोत क़ुराने मजीद है।

    ईश्वर ने क़ुराने मजीद में पूर्वजों एवं पूर्व क़ौमों के इतिहास के विवरण के साथ साथ नैतिक सिद्धांतों का महत्व बयान किया है और यह स्पष्ट किया है कि नैतिक सदगुणों एवं अवगुणों के मानव समाज पर कितना विस्तृत प्रभाव पड़ता है। क़ुरान ने अपनी इस शैली से हर पाठक एवं श्रोता तक तुरंत एवं गहराई से नैतिक संदेश पहुंचाया है। आयतुल्लाह मकारिम शीराज़ी ने भी इस शैली का चयन करके नैतिक गुणों एवं अवगुणों का विवरण पेश किया है और क़ुराने मजीद की आयतों एवं इस्लामी शिक्षाओं में उनकी खोज की है। उन्होंने हर अनैतिक अवगुण के बयान के साथ, उसके चिन्ह, उसकी प्रेरणा, उसके उत्पन्न होने कारण और अंत में उसके उपचार का विस्तृत उल्लेख किया है। उदाहरण स्वपूरूप क़ुरान में नैतिकता किताब के तीसरे खंड में झूठ के बारे में वह लिखते हैं कि इस्लामी शिक्षाओं में झूठ की बुराई के बारे में हिला कर रख देने वाले विवरण हैं, इमाम हसन असकरी (अ) ने इसका विवरण कुछ इस प्रकार किया है “समस्त बुराईयों को एक कमरे में बंद कर दिया गया है और उसकी चाबी झूठ है। बात को जारी रखते हुए इमाम (अ) ने झूठ बोलने के ख़तरनाक परिणामों का उल्लेख किया है और झूठ के प्रथम परिमाण के रूप में झूठ बोलने वाले का समाज में अपमान और लोगों का उस पर से भरोसा उठ जाना बताया है।

    आयतुल्लाह मकारिम शीराज़ी का एक और बहुमूल्य प्रयास, पैग़म्बरे इस्लाम (स) और उनके पवित्र परिजनों के कथनों का उल्लेख है। इस विषय में उन्होंने जीवन के 110 पाठ नामक पुस्तक लिखी है। उनका मानना है कि ईश्वर की किताब क़ुराने मजीद के बाद हमारा सबसे महत्वपूर्ण धन पैग़म्बरे इस्लाम (स) और उनके परिजनों के पवित्र कथन हैं, दुर्भाग्यवश यह हदीसें कि जो ज्ञान का महासागर हैं अभी भी अपरिचित रह हैं। अनेक हदीसें ऐसी हैं कि जिनके एक संक्षिप्त से वाक्य में जीवन के पाठ की पूरी किताब छुपी हुई है, और विभिन्न क्षेत्रों में वे आज के मनुष्य की समस्याओं का समाधान पेश करती हैं।

    आयतुल्लाह शीराज़ी ने अपनी रचना में चुनी हुई हदीसों को उनके सरल अनुवाद एवं संक्षिप्त विवरण के साथ पेश किया है कि जिनकी संख्या 150 है। जो कोई भी इस्लाम को एक संक्षिप्त अध्ययन द्वारा अच्छी तरह जानना चाहता है उसके लिए यह छोटी सी किताब इस्लामी शिक्षाओं का सर्वश्रेष्ठ नमूना है।

    आयतुल्लाह मकारिम शीराज़ी किताब की प्रस्तावना में लिखते हैं कि “किन्तु जो चीज़ सबसे महत्वपूर्ण प्रतीत होती है वह जीवन में उनको व्यवहारिक बनाना और उनका अनुसरण है। इसलिए आइये हम सब ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि पहले इन हदीसों को सही समझने का अवसर प्रदान करे और उसके बाद उनके अनुसरण का सुअवसर हमें प्रदान करे। यह किताब अरबी भाषा में भी अनुवाद होकर प्रकाशित हो चुकी है।

    पूर्व के पिछड़ेपन के रहस्य नामक किताब इस विद्वान की एक दूसरी मूल्यवान रचना है। इस किताब में इस्लाम के उदय की प्रारम्भिक शदाब्दियों में मुसलमानों के प्रकाशमय इतिहास के बावजूद उनके पिछड़ेपन के कारणों की समीक्षा की गई है। इस किताब में आयतुल्लाह शीराज़ी लिखते हैं कि विगत में पूर्व नैतिकता का स्रोत था, उस समय कि जब पूरब विश्व की महान सभ्यताओं का केन्द्र था और वह समय पूरब के इतिहास का स्वर्ण काल माना जाता था इस क्षेत्र के लोगों के विचारों में नैतिक सिद्धांतों प्रभुत्व था। पूरब धीमे धीमे नींद में चला गया और गहरी नींद से जब उसकी आंख खुली तो पश्चिम पूरी तेज़ी से एक औद्योगिक जीवन की ओर दौड़ रहा था तथा उसने पूरब के ज्ञान के धरोहर को स्वयं उससे अधिक अच्छी तरह सुरक्षित रखा और अपने औद्योगिक एवं वैज्ञानिक आंदोलन में उससे अच्छी तह लाभ उठाया। नींद से बोझल पूरब कि जो हड़बड़ा गया था उसने यही बेहतर समझा कि पश्चिम के क़ाफ़िले के पीछे पीछे दौड़ने लगे और धार्मिक मदभेदों समेत सब कुछ उससे मांगे। जबकि स्वयं पश्चिम, जितना अधिक मशीनी जीवन में धंस गया था उतना ही भावनाओं एवं नैतिक मूल्य से दूर हो गया।

    आयतुल्लाह नासिर मकारिम की दृष्टि में पश्चिम विशेष रूप से अमरीका, बाहर से देखने पर एक सुखी एवं आनन्दमय जीवन प्रस्तुत करता है। वास्तव में वह पल पल ईश्वर और वास्तविक जीवन से दूर हो रहा है और उसने पश्चिमी लोगों की चिंताओं एवं परेशानियों में वृद्धि कर दी है और वह भीतर से रोग ग्रस्त है। पश्चिम आध्यात्मिकता से दूर होकर एक भंवर में फंसता जा रहा है।

    आयतुल्लाह मकारिम शीराज़ी ने अपनी किताब मेहदी, महान क्रांति में मानवता के अंतिम मोक्षदाता बारहवें इमाम हज़रत मेहदी (अ) की चर्चा की है और उनके प्रकट होने एवं उनकी क्रांति का उल्लेख किया है। आयतुल्लाह शीराज़ी हज़रत इमाम मेहदी (अ) के वास्तविक जीवन के बारे में लिखते हैं कि इमाम की अनुपस्थिति का कदापि यह अर्थ नहीं है कि अनुपस्थिति काल में इमाम का अस्तित्व काल्पनिक एवं ख़याली है। बल्कि उनका जीवन प्राकृतिक है, लेकिन उनकी आयु लम्बी है। इमाम मेहदी (अ) लोगों के बीच ही हैं, वे विभिन्न क्षेत्रों में रहते हैं किन्तु लोग उन्हें नहीं पहचानते हैं।

    आयतुल्लाह नासिर मकारिम शीराज़ी की दृष्टि में हज़रत इमाम मेहदी (अ) के प्रकट होने के लिए परिस्थितियों का अनुकूल होना आवश्यक है उन्हीं में से एक मानव का उसके लिए तैयार होना है। इसका अर्थ यह है कि विश्व वासियों को अन्याय और अव्यवस्था का विरोध करना चाहिए और मानवीय क़ानूनों की कमज़ोरियों के कारण मोक्षदाता के प्रकट होने की प्रार्थना करनी चाहिए। आयतुल्लाह मकारिम आगे कहते हैं कि विश्व वासियों को यह समझना चाहिए कि विश्व के संकट के समाधान हेतु ऐसी नई व्यवस्था एवं सिद्धांतों की आवश्यकता है जिनका आधार मानवीय मूल्य, धर्म में आस्था, मानवीय भावनाएं एवं नैतिकता हो। अंत में कहा जा सकता है कि विश्व वासियों को मोक्षदाता के प्रकट होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए और उनके प्रकट होने के लिए गहरी आस्था के साथ ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए।

    मोक्षदाता के आने से मानव जीवन में एक नया अध्याय शुरू होगा और न्याय का मीठा स्वाद समस्त विश्व वासियों को चखने को मिलेगा।

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