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    आयतुल्लाह सैय्यद मुजतबा मूसवी लारी – 2

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    वरिष्ठ विवेकी एवं बुद्धिमान धर्मगुरू आयतुल्लाह मूसवी लारी ने अन्तर्राष्ट्रीय इस्लामी प्रचार केन्द्र के माध्यम से मानव समाज की सराहनीय सेवा की है। उनके दृष्टिकोण सराहनीय हैं। उन्होंने समाज की वर्तमान समस्या के बारे में कहा है कि मुख्य समस्या यह है कि हम ईश्वर की आवश्यकता का आभास नहीं करते। आयतुल्लाह लारी के अनुसार वर्तमान समय का मनुष्य, भौतिकता में पूरी तरह से डूब गया है। वह ईश्वर की ओर ध्यान नहीं देता, जबकि पैग़म्बरे इस्लाम (स) के साथी बहुत ही साधारण सा जीवन व्यतीत करते थे। वे लोग बड़े ही संतोष के साथ जीवन की कठिनाइयों को सहन करते थे। इसका कारण यह था कि उनको ईश्वर पर भरोसा था और वे उसकी आवश्यकता का आभास करते थे। इस प्रकार कहा जा सकता है कि पैग़म्बरे इस्लाम के काल में समाज में एकेश्वरवाद की एसी भावना पाई जाती थी जिसमें संतोष के साथ जीवन व्यतीत करने की परंपरा प्रचलित थी। आयतुल्लाह लारी को गहन अध्ययन और अधिक यात्राएं करने के कारण विभिन्न संस्कृतियों का उचित ज्ञान था। वे मानते हैं कि ईश्वर से मनुष्य की दूरी का कारण, धर्म के बारे में पश्चिमी विचारकों के दृष्टिकोण हैं।

    आयतुल्लाह मूसवी लारी का मानना है कि पश्चिम एकदम से धर्मविरोधी नहीं हुआ बल्कि इसाई धर्म और चर्च से विमुख विद्वानों ने उस समाज को धीरे-धीरे धर्म विरोधी बना दिया। इस बारे मे वे कहते हैं कि पश्चिमी समाज के ईश्वर से दूर रहने के कारणों का मैने अध्ययन किया और मैं यह जानना चाहता था कि एसा क्या हुआ कि आज पश्चिम इस स्थान पर पहुंच गया कि वहां के लोग न केवल यह कि कार्यों में ईश्वर की भूमिका को भूल गए बल्कि यह भी नहीं मानते कि वह हर स्थान पर मौजूद है। वे कहते हैं कि अध्ययन करने पर मुझको पता चला कि यह कार्य, पश्चिम में पाठ्यक्रम में परिवर्तन के साथ धीरे-धीरे अस्तित्व में आया।

    पश्चिमी समाजों में लोगों के दैनिक जीवन से आध्यात्म के चले जाने की आलोचना करते हुए मूसवी लारी कहते हैं कि पश्चिम में जब से चर्च ने वैज्ञानिक आंदोलन का विरोध किया और उसने हर आधुनिक चीज़ का विरोध किया इसलिए वहां के विद्वानों ने इसका बदला इसाई धर्म से लेने की ठानी और इस प्रकार ईश्वर को भुला दिया गया। वे कहते हैं कि ईश्वर को अलग कर देना और मनुष्य तथा ईश्वर के सपर्क पर प्रश्न चिन्ह लगाना, पश्चिमी विद्वानों की एक बहुत बड़ी एतिहासिक भूल थी।

    आयतुल्लाह लारी का मानना है कि पश्चिमी विद्वानों ने, राजनीति को धर्म से अलग करने और पश्चिमी समाजिक जीवन से चर्च को अलग करने को ही पर्याप्त नहीं समझा बल्कि उन्होंने पाठ्यक्रम की पुस्तकों में भी फेरबदल किया और पश्चिमी जीवन में ईश्वर को पूर्ण रूप से अलग करने के प्रयास किये। उन्होंने एसे पाठ्यक्रम बनाए जिनमें मनुष्य के आरंभ और अंत का कोई उल्लेख नहीं था अर्थात वह कहां से आया है और उसे कहां जाना है? इस आधार पर वहां ईशवर को धर्म से बिल्कुल अलग कर दिया गया।

    आयतुल्लाह लारी की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि उन्होंने केवल पश्चिमी समाज की समस्याओं का ही उल्लेख नहीं किया है बल्कि उसकी आलोचना के साथ ही इसका उचित समाधान भी प्रस्तुत किया है। इस बारे में उनका मानना है कि ईश्वर के महत्व और उसके स्थान का उल्लेख पुनः वहां के पाठ्यक्रमों में किया जाए वे कहते हैं कि यदि आप यह चाहते हैं कि मानवता, एकेश्वरवाद के स्रोत की ओर वापस आए, यदि यह चाहते हैं कि मानवता ईश्वर से दूरी और पहचान के संकट जैसी हीनता के चुंगल से बाहर आए तो इसका आरंभ धार्मिक विषयों को ही किया जाना चाहिए। वे कहते हैं कि क्योंकि वहां पर लोगों को ईश्वर से दूर करने का कार्य बहुत ही सुनियोजित कार्यक्रम के अन्तर्गत लंबे समय तक किया गया इसलिए इसका मुक़ाबला भी इसी प्रकार से किया जाना चाहिए। पाठ्यक्रम में ईश्वर के विषय को पुनः वापस लाने का कार्य आम लोगों की ओर से नहीं होना चाहिए बल्कि इस आन्दोलन का संचालन धर्मगुरूओं और धर्म का ज्ञान रखने वालों की ओर से किया जाए।

    आयतुल्लाह लारी की दृष्टि में ईश्वर की पहचान और ईश्वरीय बातों की पहचान का मुख्य स्रोत पवित्र क़ुरआन है। उनका मानना है कि ईश्वरीय मार्ग को स्पष्ट करने हेतु किये जाने वाले शोधों का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत, क़ुरआन ही है। वह व्यक्ति जो ईश्वर की आवश्यकता का आभास करता है वह उसे क़ुरआन में पा सकता है। पवित्र कुरआन की स्पष्टतम आयतों में से एक आयत का नाम है आयते नूर। इसमे कहा गया है कि ईश्वर, धरती और आकाश का प्रकाश है। यह प्रकाश एसे (चराग़ों) की भांति है जिसके भीतर (चराग) हों। ईश्वर जिसका भी चाहता है उसका मार्गदर्शन अपने प्रकाश की ओर करता है। और ईश्वर हर चीज़ को जानता है।

    इस आयत की व्याख्या में आयतुल्लाह लारी कहते हैं कि यदि कोई अंधकार में चलना चाहता है तो उसके हाथ में किसी प्रकार का प्रकाश होना चाहिए जो उसे मार्ग दिखाए ताकि वह रास्ता न भटकने पाए और अपने लक्ष्य तक सरलता से पहुंचे। वास्तविक मार्ग तै करने तथा हृदय के अंधकार से दूरी के लिए भी एक चेराग़ की आवश्यकता होती है जो मार्गदर्शन का प्रकाश होता है। यह ईश्वरीय प्रकाश से प्रजवलित होता है और मार्गदर्न करता है। यदि कोई व्यक्ति सफलता का इच्छुक है तो उसे मार्गदर्शन के प्रकाश के माध्यम से ईश्वर की ओर बढ़ना चाहिए।

    ईश्वरीय मार्गदर्शक, मानव जाति के लिए सर्वोत्तम मार्गदर्शक और कल्याण तक पहुंचने का प्रकाश थे। मूसवी लारी का मानना है कि ईश्वरीय दूतों ने सशक्त तर्कों के माध्यम से मानव जाति को चिंतन की सबसे अच्छी शैली सिखाई। उन्होंने मानव के लिए चिंतन का एसा दरवाज़ा खोला जो वास्तविकता की ओर जाता है। इन ईश्वरीय दूतों ने समाज में प्रचलित ग़लत परंपराओं को बदल दिया। उन्होंने बुरी आदतें समाप्त करवाईं और लोगों का एकेश्वरवाद की ओर मार्गदर्शन किया। वे मानव जाति को एकेश्वरवाद की छत्रछाया में लाना चाहते थे और बुद्धि तथा ईश्वरीय भय पर आधारित सत्ता को लागू करने के इच्छुक थे। ईश्वरीय दूत मानव का सदैव रहने वाले कल्याण की ओर ल जाना चाहते थे।

    आयतुल्लाह मूसवी लारी ने इस्लामी शिक्षाओं के प्रसार केन्द्र के माध्यम से विश्व के बहुत से लोगों से संपर्क स्थापित किया। उनके द्वारा स्थापित इस्लामी केन्द्र का मुख्य कार्य, इस्लाम से संबन्धित लोगों के प्रश्नों का उत्तर देना और उन्हें पुस्तकें विशेषकर पवित्र क़ुरआन भेजना था। इस केन्द्र में जहां मूसवी लारी द्वारा लिखी गई पुस्तकों का अनुवाद किया जाता था वहीं पर यहां, पवित्र क़ुरआन, नहजुल बलाग़ा और सहीफए सज्जादिया का अनुवाद विभिन्न भाषाओं में किया जाता है।

    इस्लामी शिक्षाओं के प्रसार केन्द्र में न केवल विश्व की बहुत सी भाषाओं जैसे अंग्रेज़ी, फ़्रांसीसी, स्पैनिश, उर्दू, इटैलियन, ताजिकी, मलायम, थाईलैंडी और तमिल आदि में अनुवाद किया जाता है बल्कि कुछ स्थानीय भाषाओं में भी अनुवाद का कार्य किया जाता है।

    अंग्रेज़ी भाषा में “सहीफ़ए सज्जादिया” के अनुवाद की, जो इमाम सज्जाद के कथनों और उनकी प्रार्थनाओं का संकलन है, इसाइयों में बहुत मांग है। डा. फ़िलिप कहते हैं कि उनके एक कार्डिनल मित्र ने प्रार्थना के कार्यक्रम में सम्मिलित करने के लिए सहीफ़ए सज्जादिया ली। वैटिकन के पुस्तकालय में जब सहीफ़ए सज्जादिया का अनुवाद पहुंचा तो इसको देखकर पुस्तकालय के प्रभारी ने एक पत्र भेजकर आयतुल्लाह लारी का आभार व्यक्त करते हुए लिखा कि इस पुस्तक में आध्यात्मिक और तत्वदर्शी विषय मौजूद हैं। इसीलिए इस पुस्तक को पुस्तकालय में शोधकर्ताओं के लिए रखा गया है।

    इस्लाम, मानव निर्माण का धर्म है। यह धर्म, मानव जाति का बहुत अच्छा प्रशिक्षण करता है। एसे लोगों का जो दिखावे के लिए नहीं बल्कि वास्तव में जनसेवा करते हैं और ख्याति के इच्दुक नहीं होते। आयतुल्लाह लारी को भेजे जाने वाले हज़ारों पत्रों में उनका आभार व्यक्त किया गया। वे कहते हैं कि यह कार्य हमारी ओर से नहीं था बल्कि यह ईश्वर की ओर से था। आयतुल्लाह लारी कहते हैं कि हे ईश्वर! यदि मैंने तेरे धर्म के मार्ग में कोई कार्य किया है तो वह तेरी दी हुई शक्ति से ही किया है। मेरे हाथ को तूने पकड़ा है, मार्ग तूने दिखाया और प्रभाव भी तूने उत्पन्न किया। वे कहते हैं कि यदि ईश्वर की सहायता न होती तो फिर मेरे पास कहने और लिखने के लिए कुछ नहीं था।

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