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    आयतुल्लाह मोहम्मद तक़ी फ़लसफ़ी – 2

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    निःसंदेह भाषण देने में दक्ष एवं निपुण होना एक ऐसी ईश्वरीय कृपा है कि जो हर किसी को प्राप्त नहीं होती। अगर कोई वक्ता इस कला को ज्ञान और विद्या एवं गहरी दृष्टि के साथ जोड़ दे तो उसका भाषण आकर्षक एवं मार्गनिर्देशक हो जाता है। आयतुल्लाह मोहम्मद तक़ी फ़लसफ़ी एक ऐसे ही वक्ता थे कि जिनका अस्तित्व बुद्धिमत्ता और भाषण देने की कला का संगम था, इसी कला ने उनके भाषण में मिठास भर दी थी। उनके भाषण कुछ इस प्रकार से होते थे कि जहां आम नागरिक उनसे लाभ उठाते थे वहीं सिद्धांतकार भी लाभान्वित होते थे। उन्होंने अपने खोजी मन द्वारा समाज की आवश्यकताओं को अच्छी तरह समझ लिया था और उनके बारे में अध्ययन एवं चिंतन मनन करके वे अपने भाषणों में उन्हें प्रस्तुत करते थे।

    सन् 1947 में आयतुल्लाह बोरुजर्दी जब शियों के वरिष्ठतम धर्मगुरु बने, आयतुल्लाह फ़लसफ़ी उनके निकट साथियों में से थे। वे मोहर्रम के दिनों में आयतुल्लाह बोरुजर्दी के घर में भाषण दिया करते थे और रातों को हज़रत फ़ातेमा मासूमा (स) के पवित्र मज़ार के प्रांगण में भाषण देते थे। हज़रत फ़ातेमा मासूमा (स) के पवित्र मज़ार में आयतुल्लाह फ़लसफ़ी जो भाषण देते थे रेडियो से उनका सीधा प्रसारण किया जाता था, लोगों पर उन भाषणों का बहुत गहरा प्रभाव पड़ता था।

    इसके अलावा, आयतुल्लाह बोरुजर्दी के प्रोत्साहन पर आयतुल्लाह फ़लसफ़ी ने तेहरान में क़ुरान की व्याख्या के कार्यक्रम का आयोजन किया और वर्षों तक हर शुक्रवार की सुबह अपने निवास में धार्मिक शिक्षा केन्द्र के गुरुओं एवं छात्रों के लिए क़ुरान की शिक्षाओं का विस्तारपूर्वक उल्लेख करते थे। इसी प्रकार विद्वानों की मांग के दृष्टिगत, वे छात्रों को भाषण की कला का प्रशिक्षण देते थे।

    सामान्यतः आयतुल्लाह फ़लसफ़ी का भाषण, महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दों एवं समस्याओं की सही पहचान पर आधारित होता था। भाषण से पहले वे भाषण के विषय का विस्तारपूर्वक एवं गहराई से अध्ययन करते थे और अपनी बातों को बड़ी ही सुन्दर एवं नई शैली में प्रस्तुत करते थे। उनका भाषण वर्तमान राजनीतिक एवं महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दों से संबंधित होता था। आयतुल्लाह फ़लसफ़सी बहुत ही समझदारी एवं चतुरता से तानाशाही की आलोचना करते थे और कभी कभी स्पष्ट रूप से उसका विरोध करते थे तथा इस्लाम के सम्मान की रक्षा करते थे। इन भाषणों ने जनता को जागरुक करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वास्तव में आयतुल्लाह फ़लसफ़ी के राजनीतिक विचारों का स्रोत क़ुराने मजीद और पैग़म्बरे इस्लाम (स) एवं उनके परिजनों के पवित्र कथन थे। राजनीतिक मामलों में इस्लामी इतिहास से लाभ उठाते हुए वे यह दर्शाते थे कि इतिहास में सदैव अत्याचार एवं अत्याचारी का विनाश हुआ है। इस संदर्भ में वे स्वयं कहते हैं कि बनी उमय्या के शासकों ने पवित्र इमामों पर जो अत्याचार किए और उन्हें कष्ट पहुंचाये जिसके बाद क्रांति के परिणाम स्वरूप बनी अब्बास ने सत्ता संभाली और बनी उमय्या का पतन हुआ मैं उसका उल्लेख करता था। उसके बाद इस प्रकार के विषयों के विवरण से निष्कर्ष निकालता था कि अत्याचारों एवं असमानताओं की प्रतिक्रिया होती है और कदापि यह बिना प्रतिक्रिया के नहीं रहते। यह राजशाही शासन व्यवस्था पर एक चोट होती थी कि जो नरेश को यह समझाती थी कि वह बाक़ी नहीं रहेगा और लोग एक दिन उसके अत्याचारों एवं असमानताओं का उत्तर देंगे। इसी प्रकार तानाशाही सरकार द्वारा इस्लामी सिद्धांतों एवं नियमों को पालन नहीं करने के कारण आयतुल्लाह फ़लसफ़ी उसकी कड़ी आलोचना करते थे और इस संबंध में भरसक प्रयास करते थे।

    1940 और 1950 के दशकों में आयतुल्लाह फ़लसफ़ी के महत्वपूर्ण आंदोलनों में से एक ईरान में बहाईयों के ख़िलाफ़ आंदोलन था। इस पथभ्रष्ट समुदाय को ब्रितानी साम्राज्यवाद के जासूस मुसलमानों के बीच फूट डालने के लिए अस्तित्व में लाए थे। बहाईयों का मानना है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) के बाद एक दूसरा ईश्वरीय दूत प्रकट होगा, उनके धार्मिक विश्वास बहुत ही घटिया एवं भटकाने वाले हैं।

    उस समय पथभ्रष्ट समुदाय बहाई का सरकारी विभागों और दरबार में काफ़ी प्रभाव था और वे ईरान भर में लोगों पर अत्याचार एवं उनके अधिकारों के हनन में व्यस्त थे। लोग विभिन्न शहरों से आयतुल्लाह बोरुजर्दी को पत्र लिखते थे और बहाईयों की काली करतूतों की शिकायत करते थे। इससे आयतुल्लाह बोरुजर्दी को बहुत दुख हुआ, इसलिए उन्होंने आयतुल्लाह फ़लसफ़ी को पत्र को लिखा ताकि वह नरेश से मुलाक़ात करें और उनकी चिंताओं से उसे अवगत करायें। लेकिन आयतुल्लाह फ़लसफ़ी ने भलाई इसमें देखी कि वे इस मुद्दे को नरेश की मस्जिद में अपने भाषणों में उठाएं, उनके इन भाषणों का रेडियो पर सीधा प्रसारण होता था। आयतुल्लाह बोरुजर्दी की सहमति से वर्ष 1332 हिजरी शम्सी में रमज़ान के महीने में आयतुल्लाह फ़लसफ़ी ने बहाईयत के चेहरे से पर्दा उठाया। इस भाषण के बाद पूरे देश में बहाई समुदाय के ख़िलाफ़ एक लहर चल पड़ी। आयुल्लाह फ़लसफ़ी ने उल्लेख किया कि उनका उद्देश्य बहाईयों की पथभ्रष्टता का रहस्योद्घाटन है तथा किसी मुसलमान को उनकी हत्या का अधिकार नहीं है। देश भर में लोगों की भावनाएं बहाईयों के विरुद्ध भड़क उठीं, इस प्रकार कि नरेश को बहाईयों की गतिविधियों के केन्द्र को बंद करने का आदेश देने के लिए विवश होना पड़ा और इस केन्द्र का गुंबद भी ध्वस्त कर दिया गया।

    आयतुल्लाह फ़लसफ़ी के भाषणों का एक अन्य महत्वपूर्ण विषय, परिवार एवं समाज में इस्लामी नैतिकता का प्रशिक्षण था। आयतुल्लाह फ़लसफ़ी का युवकों की ओर विशेष ध्यान था और वे सदैव युवाओं की समस्याओं एवं उनके प्रशिक्षण के विषय को अपने भाषणों में महत्व देते थे। माता एवं पिता कि जिनकी अपने बच्चों की शिक्षा दीक्षा में बहुत प्रभावी एवं महत्वपूर्ण भूमिका होती है आयतुल्लाह फ़लसफ़ी के भाषणों के संबोधन का पात्र थे। यहां तक कि आयतुल्लाह फ़लसफ़ी ने युवाओं एवं वृद्धों के लिए चार खंडों में एक किताब लिखी, पाठकों ने इसका काफ़ी स्वागत किया।

    आयतुल्लाह फ़लसफ़ी ने इसी प्रकार नैतिक सिद्धांतों के बारे में किताबें लिखीं और भाषण दिए। वे स्वयं भी व्यवहारिक रूप से नैतिक सिद्धांतों से सुसज्जित थे और नैतिक सिद्धांतों का पालन करते थे। मित्र एवं लोग इस प्रसिद्ध वक्ता का अच्छे शिष्टाचार के कारण बहुत सम्मान करते थे। उन्होंने इस्लामी नैतिकता को अपने जीवन का ध्रुव बना लिया था, इस प्रकार कि वे नैतिकता के गुरु के रूप में प्रसिद्ध हो गए थे तथा उनके मित्र एवं साथी उनसे लाभान्वित होते थे।

    उनके बच्चों का कहना है कि आयतुल्लाह फ़लसफ़ी अपनी पत्नी का बहुत सम्मान करते थे और जैसे जैसे उनकी आयु में वृद्धि हो रही थी अपने जीवन साथी से उनके लगाव में वृद्धि हो रही थी। स्वयं वे इस संदर्भ में कहते थे कि जैसे जैसे मेरी आयु बढ़ती जा रही है अपनी पत्नी की आध्यात्मिकता, विशिष्टता, धर्म में गहरी आस्था और आध्यात्मिक महत्व मेरी दृष्टि में अधिक प्रकट होता जाता रहा है। इसी प्रकार आयतुल्लाह फ़लसफ़ी ने अपनी पत्नी की विशेषताओं के बारे में कहा था कि मेरी पत्नी की उत्कृष्ट विशेषताओं में से एक दृढ़ साहस एवं ऊंचे विचार थे।

    आयतुल्लाह फ़लसफ़ी इमाम ख़ुमैनी की भांति सदैव अपनी पत्नी को ख़ानम अर्थात श्रीमती कह कर बुलाते थे, इससे आयतुल्लाह फ़लसफ़ी का अपनी पत्नी के प्रति सम्मान एवं लगाव स्पष्ट होता है।

    वर्ष 1979 में ईरान की महान इस्लामी क्रांति की सफ़लता के बाद आयतुल्लाह फ़लसफ़ी इमाम ख़ुमैनी के साथ सक्रिय रूप से उपस्थित रहे और अधिक आयु होने के बावजूद उपदेश एवं भाषण देकर अपना कर्तव्य पूरा करते रहे। वे स्वयं को इमाम ख़ुमैनी का श्रद्धालु मानते थे और सदैव इमाम ख़ुमैनी के मार्ग पर चलते थे। इस्लामी क्रांति के बाद वामपंथी, पश्चिम समर्थित एवं वर्चस्ववादी पार्टियां और दल जनता एवं इस्लामी क्रांति को भटकाना चाहते थे। आयतुल्लाह फ़लसफ़ी कि जो इन राजनीतिक दलों की नीतियों से अच्छी तरह अवगत थे, अपने भाषणों में उनकी प्रवृत्ति और वर्चस्ववादी शक्तियों से उनके संबंधों एवं झूठे वादों का लोगों के सामने रहस्योद्घाटन करते थे। यही कारण था कि इस्लामी क्रांति के बाद के प्रारम्भिक वर्षों में यह दल आयतुल्लाह फ़लसफ़ी पर अधिक प्रहार करते थे। आयतुल्लाह फ़लसफ़ी को मुसलमानों एवं इस्लामी हितों के अलावा और कोई चिंता नहीं थी और कभी भी उन्होंने शक्ति एवं धन प्राप्ति का प्रयास नहीं किया। लोगों को भटकने से रोकने को वे अपना दायित्व मानते थे और इस संदर्भ में भरसक प्रयास करते थे।

    वर्षों तक इस्लाम के मार्ग में परिश्रम एवं प्रचार प्रसार करके अंततः 1998 में 93 वर्ष की आयु में वे इस दुनिया से चले गए, उन्हें तेहरान के उपनगर में स्थित शहरे रैय में हज़रत शाह अब्दुल अज़ीम हसनी (अ) के पवित्र मज़ार में दफ़्न किया गया।

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